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Full text of "Kavya Kalpdrum Part -1"

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प्रकाशक 


जगलाथप्रसाद शर्मा, 
चुड़ीवालों का मकान, मथुरा | 


मिलने का पता-- 
साहित्यरत्र भण्डार, 
आगरा | 








प्रथम संस्करण (अलक्लारप्रकाश ) वि० सम्बत्‌ १६५६ 

हितीय संस्करण ( काव्यकल्पद्रम ) वि० सम्वत्‌ १६८३ 

तृतीय संस्करण ( काव्यकल्पद्गुम दो भागों में ) रसमझ्री 
वि० सम्वत्‌ १६६१ ओर अलकझ्कारमशरी 
वि० सम्बत्‌ १६६३ 


चतुर्थ संस्करण ( काठ्यकल्पद्रुस प्रथम साग रसमझ़री ) वि० 
सम्वत्‌ १६६८ 








मुद्रक 
सत्यपाल शर्मा, 
कान्ति प्रेस, माईैथान-आगरा | 


नोट--पुस्तक प्रकाशक से ऊपर के पते से भी मिल सकती है। 


न्त ध१्४' 
ध्वनि के भेदों की संथ्या ,. २७३, २७४, रेप्ट४ड 


“-थ्वनि पर महिममड् के मत का खरडन २६६ 
--स्वतः सम्भवी ध्वनि ह - र६३ 
ध्वनिकार ( या .ध्वन्यालोक ) १०४, १७६, २७५, २६१, ३२१, 


३२३, २३२४, ३२५४, २२३४, ३३८, 


२७६, ३७६, ३८०, ३८७, रेप८ 
स्चन्याथ प्प्० 


ध्वन्यालोक ( देखो ध्वनिकार ) 
ध्वन्यालोकलोचन ( अमिनव गुप्ताचार्य प्रणीत ) १७०, २४६, २७५४ 


व्चन्यालोक बृत्ति १७६ 
ने 

नवोढा ( नायिका ) ः श्पररे 

नागेश भट्ट ( परमालघुमज्जूपषा ) २२४ 

नागोजी भट्ट ( देखो नागेश भट्ट ) 


नाव्य शास्त्र ( भरत मुनि प्रणीत ) ११७, ११८, १२१, १२२, १२३, 
१४८, १६४, १६४५, १६७, १७०, 
२७७, ३७८५ रैप्णए, २३२, २३८ 


नायक श्ट्र० 
+-के भेद ' श्प्र्ड 
--श्रदिव्य । ३२६० 
दिव्य ३६० 
“+दिव्यादिव्य ३२६० 
--श्रीरललित ३६० 
--धीरोदात्त ३६० 
--चीरोद्वत रे&० 
--प्रशान्त ' ३६० 


नायिका भेद शैट०-रैष्४ 


विषय-सुची 


व. री ५ 
( विषय-अलुसन्धान के लिये ग्रन्थान्त में विस्तृत 
शब्दानुक्रमणिका देखिए ) 


विषय पृष्ठ | विषय. - न्पृछ् 
सहायक संस्कृत अन्थो की सूची ५ | शाब्दी और अर्थी व्यम्जना 
उद्घुत पद्यों के कवियों की का विघय विभाजन- १०१ 
नामावली ७। तात्यय्यादबृत्ति श्०र्‌ 
भूमिका ११ | चतुथ स्तवक ( प्रथम पुष्प ) 
आन के ४१ हा मे पर 
बजा का जद हे ध्वनि के भेदो की तालिका १०६ 
काव्य है लें ५७ | फणामूला ध्वनि १०७ 
ध्वनि का सामान्य लक्षण. ४४ जा पक सं 
. असलक्ष्यक्रम ध्वनि ११५ 
गुणीभूत व्यंग्य का सामान्य रस ९१७ 
डरे का सामान्य लक्षण कु अल रे 
अनुमाव श्श्६्‌ 
द्वितीय स्तवक सात्विक भाव १२० 
शब्द ओर अथ ५.० | सश्जारी-व्यभिचारी भाव १२३ 
अभधिषधा घ४ | स्थायी साव १४१ 
लक्षणा ४६ । स्थायी भावों की रस-अवस्था १४६ 
तृत्तीय स्तवक रस की अभिव्यक्ति श्प६ 
व्यक्षना ७६ | रस का आस्वाद १६४ 
व्यज्जक शब्द और व्यंग्याथ ७६ | रस की अलोकिकता १७२ 
व्यञ्जना के भेद प्र & 
अभिषा-मूला शाब्दी व्यक्षना ८दर | जल ( छ्वितीय पुष्प ) 
लक्षणा-मूला शाब्दी व्यक्षना ८६ | *य्ज्ञार रस श्ष्पर 


आर्थी व्यज्लना ६१ | हास्य रस १६६ 


( ४) 


विषय द्ड 
करण रस २०५, 
शेद्र स्स २०६ ; 
चीर रस २१३ 
अयानक रस २२२ 
ब्ीमत्स रस २२४ 
अदभुत रस र्र६ 
शान्त-स्स २३२ 
चतुर्थ स्तवक ( ठुतीय पुष्प ) 
भाव र्र्८ 
श्साभास २४५ 
भावाभास २५४० 
आवशान्ति रघ१ 
आवोदय 
भावसन्धि रपप 
भावशवलता १५७५, 


चतुथ स्तवक ( चतुर्थ पुष्प ) 
संलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि 


२५४७ 
अलड्डाय ओर अलड्जार रघ६ 
व्वुनि-संकर ओर संसृष्टि.. २७६ 


रू 
चतुथ स्तवक « पन्चस पुष्प ) 
व्यज्जना शक्ति का प्रतिपादन २८४ 


पन्न्चस स्तव॒क 

गुणीभूत व्यग्य २६६ 
गूद व्यग्य रह 
अपराड्ध व्यग्य ३०३ 


विषय हर 
वाच्यसिध्यज्ध व्यंग्य रे१४ 
अस्फुट व्यंग्य ३१६ 
सन्दिग्ध प्राघान्य व्यंग्य. ३२१७ 
ठुल्य प्राघान्य व्यंग्य २१७ 
काक्ाछिस व्यंग्य रैप्् 
असुन्द्र व्यग्य ३२० 
गुणीभूत व्यंग्य के भेदों की 
संख्या गज 


ध्वनि और गुणीभूत व्यंग्य के 


मिश्रित भेद श२६ 
ध्वनि ओर गुणीमभूत व्यंग्य 
का विषय-विभाजन इ२९ 
षष्ठ स्‍्तवक 
गुण का सामान्य लक्षण रै९७ 
गुण और अलक्लार ३२६ 
रस और अलड्ढार ३२२६ 
गुणों की संख्या रैरेप 
माधु्य गुण हे रे६ 
ओज गुण 538 
प्रसाद गुण 5 
सप्तम स्तवक 
दोप का सामान्य लक्षण रे४*+ 
शब्द दोष रे४५ 
अथ दोप पे 
रस दोष डे७३े 


सहायक सस्क्ृत- ग्रन्थ की नामावली 


अग्निपुराण--भगवान्‌ वेदव्यास, आनन्दाश्रम, पूना 

अभिधावत्तिमातृका--मुकुल भट्ट|। निर्णयसागर-प्रेस, . बम्बई, 
सन्‌ १६१६ 

अलड्डारसवंस्व--रुव्यक ओर मद्ुक, जयद्रथ-कृत विमशनी व्याख्या, 
निर्णयसागर प्रेस बम्बई, सन्‌ १८६३ 

अलड्लारसूत्र--रुव्यक और मद्डक, समुद्रबन्ध-कृत व्याख्या, अनन्त- 
शयन, सन्‌ १६२६ 

उज्ज्वलनीलमणि--श्रीरूपगोस्वामी, नि० सा०, बम्बई, सन्‌ १६१३ 

एकावली--विद्याधर, बोंवे संस्कृतसीरीज 

ओचित्यविचारचर्चा--्षेमेन्द्र, नि० सा० प्रेस, बम्बई, सन्‌ १८८ 

कविकण्ठामरण--्षेमेन्द्र, नि० सा० प्रेस, बम्बई, सन्‌ श्यू८६ 

काव्यप्रकाश--आचार्य श्रीमम्मट, वामनाचायं-कृत 'बालबोधिनी' 
व्याख्या नि० सा» प्रेस, सन्‌ १६०१ “काव्यप्रदीप' ओर “उद्योतव्याख्या', 
आनन्दाश्रम, पूना 

काव्यमीमांसा--राजशेखर, गायक्रवाड सीरीज बडोंदा, सन्‌ १६२४ 

काव्यालड्वार--आ्राचाय भामह, चोखंबा संस्कृतसीरीज विद्याविलास 
प्रेस, बनारस, सन्‌ १६१८ 


काव्यालड्वारसार-संग्रह--उद्धट, मण्डारकर, इन्स्टीट्ट, पूना, 
सन्‌ श्ध्रप्‌ 


काव्यालड्वारसूत्न---वामन, सिहभूतराल-कृत कामघेनु व्याख्या, विद्या- 
विलास प्रेस, चनारस सन १६०७ 

काव्यालड्ञार--रुद्रट, नि० सा०, प्रेंस सन्‌ १८८५ 

कान्यादश--दर्डी, कुसुमप्रतिमा व्याख्या लाहोर 


( ६) 


कान्यानुशासन ओर उसकी विवेक व्याख्या, हेमचन्द्र नि० सा०, 
श्रेंस सन्‌ १६०१ 
कुवलयानन्द--अ्रणय्य दीक्षित 
चन्द्रालोक--पीयूषवर्ष जय॑देव, गुजराती प्रिंटिंग प्रेस, बम्बई, 
सन १६२३ 
« चित्रमीमासा--अ्रणय्य दीक्षित, नि० सा०, प्रेस सन्‌ १८६३ 
दशरूपक--धनिक, नि० सा०, प्रेस सन्‌ १६२७ 
ध्वन्यालोक--ध्वनिकार और ओआनन्दवर्धनाचायं, अभिनव- 
गुप्ताचार्य-कत 'लोचन' व्याख्या नि० सा० प्रेस, सन्‌ १८६१ 
नास्यशास्त्र--भश्रीमस्तमुनि, अभिनवगुप्ताचार्य-कृत अभिनवभारती 
व्याख्या, अध्याय १-६, गायकवाड सीरीज बड़ोंदा, सन्‌ १६२६ 
. भगवद्धक्तिस्सायन--श्रीमघुसूदन स्वामी, अच्युतग्रन्थमाला, बनारस, 
'वि० सं० १६८४ 
रसगड्जाधघधर--परिडतराज जगन्नाथ, नि० सा० प्रेस, सन्‌ श्८६४ 
रसतरड्ि णी--भानुदत्त, बनारस लीथो प्रेस 
वक्रोक्तिजीवित--कुन्तक, ओरियंटल सीरीज्ञ, कलकत्ता, सन्‌ १६२८ 
व्यक्तिविविक--महिम मद्ट, चोंखम्भा संस्कृबसीरीज बनारस 
चइत्तिवार्तिक--अप्यय्य दीक्षित, नि० सा» प्रेस, सन्‌ १६१० 
शब्दव्यापारविचार--श्रीमम्मठ, निं० सा० प्रेस 


. श्रुद्वास्प्रकाश--श्रीमोजराज, २२-२३-२४ प्रकाश, लॉ-प्रिंटिंग, 
मदरास, सन्‌ १६३३ 


सरस्वतीक्रएठाभरण--श्रीभोजराज, नि० सा० प्रेस सन्‌ १६२७, 

साहित्यद्पण--विश्वनाथ, पं० शिवदत्त-कृत रुचिरा व्याख्या 
ओवेड्डटेश्वर-प्रेस, वि० सं० १६७३ 

साहित्यदपेण---विश्वनाथ, श्रीकाशे-सम्पादित नि० सा०, सन्‌ १६३३ 


हरिमक्तिस्साम्ृतसिन्धु--श्रीरूपगोस्वामी, अच्युतग्रन्थमाला, बनारस, 
(बि० सं० श्ध्पप 





इस गअन्थ में जिन कवियों के पद्म उदाहरणां में 
दिये गये हैं उनकी नामावल्ती पद्य ( छन्द ) 
संख्या के श्रनुसार 


अनूपजी--७२५ 

अयोध्यासिंहजी हरिओऔध' ( प्रियप्रवास )--११४, १७५। 

अज्ञात कवि--२१, ४६, ७८) ११३, १४८, १४५८, १७४५, 
२०४, २२१, २२२, २३६, *४०, २७१, २२६, ररे८, २७४; 
३६२, ४०७। 

आलम--१२१, २४३ | 

उजियारे---६७, १७८ २४० । 

कन्हैयालाल पोद्दार ( इस ग्रन्थ का लेखक )--9 9 के » 
११, १३, १७, १५, १७ १६ रेफऐ रे#। ऐेशि १७ र८, २६५ 
३१, ३३ से ४५ तक, ४८, ४०, ४३ ४४१३ ४९ ९०, ३१, 5४, 
६५; ६६५ ७४, ७४५, ७७, ७६५ पहि ८७, ८७ ६४) ६४५, ६६, ध्८, 
६६, १००, १०४, १०४५, ११२, ११६, ११८, १९९, १२३, १२६, 
१३०, १३२, १३४ से १३६ तक, १४१, १४४ १४३, १४३, 
१५६; १६१, १६३, १६८, २१६६, १७१, १७३, १७, १८०५ १्प३, 
१८७, १६२, १६३, १६८, १६६, २००, २०२, २०८, २१६, ९९६, 
२३३, २३४, २३६, २४२, २४४, २४०, २४८, २५१, र४३, ४५ 
२४६, २६१, २६६, २७०, २७२, २७३, २७४, २७८, २७६, रे८०, 
र८३ से २६० तक, २६३ से २६६ तक, २६८, २०१, ३२०३, ३०४, 
३०६, ३०७, ३०८, २१०) ३११, ३१२९, ३१४, ३११६, ३१९७, ३१५८५ 
३१६, ३२०, ३२२, ३२३, ३२४, देर, ३२६, रेरेफ, २३० रेरेर से 


( 5 9) 


३३७ तक ३३६, ३४२ से ३४६ तक ३४८, ३४०, ३४१; रे४३, 
३४४, ३५६ से २५६, २६१, ३९५, ३६६, र२े१६, २७०, ३७२, २७७, 
३८०, रे८१ से ३६१ तक ३६६, ४००, ४०१, ४०४, ४०४, ४०७, 
४०८, ४०६ से ४१४ तक ४१६; ४१७, ४२० से ४२७ तक ४३० से 
४४६ तक, ४४८ से ४५४६ तक ४३६१, ४६२, ४६९४, ४६९५, ४६७, 
४६८, ४७० से ४७४ तक ४७६, ४७७ । 

कविन्द--४७४ | 

कुमारमणि मिश्र (रसरसाल)--३५५ । 

कुलपति मिश्र ( रसरहस्य )--२०४५, २१७, २६७, ३४६। 

केशवदासजी ( महाकवबि )--४, ७०, २४३ । 

क़ष्णु--२२३ | 

गणेशपुरीजी गुसांई ( कर्ण पर्व )--४६, १८६, २१६ । 

ग्वालजी--५, ११६, १२६, १६०, १६६, १७०, १७६, १६७, 
२११, २३५, २४१। 

ग़ुविन्दजी चतुर्वेदी मथुरा--३६७। 

जगन्नाथप्रसादजी ( भानु )-शे८२, ४१५। 

जगजन्नाथदासजी ( रत्नाकर )--उद्धव शतक ४७, ७३, १६७, 
2६२ | द्रोपदी अष्टक ६१, १६०, २१५। भीष्साष्टक ८६, २०६ $ 
झद्भारलहरी ४४७। 

जनराज ( रस विनोद )--२०१ 

ठाकुर--१ ६५ । 

तुलसीदासजी गोस्वामी ( रामचरित मानस )--१०, १७ 
८९१, परे; ८४५, ६९, १०६ १०८, १४४५, १४६, , १४६, २७७, 
२८१, ३१३, ४६०। कवित्त रामायणु--५७, ६७, ७६, १०२, 


११०, १४६, १८२, २४२, २४५७, २४५५, २६२। विनयपतन्रिका-- 
३७६ | ॥ 


+ड 


तोष--8४१७। 

दत्त--२६४ । 

देवजी--११४, ११७, १४६, १४७, १८१, ३६०, ३६३, 
३६८, रे७१ | हि 

ननन्‍्दरास--१ २७, १५४ । 

नरहरिदासजी चारण (अवतार चरित्र)--१०२, १६४ | 

निवाज--१११ | 

पदमाकरजी--५२, ८०, १२९७, १६४, २०३, २०७, २३०, 
२४६, २६३ । 

पन्नालालजी वश्य ( आगरा )>--२३१२ | 

प्रतापसिंहजी महाराजा जयपुर (भरत हरि शतक)--२६६ । 

वंशीधर--२श८ । 

विक्रम सतसई--४०६ । 

विहारीलाल ( बिहारी सतसई )--७, ८, ६, १२, २३, २४, 
३२, ५४६, ८०, १२४, १४४७, १५५, १६२, १७२, २६० ?, २६२, 
३००, १०२, ३०४, २३०६, ३२६३, ३७३, ३७४, ३७६, ४००, 
४०२; ४२६ | ड़ 

वेनी &िज--१३१, २७६ ॥ 

बेनीगप्रवीन ( रस तरंग )--१५०, १४२, २२४५, ३२७। 

चुन्द--२९१ | 

भगवानदीनजी दीन--४०६। 

मिखारीदासजी ( काव्य निर्णय )--१०६ | 

भूषण--१९०, १६१, २१४, २२४, ९२२४, २३१, २४८, ३४१॥ 

मतिराम--३०, ६०, १७४ । 

मिश्रजू--२१० । 

मुरारिदानजी चारण कविराजा ( जोधपुर )--१६६, ३६४, 
४१६ । 


( १० ) 


मुबारिक--्ृष्ठ ११३ | 

मेथिलीशरणजी गुप्त ( चिरगाँव )--जयद्रथ बध ४१, 5४ 
६ंए, ४६, १०७, १८७, १६४, २०६, २१३, २२०, २६८, ४६६ । 
पतव्चवटी ३१४ । साकेत परे । शकुन्तला नाटक श्८ । 

रसखान--६३, २४७५ | हे 

रसिकविहारी--( काव्य सुधाकर ) ३२४७, रे७८ । 

राखन--( सुदासा चरित्र ) ६३। 

रामसहाय--( अज्ञाववास ) १३३ । 

रामहिज--२१२। 

लछिराम--( रामचन्द्र भूषण ) १५१; १५७, २०७ 

लक्ष्मणसिंहजी ( राजा ) शकुन्तला नाटक--१४० । 


सत्यनारायण॒जी--उत्तमरामचरित नाटक १८८, मालती- 
माधव २२६ । 


संभुनप--७१, २८२ । 

सुन्दरदासजी स्वामी--२६१, ३५२ 

सीतलसहायजी महन्त--२६७। 

सूरदासजी ( महाकवि )--४०», १८४७, २४६ | 

सू्यमलजी चारण ( महाकवि )--१८५ । 

सेनापति--२४० | 

सोमनाथजी चतुबंदी (रसपीयूष)--१७७, २१८, २२८, २६७। 

स्वरूपदासज्ञी चारण स्वासी ( पांडव यशेन्दु चन्द्रिका )-- 
२१०३, १८६, ९१७, २६६, ३२३१, ४६६॥। 

श्रीपति--१२८, १८६, १८६, रे३७। 

श्रृद्धार सतसई--४ २८ | 

हरिश्चन्द्रजी ( भारतेन्दु ) २२७। 

हरिचरणुदासजी ( समाग्रकाश )--१८, २०, ३४७। 

दरिप्रसाद ( वालकराम विनोद ) २६५। 


& श्रीहरि! & 


भमिका 


“तत््व किमपि काव्याना जानाति विरलो भ्रुवि , 
मार्मिक: को मरनदानामन्तरेण मधुत्रतम।” 


काव्य के अनिवचनीय तत्त्व को कोई विरला ही जान सकता 
223 ७ क सोन 0 ७. सभी होता 2022 
है। पुष्पो के सोन्द्य से सभी का मन प्रसन्न होता हे--उनकी 
सधुर गन्ध से सभी का चित्त प्रफुल्लित होता है। पर उनके मधुर 
रस का म्मज्ञ केवन्त भ्रमर ही होता है। काव्य को बहुत से 
लोग पढ़ ओर सुनकर अपना मनोरञ्लनन अवश्य करते है, किन्तु 
इसके अलोकिक रसास्वादन का अनुभव केवल सहृदय काठ्य- 

रर जि कि 4 
समज्ञ ही कर सकते है। काव्य में यही लोकोत्तर महत्त्व है। 
इस महत्त्व को जानने के लिये सबसे प्रथम यह जानना 
आवश्यक हे कि काव्य की उत्पत्ति कब ओर किसके द्वारा 
हुईं ? इसके प्रसिद्धाचाये कोन है ? इसकी पूर्बकाल में क्या 
दशा थी? और इसके द्वारा ऐहिक ओर पारमार्थिक लाभ 
क्‍या हैं ? 
हे 
वेद ही काव्य का मूल है। 


बेद में ध्वनि-गर्सित--व्यंग्यात्मक--और अलकझ्ञात्मक वर्णन 
दृष्टिगत होते है-- 


मूमिका- श्श्‌ 


“हा सुपर्णा सयुजा सखाया समान वृक्ष परिपस्वजाते ; 
तयोरन्‍यः पिप्पल॑ स्वाइत्यनश्नन्नन्योडमिचाकशीति ।” 


--ब्च० मुण्डकोपनिपद, खण्ड १, स० १ 


इसमें अतिशयोक्ति अल्द्भार हैँ। ध्वनि आदि परोक्षवाद 
तो बेद में प्रायः सवत्र ही है--'परोक्षवादो वेदो5यं' । वेद काव्य 
का मूल है, अतएव सब्विदानन्दघन श्रीपरमेश्वर द्वारा ही लोक 
में सबसे प्रथम इसकी प्रवृत्ति हुईं हे । 


चाल्मीकीय रामायण, महाभारत ओर श्रीमड्भागवत आदि 
महापुराणो में काव्य-रचना अनेक स्थलों पर विद्यमान हे" । 
वाल्मीकीय रामायण को तो महर्पिकय ने आदि काठ्य” के 
नाम से ही व्यवद्गत किया है। महाभारत को परमसेष्टि त्रह्मजी 
ने ओर स्वयं भगवान्‌ बेद्व्यासजी ने महाकाव्य संज्ञा द्री हे । 
ओर अग्निपराण में तो साहित्य विपय का विस्तृत वर्णन है? | 

जिस प्रकार व्याकरण, न्याय एवं सांख्य आदि के पाणिनि, 
गातम ओर श्रीकपिल आदि प्रसिद्ध आचाय है, उसी प्रकार 
काव्य-शात्र के-- 

प्रसिद्ध आचार्य भगवान्‌ मरखतग्ुनि हैं । 


य महानुभाव भगवान्‌ वेदठ्यास क समकालीन या उनके 
पृवंबर्ती थ | भगवान्‌ बेदव्यास ने अग्निपुराण में लिखा है-- 


है... हा: पट्टी आओ अल. ल्‍3४८४-०5८ बल 


4 इसका विशेष स्पष्टीकरण हमारे संस्कृत साहित्य का इतिहास! 
के प्रथम भाग में किया गया है | ४ 





२ महाभारत, आदिपते, अध्याय १ | ६१, १ । ७२। 
2 अस्िपुराण, आनन्दाश्रम सीरीज्ञ, श्रष्याय ३६७ से ३४७ तक। 


१.३ भूमिका 


“भरतेन प्रणीतत्वाद्धारती रीतिरुच्यते |” 
(२४० | ६ ) 


साहित्य शास्र के उपलब्ध ग्रन्थी में सबसे पहला ग्रन्थ 
महानुभाव भरतमुनि का निर्माण किया हुआ तनिास्यशासत््र' है। 
इसके बाद आचार भामह, उद्धट, दण्डी, वामन, रुद्रट, महाराज 
भोज, ध्वनिकार, श्री आनन्द्वधनाचायं, मम्मट/चायं, जयदेव, 
विश्वताथ, अप्पय्य दीक्षित ओर परिडतराज जगन्नाथ आदि 
अनेक उत्कट विद्वनों ने काव्य-पथ-प्रद्शक अनेक ग्रन्ध-रज्न 
निर्माण किए है। इन महत्त्व-पूण अन्थों के कारण हम लोग 
साहित्य-संसार भें सर्वोपरि अभिमान कर सकते है| जिस 
समय थे अन्थ निर्माण हुए थे, उस समय साहित्य की अत्यन्त 
उन्नत अवस्था थी। भठ हरि, श्रीहृषय और भोज जेसे गुणग्राहक, 
साहित्य-रसिक ओर उदारचेता राजा-महाराजो की काठ्य पर 
एकान्त रुचि रहती थी । यहाँ तक कि ये महानुभाव अनेक, 
विद्वानों द्वारा उच्च कोटि के ग्न्थ-र्न निरन्तर निर्माण कराके 
उन्हे उत्साहित ही नहीं करते थे, वे स्वयं भी अपूर्व अन्थो की 
रचना द्वारा साहित्य-मण्डार की वृद्धि करके हंस-वाहिनी, वीणा- 
पाशि भगवती सरस्वती की अपार सेवा करते रहते थे। उन्होंने 
श्रीलक्ष्मी ओर सरस्वती के एकाधिकरण में न रहने के लोकापवाद 
को सचमुच मिथ्या कर दिखाया था। उनके सिद्धान्त थे-- 


'साहित्यसड्रीतकलाविहदीनः साक्षात्शुः पुच्छविषाणहीनः ।? 
“भव हरि । 


खेद हे कि परिवर्तेनशील कराल काल के अभाव के कारण 
इस समय हमारे साहित्य की अवनत दशा है। इस-- 


भूमिका १४ 


अवनति के कारण 


अनेक है । प्रथम तो राजा-महाराजों सें तादहश रूचि का 
अभाव है । इस उपेज्ञा का फल यह हुआ हे कि विद्वत्समाज 
हत्तोत्साहित हो रहा है । दूसरे, भारतीय विद्वान्‌ विदेशी भाषा में 
अलुराग रखने लगे है । आश्चय तो यह है कि पाश्वात्य विद्वान्‌ 
हमारे साहित्य पर सनोमुग्ध हो रहे है, और हमारा विद्वत्समाज 
इसे उपेक्षा की दृष्टि से देख रहा है । 


जड़न-बुद्धि जनों को छोड़ दीजिए, कितने ही साज्ञर व्यक्ति भी 
सममभते है कि काठ्य केवल कवि-कल्पना सात्र हे, इस से कुछ 
लाभ नही हो सकता है, यह निःसार है। उनकी यह घारणा स्वेथा 
अम पूर्ण है। 
काव्य से लाभ 
क्या उपलब्ध होते है, इस विपय मे मम्मटाचाय ने 
लिखा है-- 
“काव्य यशसेष्थंकृते व्यवह्रविदे शिवेतरक्षुतये , 
सद्यः परनिद्न तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ।”” 
--काव्यप्रकाश | 
अर्थात्‌ काव्य” यश, द्रव्य-लाभ, व्यवह।र-नान, दुःख-ताश, 
शीघ्र परमानन्द ओर कान्तासम्मित मधुरता-युक्त उपदेश का 
साधन हे | इस कथन में क्रिब्चित्‌ मात्र भी अत्युक्ति नहीं हे। 
काव्य द्वारा प्राप्त-- 
यश 
चिरस्थायी हूँ ! विश्व-विख्यात महाकबि कालिदास ओर 
गोस्वामी महात्मा तुलसीदासजी आदि का कैसा अक्षय यश हो 


१५ भूमिका 


रहा है । कालिदास आदि के पेतृक कुल को कोई नहीं जानता, न 
इनका कोई दान आदि ही प्रसिद्ध है। एकमात्र काव्य ही इनकी 
आसमुद्रान्तस्थायी प्रसिद्धि का कारण है । 

द्रव्योपाजन के लिये निस्सन्देह बहुत मार्ग है । किन्तु काव्य- 
रचना द्वारा-- 


दृव्य-लाभ 


प्राप्त करना एक गोरवास्पद बात है। संस्कृत के प्राचीन भहा- 
कवियों की तो बात ही क्या, उद्धूट जैसे विद्वान को अतिदिन 
एक लक्ष सुवर्ण-सुद्रा का मिलना इतिहास-प्रसिद्ध है । हिन्दी- 
भाषा के भी केशवदास, भूषण, पद्माकर, मतिराम आदि को एवं 
राजस्थान के महाराजों से चारण जाति के बहुत से प्राचीन एवं 
अर्वाचीन विद्वान्‌ कवियों को सम्मान-पूवेक अमित द्र॒व्य-लाभ 
होना प्रसिद्ध है। इस समय भी पाश्चात्य देशो में विद्वानों को 
प्रचुर पारितोषिक* देकर प्रोत्साहित किया जाता है | 
लोक-व्यवहार-ज्ञान 
के लिये तो काव्य एक मुख्य और सुख-साध्य साधन है। 
महाकवियों के क्राव्य केवल लोक-उ्यवहार-ज्ञान के भग्डार ही 
नही है, किन्तु शद्भार-रस के सुमधुर और रोचक वर्णनो द्वारा 
धार्मिक और नेतिक शिक्षा के भी सर्वोत्कृष्ट साधन है। 
उपदेश 


के लिये जब नीति-शाश्न ओर घम-शासत्र आदि है _तब काव्य से 
कया अधिक उपदेश मिल सकता है, ऐसा समझना अनमभिज्ञता- 


१ देखिए, राजतरब्निणी । 
२ नोबिल प्राईज भ्रादि। 


भूमिका १६ 


सात्र है। काव्य द्वारा जिस रीति से उपदेश मिलता है, वेसा और 
कोई सुगम साधन नहीं है। शब्द तीन प्रकार के होते है-- 
प्रग्भु-सम्मितः, 'सुहृदू-ससम्मित! ओर 'कान्ता-सम्मित! । वेद्-स्व्ृति 
आदि प्रभु-सम्मित शब्द है। प्रथम तो उनका अध्ययन ही आज 
कल सुसाध्य नही रहा हे । दूसरे, इनके वाक्यों का राजाज्ञा के 
समान भय से ही पालन करना पड़ता है--ये आन्तय दूपित भावों 
का निराकरण नहीं कर सकते। पुराण-इतिहास आदि सुदृद्‌- 
सम्मित शब्द हैं| ये सित्र के समान सदुपदेश करते है परन्तु 
मिंत्र के उपदेश का भी प्रायः कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । इन 
दोनो से विलक्षण जो काब्य-रूप कान्ता-सम्मित! शब्द है, वह 
कानन्‍्ता की भांति सर्मणीयता से उपदेश देता है। जिस प्रकार 
कामिनी गुरुजनों के आधीन रहनेवाले अपने स्रियतम को विल्षक्षएण 
कटाज्षादि भावों की मधुरता से सरसता-पूवक अपने में आसक्त 
कंर लेती है, उसी प्रकार काव्य भी सुकुमारमति, नीति-शास्त्र- 

विमुख जनों को कोमल-कान्त-पदावली की सरसता से अपने में 

अनुरक्त करके फिर 'श्रीरासादि की भाँति चलना चाहिए, न कि 

रश्वणादि की भॉति' ऐसे सार-गर्मित किन्तु मधुर उपदेश करते है। 

काव्य की सुमधुर शिक्षा द्वारा हृदय-पटल पर कितना शीघ्र और 

कसा विलक्षण प्रभाव पड़ता है, इसके प्रचुर प्रमाण प्राचीन अन्थों 

में विद्यमान है*। एक अर्वाचीन उदाहरण ही देखिए। जयपुरसाधीश 

हाराज जयसिंह बड़े विज्ञासी थे। उनकी विलास-प्रियता के 


कारण उनके राज्य की शोचनीय अवस्था हो रही थी | कविवर 
चिहारीलाल ने केवल-- 


जा जा क>+ १2५ 


$ देखिये दशकुमार चरित्र श्ञोर हितोपदेश आदि । 


१७ भूमिका 
पहिं पराग नहिं मधुरमथु, नहिं विकास इहिकाल ; 
किक ग आप कि 
अली कली ही ते वबॉध्यो आगे कॉन हवाल ।' 


इसी शिक्षा-गर्भित शृद्भार-रसात्मक एक दोहे को सुनाकर महाराज 
जयसिंह को अन्तःपुर की एक अनखिली कल्ली के वन्धन से विमुक्त 
करके राजकाय में संलग्न कर दिया था | उपदेश में मधुरता होना 
दुलभ है । महाकवि भारवि ने कहा है-- 


“(हित मनोहारि चर दुर्लभ बचः | 


परन्तु यह अनुपम गुण केवल काव्य में ही है । ओर-- 


दुःख-निवारण 


के लिये भी काव्य एक प्रधान साधन हे । काव्यात्मक देव-स्तुति 
द्वारा असंख्य मलुष्यो के कष्ट निवारण होने के इतिहास महा- 
भारतादि में है । मध्यकाल से भी श्रीसूयदेव आदि से सयूरादि” 
कवियों के दुःख निःशेष होने के उदाहरण मिलते है। और काव्य- 
जन्य आनन्द केसा निरुपम है, इसका अनुसव सहृदय काव्या 
नुरागी ही कर सकते है। अत्यन्त कष्ट-साध्य यज्ञादिकों के करने 
से स्वगोदिको की प्राप्ति का आनन्द्र कालान्तर ओर उेहान्तर में 
$ कहते हैं, मयूर कवि कुष्ठ-रोग से पीड़ित होकर यह प्रण करके 
हरिद्वार गए कि 'या तो सूर्य के अनुअह से कुष्ठ दूर हो जायगा, नहीं तो 
मैं आ्राण विसर्जन कर दूँगा! । वह किसी ऊँचे बृत्त की शाखा से लटकते 
हुए एकसो रस्सी के छींके पर बैठकर श्रीसूर्य की स्तुति करने छूगा और 
शुक-एुक पय के अ्रन्त में एक एक रस्सी को काटते गए। सब रस्खियों के 
काटे जाने के पहले हो, काव्यमयी स्तुति से भगवान्‌ भास्कर ने प्रसन्न 
होकर उनका रोग निर्मल कर दिया । 





भूमिका श८ 


मिलती है, पर काठ्य के श्रवण-मात्र से ही रस के आस्वादन के 
कारण तत्काल-- 


परमाननन्‍द 


प्राप्त होता 'हे। इस आनन्द की तुलना में अन्य आनन्द 
नीरस प्रतीत होने लगते है । कहा है-- 


'सत्कविर्सनासर्यी निस्तुपतरशव्दशालिपाकेन ; 
तृप्तो दयितावरमपि नाद्वियते का सुधादासी । * 
--थ्ार्या सप्तशती 
निष्कर्प यह है कि काव्य द्वारा सभी वाज्छित फल प्राप्त 
हो सकते है। त्रिवग-घम, अथ और काम-के अतिरिक्त 
मोक्ष की भी प्राप्ति हो सकती है । आचाय भामह ने कहा है-- 


घमार्थकाममोक्षेपे वंचच्ण्य कलास च; 

करोति कीर्ति प्रीतिं च साधुक्राव्यनिषेवशम ।* 
चहुत से लोग काव्य-रचना एवं काव्यावलोकन करते है, पर 
उनकी काव्य-रचना प्रायः उपयोगी और चित्ताकषक नहों हो 
सकती ओर न डनको काव्यावलोकन द्वारा यधाथ आनन्दानु- 
भव ही हो सकता है। इसका कारण यही हे कि वे प्रायः 
साहित्य-शात्र से अभिज्ञ नही होते ओर न वे अभिज्ञ होने का 
कष्ट ही उठाते है। काव्य-रचना एवं काव्य के आस्वादन के 


लिये साहित्य-शास्र के अध्ययन की परमावश्यकत! हैं। कविवर 
सद्धक ने कहा-- 





१ सुकवि के जिद्दा-रपी सूप से सर्वथा तुपरहित किए गए शब्द-रूपी 
शालि--चावल--पाक से जो तृप्त हे, वह अपनी प्रिया के श्रघर-रस 
का भी आदर नहीं करता, तब बेचारी सुधा-दासी तो वस्तु ही कया है । 


१६ भूमिका 


“अज्ञातपारिडत्यरहस्यमुद्रा ये काव्यमार्ग दघतेडभिमानम्‌ ? 
ते गारुडीयाननघीत्य मन्त्रान्हालाहलास्वादनमारभन्ते ।' 
“--श्रीकर्ठ चरित 
निदान, काव्य-प्रणेता को एवं काव्य-प्रेमी जनो को काठ्य- 
निर्माण के साधन ओर रहस्य अवश्य जान लेने चाहिए । 


काव्य के निर्मोण होने म॑ हेतु अर्थात्‌-- 
कारण 


क्या है ? काव्यप्रकाश में कहा है-- 
'शक्तिनिपुणतालोकशासत्रकाव्याद्रवेक्षणात्‌ , 
काव्यनशिक्ष॒याभ्यास इति हेतुस्तदुद्धवे |” 


काव्य-रचना के लिये शक्ति, निपुणता और अभ्यास 
परमावश्यक है। 


शुक्कि--.-यह काव्य का बीज-रूप एक संस्कार होता है । 
इसके द्वारा काव्य के निर्माण करने में सामथ्य प्राप्त होता है । 
इसके बिना काठ्य का अंकुर उत्पन्न नहीं हों सकता है। यदि 
होता है तो उपहास-जनक । इसको प्रतिभा” भी कहते हैं | इसका 
लक्षण रुद्रट ने इस प्रकार लिखा है-- 
मनसि सदा सुसमाधिनि विस्फुरणमनेकधाभिधेयस्य , 
अक्लिष्ठनि पदानि च विभान्ति यस्यामसों शक्तिः |! 
--काव्यालड्ार । 
अथोत्‌ जिस शक्ति से स्थिर चित्त में अनेक प्रकार के 
वाक्यार्थों का स्फुरण ओर कठिनता-रहित पदों का भान होता 
है--अनेक प्रकार के शब्दार्थ हृदयस्थ होते है--उसे 'शक्तिः 
कहते है । 


भूमिका २० 


“निपुणता---निपुणता कहते हैं प्रवीणता को; अथात्‌ 
स्थावर, जज्गम आदि की स्वरूप-स्थिति के लोकिक बृत्त का ज्ञान; 
छन्द, व्याकरण, कोश, कला; चतुबंगं, गज, अश्व, खड़ग आदि 
के लक्षए-प्रन्थ, महाकबियों के प्रणीत काव्य और इतिहास 
आदि के अध्ययन द्वारा निपुणता प्राप्त करना । 


असभ्यास---हाव्य के निर्माण म॑ ओर सदू-असदू विचार 
करने मे कुशन्ष गुरु के उपदेश द्वारा कांव्य-निर्माण में ओर 


अवन्धादिकों के गुम्फन करने में वारम्बार प्रवृत्त होने को 
अभ्यास कहते है। 


शक्ति, निपुणता और अभ्यास, दण्डचक्रादि-न्याय के 
अलुसार, तीनो मिलकर, न कि इनमें एक या दो, काव्य के 
निर्माण ओर उत्क्ृष्टता के हेतु हैं। कुछ आचार्यों) का मत है 
कि काव्य-निर्माण के लिये निपुणता की अपेक्षा नहीं, केवल 
अतिभा ही पर्याप्त है । हाँ, यह तो निर्विवाद हे कि काव्य-निर्माण 
में प्रतिभा प्रधान है। पर प्रतिभा से केवल हृदय में शब्द 
ओर अथ का सन्निधान ही होता है, सार का ग्रहण ओर असार 
का त्याग व्युत्पत्ति--निपुणता-द्वारा ही हो सकता है । अतणएब 
शाज्रो के जान द्वारा ग्राप्त निपुणता की नितान्त आवश्यकता 
हैं, आर इसी प्रकार काव्य के अभ्यास की भी परमावश्यकता 


हे। अतः अधिकतर आचार्यों* का मत यही है कि तीनो ही 
काठ्य क लिये अपेत्तित हे । 


चल ला जः 


१ देखिये हमारा संस्कृत साहित्य का इतिहास, दू० भाग, छू० १७। 


२ देखिये हमारा संस्क्रत साहित्य का इतिहास, दूसरा भाग 
'पू० १३-१६ | 


२१ भूमिका 


साहित्य-शास्र 
डसे कहते है जिसके द्वारा काव्य के निमोण ओर रसानुभव 
का एवं उसके स्वरूप, दोष, गुण आदि का ज्ञान प्राप्त होता है । 
जिस प्रकार भाषा-ज्ञान के लिये व्याकरण आवश्यक हे, उसी 
अकार काव्य के निर्माण ओर रसास्वादन के लिये साहित्य-शात्र 
अर्थात्‌ रीति-अन्थो के अध्ययन की आवश्यकता है | 
काव्य क्‍या है ? 
इस विपय में यहाँ केबल इतना कहना ही पर्याप्त है 
पके काव्य में-- 
ध्वनि और अलझ्ार 


ही भुख्य है | ध्वनि कहते है व्यंग्याथे को | व्यग्या्थ शब्द द्वारा 

स्पष्ट नहों कहा जाता | कहा है-- 
प्रतीयमानं पुनरन्‍्यदेव वस्त्वस्ति वाणीयु महाकवीनाम , 
यत्तस्प्रसिद्रावववानिरिक्त विभाति लावण्यमिवाड्भनासु ।* 

+वच्वन्यालोक । 

अर्थात्‌ महाकवियो की वाणी में वाच्य अथ से अतिरिक्त 

जो प्रतीयमान अथ--ध्वनि रूप व्यंग्य अथ-है, वह एक 

विलक्ञण पदार्थ है । वह अर्थ उसी प्रकार शोभित होता है, जैसे 

ऋसमिनी के शरीर में हस्तपाद आदि प्रसिद्ध अवयवो के अत्तिरिक्त 

लावरण्य । काव्य के प्राण रस, भाव आदि हैं। वे प्रतीयमान ही 

होते है--'रस” भाव” आदि शब्द कह देने मात्र से ही आनन्द 

नहीँ। होता--उनकी व्यज्ञना ही आस्वादनीय होती है। अलझ्कार 


#५न्‍५न्‍ १ ढ5 ट3४न्‍3८५ढ 5 ल्‍3 ढअल5 53 #ब 2४ ढ़ ३ ञ5४ ढक... ४ ४5 ४७८5४ ४5 ब७४ ०७०४६ »६२४६८५०७४० 


३ काच्य के लक्षण के विषय में आाचायों के भिन्न-भिन्न मतों का 
विस्तृत विवेचन हमारे 'संस्कृत साहित्य का इतिहास” में किया गया है । 


भूमिका २२ 


कहते हैं. आभूषण को । जिस प्रकार सोन्दर्यादि गुण-युक्त रमणी 
आभूषणों से और भी अधिक रमणीयता को प्राप्त हो जाती हे, 
उसी प्रकार अलक्कारों से युक्त काव्य भी सहृदयों के लिये 
अधिक आह्ाादक हो जाता है। भगवान्‌ वेदव्यासजी ने कहा है-- 


गअलडटरणमर्थानामर्थालड्डार इष्यते ; 
त॑ बिना शब्दसोन्दर्यमपि नास्ति मनोहरम | 
“--अगमिपुराण, ३४४।१०२ 


बहुत-से पाश्वात्य सभ्यता? के प्रेमी विद्वान व्यंग्य और 
अलक्लार-युक्त काव्य को उत्कृष्ट काव्य नहीं मानते। वे केवल सष्टि- 
बेचिज्यन्वणनात्मक काव्य सें ही काव्यत्व की चरम सीमा 
सममते है। यही कारण हे कि काठ्य-पथ प्रदर्शक अन्ध उनको 
अनावश्यक प्रतीत होते है । इस विपय मे यह कहना ही पर्याप्त 
है कि स्ष्टि-वर्णनात्मक काव्य के साथ जब व्यंग्य और अलझ्लार 
का संयोग हो जाता है, तभी वे उत्कृष्ट काव्य हो सकते है 

अन्यथा नहीं । देखिए--- 


मा निषाद प्रतिष्ठा त्वमगमः शाश्वती:ः समा; : 
यतक्रोज्लमिथुनाठेकमवधीः काममोहितम्‌ ।* 
“>-वाल्मीकीय रामायण 


वाल्मीकीय रामायण का यही मूल-सूत श्लोक है। महर्षि 
वाल्मीकि के देखते हुए क्रोब्च पक्षी के जोड़े में से कामोन्मत्त 
नर क्रोल्च को व्याध ने मार डाला । भूमि में गिरे हुए और 
रुधिरलिप्ताड़ उस मत सहचर की ताहश दशा देखकर वियोग- 
व्यथा से व्याकुल्ल होकर क्रोब््ची ने अत्यन्त कार॒ुशिक ऋन्‍दन 
किया । उसे सुनकर दयालु महर्षि के चित्त स॑ उस ससय जो 
शोक--करुणरस--उत्पन्न हुआ, वही इस श्लोक में ध्वनित 


श्रे भूमिका 


होता है। वही शोक ऋृपादर-हृदय महर्षि के मुख से क्रोब्चधात्ी 
व्याध के.प्रति इस श्लोक द्वारा परिणत हुआ है। यह एक 
साधारण स्वाभाविक वर्णन है । इस वन के वाच्याथ में कुछ 
चित्ताकषक चमत्कार नहीं है, परन्तु इसके करुणोत्पादक व्यंग्याथ 
में महानुभाव महर्षि के करुणा-प्लावित चित्त का अग्रतिम झदढुल 
भाव व्यक्त होता है। ओर वह सहृदयों के मन को बलातू 
आकर्षित कर लेता है | कहा हे-- 


काव्यस्यात्मा स एवाथ्थंस्तथा चादिकवेः पुरा , 
क्रोश्वद्वन्द्रवियोगोत्थ: शोकः श्लोकत्वमागतः | 


--ध्वन्यालोक । 


यह ध्वनि-गर्भित (मानसिक अन्‍्तः सप्टि-वर्ण न है | ध्वनि- 
गर्भित बाह्य सष्टि-वणन भी देखिए-- 


“एते त एव गिरयो विरुवन्मयूरा- 
स्तान्येव मत्तहरिणानि वनस्थलानि , 
आमखज्जुबञश्जुललतानि च तान्यमूनि 
नीस्प्रनीबनिचुलानि सरितिटानि [? 


--उ5त्तररामचरित | 


शम्बूक का वध करके अयोध्या को लोदढते हुए मगवान्‌ 
श्रीरामचन्द्र पूर्वांसुभूत दस्डकारण्य को देख कर कह रहे है--“यह 
वही मसयूरो की केका-युक्त पवेतों का मनोहारी दृश्य है। यह बही 
मत्त मग श्रेणियों से सुशोभित बनस्थली है । ये वे ही सोन्दर्य- 
शाली बब्जुल लताओ से युक्त नीरन्ध्र-सघन-निचुलवाले नदियो के 
तट है! । यह एक नेसर्गिक वन है | यहाँ दर्डक-वन के निरीक्षण 
से भगवती जनक-नन्दिनी के साथ पहले किया हुआ आनन्दमय 


भूमिका रेड 


विहार स्मरण हो आने से भगवान्‌ श्रीरामचन्द्र के हृदय में 
जानकीजी के वियोग के कारण जो आन्तय वेदना हुई, वह 
व्यंग्य है--“अवश्य ही ये सारी वस्तुएँ वे ही है, जिनके रमणीय 
दृश्य से जनकनन्दिनी की अलोकिक भाव-साधुरी से प्रमोदित 
मेरे हृदय में अनुपस आनन्द का स्रोत प्रवाहित हो जाता था। 
हाय ! अब उसके विय्योग में -बही अनुपम दृश्य कुछ ओर ही 
प्रतीत हो रहा है-मुझे अत्यन्त असहाय सन्‍्ताप दे रहा है!। 
यह वियोग-कालिक पूर्व स्वृतिरूप व्यंग्य जो एते त एव, 
'वान्येब इत्यादि पदों से ध्वनित हो रहा है वही इस नेसर्गिक 
वर्णन का जीवन सवस्व है । अब एक अलक्छार-मिश्रित नेसर्गिक 
वर्णन भी देखिए-- 


तत्माथित 'जवनवाजिगतेन राजा 
तूणीमुखोद्ध_.तशरेण विशीशणयंक्ति- 

श्यामीचकार वनमाकुलदृष्टिपाते- 
वतिरितोत्पलदलप्रकरेरिवाद्रं: . ॥ 
-रघुवश । 


इसमें कवि-कुल-सूषण कालिदास - ने महाराजा दशरथ 
की झूगया का वर्णन किया है । वंगवान्‌ घोड़े पर आरूढ़ 
तूणीर से वाण निकालते हुए राजा को अपने पीछे आते 
हुए देखकर इतर-वितर हुए मृग-समूह ने अश्रु-प्लावित और 
सभय इृष्टि-पात से वन को श्यामल कर दिया हे-तीन 
पादो में यह नेसर्गिक वर्णन है ओर चौथे पाद में सग-समूह 
के डस दृष्टि-पात को, पवन के वेग से सरोचर में विचलित हुए 
त्तील कमल-दलो के बृन्द्‌ की डपसमा दी गई है। इस डपसा 
के संयोग से वस्तुतः इस नेसर्गिक वर्णन की मन-मोहिनी छुटा 
में अपरिमसित आनन्द की घटा छा गई हे । 


श्र भूमिका 


कहने का तात्पय यह है कि व्यंग्य अथवा अ्लक्कार-युक्त 
काव्य की उपेक्षा करना सहृदयंता पर गहार करना हे। 
वास्तव में व्यंग्य-काव्य संहृदयों के अन्तःकरण को आप्लाबित 
कर देता है, ओर सर्वेत्कष्ट कवित्व का ही एक परम मनोहर 
नामधेय व्यंग्य है । हो, यह बात ओर है कि जो वस्तु-विशेष 
किसी को, परमश्रिय होती है, वही वस्तु दूसरे को तादश 
सुखकारक न होकर कदाचित्‌ अरुचिकर भी हो सकती हे। 
महाकवि कालीदास ने इन्दुमति के स्वयम्बर प्रसद्ग में 
कहा है-- 
“अथाड्राजादवताय चक्षु- 
याहीति जन्यामवदत्कुमारी , 
नासो न काम्यो न च वेद सम्यंग्‌ 
द्रष्ट्ु न सा मिन्नसचिहिं लोके |” 
--रघुवश ६ | ३० 


अर्थात्‌ अज्गराज से दृष्टि हटाकर राजकुमारी इन्दुमति ने 
सुनन्‍्दा से आगे बढ़ने को कहा। इसका यह अथ नहीं कि 
वह राजा सोन्दर्यादिगुण-सम्पन्न न था, ओर यह भी बात 
नही थी कि इन्दुमति, वर की परीक्षा करने में अनभिज्ञ थी | फिर 
इन्दुमति ने इस राजा को क्‍यों वरण नहीं किया ? महाकवि 
कहते हैं--अज्ल राजा को इन्दुमति ने वरण नहीं किया, 
इसलिये वह अयोग्य नहीं कहा जा सकता और न इन्दुमति 
में ही वर-परीक्षा की अयोग्यता कही जा सकती हे । वास्तव 
में बात यह है कि किसी वस्तु के त्याग और ग्रहण में मिन्न 
भिन्न रुचि ही एकमात्र कारण हे!। सुतरां, किसी को ग्राक्ृ- 
तिक वर्णनात्मक और किसी को व्यंग्य-गर्मित काव्य मनोहर 
प्रतीत होता है । किन्तु इसका यह अथ नही कि केवल प्राकृतिक 


भूमिका २६ 


चणुनात्मक काव्य उत्कृष्ट ओर व्यंग्य एवं अलकझ्कार युक्त काव्य 
'निकृष्ट है, यह कहना काव्य के रहस्य से अनभिज्ञता मात्र है। 


इस ग्रन्थ में 


श्रव्य काव्य के सभी अड्ों पर प्रकाश डाला गया है । 
ओर इसे जिन संस्कृत के सुप्रसिद्ध शन्थों की सहायता से 
निर्माण किया गया है, उनकी सूची अन्यत्र दी गई है । 
साहित्य जैसे रसावह ओर जटिल विषय को भली भाँति 

सममभाने की वहुत आवश्यकता है । इसलिये इस विषय के 
संस्कृत-भन्थों में लक्षणों को सममाने ओर डउदाहरणों 
से लक्षणों का समन्वय करने के लिय वार्तिक-ृत्ति-में 
स्पष्टीकरण कर दिया गया है, जिससे लक्षण ओर उदाहरणों का 
समभना सुवोध हो गया है । बहुत-से विषय एक दूसरे से मिले 
हुए प्रतीत होते हैं, उनकी प्रथकृता भी भले प्रकार सममा दी गईं 
है । इसके अतिरिक्त संस्कृत-ग्रन्थों पर साहित्य मसज्ञ विद्दानों 
द्वारा अनेक टीकाएं लिखी गई है, जिनसे विपय सरलता से 
सममक में आ सकता हे। किन्तु खद हे, हिन्दी के प्राचीन अन्ध- 
कारो ने इन बातों पर सवथा ध्यान नही दिया । हिन्दी के प्राचीन 

रीतिन्ग्रन्थो में जो लक्षण पद्म में दिए गए हें, उसका वार्तिक में 
स्पष्टीकरण न किया जाने के कारण वे वड़ सन्दिग्ध हो गए है। 
इसलिये विपय का समझना कठिन ही नहीं, पर कही-कही दर्वोध 
भी हो गया है । इस अभाव को दूर करने के लिये इस अन्थ में 
अत्येक विषय के लक्षण सूत्र-रूप में अर्थात्‌ गद्य में दिए गए हैं: 

ओर उन्हे सममाने के लिये वातिक में स्पष्टीकरण कर दिया गया 
है| अधिकाधिक उदाहरण देकर विपय को यथासाध्य स्पष्ट करने 

क्री चेष्टा की गई हे । 

, डदाहरण लेखक की स्वयं रचना के, एवं अन्य महानुभावों 


ड्७ भूमिका 


की रचना के, दोनो प्रकार के रक़्खे गए है। अन्य कवियों के 
उदाहरण इनवर्टेंड कॉमा में ( “” ऐसे चिह्ो के अन्तगंत ) लिखे 
गए है। जिन पद्मो के आदि-अन्त में ऐसे चिह्न नहीं है, वे 
लेखक की निजी रचनाएं हैं, जिनमें संस्कृत अ्न्थो से अनुवादित 
भी है। संभव है. अनुवादित पद्मों में कुछ पद्म ऐसे भी हो, 
जिनके साथ हिन्दी के प्राचीन ग्रन्थों के पद्मयों का भाव-साम्य 
हो, ऐसे भाव-साम्य का कारण केवल यही हो सकता है, कि 
जिस संस्कृत पद्म का अनुवाद करके इस अन्थ मे लिखा गया 
है, उसी पद्य का अनुवाद हिन्दी के प्राचीन ग्रन्थकार ने भी करके 
अपने ग्रन्थ में लिखा हो। ऐसी परिस्थिति में भाव-साम्य ही 
नहीं कही-कहो शब्द-साम्य भी हो सकता हे | । 
उदाहरणो के विषय में एक बात ओर भी स्पष्ट कर देना 
आवश्यक है। कुछ महाशयो ने, जैसे बावू जगन्नाथप्रसाद 'भानु 
ने काव्यप्रभाकर' में,बाबू भगवानदीनजी 'दीन' ने 'अलझ्लारमच्जूपा 
ओर “व्यंग्याथमञ्जूषा' में ओर पं० रमाशह्डुर शुक्तजी 'रसाल 
ने अलझ्लारपीयूष' में, अनेक स्थज्ञों पर इस ग्रन्थ के प्रथम 
संस्करण ( अलक्लारप्रकाश ) ओर ह्ितीय संस्करण (काव्य 
कल्पद्रम ) के पद्च ओर गद्च-प्रकरण अविकज्ञ रूप में ओर अनेक 
स्थलों पर कुछ परिवर्तित करके उद्धत करने की कृपा की है | उन 
अन्धो की आलोचनाएँ 'माघुरी' और 'साहित्यसमालोचक' आदि 
में हुई हैं। वास्तव में तो इन महानुभावों ने इस ग्रन्थ का आदर 
ही किया है | यहाँ इस विषय का इसलिये उल्लेख किया 
जाना आवश्यक समझा गया है कि भानुजी' आदि महाशयों 
ने इस ग्रन्थ से उद्धृत अंश को अवतरण रूप में न लिखकर 
अपनी निजी कृति की भॉति उपयोग किया हैं? | यह तीसरा 


$ इसका दिकदशन द्वितीय भाग श्रल्क्वारमंजरी! की भूमिका में , 
कराया गया है। 


भूमिका च्घ 


संस्करण उन महाशयों के श्रन्थों के बाद निकल रहा है । अत- 
एवं इस ग्रन्थ में तदनुरूप गद्य ओर पद्य देखकर आशा है समा- 
लोचक महोदय कोई दोषारोपणः इस छुद्र लेखक पर न करेंगे। 


ग्रथम संस्करण (अलझ्कारप्रकाश ) का जितना आदर हुआ 
था, उससे कही अधिक दूसरा संस्करण ( काव्यकल्पद्गरम 9. 
आर तीसरा संस्करण (काव्यकल्पद्रम के दोनों भाग रस मश्जरी 
ओर अलक्कार मञ्ज री ) लोक-प्रिय सिद्ध हुए है। अलझ्लारप्रकाश को 
कवल हिन्दी-साहित्य सम्मेलन की परीक्षाओं की पाउ्य पुस्तकों में 
ही स्थान उपलब्ध हो सका था | काव्यकल्पद्गम साहित्यसम्मेलन 
की उत्तमा ओर आगरा एवं कलकत्ते के विश्वविद्यालयों में भी 
बी० ए०, एम्‌० ए० के पाठ्य अन्धों में निर्वाचित हो गया है। 


तीसरा संस्करण वहुत परिवद्धित हो गया था। द्वितीय 
संस्करण से उसका दूने से अधिक कलेवर है । द्वितीय संस्करण 
में लक्षणा, व्यज्ना एवं ध्वनि ओर नवरस का विषय संक्तिप्त 
रूप से था, ओर अलड्र विपय पर भी अधिक विवेचन न था| 
तृतीय संस्करण में प्रत्येक विषय का, विशेषंतः नवरस ओर 


अलझ्र विषय का, वहुत विस्तार के साथ निरूपण किया 
गया हे । 


तृतीय संस्करण दो भागो में विभक्त कर दिया गया था । 
प्रथम भाग रसमज्जरी में अधानतः रस विषय हे । इसमें रस, 
भाव आदि के विपय का सविस्तर निरूपण किया गया हे । 
अभिधा, लक्षणा, व्यज्ञना ओर ध्वनि का जो विवेचन इस भाग 
में किया गया हैं, वह रस विपय के अ्रध्ययन करने के लिये 
परमावश्यक है। रस ध्वनित होता- है--अतएव “रस” ध्वनि 
का ही एक अधान भेद है । जब तक ध्वनि और ध्वनि के सर्वेस्व 


/ रे& सूमिका 


व्यंग्याथं को न समझ लिया जाय, रस का वास्तविक रहस्य 

न्द रे पे 

ज्ञात नहीं हो सकता है। ध्वनि ओर व्यंग्याथ को सममने के 

( 
लिये शब्द, अथे ओर अमभिधा आदि शब्द-शक्तियो का अध्ययन 
भी अत्यावश्यक है | रस-सम्बन्धी दोष ओर उनके परिहार का 
जा ए्‌ 

विषय भी प्रथम भाग में हे। गुण” रस के ध+ है, अतएव 

“उनका निरूपण भी इसी भाग में किया गया है। 


हिन्दी में रस-विपयक अनेक ग्न्‍न्ध है। उनमें कुछ ग्न्ध 
सुप्रसिद्ध साहित्याचार्यों के प्रणीत किए हुए हैं। इस पन्ध 
में उन ग्रन्थों को अपेक्षा क्या अपूबंता है, उसका अनुभव 
सहृदय साहित्य-ममज्ञ स्वयं ही कर सकते है । 


इस विषय के हिन्दी के प्रचलित रस-सम्बन्धी गन्थो में 
नायिका-भेदो को प्रधान स्थान दिया,गया है । उस विषय के पिष्ट- 
पेषण से इस ग्रन्थ का कलेवर ठयथ न बढ़ाकर; रस विषयक 
अन्य अत्यन्त महत्व-पूणं ओर उपयोगी विषयो का, जो 
ग्राचीन एवं आधुनिक हिन्दी के ग्रन्धों म॑ तो कहा किन्तु संस्कृत 
के सुप्रसिद्ध ध्वन्यालोक, काउ्यप्रकाश ओर रस-गड्स्‍ाधर आदि 
अन्थो से भी बिखरे हुए दृष्टिगत होते है, समावेश किया गया 
है। प्रसिद्ध साहित्याचार्यों का जिन-जिन विषयो में मत-भेद 
है, उन सतन्भेदो का, विषय को बोध-गम्य करने के लिये, 
पिग्दशन रूप में, प्रसज्गञ प्राप्त उल्लेख, कर दिया गया है। 

हितीय भाग--अलक्वारमझरी" --मे अलझ्लार विषय है। 

4 हिन्दी साहित्यप्तम्मेलन प्रयाम के अनुरोध से काव्यकल्पट्टरम के 
द्वितोय भाग अलकझ्कारमअरी! का एक संक्षिप्त संस्करण 'खंतिप्त- 
अलझ्लारमक्षरी' नाम से भी प्रकाशित हुआ है । 


भूमिका ३० 


अलक्कार प्रकरण भो बहुत कुछ परिवर्तित और परिवद्धित केर 


दिया गया है । इस विषय को भी यथासाध्य स्पष्ट करने की चेप्टा 
की गई है । 


इस ग्रन्थ में अधिकतया सुप्रसिद्ध श्राचीन कवियों के भाव- 
गर्भित एवं हृदयग्राही पद्म उदाहरणों में रक््खे गए है। बहुत से 
ऐसे महत्त्व-पूर्ण अ्न्थों से भी उदाहरण लिए गए है, जो इस 
समय अप्राप्य हो रह हैं। हिन्दी के प्राचीन रीति-अन्थों से जो 
उदाहरण चुने गए है बे जिस विषय का जो उदाहरण उन अन्थों 
म॑ दिया गया है, उसे उसी विषय के उदाहरण में, मक्षिका स्थाने 
मक्षिका, न रखकर जिस पद्म को जहाँ विषय-चिशेष के उदाहरण 
में दिया जाना उपयुक्त समझा गया, वहीं उसे दिया गया है । 


हिन्दी के आचार्य 


ह्वितीय संस्करण की आलोचना करते हुए कुछ महानुभाषों 
ने यह आक्षप किया है कि इसमे संस्कृत-साहित्य के आचार्यों के 
मतो का ही उल्लेख हे, हिन्दी के आचार्यों के मत को प्रदर्शित 
नहीं किया गया हे । सत्य तो यह है कि हिन्दी के आचार्योा का 
कोई स्वतन्त्र सत नहीं है--उनके अन्‍्थों का मूल-श्रोत संस्क्रत- 
साहित्य-अन्थ ही है | जेसे, महाकवि केशवदासजी की कविश्रिया 
का मूल-आधार दण्डी का काव्यादश, राजशेखर की काव्य- 
मीमांसा ओर केशव मिश्र का अलझ्बारशेखर या इसी श्रेणी का 
काञ्यकल्पल्ता आदि अन्य कोइ अन्धथ हे । श्रीहरिचरणदास के 
सभाग्रकाश, श्रीमिखारीदास के काव्य-निणेय का आधार क्रमशः 
साहित्यदपण ओर काव्यप्रकाश है। इसी प्रकार महाराज जस- 
चंतसिह्‌ के भाषाभूपषण, पदूमाकर के पद्माभरण आदि अलक्षार- 
अन्थों का आघार विशेषतः कुबल्यानन्द है । हिन्दी के ओर भी 


३१ भूमिका 


रस एवं नायिका-भेद के ग्रन्थों के आधार प्रायः साहित्यदपेण 
और रसतरक्विणी आदि है । 


निःसन्देह हिन्दी के प्राचीन कवि बड़े प्रतिभाशाली हुए 
है। किन्तु उनका प्रधान ध्येय ब्रजभापा-साहित्य की अभि- 
वृद्धि करना ही था। उन्होंने प्रायः शृद्भार-रस के आलम्बन- 
विभाव नायिका आदि, उद्दीपन-विभाव पघटऋतु आदि, एवं अनु- 
भाव--हाव-भाव आदि क वर्णन में ही विषय को समाप्त कर दिया 
है । अलझ्लार विषय का भी उन्होंने बहुत साधारण और. संक्षिप्त 
रूप में निरूपण किया हे। संस्कृत-साहित्य-भ्न्थो में किए गए 
गम्भीर ओर मार्मिक विवेचन को उन्होने स्पर्श तक नहीं किया। 
इसका दुःखद परिणाम यह्‌ हुआ कि ऐसे प्रतिभाशाली विद्वानों 
द्वारा जेसे गम्भीर रीति-अ्रन्थ लिखे जाने चाहिए थे केसे नहीं 
लिखे गए। ये महानुभाव साहित्य-विषय को स्वयं कहॉ तकः 
समभक सके ओर अपने ग्रन्थों के आधारभूत संस्क्रत-अन्थो के 
अनुसार विषय को समभाने में कहाँ तक कृतकाये हुए है, इस 
बात पर प्रकाश डालना हिन्दी-साहित्य के लिये परम 
उपयोगी है । हक 


| 


इस सम्बन्ध में यहाँ उदाहरण रूप में केवल एक साधारण 
विपय पर कुछ प्रकाश डालना ही पयाप्र है । हिन्दी के प्रायः सभी 
प्राचीन आचार्यों ने अपने ग्रन्थों में संस्कृत ग्रन्थी के आधार पर 
यह बात लिख तो दी है कि रस, स्थायी भाव ओर सच्चारी भावों 
का स्वशब्द से स्पष्ट कथन किया जाना; दोष है । फिर भी उनके 
ग्रन्थों में जो उदाहरण दिखाये गये है, उनमें प्रायः रस और 
स्थायी आदि भावों का स्वनाम से स्पष्ट कथन किया गया है-- 


भूमिका श्र 


५ “ अ“परींडि मारत्रो कलह वियोग मास्थो बोरि के, 
मरोरि मारो अमिमान भरयो भय भान्यों है ; 

सबको सुहाग अनुराग लूटि लीन्हों दीन्हो, 
राधिका कुवरि कहेँ सत्र सुख सान्‍्यो हे। 

कपठ-भटके डारबो निपटि के ओरन सो, 
भेटी पहिंचानि मनम हू परहिचान्यो हे। 

जीत्यो रति-रन मथ्यो मनमथहू को मन, 
'केसोराइ' कोनहू पे रोप उर आन्यो है।” 


. रसिकग्रिया में इस पद्म को रोद्र रस के उदाहरण में लिखा 
है। यहाँ रोष का शब्द हारा स्पष्ट कथन किया -गया हे । 


“टूटे टाटि घुन घने घूम-बूम सेन सने, 
भीगुर छुगोडी सॉप त्रिच्छिन की घात जू ; 

कबव्क कलित गात तृून वलित बिगध जल, 
तिनके तलय तल ताको ललचात जू ; 

कुलयण कुचील गात अंधतम अधरात, 
कहि न सकत बात अति अकुलात नू | 

छेडी भम घुसे कि घर इंघधन के घनस्वाम, 
वर-घरनीनि यद जात न बिनात जू।? 

. रसिकप्रिया में इस पद्म को वीभ्रत्स-रस के उदाहरण में 
लिखा.-है । यहाँ वीभत्स के स्थायी भाव 'बिनात'” का शब्द द्वारा 
स्पष्ट कथन हे । 

“काहू एक दास काहू साहव की आस में, 

कितेक दिन बीते रीत्यों सब भाँति बल है ; 
-बिथा जो बिने सो करे उत्तर याही सो लहै, 

सेबा-फल हो ही रहै, यामें नहिं चल हे | 


ड३ भूमिका 


एंक दिन हास-हित आयो प्रभु पास तन, 

राखे ना पुराने बास कोऊ एक थल है; 
करत प्रनाम सो बिह सि बोल्यो यह कहा! 
... _कह्मो कर जोरि देकसेवा ही को फल है।” 


इसे काव्यनिणुय में भिखारीदासजी ने हास्य रस के उदा- 
हरण में लिखा हे। यहाँ हास का स्पष्ट कथन हो गया है । 
“वेद के लाइवे के मिस के हसिके कढि ग्वालन संग बिहार ते ; 
पीत पटी कि सौ कसिके उर में डरप्यो न कलिदी की धारतें । 
ए. ससिनाथा कहा कहिए जु बढी अरुनाई उछाह अपार तें | 
काली फनिद्‌ के कंदन को चढि क्रद्यो गुर्विंद कदव की डार ते ।” 


सोमनाथजी ने रसपीयूप में इसे वीर रस के उदाहरण में 
लिखा है, यहाँ वीर रस के स्थायी उत्साह का शब्द द्वारा 
कथन है । 
इसी प्रकार-- 
“कहा कीन्हीं असमें अनीति दसकंठ कंत, 
हरिलायों सिया को सु ताको फल पावेगों ; 
सेत बाधि सिंधु में अडिग्ग पथ कीन्हों उनि, 
कोन अब ऐसो समुकाय जु॒ बचावेगी | 
बूडि-बूडि जात मन मेरों भय-सागर में, 
कहा जानो केसे जरास ऑखिन दिखावेगौं ; 
बन्‍्दी करि सब कीस बारे रघुनन्द आय, 
हाय-हाय हाथें हाथ लकहि लुठावेगों।” 
रसपीयूष में इसे भयानक रस में लिखा है, यहाँ भयानक 
रस के स्थायी भय ओर त्रास सब्चारी का शब्द द्वारा कथन है। 


ओर-- : 


भूमिका १ 


“हा-हा वहँ चलि देखि मदद अजहूँ वह पालने लाल परखथो है; 
जाहि निहारि कहै 'ससिनाथ' अचंभो महा ब्रज माहि मरयो है। 
ठोरहि ठोर यही चर्चा, गह-काज, समाज सबे विसरथों है ; 
नेक से नंद के छोहरा री, पग सो सकगासुर चूर करबो है।” 


रसपीयूप में इसे अद्भुत रस के उदाहरण में लिखा हे, 
किन्तु इसमें अचंभों” पद से अदूभुत रस का शब्द द्वारा 
कथन हे । 
“दान न दें गई मोसो क्यो मै क्ल्मो नेंदगामु मे बेचति नाहीं, 
ले गयो छीन छला चट सो नट तातें परी यहि भंभट माहीं। 
वार लगीन है विनीप्रवीन॑ कहो सप्रनो सपनो यहीं ठाहीं, 
हे अलि ताको वतावति क्यो न गहे ललिता को न छोडति बाहीं ।” 
इसे नवरस तरंग में 'स्वप्न' संचारी के उदाहरण में लिखा 
है। यहाँ 'सपनो सपनो' में स्वप्न का शब्द द्वारा कथन हे । 
“सिसि जागी लागी हिये प्रीति उमंगत प्रात ; 
उठि न सकत आलस वलित सहज सलोने गात ।” 


पद्माकरजी ने जगद्विनोद मे इस पद्म को आलस्य सब्चारी 
वि ७.5 हे 
के उदाहरण में लिखा हे | यहाँ 'आलस' का स्पष्ट कथन है । 
“पग्रग ते, मथानी ते, मथन ते, सु माखन तें 
मोहन की मेरे मन सुधि आय-आय जात |” 
इसे ग्वाल कवि के 'रसरंग' में स्प्रति भाव के उदाहरण में 
दिया है, पर 'सुधि' पद से स्घ्रति का स्पष्ट कथन हे । 
“हरि भोजन जब तें दए तेरें हित चिसराय | 
दीन भयो दिन भस्त है, तब ते हाह्य खाय ।” 
इसे रसलीन ने अपने 'रसप्रवोध' में दन्‍्य सच्च्चारी के उदा- 
हरण से दिया है| यहाँ दीन शब्द से देन्‍य का स्पष्ट कथन है । 


है; 24 भूमिका 


यह दिकदशन मात्र हे। इसके लिये विस्तृत आलोचना 
अपेक्षित हैः। किन्तु इस छुद्र लेखक को प्राचीन आचार्यों 
की आलोचना करना अभीष्ट नहीं है। महान्‌ साहित्याचार्य 
श्री आनन्द्वधनाचाय का कहना है कि असंख्य सरस 
सूक्तियो ह्वारा अपने यश को उज्ज्वल करनेवाले लब्धप्रतिष् 
४ 5 के दोपों का उद्घाटन करना स्वयं अपने को दोषी 
करना है-- 


“तत्त सूक्तिसहखद्योतितात्मना महात्मना दोपाडोपणमात्मनएव 
दूषण ।” --ध्वन्यालोक, उद्योत २। 


अतएव जिन महानुभावो के द्वारा हिन्दी साहित्य की 
अनिवचनीय श्रीवृद्धि हुई है और जिनके अकथनीय परिश्रम: 
का आज यह फज्ञ है कि हम लोग साहित्य-क्षेत्र में असिमान कर 
सकते है, उन महानुभावों को आद्रास्पप समझकर उनके 
सवंतोभावेन अनुग्रहीत होना ही उचित है। इस भ्न्थ में हिन्दी 
के प्राचीन साहित्य-अन्थों के विषय में जो कुछ आलोचनात्मक 

; प्रसज् वश लिखे गये है, वह छिद्रान्वेषण की दृष्टि से नही । 
केवल प्रतिपादित विषय की स्पष्ठता करने के लिये आवश्यक 
समभ कर ही लिखे गय है | इस प्सद्भ मे जो-- 


हिन्दी के आधुनिक , साहित्य-ग्रन्थ 


प्रकाशित हुए है, उनके विपय में भी कुछ उल्लेख करना आव- 
श्यक प्रतीत होता है । कविराजा मुरारीदानजी का 'जसवंतजसो- 
भूषण, श्रद्धेय द्वेय विद्यामातंस्ड पर्डित श्री सीतारामजी शाञ्री का 
'साहित्यसिद्धान्त', श्री जगन्नाथप्रसाद 'भाजें' का 'कोव्यप्रभाकर', 
श्री बाबूराम विध्थरिया का हिन्दी में 'नवरस', श्री भगवानदीनजीः 


भूमिका रें६ 


ददीन' को व्यंग्यसज्ञ पा, श्री गुलावराय एम० ए० का नवरस 
आर श्रद्धेय परिडत श्री अयोध्यासिहजी हरिओध' का 'रस- 
कलश?” आदि अनेक ऐसे साहित्य-म्न्थ प्रकाशित, हुए हैं जिनमें 
रस विषय का उल्लेख है । 


कविराजा मुरारीदानजी प्रणीत 'जसवंतजसोभूषण” अत्यन्त 
पारिडत्य-पूण है। इस ग्रन्थ से रस विषय पर जो संक्षिप्त रूप 
में लिखा गया है, वह संस्कृत अ्न्धों के अनुसार है और उप- 
योगी है। पर इस ग्रन्थ में कविराजा ने एक नवीन सिद्धान्त यह 
प्रतिपादन किया है कि अलझ्जारों के नामों के अन्तर्गत ही सभी 
अलडझ्भारों के लक्षण है। अपने इस मत के सिद्ध करने का उन्होंने 
असफल प्रयास किया है । ओर अपने इस नवाविष्क्रत सिद्धान्त 
के ग्रतिपादन करने में उन्होंने संसक्र॒ के सभी सुप्रसिद्ध साहित्या- 
चार्यों की प्रथक्‌ लक्षण लिखने की प्रणाली का खण्डन किया 
है। किन्तु कविराजा इस काये में कृतकार्य नहीं हो सके है। 
अथ्थात्त न तो वे अपने नवीन सिद्धान्त को निश्रोन्‍्त स्थापित 
कर सके है ओर न प्राचीन परिपाटी के खण्डन करने में ही 
समर्थ हुए हैं? । 


श्रद्ेय विद्यामातंण्डजी का 'साहित्यसिद्धान्तः हिन्दी भाषा 
में अत्यन्त उत्कृष्ट ग्रन्थ है। इसमें प्रधानतः काव्यप्रकाश के 
अनुसार साहित्य के सभी विषयो पर मार्मिक विवेचन किया 
गया हे । इस ग्रन्थ में हिन्दी भाषा के पद्म उदाहरणों में न रख- 

३ देखिये काव्यकल्पटस के तृतीय सस्करण के ह्विंतीय भाग 
अलक्कारमझरी की भूमिका पु० ह, क्ष, तर, ज्ञ और द्विवेदी अभिनन्‍्दन 
अन्य में हमारा अलदार' शी्रेक लेख पू० २२६ 


३७ भूमिका 


'कर काव्यप्रकाश के कुछ संस्क्रत पद्मो को उद्घ्रत किया गया है ॥ 
अतः यह अन्थ संस्कृत के उच्च कक्षा के विद्यार्थियों के लिये 
अधिक उपयोगी हे । ह 


भानुजी! के काव्यप्रभाकर!), विथ्थरियाजी के “हिन्दी 
नवरस”* ओर दीनजी की “व्यंग्यमच्जूषाःः की आलोचना हम 
माघुरी' पत्रिका में कर चुके है। यहाँ इतना लिखना ही पर्याप्त है 
कि इन विद्वानों ने अपने-अपने ग्रन्थ के ग्रतिपाद्य विषय पर 
लेखनी उठाने का व्यथ ही कष्ट उठाया है। खेद के साथ कहना 
पड़ता है कि इन विद्वानों का यह प्रयास उनकी सबथा अनधिकार 
चष्टा थी। 


यह भी खेद के साथ कहना पड़ता है कि हमारे स्नेहास्पद 
बाबू गुलाबरायजी एस० ए० के द्वारा रस विपय पर जेसा ग्रन्थ 
लिखा जाने की साहित्य-संसार आशा रखता था, वसा भन्धथ वे 
भी न लिख सके है | वृहत्काय 'नवरस” से ग्राचोन परिपाटी के 
अनुसार नायिका भेद आदि अनावश्यक विषयो की प्रधानता तो 
है ही, पर उसके सिवा जिस विषय के उदाहरणों में जो पद्य 
रक्खे गये है, उनमें बहुत ही कम पद्म ऐसे है जो उस विषय के 
उदाहरण कहे जा सकते है, शेष पद्म केवल विषय के अनुपयुक्त 
ही नहीं किन्तु दोष पूण होने के कारण उनके द्वारा उस विपय 
के सम्बन्ध में भ्रम होजाना भी सम्भव हे। श्रतिपाद्य विषय रस 


३ साघुरी पत्रिका वर्ष ७, खण्ड $ पृ० ४४७, ६९ और प्र० ८३२-- 
मरे७ 

२ भाधुरी वर्ष ७ खण्ड ३ पृ० १०-१४ 

३ माधुरी पत्निका वर्ष ६, खण्ड २, ए० ३१४७३१४ 


भूमिका रेप 


का विवेचन बड़ी असावधानी से किया गया है । ऐसा ज्ञात होता 
है कि नवरस में जिन संस्कृत ग्रन्थों का ओर साहित्य के प्रधान 
विषयों का उल्लेख किया गया है, उनसे एवं साहित्य के महत्व- 
पूरं विषयों से विद्वान लेखक महाशय सम्भवतः परिचित भी 
नहीं हैं। आप लिखते है-- 


“व्वनि को अधानता दनेवाले आचार्यों में अभिनव गुप्त 
५ 5 सेद्धान्त ' 
मुख्य है। उनके ध्वन्यालोक में ध्वनि का सिद्धान्त दिया गया है । 
उत्तका कथन हे कि काठ्यस्यात्सा ध्वनि! ?--नवरस प्रू० ४ 


ध्वनि को ग्रधानता देनेवाले आचार्यों म॑ सब ग्रधान अज्ञातनामा 
ध्यवूनिकार एवं श्री आनन्दवधनाचायें है।आओऔर यह बात सर्वे 
सम्मत है कि ध्वनि-सिद्धान्त के सबग्रथम अन्ध ध्वन्यालोक' के 
अणता अज्ञातनासा ध्वनिकार ओर श्री आनन्दवधनाचाय ही हे, 
कि अभिनव गुप्ताचाय । आगे चल कर नवरस'-कार लिखते हैं-- 


“भरत मुनि ने जो शान्त को स्वतंत्र स्थान नहो दिया इसका 
कारण यह हे कि शान्त का स्थाई भाव 'निर्वेद! सञ्चारी भावों 
में आ जाता है | फिर उसके दुहराने की उन्होंने आवश्यकता 
नहीं समझी |” -नवरस प्रू० ५१८ 


किन्तु भरत मुनि ने तो शान्त को स्वतंत्र रस स्वीकार किया 
है, ओर उसका स्थायी भाव 'शम' माना है, न कि निर्वेद । 
अरत मुनि ने कहा है-- 


“अथ शान्तो नाम शमस्थायिभावात्मको मोक्ष त्रवर्तक: ** 
“एवं नवरसा इष्टा नाव्यज्ञेलेन्षणान्विताः ।? 


ऐसा अतीत होता है कि 'नवरसः के विद्वान लेखक ने 


३६ भूमिका 


आचाय कुन्तक के वक्रोक्ति सिद्धान्त को अलझ्ारो के अन्तगगंत 
प्रधानतः 'वक्रोक्ति अलझ्कार का विषय ही समझ लिया हे । किन्तु 
'कुन्तक का वक्रोक्ति सिद्धान्त अत्यन्त व्यापक है, कुन्तक ने अपने 
इस सिद्धान्त के अन्तर्गत ध्वनि, अलद्लार और रीति आदि 
सभी सिद्धान्तों का समावेश कर दिया हे । 


रस दोप का विवेचन करते हुए ग्रन्थकार ने लिखा हे; 
+शअड्डारादि रस, स्थायी भाव, ओर सच्चारी भावों का स्वशब्द 
द्वारा कथन किया जाना दोष है” | यह ठीक हे किन्तु फिर भी 
रस एवं भावों के जो उदाहरण दिये गये हैं, वे अधिकतर ऐसे 
हैं जिनमें रसों ओर भावो के नाम स्पष्ट आ गये है। अस्तु, 

श्रद्धय हरिओधजी का 'रसकलशः' विद्वत्तापूण होने पर भी उसमें 
दिये गये उद्गहरणो में रस, भाव आदि के नाम स्पष्ट स्वशब्द्‌ 
द्वारा स्पष्ट कथन है, यह॑ चिन्त्य हे। इसके सिवा रसकलश में 
देश सेविका आदि नायिकाओ का जो नवाविष्कार किया गया है 
चह नवीन तो अवश्य हे किन्तु खड्जार रस के आलम्बन-विभाषों 
के अन्तगत चिन्तनीय है | श्री हरिओधजी की काव्य-शक्ति के 
अभाव ओर महत्व के कारण उनका 'रसकलश' वस्व॒ुतः आधु- 
निक हिन्दी साहित्य-अ्न्थो में गोरवास्पद स्थान रखता है। 


चतुथे संस्करण के सम्बन्ध में दो शब्द 
हे का विपय है कि भगवान्‌ श्री राधागोविन्द्देवजी की 
कृपा से इस ग्रन्थ के चतुथ संस्करण का सुअवसर श्राप्त हुआ 
है | निस्सन्देह साहित्य-ममंज्न सहृदय विद्वानों की गुण-प्राहकता 
ओर अनुग्रह का ही यह फल हे । 


प्रस्तुत चतुर्थ संस्करण तृतीय संस्करण का संशोधित परि- 
चर्तित एवं परिवद्धित संस्करण हे । 


भूमिका ४० 


' इस संस्करण में कतिपय स्थानों मे विषय को अधिक स्पष्ट 
करने के लिये परिवर्तत कर दिया गया है। उदाहरण भी नये 
नये रखकर ग्रन्थ की उपयोगिता बढ़ा दी गई है। विषय को 
प्रथक-प्रथक्‌ विभक्त करके नये-नये शीपेक कर दिये गये है। 
एवं विषय की स्पष्टता के लिये कतिपय विपयो को प्रसद्भानुकूल 
स्थानान्तर भी कर दिया गया हे। पिछले संस्करण की भाँति 
शब्दानुक्रमणिका इस संस्करण भें भी रक्खी गई है ओर उसमें 
कुछ त्रुटियाँ थी, वे यथा संभव दूर कर दी गई है । 

आशा है, यह ग्रन्थ केवल हिन्दी ही के नही, संस्क्ृव-साहित्य 
के विद्यार्थियों के लिये भी उपादेय होगा, ओर हिन्दी एवं संस्कृत 
काव्य-ममन्न सह्ृदय विद्वानों के भी मनन करने योग्य एवं 
सनोरज्धन के लिये एक नवीन वस्तु होगी। 
प्रथम तो रस और अलझार विपय ही अत्यन्त जटिल है। 
दूसरे, अन्थ का अधिकृत आलोचनात्मक विषय तो बहुत ही 
विवादास्पद है | अतणव संभव हे, इस अन्थ में बहुत कुछ त्रुटियाँ 
हों। लेखक इस विषय म॑ कहाँ तक कृतकाय हो सका है, यह 
सहृदय काव्य-मसज्ञ विद्वानों की समालोचना पर निभर हे 
“एक: सूते कनकमुपलं तत्परीक्षाक्षमो पन्‍यः । अस्तु । 
अब अधिक कुछ निवेदन न करक सह्ृद्य महानुभाव काठ्य- 
ममज्ञों की सेवा सं कविराज भट्ट नारायण की निम्नलिखित सूक्ति 
आथना-रूप उद्धत की जाती हे-- 
कुसुमाझलिसर इव॒प्रकीयत काव्यबन्ध एपजोअ्त्र 
मधथुलिट इव मधुबिन्दून्बिस्तानपि भजत गुणलेशान 
विनीत 
मथुरा | साहित्य का एक नगरण्य सेवक 
बसंतयचमी स० १६६७ [ '. -कन्हैयालाल पोद्यर 


4६ श्रीहरि;! शरणम्‌ & ४४ 


काव्यकल्पहुम 





प्रथम स्तवक . 


मड़लाचरण 


विघनहरन हो असरन-सरन मुद-करन विमल मति दूषन द्रो ही गे ; 
वरन-करन ' पुनि चरन-करन * सदर, वरन अरुन याहि पूधन3 करो ही गे। 
चंदन चरन जुग ध्यान हिय घारि करों, विनय करन सुनि भूखन * हरो ही गे ; 
चाररन-वदन" प्रभु ! मदन-कदनजू के,भूषन-सदन ५ अथ सूधन ० भरो ही गे॥ 


कल्यानी ! बानी“! सदा प्रनर्वों पानी जोर। 
मो मसुख-रसनातल रुचिर करहु नृत्य थल तोर॥ 


विघन-हरन सुचि नाम कासदतरु वर-सुमति-सिधि। 
सेवहिं बुध सब जाम कविपति गनपति जयति नित* ॥ 


सिम कक 


१ चर्णों को शोभित करनेवाले या सर्वश्रथम लेखक ( गणेशजी की 
लेखनी से ही महाभारत”! लिखी गई थी ) । २ अनेक वर प्रदान 
करनेवाले । ३ इस अन्थ का पोषण करोगे । ७ मेरी भूख को हरोगे-समेरो 
इच्छा पूणों करोगे । < गज वदन । ६ श्रीमहादेवजी के ग्ृह-भूषण ॥ 
७ इस अन्थ को भूषित करोगे। ८ श्री सरस्वती । & इससें श्लेष से 
श्रीगणेशजी और जोधपुर निवासी कविवर स्वामी गणेशवुरीजी--जिनसे: 
अन्थकर्ता ने सब से प्रथम भाषाभूषन अन्थ पढ़ा था--की स्तुति है | 


अथस स्तवक ४२ 





आनेंद के कंद नेंदंद यदुवंसचंद! 

भक़न-दुख इन्द॒ के हरेैया सुकंद होौ;. 
गायन चरेया गज-फंद के कठेया प्रझ्ु ! 

सुवैया फ्ललिंद छीरसिंधु में सुद्ंद हो 
जानि मतिमंद त्यों विवेकमंद, विद्यामंद , 

छेदी तमवृन्द नाथ! जै जय अमसंद्र हो; 
अँध के अमंगल टारि मगल करो ही गे, 

आरपे हमारे सदा सहायक गुविंद हो ४ 


घोएू हरि पाद"* आदि विधि के कमंडल सा , 

कढ़ि सुरलोक वे असोक थोक जोय जब $; 
उतरि तहाँ ते इंस-सीस* घोय धथोए फेर , 

सगरज-ढेरटें हेर धार सतत होय तब ६ 
भक्नन भव-तापन ओ पापन हूँ धोचे त्यों 

थोवे खतापन हू. ऐसी तव तोय अब-- 
सोह धोइवे की बान ध्यान करि आदि ही की 

गअथ के अमगल हू सात गंग ! घोय सब | 


करुन-सरुन-पद॒ ४ पदु-सुरुत तरुन अरन सम कंजु ॥ 
वदौ जिहि सुसरिन किए होहिं सकल झुद मजु ॥ 





१ श्रीविष्णु भगवान के चरण | २ श्रीशइझूर का मस्तक । ३ सगर 
राजा के साठ हज़ार पुत्रों की भस्म के ढेर । ४ करुणा और शरण 
के स्थान। 


श्ड्३े काव्य का लक्षण 


' बंदी व्यास रु आदिकथि सक्र-चाप जिमि बंक"। 
विहितघनालंकार* पुनि बरन बविचित्र3 निसंकरई ॥ 
श्लिष्ट सभंग" सुवर्ण रझूदु* गुनजुत सरस निदोस | 
कालिदास बानादि कवि जय-जय नवकृति कोस ॥ 
कहि हरि जस न अ्रधाय बालमीकि मुनि ज्यास मनु। 
प्रटटे भुवि पुनि आ्राय बंदी तुलसी-सूर-पद ॥ 


--- (0३ २8,-.- 
काव्य का लक्षण । 


दोष-रहित, गुण एवं अलड्भार-सहित ( अथवा कहीं 
अलड्डगर-रहित ) शब्दार्थ को काव्य कहते हैं । 


अर्थात्‌ काव्य उन शब्द और अथ की ( दोनो की मिलकर ) 
सज्ञा है जिनमे दोषन हो, ओर जो गुण एवं अलड्जास्युक्त हों। 
यदि किसी रचना में अलड्जार न भी हो, श्रर्थात्‌ स्पष्टटया अलड्जार की 
स्थिति न हो, तो मी दोप-रहित ओर गुण-सहित शब्दार्थ काव्य कहा 
जाता है। काव्य का यह लक्षण आचार्य मम्म>-प्रणीत काव्यप्रकाश के 
अनुसार है। सस्कृत रीति-अन्थों मे काव्य के लक्षण भिन्न मिन्न आचायों 

१ इन्द्र धनुष के समान टेढे, भर्थात्‌ वक्रोक्नि युक्र । २ इन्द्र- 
धनुष के पक्ष में मेघ-घटा से शोभित, और काव्य पक्त में अलक्षारों से 
युक्र | ३ इन्द्र धनुष के पक्त में अनेक रंगोंवाल्ला, काव्य पक्ष में विचित्र 
चर्णो" की रचना-युक्र | ४ शद्बा-रहित । & अभनज्ञ (इलेष-युक्क) होकर भी 


सभझ्ग । ६ सुवर्ण (श्लेषार्थ सुन्दर) होकर भी कोमल । 





प्रथम स्तंवक ४४ 





द्वारा भिन्न भिन्न बताए गए हैं। इस विषय में बडा मतमेद हैं! । शब्द- 
अर्थ, गुण, दोष ओर अलड़्ारों की स्पष्टता यथास्थान आगे की जायगी | 


काव्य के भेद 


काव्य के मुख्य तीन भेद हैं---उत्तम, मध्यम और अधम्‌ः। काव्य में 
व्यग्यार्थ ही स्वोपरि पदार्थ हैं। अतएव काव्य की उत्तम, मध्यम और 
अधम संज्ञा व्यंग्यार्थ पर ही अवलम्बित है। अर्थात्‌, जहाँ व्यंग्यार्थ की 
प्रधानता हो, उसे उत्तम- जहों व्यंग्यार्थ गौणु हो, उसे मध्यम; और जहाँ 
व्यंग्याथ न हो, केवल वाच्याथ ही म॑ चमत्कार हो, उसे अधम काब्य 
माना गया हैं। इन तीनों भेदों के नाम क्रमशः ध्वनि, गुणीमृतव्यंग्य 
ओर अलड्लार* हैं। यद्यपि काव्य के भेदो के विषय में भी साहित्याचार्यों 
का मतभेद हैं, किन्ठु काव्यप्रकाश आदि अनेक ग्रन्थों मे उपयुक्त तीन 
भेद ही माने गए, हैं । इन तीनो भेदों के विशेष लक्षण ओर उदाहरण 
यथास्थान आगे लिखे जायेंगे। इनके सामान्य लक्षण ओर उदाहरण 
इस प्रकार हैं--- 

ध्वनि 

जहाँ वाच्यार्थ की अपेक्षा व्यंग्यार्थ में अधिक चमत्कार 

हो, उस काव्य को ध्वनि कहते हैं | 


वाच्याथ ओर व्यग्यार्थ की स्पष्टता द्वितीय स्तवक में की जायगी । 
काव्य में ध्वनि का स्थान सर्वोच्च है, ध्वनि में व्यंग्यार्थ अधिक चमत्कारक 
होने के कारण वह (व्यग्याथ) प्रधान रहता है इसी से इसे उत्तम काव्य 
की सज्ञा दी गई है। नि का उदाहरण-- 


के ५५ ७०५७३४८८५०5, 





४५ ४८ ४जी ५ धरम ५तऊ 


_$ विस्तृत विवेचन के लिये, देखिये, हमारा 'संस्कृतसाहित्य का 
इतिहास! दूसरा भाग । २ “अ्लक्कार! का दूसरा नाम 'चित्र' भी है। 


9४ ध्वनि काललक्षण 





ये ही अ्रपमान, मेरे शत्रु को लखानों, पुनि 

वाकी इत श्ानों, गढ़लंक में घिरानों मैं; 
सोहू है तापस, ध्वंस बंस जातुधानन को 

देखों हों जीवित, घिक रावन कहानों मैं। 
इंद्र के जितेया को ,हजार हैं घिकार और 

जानों हों वृथा ही कुभकने को जगानों मैं; 
लूव्यो स्वर्ग तुच्छु या घमंड सौं प्रचंड शअहो 

मानों क्यो न व्यर्थ भुजदड को फुलानों में ॥१॥ 


यहां श्रीरधुनाथजी द्वारा असख्य राक्षुस वीरो का विध्वस हो जाने 
पर अपने को घिकारते हुए रावण का अपने आप पर अधिक्षेप है) इस पद्म 
के पद पद में व्वनि हैं। रावण कहता है--'प्रथम तो मेरे शत्रु का होना ही 
अपमान हैं! । मेरे! पद्‌ में यह ध्वनि है कि मुझ अलोकिक बलशाली, 
इन्द्रादि के विजेता, रावण के साथ शत्रुता का साहस किया जाना बडे 
आश्चर्य का कारण है। 'फिर उसका यहाँ आना” इसमे यह ध्वनि है 
कि जिस लड़ा के चारों ओर समुद्र है ओर जो मेरे जैसे अलोकिक 
प्रभावशाली एवं पराक्रमी द्वारा रक्षित हैं। और आकर लड़ा में मुझे 
घेर लेना' यहाँ यह व्वनि है कि मेरे ही स्थान में आकर मुझे घेर लेना । 
“वह शत्रु भी तापस है? 'तापस' में यह व्वनि हैं कि वह कोई देवता 
या प्रसिद्ध बलवान नहीं है किन्तु घर से निकाला हुआ, वन में भठकनेवाला, 
युद्ध-कला-अनभिज्ञ, सत्री-वियोग से व्यथित, एक मनुष्य ओर मनुष्यों में 
भी तापस--पुरुषार्थ-हीन--जो हम राक्षुसो का भक्ष्य है, यह ओर भी मेरा 
अपमान है। 'ऐसे तठुच्छे शत्र द्वारा मेरा घिर जाना आर राक्षुस-कुल का 
विनाश किया जाना ओर ऐसे अनर्थ को मैं जीता हुआ अपने नेत्रों के” 
सामने ही देख रहा हूँ? । इस वाक्य मे यह ध्वनि है कि ऐसा घोर अपमान होने 


प्रथम स्तवक ४१ 





पर भी मैं जी रहा हैँ | 'जीवित” पद मे काक्काछिस ध्वनि यह है कि, क्या 
मैं जी रहा हैँ ! नहीं, जीता हुआ भी मतक के समान हूँ, जो अब तक 
ऐसे नगण्य शत्रु का परिहार करने में समर्थ नहीं हो रहा हूँ | 'घिकार 
है मेरे रावण कहाने को! । 'रावण' पद में यह ध्वनि हे कि मैं जो सारे 
ससार को रुलानेवाला हैँ (रावण नाम का तातय ही यह है) उसे यह दुच्छ 
तपस्त्री भयभीत कर रहा है, इससे बढ़कर हाय ! मेरा और क्या अपमान 
हो सकता है! 'केवल मुझे; ही नहीं, किन्तु इन्द्र-विजेता मेघनाद को भी 
हजार बार धिक्कार है? | इसमे यह ध्वनि हे कि जब वह इस ठुच्छ श्र 
को परास्त करने मे असमर्थ है, तब इन्द्र को पराजित करके अपने को 
विश्व-विजयी समभनेवाले मेघनाद का गर्व करना भी व्यर्थ हैं, 
'कुम्मकर्ण का जगाया जाना भी व्यर्थ हो गया है | यहों यह ध्वनि हट 
कि जिस कुम्मकर्ण को मैने अभूतपूर्व पराक्रमी समककर जगाया था 
वह भी कुछ न कर सका। “अतएव स्वर्ग जेसे एक छोटेसे गॉब 
को लूटक़र जिस गयव॑ से मैं अपनी झुजाओं को फुला रहा था वह 
व्यर्थ ही था। यहा यह ध्वनि है कि जिन भुज-दण्डों के अनुपम पराक्रम 
का अनुभव श्रीशड्डर के केलास को हो चुका है, उन म॒जाओं द्वारा इस 
दो भजावाले तृच्छे तपस्वी को मैं पराजित नहीं कर सका तो इन अपनी 
भुजाओ के वल पर गव॑ करना मेरा भश्रम-मात्र था। यहाँ वाच्यार्थ से 
व्यंग्या्य मे ही अधिक चमत्कार है, अतः यह ध्वनि काव्य है। 
ध्वनि के विशेष भेदों का निरूपण चतुर्थ स्तवक में किया जायगा । 
गुणीभूतव्यंग्य 
जहाँ बाच्याथ से व्यंग्यार्थ में अधिक चमत्कार न हो, 
अथवा समान या कम चमत्कार हो अर्थात्‌ व्यंग्यार्थ प्रधान 


३ काक्ातल्षिप्त ध्वनि की स्पष्टता आगे ध्वनि प्रकरण में देखिये । 


४७ गुणीमूत व्यंग 


म हो वहाँ व्यंग्यार्थ गौय कहा जाता है। गौर व्यंग्यार्थ 
को ग्रुणीभूतव्यंग्य कहते है । 


उदाहर्णु--- 
उन्निद्र रक़् अरविन्द लगे दिखाने, 
गुझ्लार मन्जु अलि-पुअ लगे सुनाने ; 
'ए देख तू उदयअद्वि लगा सुहाने, 
बन्धूक पुष्प-छुचि सूर्य लगा चुराने ॥२॥ 


प्रभात होने पर भी शयन से न उठनेवाली किसी नायिका के प्रति 
उसकी सखी की यह उक्ति है। यहाँ 'सूर्य-बिम्ब द्वारा बन्धूक-पुष्प 
की कान्ति का चुराया जाना वाच्यार्थ है । इसमे प्रभात का 
हो जाना व्यग्यार्थ हे। यहाँ व्यग्यार्थ वाच्यार्थ के समान ही स्पष्ट 
है, कोई अधिक चमत्कार नहीं है, अतएव यहाँ व्यग्यार्थ गोण है-- 
अधान नहीं है | गुणीमूतव्यग्य के विशेष भेदों का पॉचवे स्तवक में 
निरूपण किया जायगा | 


अलडूगर 


जहाँ व्यंग्यार्थ के बिना वाच्यार्थ ही में चमत्कार हो, 
उसे अलडूगर कहते हैं | 


यद्यपि व्यग्यार्थ प्रायः सर्वत्र रहता है, किन्तु जहाँ कवि का लक्ष्य 
व्यंग्याथ पर नहीं होता है, श्रर्थात्‌ जहाँ व्यग्यार्थ के ज्ञान बिना ही 
केवल वाच्ष्याथ मे चमत्कार होता है, वहाँ अलड्लार होता है। अलड्डारों 


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4 एक प्रकार का लाल रक्ञ का युष्प । 


ग्रथंस स्तवक ष्प 


के सामांत्यतः मुख्य तीन भेद हं--शब्दलड्ढार अथॉलड्ार ओर शब्दार्थ: 
उभयालड्डार । ४ ४ 5 


शब्दालड्लार का उदाहरणु-- 


फूलन के स्‍्याने के कमाने लगी फूलन की , 

फूलन ही के खाने सु सुहाने मने हरे ; 
फूलन की माल में बिसाल छुत्र कंचन को , 

बीच उड्ुजाल बाल-रवि सो लखे परे ॥ 
तिहिमें विरजें रघुराजें दुति आजे आज , 

ध तुलसीमुकु.. समनि तुरसी करे चुरे; 

देखि -छुव्ि याके बिन बेन हाय अ्रास्तें 

आखें चैनहू न राखें तासों भाखें ना बने परे,॥३॥ 


इसमे फ; म, न आदि अनेक व्यज्ञनो की कई बार आदइत्ति होने सें 
बृत्यनुप्रास ओर एक ही अर्थवाले आखे पढ का दो बार प्रयोग होने से 
लाटानुप्रास है। ये दोनो शब्दालड्लार हैं। यहाँ भगवान्‌ श्री रघुनाथजी के 
विषय मे जो प्रेम सूचन होता है, वह व्यंग्य अवश्य है, पर उस व्यंग्यार्थ के 
ज्ञान विना ही केवल शब्द-साइश्य में यहों चमत्कार है। 
अर्थालड्वार का उदाहर्ण-- _ 


“साल गुही ग्रुन लाल लटें लपटी लर मोतिन की सुख देनी 
ताहि विलोकत आरसी ले कर आरस सो इक सारस-नैनी । 
'केसव! कान्ह दुरे दरखी परसी उपमा मत्ति को अ्रति पेनी ; 
सूरज-मंढल में सप्ति-मंडल मध्य घसी जनु जाहि ज़िचेनी”? ॥४॥ 


च्क 


दर्मण में मुख देखती हुई किसी गोपाड्ना के मुख के उस 
दृश्य मे, जिसके केश-कलाप में रक्त सत्र की डोरियों और मोतियों की 
लड़ी गुँथी हुई थीं, सर्म-मण्डल मे चन्द्र-मए्डल ओर उस चन्द्र-मण्डल में 


४६ अलक्कार 





शोभित त्रिबेणी की उत्पेत्षा की गई है। यहाँ उत्पेज्षा अलड्लार जे 
वाच्ष्यार्थ है उसी में चमत्कार है। 


शब्दार्थ उभयालड्लार का उदाहरणु-- 

“झौरन के तेज तुल जात हैं तुलान बिच, 

तेरो तेज जमुना तुल्लान न नुलाइये | 
झरन के शुन की सु गिनती गने ते होत, 

तेरे गुन॒ गन की न गिनती गनाइये। 
दवाल! कवि श्रमित प्रवाहन की थाह होत, 

रावरे श्रवाह की न थाह दरखाइये। 
पारावार पार हू को प्रारावार पाइयत, 

तेरे पारा पार को न पारावार पाइये” ॥श्ा' 


यहों अन्य नद-नदियों से यमुनाजी का आधिक्य वर्णन किये जाने 
में व्यतिरेक' अर्थालड्वार है । ओर 'त? 'ग? 'प' की अनेक बार आदृत्ति में 
वृत्यानुप्रास तथेव चतुर्थ चरण मे एकार्थक 'पारावार' शब्द की आइत्ति 
होने के कारण लाटानुप्रास शब्दालड्वार है। यहाँ शब्दालड्लार और 
अ्थालड्लार एकत्र होने से उभयालड्डार है । 


अलड्ारों के विशेष भेदा का निरूपण इस ग्रन्थ के द्वितीय भाम 
“अलइड्लार मज्लरी में किया गया है । ः 


द्वितीय स्तवक 





शब्द ओर अथे 


काव्य शब्द ओर अर्थ के ही आश्रित है। काव्य में शब्द तीन 
अकार के होते हैं--( १) वाचक, (२) लक्षक या लाक्षणिक, ओर 
( ३ ) व्यज्ञक । इन तीन प्रकार के शब्दों के अर्थ मी तीन प्रकार के 
क्रमशः ( १ ) वाच्याथ, ( २) लक्ष्या्थ ओर ( ३ ) व्यंग्यार्थ होते हैं। 
अर्थात्‌ ( १) वाचक शब्द के अर्थ को वाच्यार्थ कहते हैं, ( २) लक्षक 
या लाक्षुणिक शब्द के अर्थ को लक्ष्यार्थ कहते हैं, ( ३ ) व्यज्ञक शब्द के 
अर्थ को व्यंग्यार्थ कहते हैं | ये अर्थ जिन शक्तियों द्वारा व्यक्त होते हैं, 
चे (१) अभिधा, (२) लक्षणा ओर ( ३ ) व्यज्ञना कही जाती हैं। 
अथांत्‌ अभिषा' आदि शक्तियों शब्द के व्यापार हैं। कारण” जिसके 
द्वारा कार्य करता है उसे व्यापार कहते हैं | जेंसे, घट बनाने में मिद्दी, 
कुम्हार, कुम्हार का दर्ड ओर चाक आदि कारण हैं। भ्रमि ( चाक के 
बास्वार फिरने की क्रिया ) व्यापार है, क्योंकि इसी क्रिया द्वारा घट 
बनता है। इसी प्रकार अर्थ का बोध कराने में शब्द! कारण है, ओर 
अर्थ का बोध करानेवाली अभिधा, लक्षणा ओर उ्यज्ञना व्यापार है| 
इन शक्तियों को द्कत्ति भी कहते हैं। इनकी स्पष्टता क्रमशः इस 
प्रकार है--- 


“बाचक -शब्द 


सांचात्‌ संकेत किए हुए अर्थ को बतलानेवाले शब्द 
को वाचक कहते हैं। 


४१ शब्द और अर्थ 





संकेत--किसी वस्तु को प्रत्यक्ष दिखाकर कहा जाय कि इसका 
नाम यह है”, अथवा “इस नाम की यह वस्तु है”, इस प्रकार के निर्देश 
को--बतलाने को--सकेत कहते हैं। जेसे शह्लू की ग्रीवा ( गरदन ) के 
आकारवाली वस्तु को दिखलाकर बतलाया जाय कि इसका नाम 'घडा' 
है, अथवा 'घड़ा-शब्द का अर्थ 'शह्ठु की गरदन जेंसे आकारवाली 
वस्तु! | इस तरह के निर्देश से 'घड़ा“शब्द ओर शझ्ड की गरदन-जेसे 
आकारवाली वस्घु ( घडा ) का जो परस्पर सम्बन्ध, बतलाया जाता है, 
चही सकेत है | ओर जो शब्द साज्ञांत्‌ सकेत की हुईं वस्तु को बतलाता 
है, वह वाचक शब्द है । 


साक्षात-इस शब्द का प्रयोग यहाँ इसलिए किया गया है कि 
सकेत दो प्रकार से किया जाता है---साज्ञात्‌! ओर “परम्परा-सम्बन्ध से! | 
जैसे, गोवर्धन पर्वत को (जो ब्रज-मण्डल के अन्तर्गत है) प्रत्यक्ष 
दिखलाकर कहा जाय कि “यह गोवधघंन है? । यह तो साक्षात्‌ सकेत हुआ । 
गोवर्धन पर्वत से मिला हुआ जो एक कर्ता है उसका नाम भी गोवर्धन 
पव॑त के सम्बन्ध से गोवर्धन पड गया है। उस कस्बे का “गोवर्धन! 
शब्द सकेत तो है पर वह साक्षात्‌ सकेत नहीं है, गोवर्धन पव॑त के सम्बन्ध से 
'परम्परा सम्बन्ध से सकेत है । 'गोवंधन! शब्द उस कस्त्रे का वाचक नहीं 
कहा जा सकता किन्तु लाक्षशिक"” है, क्‍योंकि वह परम्परा सम्बन्ध से 
सकेतित होता है। 


संकेत का अहण 


संकेत का अहणु--व्यवहार से, प्रसिद्ध शब्द के साहचरय से (समीप 
होने से), आस-वाक्य से, उपमरान से, व्याकरण से और कोष आदि 
अनेक कारणो से होता है | जैसे-- 


+-#१/४७/५०६ 





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१ लाक्षणिक्र शब्द की स्पष्ठता आगे की जायगी। 


प्रथम स्तवक श्र 

१--5्यवहार से संकेत ग्रहणु--किसी दृद्ध मनुष्य के द्वारा अपने 
भ्त्य से यह कहने पर कि 'गेया ले आओ”, यह सुनकर उस भ्रृत्य द्वारा 
गैया ले आने पर, पास में बेठा हुआ बालक, जो अब तक इन शब्दों 
का अथ नहीं जानता था, समर लेता है कि दो सींग, पूंछु ओर फटी हुई 
खुरी के आकारवांले जीव को गेया कहते हैं | इस प्रकार लोगो के व्यवह्यर 
से सकेत का अहण होता है । 


२--असखिद्ध शब्द के साहचय से--यद्यपि' 'मंधुकर'-शब्द का 
अथ शहद की मक्खी ओर भौंरा दोनों है, पर--- 
“कमल पर बैठा हुआ मधुकर मधु पान करता है? 
इस वाक्य में 'मधुकर'-शब्द का अथ 'कमल'-शब्द के समीप होने से 
भौरा ही ग्रहण हो सकता है, न कि शहद की मक्‍्ख़ी | क्योकि, कमल 
शब्द प्रसिद्ध है, ओर कमल का रसं-पान भौरे किया करते हैं। ऐसे 
प्रयोगो में प्रसिद्ध शब्द के साहचय से सकेत का ग्रहण होता है । । 


३--आप्र-वाक्य से--अ्राप्त कहते हैं प्रामाणिक पुरुष को। कहीं 
आप्त वाक्य से भी सकेत ग्रहण होता है। जैसे, किसी वालक को उसकी 
पिता बतला देता है कि इसे घोडा कहते हैं? । वह बालक घोडे शब्द का 
सकेत उस पशु मे समझ लेता है। 


४--उपमान द्वारा--उपमान” कहते हैं साहश्य को । सादृश्य-ज्ञान 
से भी सकेत अहण होता है । जिसने यह सुन रक्खा हो कि गया के जैसा 
गवय ( वनगाय ) होता है, जब कभी वह पुरुष जड्शल मे गेया के जैसा 
जीव देखेगा, तो कट समझ जायगा कि यह “बनगाय' है। 


५--उयाकरण द्वारा--दशरथ का पुत्र दाशरथी” कहा जाता है / 
यहाँ व्याकरण से सकेत का अहण है। 





4 दशरथस्यथापत्यं पुमान्‌ दाशरथिः। 


४३ शब्द ओर अथे 


इस मोॉति अनेक प्रकार से सकेत का ग्रहण किया जाता हे। यह 
सकेत उपाधि में रहता है। वस्तु के धर्म को उपाधि कहते हैं| वस्तु के 
धर्म चार प्रकार के होते हैं, अर्थात्‌ वाचक-शबव्द के चार भेद हैं--- 
जाति-वाचक, गुण-वाचऊ, क्रिया-वाचक ओर यहच्छा-वाचक। इन्हीं में 
शब्द के सकेत का ज्ञान होता है-- ५ 


( १ ) जाति--यह वस्तु का प्राण-भूत धर्म हे। किसी भी पदार्य 
का नाम उस पदार्थ की जाति पर ही स्थिर क्रिया जाता है। जैसे, गेया 
को गेया इसलिये कहा जाता है कवि गोत्व ( गैयापन ) अर्थात्‌ दो सींग, 
फटी हुई खुरी, दूध देना इत्यादि ग़ो-जाति के जो धर्म हैं, वे उसमें हैं । 


गेया, घोडा, मनुष्य आदि शब्द जाति-बाचक हैं क्‍योंकि ऐसे शब्द 
जाति को बतलाते हैं । 


( २ ) गुण--यह वस्तु की विशेषता बतलानेवाला धर्म है । जैसे, 
“सफेद गाय! । यहाँ सफेद गुण है। यह गोत्व प्राप्त करने के लिये नहीं 
है, क्योकि गो-जाति का अस्तित्व तो पहले “गो” कहने-मात्र से ही सिद्ध हो 
चुका है। गुण तो अस्तित्व प्राप्त वस्तु में विशेषता ( दूसरे से जुदापन ) 
बतलाता है। जैसे, जब काली, पीली गायों में से सफेद गाय को जुदा 
बतलाने की इच्छा होती है तब सफेद” जैसे गुण-वाचचक विशेषण का 
प्रयोग किया जाता है। जिसके द्वारा अन्य रज्नो की गायों को छोड़कर 
सफेद गाय का बोध होता है। अतः दूसरे से भेद बतलानेवाले शब्द को 
गुण-वाचक कहते हैं । 


(३ ) क्रिया--जो शब्द क्रिया को निमित्त मानकर प्रशञ्नत्त होते 
हूँ, वे क्रिया-वाचक होते हैं। जैसे, 'पाचक'--पाक वनानेवाला। यहों 
पाक क्रिया के निमित्त से पाचक-शब्द का प्रयोग किया जाता है। अतः _ 
पाचक, पाठक, आदि क्रिया-वाचक शब्द हैं। 


5 


द्वितीय स्तवक घर 





(४ ) यदच्छा--यह उपाधि वक्ता की इच्छा से व्यक्ति पर 
सकेतित होती है। जैसे, देवदत्त, धर्मदत्त इत्यादि नाम | ये नाम रखने- 
वाले की इच्छा पर निर्भर है। वक्ता की इच्छा से जिसका जो नाम रक्खा 
जाय, वही उसका सकेत है । 


वाच्या्थ 

वाचक-शब्द के अर्थ को वाच्यार्थ कहते हैं | जाति-वाचक शब्दों में 
जाति, गुण-वाचक शब्दा मे गुण, क्रिया-वाचक शब्दों में क्रिया ओर 
यहच्छा-वाचक शब्दों म यहच्छा रूप वाच्यार्थ होता है। यह 
महामाष्यकार का मत है। नेयायिक उक्त चारों प्रकार के 
शब्दों का एकमात्र जाति' ही वाच्यार्थ मानते हैं। इसी (वाच्यार्थ) कोः 
मुख्याथें ओर अभिवेयार्थ कहते हँ---मुख्यार्थ तो इसलिये कहा जाता है 
कि लक्ष्या्थ ओर ब्यंग्यार्थ के प्रथम वाच्यार्थ ही उपस्थित होता है; 
अभिवेयार्थ इसलिये कहा जाता है कि यह अभिधा शक्ति का व्यापार है--- 


अभिधा से वोघ होता है। 
“--क्वेते#&< ,-- 


श्र 
अभिधा' शक्ति 
सा्षात्‌ संकेतितः अर्थ का बोध करानेवाली झुख्य 
क्रिया ( व्यापार ) को अमिधा कहते हैं | 
अ्रभिषा' शक्ति द्वारा जिन शब्दों के अर्थ का बोध होता है वे तीन 
प्रकार के होते हँ--रूढं, योंगिक ओर योगरूढ । 


( १) रूढ़ शब्द--समुटाय शक्ति द्वारा जिन शब्दों का अर्थ बोध 
हल होते मद री पा होती थांव्‌ ६.) 
होता है वे रूढ शब्द होते हैं| रूढ शब्दों की व्युत्पत्ति नहीं होती है अ 


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मत 


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भर शब्द और अथी 





उनका अवयवार्थ नहीं होता" है । जेसे, आखण्डल' शब्द-का अर्थ इन्द्र है।, 
इस शब्द के अवयवों ( जुदे-जुदे ख़ण्डों ) का अर्थ नहीं हो सकता |, 
इसी प्रकार “गढ” 'घडा? 'घोडाः आदि शब्द भी रूढ हैं। रूढ-शब्द में 
प्रकृति प्रत्ययार्थ की अपेक्षा नहीं रहती है समूचे शब्द के प्रयोग की किसी 
विशेष अर्थ में प्रसिद्धि होती है* | 


( २) यौगिक शब्द--अवयवों की शक्ति द्वारा जिन शब्दों का 
अर्थ बोध होता है वे योगिक शब्द होते हैं| इन शब्दों का अर्थ उनके 
अवयवों से बोध होता है। जैसे, 'सुधाशु” इस शब्द में 'सुधा' ओर 'अशु”' 
दो अवयव ( खण्ड ) हैं। सुधा का अर्थ है अमृत” ओर अशु का अर्थ 
है (किरण! । इन दोनों अवयवों का श्रर्थ है अमृत की किरणोवाला,- 
अतः अमृत को किरणवाले चन्द्रमा का सुधाशु नाम योगिक है। “हृप ३ 
“दिवाकर! आदि शब्द भी योंगिक हैं। ' 


(३ ) योगरूढ़ू--समुदाय ओर अवयवों की शक्ति के मिश्रण से 
जिन शब्दों के अर्थ का बोध होता है वे योगरूढ़ शब्द होते हैं। ये 
शब्द योगिक होते हुए, मी रूढ होते हैं | अर्थात्‌ जिस शब्द के अबयवों के 
श्र्थ से बोध होनेवाली सभी वस्तुओं के लिये उस शब्द का प्रयोग न 


८० 


करके उन वस्तुओो में से किसी एक विशेष वस्तु के लिये ही प्रयुक्त किये 


्> 


हट ५८5 ८5८४८ ८3 ८६ /५१६ ४६ ०६ ८५ ४४ / ६ ४६ / ६ ४5 २५ ४5५ ८६ /६/६ ०६ /६ 2६/४६/६४६८ 


३ व्युप्पतिरहिता: शब्दाः झूढ़ां आ्ाखणडलादयः! । 

२ “प्रकृतिप्रत्ययार्थमनपे चयशाब्दबोधजनक. शब्द; रूढ़:'--शब्द- 
करपदुस । 

३ निप'-शब्द में 'न” ओर 'प! दो अवयव हैं। न? का श्रर्थ है नर 
ओऔर 'प! का श्रर्थ पति । अ्रतः 'नप! शब्द राजा का योगिक नाम है। 

४ 'दिवाकरः में 'दिवा! और 'कर! दो अव्रयव हैं। दिन को करने-- 
वाला होने से सूर्य का दिवाकर नाम यौगिक है। 


द्वितीय स्तवक ४६ 


लाने की रूढ़ि--प्रसिद्धि--हो, उस शब्द को योगरूढ कहते हैं। जैसे, 
धारिज' | बारि' नाम जल का है। जो वस्तु जल में उत्तन्न होती है 
उसको वारिज! कहा जा सकता है। कमल जल से उत्पन्न होता है। 
इसलिये कमल का वारिज' नाम योगिक तो है, पर जल से केवल कमंल 
ही नहीं, किन्तु शह्लन, सीपी आदि भी उत्पन्न होते हैं। यद्यपि ये समी 
वारिज! ही हैं, किन्तु उन सभी को वारिज' नहीं कहा जाता | क्योकि, 
वारिज' केवल कमल को ही कहने की रूढ़ि--असिद्धि--है । अतः ऐसे 
शब्द यौगिक होते हुए भी रूढ़ होने के कारण “योगरूढ! कहे जाते हैं। 
पयोद", त्रिफला' आदि शब्द भी योगरूद् हैं । 
पद्मात्मक उदाहरण--- 
नूपुर सिंज्ञित चारु अरुन चरन अचुज सरिस | 
भ्ुज सनाल अनुहारु वदन सुधाकर-सम रुचिर ॥६॥ 
यहा नूपुर-शब्द रूढ़ है। अम्बुज' शब्द योगरूढ़ है। 'सुधाकर 
शब्द योगिक है | ये सभी वाचक शब्द हैं | इनका सरल अर्थ 
ही वाचयार्थ है । “क्व७8२९,--- 


लक्षणा' शक्कि 


लाक्षणिक शब्द ओर लक्ष्याथ 


जो शब्द लक्षणा-शक्ति द्वारा अर्थ को लक्ष्य कराता है उसे लाक्षणिक- 
शब्द कहते हैं | लक्षणा-शक्ति द्वारा लक्षित होनेवाले लाक्षणक शब्द 
के अर्थ को लक्ष्यार्थ कहते हैं । 
3 पयोद का यौगिक अथ है पय ( जल ) देनेवाला, अतः जल देने- 
वाले कूप, तड़ाग सभी पयोद हैं, किन्तु पयोद केवल मेघ को ही कहने की 
प्रसिद्धि है । २ त्रिफला का यौगिक अर्थ है तीन फल, पर चाहे जिन 
तीन फलों को त्रिफत्ता नहीं कहा जा सकता, क्योकि त्रिफला केवल 
*'हरड, बहेडा ओर आॉवला, इन्हीं तीन फलों को कहने की रूढ़ि है । 


७  लक्षगा 


हट 


लक्षणा 


मुख्य अर्थ का वाध होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजन के 
कारण जिस शक्ति द्वारा मुख्यार्थ से सम्बन्ध रखनेवाला 
अन्य अर्थ लक्षित हो, उसे 'लक्षणा' कहते हैं । 


जिस प्रकार पूव्वोक्त अमिधा शक्ति शब्द के ज्ञान के साथ तत्काल 
उपस्थित होकर अपने वाच््याथ का बोध करा देती है, उस प्रकार लक्षणा 
सत्काल उपस्थित होकर लक्ष्याथ का बोध नहीं करा सकती । लक्षणा 
तभी होती है जब ( १ ) मुख्याथ का बाघ, ( २ ) मुख्यार्थ का लक्ष्यार्थ 
के साथ योग ( सम्बन्ध ), ओर (३ ) रूढ़ि अथवा प्रयोजन, ये तीन 
ऋारण होते हैँ? । 


मुख्याथ का बाध--जहाँ मुख्य अर्थ ( वाच्ष्यार्थ ) के ग्रहण करने 
मे बाघ हो, अर्थात्‌ प्रत्यक्ष विरोध हो, अथवा जहा वक्ता ( कहनेवाले ) 
का अमिप्राय मुख्याथ से न निकलता हो उसे 'मुख्याथ का बाध' कहा 
जाता है। 

मुख्याथे का योग--मुख्यार्थ का बाघ होने पर जो दूसरा अर्थ 
अहण किया जाय ओर वह अर्थ ऐसा हो जिसका मुख्याथ के साथ 
सम्बन्ध हो उसे मुख्याथ का योग कहा जाता है | 


३ 'सानान्तरविरुद्ध तु सुख्या्थस्यापरिग्रहे । 
अभिषेयाविनाभूत प्रतीतिलेक्षणोच्यते ।? 
--वार्तिककार कुमारिल भद्ट 
२ सम्बन्ध अनेक अकार के होते हैं, जिनका विवेचन आगे 


किया जायगा । 
र्‌ 


“द्वितीय स्तवक - ८ 


रूढ़ि ओर प्रयोजन--रूढ़ि कहते हैं प्रसिद्धि को। अर्थात्‌ किसी 
वस्त को विशेषरूप से कहने की प्रसिद्धि ओर प्रयोजन कहते हैं किसी 
» कार्रण विशेर्ष को (अर्थात्‌-किसी कारण विशेष से या किसी विशेष बात 
* के सूँचन-करने के लिये लाज्षशिक शब्द का प्रयोग किया जाना-। 
इन मे से दो का--मुख्याथ - के बाँध ओर मुख्याथ का लक्ष्याथ के 
साथ योग ( सम्बन्ध ) का होना तो लक्षणा में सर्वत्र अनिवाय है ।॥ 
किन्तु रूढ़ि अथवा प्रयोजन में से एक ही होता है । 
.... इस प्रकार लक्षणा उपयुक्त तीन कारणों के समूह होने पर दो। 
प्रकार की होती है-- 
(१) मुख्याथ का बाघ, मुख्यार्थ का लक्ष्याथ से सम्बन्ध, ओर 
रूढि, यह एक कारण समूह है । 
(२) मुख्याथ का बाघ, मुख्याथ का लक्ष्याथ के साथ सम्बन्ध ओर 
प्रयोजन, यह दूसरा कारण-समूह है। 
इन दोनो मे 'मुख्यार्थ का वाध! ओर “मुख्याथ का लक्ष्यार्थ के साथ 
सम्बन्ध' तो समान हैं | तीसरा कारण पहिले समूह में 'रूढ़ि' है' ओर 
दूसरे में प्रयोजन! | अतः इस तीसरे कारण द्वारा लक्षणा दो भेदों में 
विभक्त है--रूढ़ि' ओर 'प्रयोजनवती ।! 


रूढ़ि लक्षणा 
जहाँ केवल रूद्ि के कारण, मुख्य. .अथे को छोड़कर 
मुख्याथ से सम्बन्ध रखनेवाला दूसरा अर्थ ( लक्ष्यार्थ ) 
ग्रहण किया जाता है, वहाँ रूढ़ि लक्षणा होती है । 
जैसे--भहाराष्ट्र साहसी हें ।? 


यहां “महाराष्ट्र” शब्द लाक्षणिक है, इसमें लक्षणा का पहला 
कारण समूह हँ--- 


- ह६ रूढ़ि लक्षणा 


(१) हाराष्ट्र! का मुख्याथथ है महाराष्ट्र प्रान्त विशेष ।-यहोँ इस 

भुख्यार्थ का बाध है। क्योंकि प्रान्त जड वस्टु है, प्रान्त विशेष में साहस का 

, होना सम्भव नहीं । अतः प्रान्त-को साहसी नहीं कहा जा सकता । यही 
, मुख्यार्थ का वाध' यहाँ लक्षणा का एक कारण है । 


(२) मुख्याथ का बाघ होने के कारण यहों 'महाराष्ट्र'-शब्द से उस 
प्रान्त से सम्बन्ध रखनेवाले "महाराष्ट्र के निवासी पुरुष” यह लक्ष्यार्थ 
_अहण किया जाता है। अर्थात्‌ महाराष्ट्र प्रान्त के निवासी साहसी हैं, 
ऐसा लक्ष्याथ समभझा जाता है। ,इस लक्ष्यार्थ का मुख्याथ “महाराष्ट्र 
प्रान्त' के साथ आधाराधेय सम्बन्ध है। अर्थात्‌ महाराष्ट्र प्रान्त आधार 
है ओर वहाँ के निवासी आधेय | यहाँ यही मुख्यार्थ का “लक्ष्यार्थ के 
साथ सम्बन्ध रूप' लक्षणा का दूसरा कारण है |. 


( ३ ) यहां तीसरा कारण रूढ़ि है | यहाँ किसी विशेष प्रयोजन के 
लिये ऐसा प्रयोग नहीं किया गया है । महाराष्ट्रनिवासियों को 
महाराष्ट्र कहते की रूढ़ि (रिवाज) पढ़ गई है, अतः यहाँ रूढ़ि ही कारण 
होने से रूढ़ि लक्षणां है । 


दूसरा उदाहरण--“यह तेल शीतकाल में उपयोगी है! । 


तैल का मुख्यार्थ है तिलों से निकाला हुआ तिली का तैल । पर 
सरसों, नारियल आदि से निकले हुए, स्निग्घ द्रव्य को मी तैल कहा जाता 
है। सरसों आदि से निकले हुए. स्निग्ध द्रव्य को तैल कहने में मुख्यार्थ 
का बाध है, क्योंकि वे तिलों से नहीं बनते । पर उनको भी तैल कहे जाने 
की रूढ़ि है। अतः यहाँ भी रूढ़ि लक्षणा हे। 


रूढ़ि लक्षणा का पद्मात्मक उदाहरणश-- 


“ड्िगत पानि डियुलात गिरि क्षखि सब म्ज बेहाल । 
कंप किसोरी दरस ते खरे लजाने बाल” ॥णा 


द्वितीय स्तवक के 





ध्रज! का मुख्य अर्थ गॉव या गोपालको का निवास स्थान है। 
वह जड़ है । जड का विहाल” होना सम्मव नहीं । अतः व्रज को वेहाल 
कहने में मुख्यार्थ का बाघ है। यहाँ व्रज' शब्द का अर्थ लक्षणा द्वारा 
, ब्रज में रहने वाले व्रजवासी समझा जाता है | यहाँ मी रूढ़ि लक्षणा है । 


प्रयोजनवती लक्षणा 

जहाँ किसी विशेष प्रयोजन के लिये लाक्षणिक शब्द 
का ग्रयोग किया जाता है, वहाँ प्रयोजनवती लक्षणा 
होती है । 

जैसे--गड्ढा पर आराम” हे? । 

यहाँ 'गद्भा' शब्द लाक्षणिक है | इस लाक्षशिक शब्द के प्रयोग 
किए, जाने में विशेष प्रयोजन है। अतः यहाँ पूर्वोक्त दूसरा कारण 
समूह है-- 

(१) गड्ढा शब्द का मुख्यार्थ है गज्गञाजी का प्रवाह '( घारा ) इस 


मुख्या्थ का यहाँ बाध है। क्योकि गड्भाजी की धारा पर गाँव का 
होना सम्भव नहीं | 


( २) गड़ा शब्द के मुख्यार्थ का बाघ होने से इसका लक्ष्यार्थ 
“गड्जाजी का तट ग्रहण किया जाता है। लक्ष्यार्थ तट! का मुख्या्थ 
प्रवाह! के साथ सामीप्य ( समीप मे होना ) सम्बन्ध है । यह लक्षणा 
का दूसरा कारण है | 

ये दोनो कारण--मुख्या्थ का बाघ और "मुख्याथे के साथ 
लक्ष्यार्थ का सम्बन्ध--तो रूढ़ि लक्षणा के समान ही '्रयोजनवती 
लक्षणा में भी हुआ करते हैं | 


नल जी की ज+> 33३ णलअजबज की 3 अल 


१ गदड्गजायां घोष: । 


६£ प्रयोजनवती लक्षणा 





( ३ ) तीसरा कारण यहा 'प्रयोजन' है, न कि रूढ़ि । 'गद्ञा-तट 
पर गॉव! ऐसा स्पष्ट न कहकर, “गद्ला पर गाव” ऐसा कहने में इस वाक्य 
को कहनेवाले ( वक्ता ) का अभिप्राय अपने गोव की पवित्रता ओर 
शीतलता का आधिक्य सूचन करना है | इसी प्रयोजन के लिये यहाँ 
ऐसा कहा गया है | यदि वह कहता कि 'ेरा गॉव गद्भा-तद पर है”, तो 
गॉव की पवित्रता ओर शीतलता का वैसा आधिक्य सूचन नहीं हो सकता 
था, जैसा कि 'गड़ा पर गॉव! कहने से सूचित होता है । क्योंकि, वास्तव 
में पवित्र॒ता आदि धर्म गड्ढा के प्रवाह के हैं, न॒ कि तट के | अतः गल्जा- 
तट को गड्जा कहने से तट में गद्भाजी की साज्ञात्‌ एकरूपता हो जाने से 
प्रवाह के पवित्रता आदि धर्म भी तट में सूचन होनें लगते हैं । यहोँ यही 


प्रयोजन है, अतः यह प्रयोजनवती लक्षणा है। प्रयोजनवती लक्षणा 
के भेद-- 


प्रयोजनवती लक्षणा 
| 
| | 
गौणी शुद्धा 


(१) का ल० (२) 2 तक 


| | 


(१) सारोपा (२) साध्यवसाना (३) सारोग (४) साध्यवसाना . 





इस तालिका में गोणी के दो ओर शुद्धा के चार भेद, अर्थात्‌ 
सब छुः भेद बतलाए गए: हैं।-ये छहों भेद गूढ़-व्यग्य में भी होते हैं और 
अगूढु-व्यग्य में भी । इस प्रकार प्रयोजनवती लक्षणा के काव्यप्रकाश के 
अनुसार १२ भेद होते हैं । इन बारह भेदों की स्पष्टता इस प्रकार है-- 


द्वितीय स्तवक 8२ 





: गोणी ल्ंकेणा / “7 


जहाँ सारश्य सम्बन्ध से लक्ष्याथे. ग्रहण किया जाय, 
वहाँ गौणी लक्षणा होती है | है. 


लक्षुणा के ऊपर कहे गये तीन कारणों के समूह में एक कारण “ुख्या्थ 
के साथ लक्ष्याथ का सम्बन्ध होना” भी है। जहाँ साहश्य सम्बन्ध से, 
अर्थात्‌ आड्डादकता, जड़ता, आदि गुणों की समान॒ता के कारण लक्ष्या्थ 
अहण किया जाता है", वहाँ गोणी लक्षणा होती है। इस लक्षणा का 
मूल 'उपचार' है। अत्यन्त प्रथक्‌ प्रथक्‌ रूप से भिन्न-भिन्न प्रतीत होने- 
वाले दो पदार्थों में साइश्य के अतिशय से--अत्यन्त समानता होने के 
ग्रभाव से--मभेद की प्रतीति न होने को 'उपचार' कहते हैं? । 

जैसें--“मुखचन्द्र' । 


इसका मुख्या्थ है मुख चन्द्रमा है! | इस मुख्याथ का बाघ है । 
मुख ओर चन्द्रमा दो भिन्न-भिन्न पदार्थ हैं, ग्रतः मुख को/चन्द्रमा नहं 
कहा जा सकता । चन्द्रमा म-अआ्राह्मदक अर्थात्‌ आनन्द प्रदान- करने का 
जो गुण है, वह मुख म भी है--मुख भी आनन्ददायक है । अर्थात्‌, 
आह्वादक गुण चन्द्रमा ओर मुख दोनो में समान है । इस समान गुण के 
सम्बन्ध से “चन्द्रमा के समान मुख है? इस लक्ष्याथ का ग्रहण किया जाता 
है। यह लक्ष्या्थ यहों साइश्य रूप गुण के सम्बन्ध से लिया जाता है, 
अतः गोंणी लक्षणा है | 


कं 





१ गुणतः साइश्यमस्याः अवृत्तिनिमित्तम!'--एकावल्ली की तरल 
रीका, पृष्ठ ६८ । 
८ २ भ्रत्यन्तविशकलितयोः शब्दयो: सादश्यातिशयमहिउ्ना भेद प्रतीति- 
स्थग़नमुपचार:'-- साहित्यटपेण परि० २। - थे 


६३ शुद्धा,लक्षरगा 


३96." अल शुद्धा लक्षणा हु कि 


सादश्य सम्बन्ध फे बिनां जहाँ अन्य किसी सम्बन्ध से 
लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाय, वहाँ शुद्धा लक्षणा होती है | 


जहों सादहश्य के बिना अन्य किसी प्रकार का सम्बन्ध होता है वहाँ 
शुद्धा लक्षणा होती है | शुद्धा लक्षणा मे अनेक सम्बन्धो द्वारा लक्ष्याथ 
अहण किया जाता है। जेसे--- 


ही 
लक इममन+.. +»«» ४ हक 


(१) सामीप्य सम्बन्ध से। - - - 

पूर्वोक्तः 'गज्ञा पर घरों ही इसका उदाहरण है। इसमे साहश्य 
सम्बन्ध से तठ का ग्रहण नहीं, किन्तु मुख्याथ प्रवाह के साथ लक्ष्यार्थ तट 
का सामीप्य सम्बन्ध हे | यह पहले स्पष्ट किया जा चुका है। 


(२) तादाथ्य* सम्बन्ध से । 

जैसे, यज्ञ में काष्ठ के स्तम्म को इन्द्र कहा जाता है। इन्द्र का 
मुख्याथ इन्द्र देवता है। स्तम्म*को इन्द्र कहने में मुख्याथ का बाघ है । वहाँ 
इन्द्र शब्द का लक्ष्याथ--सतम्भ--तादाथ्य सम्बन्ध से अहण किया 
जाता है, क्योकि यज्ञ-क्रिया में स्तम्भ को इन्द्र -का स्थानापन्न मान लिया 
जाता है। यज्ञ में इन्द्र की पूजा का विधान है। उसके स्थानापन्न स्तम्म- 
को पूज्य सूचन करने के लिये उसे इन्द्र कहा जाता है, यही प्रयोजन है । 


(३) अद्जाज्ञीभाव सम्बन्ध से । 


“अपने कर गुहि श्रापु हठि हिय पहिराई लाल; 
'नोलसिरी श्रौरें चढ़ी 'मोलसिरी की माक्ष”'॥८ा॥। 


अत 3ढञ 3 ध ५ढ ०. ७४५८५» ५७/४० ७४०६०४५०६ ८५७०६०७०६८४७०९०५७/४७/५७८०६८४० ४४ ४४ ५० ४० ७८ ४८५८० 


$ किसी कार्य के लिये जो नियंत हो, उसके स्थनापर्स दूंसरे को 
ऋरना 'तादाथ्ये! है । 


है! 


द्विंतीय स्तवक श्ष 


यहाँ मौलसिरी की माला को अपने कर गुहदी' कहा गया है| इसका 

मुख्याथथ है 'हाथ से गूँथी हुई!। माला हाथ के अग्रमाग--डँगलियॉ--से 
गूँथी जाती है, न कि हाथ से | उँगली को हाथ कहने में मुख्याथ का बाघ 
है | द्वाथ अज्ञी है उंगली उसके अद्भ हैं, इसलिये अड्राज्ली भाव के 
सम्बन्ध से 'हाथ” शब्द का 'डँगली' लक्ष्यार्थ अहण किया जाता है| 

(४) तात्कम्य* सम्बन्ध से । 

जैसे, कोई ब्राह्मण जाति का बढ़ई न होने पर भी बढ़ई का काम 
करने से वह बढ़ई कहा जाता है । यहों बढ़ई कहने में मुख्यार्थ 'बढ़ई-जाति' 
का बाघ है। वह बढ़ई का काम करता है, इस तात्कर्म्य सम्बन्ध से यहाँ 
बढ़ई! अथथ ग्रहण किया जाता है। इनके सिंवा कुछ अन्य सम्बन्धों के 
उदाहरण भी आगे दिये जायेंगे। 


उपादान लक्षणा 


_ अपने अर्थ की सिद्धि के लिये दूसरे अर्थ का आक्षेप 
किया जाय, उसे उपादान लक्षणा कहते हें । 


“पादान'! का अर्थ है 'लिना'। अर्थात्‌ इसमें मुख्याथं अपने 
अन्वय की सिद्धि के लिये अपना अर्थ ( मुख्या्थ ) न छोड़ता हुआ दूसरे 
अर्थ को खींचकर ले आता है!। इसीलिये इस लक्षणा को 'अजहत्‌ 
स्वार्था'* भी कहते हैं। निष्कर्ष यह कि इसमें मुख्यार्थ का सर्वथा त्याग 
नहीं किया जाता, लक्ष्यार्थ के साथ वह भी लगा रहता है। 


/४.५८। 





३ 


4 तात्कम्य का अर्थ है किसी भ्रन्य व्यक्ति द्वारा किये जानेवाले काम 
को करनेत्राला पुरुष । 


२ अजहंत्‌ ८ नही, छोड़ा है, स्वार्थॉ-( स्व अर्थ > अपना 
अथ जिसने । 


६५ उपादान लक्षणा 


जैसे--ये कुन्त ( भाले ) आ रहे है?" । 


इसका मुख्या्थ है 'ये भाले आ रहे हैं'। भाले जड वस्तु हैं। वे 
आने जाने का कार्य नहीं कर सकते | अतः मुख्याथ का बाघ है। 'भाले 
आ रहे हैं? यह मुख्या्थ अपने इस अथ की सिद्धि करने के लिये 'भालेः 
धारण किए हुए पुरुष आ रहे हैं; इस लक्ष्यार्थ का आज्षेप करता है---- 
खींचकर ले आता है। इस लक्ष्यार्थ का मुख्याथ भालों' के साथ 
संयोग-सम्बन्ध अथवा धाय-घारक-सम्बन्ध? है। यहाँ “भाले' शब्द ने: 
अपना मुख्यार्थ नहीं छोडा है, ओर “भाले धारण किए हुए पुरुष” यह 
लक्ष्यार्थ खींचकर ले लिया है | इस लक्ष्यार्थ के बिना मुख्यार्थ की सिद्धि 
नहीं हो सकती थी । अर्थात्‌ , इस वाक्य के कहनेचाले का तात्पय नहीं 
निकल सकता था । यहां भालेवाले पुरुषों में भालो जैसी तीक्षणता सूचन 
करने के लिये इस लाक्षशिक वाक्य का प्रयोग किया गया है, अतः 
प्रयोजनवती उपादान लक्षणा है। आगे ध्वनि प्रकरण में लिखी जानेवाली 
अर्थान्तरसक्रमितवाच्य ध्वनि में यही लक्षणा हुआ करती है । 


एक और उदाहरण--कौओं से दही की रक्षा करो!। 


इस वाक्य का मुख्यार्थ है 'कोओो से दही की रत्ता करने को कहा 
जाना ।! इस अर्थ में कुछ असम्मवता प्रतीत न होने से साधारणतः 
मुख्या्थ का बाघ प्रतीत नहीं होता है। यहाँ मुख्याथ का बाध इसलिये है 


कि इस वाक्य के वक्ता का तात्पय केवल कोओं से ही दही की रक्षा करने 


' “॥ एे कुस्ता: प्रविशन्ति । 
२ भालेवालों के साथ भाले हैं, यह संयोग-सम्बन्ध है । 
३ भाले धाय हैं और भालेवाले घारक, यह धार्य-धारक सम्बन्ध- है ६: 


द्वितीय स्तवक ६६ 





-को कहने का नहीं है--कोझ्ा-शब्द तो उपलक्षण" मात्र है| वास्तव 
मे कौओं के सिवा जितंने ओर बिल्ली, कुत्ते आदि दही के भक्षुक हैं, उन 
सभी से रक्षा करने के लिये कहने का है | यह बात मुख्याथ द्वारा नहीं 
जानी जाती, इसलिये यहा वक्ता के तात्पर्य रूप मुख्यार्थ का बाघ 
है मुख्या्थ के अन्वय का बाघ” और “वक्ता के तात्पर्य का बाध', दोनो 
ही-को मुख्याथ का वाध पहले बतलाया गया है। यहां 'कोआ' शब्द 
अपना मुख्यार्थ न छोडता हुआ अन्य दधि-भक्षका का आज्षेप कराता है 
ऐसे प्रयोगो में भी उपादान लक्ष॒णा होती हैं । 


; लक्तण-लक्षणा 
जहाँ वाक्य के अर्थ की सिद्धि के लिये झुख्यार्थ को 
छोड़कर लक्ष्याथ का ग्रहण किया जाय, वहाँ लक्षण- 
लंचणा होती है । 
उपादान लक्षणा अजहत्‌-स्वार्था” है उसम--मुख्याथ अपना अथ 
नहीं छोडता । लक्षण-लक्षणा “जहत्‌ स्वार्था* है । क्योकि, इसमें 
मुख्यार्थ अपना अर्थ छोड देता है | “अत्यन्ततिरस्क्ृतवाच्ष्य ध्वनि! में 
यही लक्षणा होती है। इसका उदाहरण पूर्वोक्त गड़ा पर गाँव! है। 
इसका मुख्याथ ( प्रवाह ) सर्वथा छोड दिया गया है | 
पद्मात्मक उदाहरण ि 
“कच समेट करि भुज उलटि ख़ए सीत्र पर डारि हु 
का को मन बाँधे न यह जूरो यॉधनि हारि” ॥श॥ 





३ एक पद के कहने से उसी श्रर्थवाले अन्य पदार्थों का. कथन 
जिसके द्वारा क्रिया जाय, उसे “उपलक्षण” कहते हैं-- एकपदेन 
सदर्थान्यपदाथंकयनम्‌ उपलक्षणस” । 


२ जहत्‌ - छोड़ दिया है | स्वार्था अपना अर्थ जिसने । 


छः लक्षण-लक्षणा” 





यह जूरा ( केश-पाश ) बॉधते समय की. किसी युवती की चेश का 
€ ध्ेे क की *$ श ध्ह 

यणन है। मन बॉध' पद मे धवोपे-शब्द का' मुख्याथ 'बॉधना' है| मन 
कोई स्थूल वस्तु नहीं है, मिंसको बोधा जा सकता हो । अतः झस्वाय 
का बाघ है । इस मुख्यार्थ को सर्वथा छोडकर 'मन को आसक्त करना' 
यह लक्ष्याथ लिया जाता है। अतः लक्षण-लक्षणा है। युवती का 
अनुपम सौन्दर्य सूचन करना यहॉ प्रयोजन है।.'..' 

एक ओर उदाहरण--- कि 

६६... ०७०००००००९०००००००००००० » है| कीन्ह केफेयी सब कर काजू । 
एहि ते मोर कहा अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका ॥7१०॥ 


राज्यारोहण के लिये आग्रह करनेवाले अयोध्यानिवासियों के प्रति 
मरतजी की यह उक्ति है। इसका मुख्यार्थ यह है कि “आप लोग मुझे 
राजतिलक देने को कहते हैं इससे अधिक मेरी क्या मलाई हो सकती है । 
राज्य के अनिच्छुक मरतजी द्वारा ऐसा , कहना नहीं वन सकता अतः 
जुख्यार्थ का बाघ है। यहाँ मलाई का लक्ष्यार्थ बुराई है। यहाँ मुख्याथ्थ 
के साथ लक्ष्यार्थ का विपरीत सम्बन्ध है। बुराई की अधिकता सूचन 
करना प्रयोजन है। ऐसे उदाहरणों में भी लक्षण-लक्षणा होती है। 
लक्ष्यार्थ विपरीत होने से इसे विपरीत लक्षणा भी कहते हैं। ओर भी-- 


लखहु सरोवर रुचिर यह,, जल पूरन लहराय | 
लोटत पोढ़त नर जहाँ, नहाय रहे हरखाय ॥११॥ के 


यहाँ सरोवर को जल से भरा हुआ कहने मे मुख्यार्थ का बाघ है। 
जल भरे हुये तालाब में लोग लोट कर नहीं नहा स़कते | अतः जल से 
मरे का अर्य “थोड़े जल वाला' यह लक्ष्यार्थ अपहरण किया जाता है। 


द्वितीय स्तवक दर 


सारोपा लक्षणा 


जहाँ आरोप्यमाण ( विषयी ) और आरोप के विषय, 
दोनो का शब्द हंस कथन किया जाय, वहाँ सारोपा 
लक्षणा होती है । 


प्रथक प्थक शब्दों द्वारा कही हुईं दो वस्तुओं में एक वस्तु के स्वरूप 
की दूसरी वस्तु में तादात्म्य प्रतीति ( अमेद ज्ञान ) को आरोप कहते हैं। 
जिस वस्तु का आरोप किया जाय, उसे आरोप्यमाण” या विषयी', ओर 
जिस वस्तु में दूसरी वस्तु का आरोप किया जाय, उसे आरोप का 
विषय” या विषय” कहते हैं | 'सारोपा' लक्षणा में विषयी ओर विषय 
दोनो का शब्द द्वारा स्पष्ट कथन किया जाता है ओर विषयी के साथ 
विषय की तादात्म्य प्रतीति होती है, अर्थात्‌ उन दोनो में अमेद शानः 
रहता है । 
सारोपा गोणी लक्षणा । 
जैसे--“वाहीक बेल हैं?! | 
वाहीक कहते हैं असभ्य ( गँवार ) को । यहों गँवार में बेल का 
आरोप है। 'वाहीक' आरोप का विषय है। “वेल' आरोप्यमाण है ।- 
दोनो का शब्द द्वारा स्पष्ट कथन है | अतः सारोगा है। गँवार को बेल 
कहने ममुख्याथ का वाघ है। बेल में जड़ता, मन्दता आदि धर्म है । 
गवार में भी जडता ओर मन्दता होती है । अतः इस साहश्य सम्बन्ध से 
धवाहीक बेल के समान है? यह लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है। अतः 
गोणी है| वाहीक ( गँवार ) में मूलता का आधिक्य सूचन किया जाना 


अशषली>म बरी जन्‍ी 


१ गौर्वाहीकः । 


६ सारोपा लक्षणा 





अयोजन है । पूर्वोक्त 'मुखचन्द्र' उदाहरण में भी यही सारोपा गौणी 
लक्षणा है। रूपक' अलड्जार के अन्तर्गत यही लक्षणा रहती है” । 


सारोपा शुद्धा उपादान लक्षणा । 
जैसे---'वे भाले आ रहे हैं ।* 


इस पूर्वोक्त उदाहरण में 'भाले? आरोप्यमाण हैं, ओर भालेवाले 
पुरुष आरोप के विषय हैं। इन दोनो का शब्द द्वारा स्पष्ट कथन है। 
क्योंकि 'वे” इस सबनाम से भाले धारण करनेवाले पुरुषों का भी शब्द 
द्वारा कथन है, अतः सारोपा है | लक्ष्याथ जो भालेवाले पुरुष हैं, उनके 
साथ मुख्यार्थ जो “भाले” हैं, वह भी लगा हुआ है, अतः उपादान 
लक्षणा है | यहों धार्य-धारक सम्बन्ध है, अतः शुद्धा है। 


सारोपा शुद्धा लक्षस-लक्षणा । 
जैसे---'घृत जीवन है?* 4 


इसमें घृत को जीवन कहा गया है | अतः घृत आरोप का विषय है 
आर जीवन आरोप्यमाण है। घृत को जीवन कहने में मुख्याथ का बाघ 
है | घृत आयु बढ़ानेवाला है--जीवन का कारण है, यह लक्ष्यार्थ ग्रहण 
किया जाता है। घृत जीवन का कारण है, ओर जीवन” कार्य है, अतः 
काय-कारण सम्बन्ध होने से शुद्धा है। घृत ने अपना मुख्यार्थ स्वंथा 
छोड़ दिया है, अतः लक्षण-लक्षणा हे। यहाँ अन्य पदार्थों से घृत को 
अत्यधिक आयु-द्धंक सूचन करना प्रयोजन है। जीवन के साथ घुत की 
तादास्म्य प्रतीति अर्थात्‌ अमेद बतलाया गया है, ओर घृत तथा जीवन 
दोनो का स्पष्ट शब्द द्वारा कथन है, अतः सारोपा है | 


१ रूपक अलझ्लार के विस्तृत विवेचन के लिये इस गअन्थ का द्वितीय 
भाग अलड्लारमब्जरी' देखिये। 


२ आयुष तम्‌ । 


' द्वितीय स्तवक 8७ 





प्रद्ात्मक उदाहरणु--- 


' ““क्षेऊ कोरिक संप्रहो, कोॉऊ लाख हजार। 
मो संपति जद॒ुपति सदा विपद-विदारन-हार ॥१२॥” 


यहाँ यदुपति मे सम्पत्ति का आरोप है--यदुपति को ही सम्पत्ति कह 

“गया है| इन दोनो का शब्द द्वारा कथन होने से सारोपा है। सम्पत्ति के 

 मुख्याथ 'द्रव्यः आदि का त्याग है | सम्पत्ति का लक्ष्या्थ पालक, सुखद 

आदि ग्रहण किया जाता है | अतः लक्षण-लक्षणा है। तात्कम्य सम्बन्ध 

होने से शुद्धा है । भगवान श्रीकृष्णुचन्द्र में प्रेम सूचन करना ही प्रयोजन 
है । अतः प्रयोजनवती है | 


साध्यवसात्ना लत्ञणा 


जहाँ आरोप के विषय का शब्द द्वारा निर्देश ( कथन ) 
न होकर फेवल आरोप्यमाण का हो कथन हो, वहाँ साध्य- 
_बसाना लक्षणा होती है । 
साध्यचसाना गोंणी लक्षणा । 
जैसे, किसी गेंवार को देखकर कहा जाय कि “यह बैल है! | इसकी 
' स्पष्टता 'वाहीक बेब है? इस उदाहरण में की जा चुकी है | वहाँ आरोप 
का विषय जो चाहीक ( गँवार ) है उसका ओर आरोप्यमाण बेल दोनो 
का शब्द द्वारा कथन है| यहाँ आरोप के विषय 'वाहीकः का कथन 
नहीं, केवल आरोप्यमाण 'बेल” का ही कथन है। अतः साध्यवसाना है $ 
बस सारोपा ओर साध्यवसाना में यही अन्तर है | इसके सिवा वहाँ बेलपन 
ओर गेंवारपन आदि परस्पर में विरुद्ध धर्मों की प्रतीति होने पर भी 
अत्यन्त सादश्य के प्रभाव से तादात्म्य अर्थात्‌ अभेद की प्रतीति कराना- 
मात्र प्रयोजन है, किन्तु यहो--साध्यवसाना के “यह बैद्ध है? इस 


ब 


७१ साध्यवसानों लक्षणा 





उदाहरण में---“वाहीक'-पद,:जो विशेष्य-वाचक है, नही कंहा गया है; अत-- 
एव लक्ष्यार्थ के समभने के प्रथम ही मुख्या्थ के ज्ञानमात्र से ही बैलेपन 

ओर गेवारपन, जो परस्पर में इनके भेद बतलानेवाले धर्म हैं उनकी 

प्रतीति के बिना ही सबंधा अमेद कथित है| तालय यह है कि यद्यपि 

. गँवार को बेल के समान जढ़ ओर मन्द तो दोनो ही में सूचन किया गया 

है, तथापि सारोग्रा मे भेद की प्रतीति होते हुए अर्थात्‌ गंवार ओर बेल 

दो प्रथक्‌ प्थक्‌ वस्तु समझते हुए, एकता का--तद्गुपता का--ज्ञान 

कराया जाना प्रयोजन होता है, ओर साध्यवसाना में दोनो की पृथक्‌ 
पृथक्‌ प्रतीति कराए, बिना ही सवृंथा अमेद अर्थात्‌ 'यह बैल ही है? ऐसा 

ज्ञान कराया जाना प्रयोजन' होता है। इन दोनो लक्षणाओं मे यही, 

उल्लेखनीय भेद है । 


प्रयात्मक उदाहरणु-- ० 


न + 


लावण्य-पूरित 'नवीन नदी. सुहाती, 
देखो वहाँ दिरख-कुम्भ-तरी दिखाती, 
“ उन्लिद्र चन्द्र अरविन्द भ्रफुल्लशाली--- 
है कान्चनोय कद्ली-युग-दर्ड वाली ॥१झ॥॥ 


किसी सुन्दरी को लक्ष्य करके किसी युवक की यह उक्ति है । सुन्दरी 
में लावण्य की नदो का ओर उसके अज्ञों में--उरोज, मुख, नेत्र, ओर 
जड्ाओं मे--त”, पूर्णचन्द्र, प्रफुल्लिल कमल और खसुबर्ण के केले के 
स्तम्मों का आरोप है | यहाँ आरोप के विषय सुन्दरी ओर उसके श्रड्धों का 
कथन नही किया गया है, केवल आरोप्यमाण नदी ओर 'तद' आदि का 
कथन है । अतः साध्यवसाना है। सुन्द्री के अद्धों के साथ गज-कुम्म आदि 


का साहश्य सम्बन्ध होने से गोणी हे । यहाँ अत्यन्त सौन्दर्य सूचन करना 


द्वितीय-स्तवक ७२ 


“अयोजन है । 'रूपकातिशयोक्ति " अलड्लार के अन्तर्गत यही लक्षणा 
'रहती है । 
साध्यवसाना शुद्धा उपादान लक्षणा 4 ' 
'ुन्त ( भाले ) आ रहे हैं? । 
पूर्वोक्त वे कुन्त आ रहे हैं” उसमे ओर इसमें भेद यही है कि वहाँ 
“बे? सबनाम के प्रयोग द्वारा आरोप के विषय भालेवाले पुरुषो का भी 
-कथन किया गया है, अतः सारोपा है; किन्तु यहाँ केवल 'कुन्त आ रहे हैं! 
कहा गया है, अतः केवल आरोप्यमाण 'कुन्त!' का ही कथन है, न कि 
आरोप के विषय का, अतः साध्यवसाना है । _ 
दूसरा उदाहरण--- 
'ंसी गावत है वहाँ? । 
यहाँ श्रीकृष्ण म बसी का आरोप है। आयेप का विषय जो * श्रीकृष्ण 
हैं, उनका कथन नहीं है | आरोप्यमाण बंसी मात्र का कथन है । श्रीकृष्ण 
और बंसी मे अमेद कथन है, अतः साध्यवसाना है। बंसी जड है, वह 
गान नहीं कर सकती । अतः मुख्या्थ बंसी का बाघ है। यहाँ इसका 
गलक्ष्या्थ 'बंसीवाला' अहण किया जाता है।इस लक्ष्याथ के साथ 
मुख्यार्थ बंसी मी लगा हुआ है, अतः उपादान है। धाय-घारक सम्बन्ध 
होने से शुद्धा है । 
साध्यवसाना शुद्धा लक्षण-लक्षणा । 
घृत की दिखलाकर कहा जाय यही जीवन है ।! 
पूर्वोक्त 'इत जीवन है? उसमें ओर इसमें एक भेद तो यह है कि 
वहाँ घृत ओर जीवन--आरोप के विषय और आरोप्यमाण--दोनो का 


टतट+ 2 435 ४४० +७म3+१८४७ञ५७ञ धर सर 3त रस ४ 4 जत-- 


१ रूपकातिशयोक्नि अ्रजकार के विस्तृत विवेचन के लिये इस गअन्थ 
-क्रा दूसरा भाग अलझीरमअ्रो देखिये । 


का गूढ़-वयंग्या लक्षणा 


कथन किया जाने से सारोपा है, ओर यहाँ आरोप के विषय घृत का 
कथन न किया जाकर केवल आरोप्यमाण 'जीवन' का हीं कथन है, अतः 
साध्यवसाना है । इसके सिवा दूसरा भेद प्रयोजन मे है । सारोपा में 'घृत 
जीवन है” इसका प्रयोजन आयु-वद्धक अन्य पदार्थों से केवल घृत को 
अत्यधिक आयु-वद्धंक सूचन करना है। साध्यवसाना में यही जीवन हे” इस 
में घृत को अव्यभिचार तथा अव्यर्थ आयु-धद्धक सूचन किया गया है। 
इन दोनो (सारोग़ा ओर साध्यवसाना के) उदाहरणों में कार्य-कारण सम्बन्ध 
समान है पूर्वोक्त गल्ला पर गांव! मे भी साध्यवसाना लक्षणा ही है, 
क्योंकि तट में गड़ा के प्रवाह का आरोप है, ओर आरोप के विषय 
“तट! का कथन नहीं है । 


प्रयोजनवती लक्षणा के छुआ भेदां के लक्षण ओर उदाहरण जो 
ऊपर लिखे गए है उनमें जिसे प्रयोजन कहा जाता है, वह व्यग्याथ होता 
है। वह न तो वाच्यार्थ है, ओर न लक्ष्याथ। यह लक्षणा-मूला व्यज्ञना के 
अकरण में स्पष्ट किया जायगा। व्यग्याथ दो प्रकार का होता है--गूढ़ 
ओर अगूढ़ । अ्रतः प्रयोजनवती लक्षुणा के उपयुक्त छझ्लों भेदो मे से 
अत्येक भेद में लक्षणा गृढ-ब्यग्या ओर अगूढ-व्यग्या होती है । 


गूढ़-व्यंग्या लक्षणा 


जहाँ व्यंग्यार्थ गृढ़ होता है अर्थात्‌ जिसे सहृदय काव्य- 
म्मज्ञ ही जान सकते हैं, वहाँ गूढ़-व्यंग्या लक्षणा होती है। 

उद्यमहरणु--- 

सुख में विकस्पो मुसकान वसोकृत वंकता चारु विलोकन है। 

गति में उछुले वहु॒ विश्रम त्यो. मति मे मरजादहु लोपन है। 

मुकुलीकृत हैं स्तन, उद्धर त्यों जघनस्थल चित्त प्रद्लोभन है ; 

डुहिं चंदसुखी तन में है उदें हुलसाय रह्मो नव जोबन है ॥१४७॥ 

डरे 


द्वितीय स्तवक ७० 





किसी तरुणी को देखकर किसी युवक की यह उक्कि है| इसका मुख्य 
अथ यह है कि--( १ ) इस चन्द्रमुखी के अड़ो में योवन का उदय 
मुदित हो रहा है । ( २ ) इसके मुख में मुसकान--स्मित विकसित--है ॥ 
(३ ) वड्ढता को वश करने वाला कठाक्षपात है | ( ४ ) गति में विश्रमों 
की उछाल है। (५४) बुद्धि मे परिमित विषयता का त्याग है।' 
(६) कुच अधखिली कली हैं। (७ ) जघनस्थल उद्धर है। इनमे 
लक्षणा ओर व्यंग्य क्रमशः इस प्रकार है--- 


(१) योवन कोई चेतन वस्तु नहीं है | यह मुदित नहीं हो सकता है 
अतः मुख्याथ का बाघ है | इसका लक्ष्यार्थ है योवन अवस्था-जनित 
उत्कर्ष | अर्थात्‌ ; अत्यन्त सोंन्दर्य। ओर नायिका मे अभिलाषाः 
होना व्यंग्य है। 


(२) 'विक्स्यो' का मुख्याथ हे प्रफुल्लित होना। प्रफुल्लित होना, 
पुष्यो का धर्म है, न कि मुख की मुसकान का | अतः मुख को विकसित 
कहने मे मुख्याथ का बाघ है। विकसित” का लक्ष्यार्थ उत्कर्प! ग्रहण 
किया जाता है। मुख्याथ विकसित के साथ लक्ष्याथ 'उत्कर्ष' का 
असड्डोच रूप साहश्य सम्बन्ध है | क्योंकि विकास ओर आधिक्य दोनो में 
असड्लोच रहता है | मुख को पुष्पो के समान सुगन्वित सूचन करना 
व्यग्य है । इसम साहश्य सम्बन्ध होने से गोंगी, मुख” एवं विकसित” 
दोनों का कथन होने से सारोपा, ओर विकसित” ने अपना मुख्याथ छोड 
दिया है, अतः लक्षण-लक्षणा है । 


(३ ) वशीकृृत! का मुख्य अथ है किसी को अपने वश में कर 
लेना | कयाक्षो द्वारा बॉकेपन को वश में करना असम्भव है, अतः 
मुख्यार्थ का बाघ दे | 'वशीकृत' का लक्ष्या्थ स्वाधीन करना ग्रहण किया 
जाता है | अपने अभिलपित विपय मे प्रवृत्ति रूप सम्बन्ध है। अपने 
'प्रेमी मे अनुराग सत्नन करना प्रयोजन है । 


७ अगूढ-उ्यंग्या लैक्षणा 





(४ ) विश्रम” अर्थात्‌ हाव उछुलेने वाली वस्खु नहीं है| अतः 
मुख्याथ का बाघ है । 'यहाँ उछलने का लक्ष्याथ अधिकता” श्रहण कियो 
जाता है. प्रैये-प्रेरक भाव सम्बन्ध है। 'मनोहारी' सूचन करना व्यग्य है । 

(५ ) मति मे मर्यादा का लोप कहने में मुख्याथ का बाघ है। यहाँ 
इसका लक्ष्याथ अधीरता” है। काय-कारण भाव सम्बन्ध है| अनुराग 
का आधिक्य व्यंग्य है । 

(६ ) 'मुकुलीक्षत” का मुख्याथ अधखिली कली है। स्तनों को 
अधखिली कली कहने मे मुख्यार्थ का बाध है, क्योंकि कली फ़ूलो कीं होती 
है, न कि मनुष्य के अड्ों की | इसका लक्ष्यार्थ 'काठिन्य' है। अवयवों 
की सघनता रूप साहश्य सम्बन्ध है | मनोहरता सूचन करना व्यग्य है। 

(७ ) जघनस्थल को उद्धर' कहने में मुख्याथ का बाध है, क्योकि 
यह चेतन का धर्म है। उद्धर का लक्ष्यार्थ है--विलक्षुण रति योग्य 
होना । भार को सहन करने रूप साहृश्य सम्बन्ध है | रमणीयता सूचन 
करना व्यग्य है। 

इनमे जहाँ जहाँ साहश्य सम्बन्ध है वहाँ गोंणी ओर जहाँ जहाँ अन्य 
सम्बन्ध है, वहाँ शुद्धा लक्षणा है| इनमे जो व्यंग्य हैं वे सभी गूढ 
हैँ, साधारण व्यक्ति द्वारा सहज में नहीं समझे जा सकते---इन्हें काव्य- 
मर्मश ही समझ सकते हैं। 


अगूढ़-व्यंग्या लक्षणा 
जहाँ ऐसा व्यंग्य हो, जो सहजही में समका जा सकता 
हो, वहाँ अगूढ़-व्यंग्या लक्षणा होती है । 
'. उदाहरण-- 


के स्रिय परिचय सो मूढ़हू जानहिं चतुर चरित्र | 
जोबन-मद तरुनिन ललित सिखवत हाव विचित्र ॥॥ शा 


द्वितीय स्तवक भर 





यहाँ 'सिखवत” पद लाक्षणिक है | सिखाने का मुख्याथ है उपदेश * 
करना । यह चेतन का काय है। योवन जड़ है | उसके द्वारा उपदेश 
होना असम्मव है, अतः मुख्यार्थ का बाध है । 'सिखबत' का लक्ष्याथ है 
-प्रकट करना! । प्रकट करना यह सामान्य वाक्य है, ओर सिखाना” यह 
विशेष वाक्य है, अतः यहाँ सामान्य-विशेष भाव सम्बन्ध होने से शुद्धा है। 
अनायास लालित्य का ज्ञान होना व्यंग्य हे | यह व्यंग्य गूह नहीं--सहज 
ही मे समझा जा सकता है | अतः अगूढ़ व्यग्या है । सिखवबत ने अपना 
मुख्याथ छोड दिया है, अतः लक्षण-लक्षणा है | अगूढ गुणीभूतव्यग्य मे 
यही लक्षणा होती है । 

गूढ़ के समान अगूढ़ व्यग्य भी सभी लक्षणाओं के भेदो में हो 
सकता है । विस्तार-भय से अधिक उदाहरण नहीं दिये गये हैं । 

इस विवेचन से स्पष्ट है कि लक्षणा का मूल लाक्ष॒णिक शब्द है, 
अतः लक्षुणा लाक्षणिक शब्द पर ही अवलम्बित है | 

यहाँ तक काव्यप्रकाश के अनुसार लक्षणा के भेद लिखे गये हैं। . 


साहित्यदपंण के अनुसार लक्षणा के भेद 


साहित्यद्यण मे विश्वनाथ ने शुद्धा लक्षणा के समान 
गाणी के भी उप्रादान ओर लक्षण-लक्षणा, ये दो भेद और 
अधिक लिखे है | ओर इन दोनो को सारोपा और साध्यवसाना में विमक्त 
करके गोणी के भी चार भेद माने हैं | गोणी के ये चार ओर शुद्धा के 
चार भेद मिलकर आठ भेद हैं । ये आठो गूढ़-व्यंग्य ओर अगूढ-व्यग्य 
भेद से १६, हो जाते हैं । ये सोलह भी पदगत और वाक्यगत भेद से 
३२, ओर ये ३२ भो कही घर्मगत ओर कहीं धर्मिगत भेद से श्रयोजनवती 





१ उपदेश का अथे है न जानी हुई बात को शब्द द्वारा कथन 
करके सममक्राना । 


छऊ धर्मगत और धर्मिंगत लक्षणों 





लक्षणा के ६४ भेद लिखे हैं, ओर रूढ़ि लक्षणा के भी साहित्यदर्पण 


में निम्नलिखित १६ भेद लिखे है--- 
रूढि बी 





। शोणी 


शुद्धा गोणी 
केला आज रिमलर की (अर 
| | | | 
(१) उपादान (२) लक्षणलक्षुणा (३) उपादान (४) लक्षणलक्षणा 
ये चारो भेद सारोपा ओर साध्यवसाना दोनो प्रकार के होने पर 
आठ ओर ये आठो भी कहीं पदगत ओर कहीं वाक्यगत होने पर १६ 
होते हैं । इस प्रकार रूढ़ि के १६ और प्रयोजनवती के उपयुक्त ६४ सब 
मिलाकर लक्षणा के ८० भेद लिखे हैं। ये सब्र महत्वपूर्ण न होने के 
कारण१ यहों केवल पदगत ओर वाक्यगत एवं धमंगत ओर घर्मिंगत भेदों 
के उदाहरण ही लिखते हँ-- 


पद्गत और वाक्यगत लक्षणा 

जहाँ एक ही पद लाक्षणिक हो वहाँ पदगत लक्षणा समझना 
चाहिये । जैसे, पूर्वोक्त गड़ा पर गाँव” में गद्ा' यह एक ही पद लाक्ष- 
शिक है। अतः ऐसे उदाहरण पदगत लक्षणा के होते हैं। जहाँ अनेक 
पदों के समूह से बना हुआ सारा वाक्य लाक्षणिक होता है, वहों वाक्यगते 
लक्षणा होती है। जैसे, पूर्वोक्त 'कीन्द केकयी सब कर काजू |” में सारा 
वाक्य लाक्षणिक है । 

१ काब्यप्रदीप! से साहित्यदर्पण के इस मत का खण्डन भो किया 
है। देखिये--काव्यप्रदीप में काव्यप्रकाश के 'शुद्धोव सा द्विघा? २१० 
की ध्यारया । 


ट्वितीय स्तवक़ - जप 





धर्मंगत ओर घर्मिगत लक्ष॑णा 
यहाँ 'धर्मि) से लक्ष्यार्थ ओर 'धर्म' से' लक्ष्या्थ का धर्म समझना 
चाहिए | अर्थात्‌ लक्षणा का प्रयोजन रूप फल जहाँ लक्ष्याथथ भें हो, 
वहाँ धर्मिगत लक्षणा ओर जहाँ लक्ष्यार्थ के घमर्म में प्रयोजन हो, वहाँ 
धमंगत लक्षणा होती है । 
प्वातक मोरन धुनि बढ़ी, रही घटा भुवि छाय । 
सहिहाँ सब हो राम, पे वेदेही किमि हाय ॥।१६॥ 


: /र्पाकालिक उद्दीयन विभावो को देखकर श्रीज॑नकनन्दिनी के वियोग में 
किष्किन्धा-स्थित श्रीरधुनाथजी चिन्ता कर रहे हैं कि में तो “इस वर्षा- 
कालिक विरह-ताय को स्व प्रकार सहन, कर सकता हैँ । पर ऐसे 
समय-म बेंदेही की क्या दशा होगी ? यहा 'हो राम! के मुख्यार्थ का 
चार्घ है| क्योकि, जब श्रीराम स्वयं वक्ता हैं तब हों राम' कहा जाना 
व्यर्थ है । इसका 'मैं वनवासादि अनेक दुःख सहन करनेवाला कठोर 
हृदय राम हैं?, यह लक्ष्यार्थ अहण किया जाता है | कठोरता के अतिशय 
रूप प्रयोजन को सूचन करने के लिये हो। राम” पद का प्रयोग किया 
गय्या है| अतः यहाँ इस लक्ष्याथ मे प्रयोजन होने के कारण यह 
श्रर्मिग्रत लक्षणा है । 


पूर्वोक्त गड्डा परगाँव! में गज्ञा पद का लक्ष्याथ तट है 
े ५ जय 
आर तट का धम पवित्रता आदि है। वहाँ तट के धमम पवित्रतादि का 
अतिशय सूचन प्रयोजन है। अतः वहाँ धर्मंगत लक्षणा है | 


ततीय स्तवक 


>-+--8७-२-०६मू७०--- 


व्यज्जना 


अपने-अपने अर्थ का बोध कराके अभिधा और 
लक्षणा के बिरत हो जाने पर जिस शक्षि द्वारा व्य॑ग्यार्थ 
का बोध होता है, उसे व्यस्तनना कहते हैं । 


व्यज्ञलक शब्द ओर व्यंग्यार्थ 


जिस शब्द का व्यज्जना शक्ति द्वारा वाच्यार्थ और लक्ष्याथ से भिन्न 
अर्थ प्रतीत होता है उसे 'व्यञ्जक कहते हैं | व्यञ्जना से प्रतीत होनेवाले 
अथ को व ्यंग्यार्थ' कहते हैं। 

व्यग्यार्थ का बोध अभिघा और लक्षणा नहीं करा सकतीं | क्योकि, 
शब्द, बुद्धि ओर क्रिया एक-एक व्यापार करके विरत ( शान्त ) हो जाने 
पर फिर व्यापार नहीं कर सकते * | अभिप्राय यह कि एक बार उच्चारण 
किये गये शब्द का एक ही बार अर्थ बोध हो सकता है, अनेक वार ; 


१ प्यप्नकट वस्तु को प्रकट करनेवाले पदार्थ को अ्रक्षन ( नेत्रो में लगाने 
का सुरमा ) कहा जाता है। अझ्ञन से वि! उपसर्ग लगाने से “व्यक्षन! 
शब्द बनता है | इसका अथथ है एक विशेष भ्रकार का अज्लन | साधारण 
अजख्षन दृष्टि-मालिन्य को नष्ट करके अ्रप्रकट वस्तु को प्रकट करता है । 
्यक्षनः अभिधा और लक्षणा से जो श्र्थ प्रकट न' हो सके उस श्रप्रकट 
अर्थ को प्रकट करता है। अतएव इस शब्द-शक्ति का नाम व्यक्षना! है। 


२ “शब्दखुद्धिकमेणां विरम्य व्यापाराभाव:।? ._- 


५ 


तृतीय स्तवक ८० 





नहीं । बुद्धि ( शत ) उदय होकर एक ही बार प्रकाश करती है। अर्थात्‌ 
“घटो आकार से परिणत बुद्धि घट का ही ज्ञान करा सकती है, न कि 
पट का। क्रिया भी उत्नन्न होकर एक ही वार अपना कार्य करती है । 
जैसे, बाण एक बार छोडा जाने से एक ही बार चलेगा, अनेक बार 
न चल सकेगा। ये तीनो ही शब्द, बुद्धि ओर क्रिया क्षणिक हैं-- 
उत्पन्न होकर अत्यन्त अल्प समय तक ही ठहरते हैं। इसी न्याय 
के अनुसार वाच्याथ का बोध कराना अभिधा ओर लक्ष्याथ का 
बोध कराना लक्षणा का व्यापार हैं | जनत्र यह अपने-अपने व्यापार 
का अर्थात्‌ अभिधा अपने वाच््याथ का ओर लक्षणा अपने लक्ष्याथे 
का बोध करा देती हैं, तव उनकी शक्ति क्षीण हो जाने से वे विरत 
हो जाती हैं---हट जाती हैं, उसके बाद किसी अन्य अर्थ का बोध कराने 
की उनमे सामर्थ्य नहीं रहती है । ऐसी अवस्था में वाच्यार्थ ओर लक्ष्याथे 
से भिन्न किसी अर्थ की यदि प्रतीति होती है तो वह व्यञ्जना शक्ति 
ही करा सकती है | जिस प्रकार अमिधा द्वारा लक्ष्याथ का बोध न हो सकने 
पर लक्ष्याथ के लिये लक्षणा शक्ति का स्वीकार किया जाना अनिवाय है, 
उसी प्रकार अभिधा ओर लक्षणा जिस अथथ का बोध नहीं करा सकतीं, 
उस अर्थ के लिये किसी तीसरी शक्ति का स्वीकार किया जाना भी 
अनिवाय है, ओर ऐसे अर्थ का बोध कराने वाली शक्ति को ही व्यञ्जना 
कहते हैं । 


व्यंग्याथ को ध्वन्यूथ, सूज््याथं, आक्षेपाथ ओर “प्रतीयमारन 
आदि भी कहते हैं | यह वाच्ष्या्थ की तरह न तो कथित ही होता है, ओर. 
न लक्ष्याथं, की तरह, लक्षित ही, किन्दु यह व्यज्जित, ध्वनित, सूचित, 
आक्तितत ओर प्रतीत होता है । 


अमिधा ओर लक्षणा का व्यापार (क्रिया) केवल शब्दों में ही 
होता है, किन्तु व्यज्नना का शब्द ओर अर्थ दोनो में | अर्थात्‌, वाच क 


पर व्यखना' 





ओर लाक्ष॒णिक तो केवल शब्द होते हैं; अर्थ नहीं ।'पर व्यञ्जक केवल 

थप गम के अंक 
शब्द ही नहीं, किन्तु वाच्य, लक्ष्य ओर व्यंग्य जो तीन प्रकार के अथ हैँ 
वे भी व्यञ्जक होते हैं । 


व्यञ्जना के निम्नलिखित भैद हैंः--- 
--अभिषा-मूला--जिसके संयोगादि १४ भेद होते हैं । 


-+लक्षणा-मूला--प्रयोजनवती लक्षणा के काव्यप्रकाश 










के अनुसार १२ भेद और साहित्यदर्पण के 
| अनुसार ६४ भेद हैं | 
" वशिष्टबप्रयुक्ता 2 6 व 
--जोधव्य वेशिश्च्रप्रयुक्ता | #० ् ८ 
काकु वेशिश्टयप्रयुक्ता 5 मल 
हि --वाक्य वेशिष्टयप्रयुक्ता वह हि 
चय वेशिष्टयप्रयुक्ता ख 
सन्रिधि वेशिष्टयप्रयुक्ता । ५ ४5) 
प्रस्ताव वेशिष्टयप्रयुक्ता | ्ठ़ट्टि हि 
देश वशिष्टअप्रयुक्ता | कट हि 
वेशिष्टथप्रयुक्ता | ट ॥ 
--चेश वेशिष्टयप्रयुक्ता | रे * ्ि 
रन 


इस तालिका के अनुसार व्यज्जना के शाब्दी ओर आर्थी दो भेट 
होते हैं । इन दोनो भेदों के उपयुक्त अवान्तर भेदों की स्पष्टता इस: 
प्रकार हैः-- 


तलतीय स्तवक ८३. 


अभिधा-मूला शाब्दी व्यज्ञना 


अनेकार्थी शब्दों की वाचकता का संयोग” आदि से 
नियन्त्रण हो जाने पर जिस शक्ति द्वारा व्यंग्याथ की प्रतीति 
होती है, उसे अभिधा-मूला व्यज्ञना कहते हैं । 


जिन शब्दों के एक से अधिक--अनेक--्रथ होते हैं, वे अनेकार्थी 
शब्द कहे जाते हैं | अनेकार्थी शब्दों की वाचकता को, अर्थात्‌ वाचयार्थ 
का बोच करानेवाली अभिधा की शक्ति को, संयोग आदि ( जिनकी 
स्पष्टता नीचे की जायगी ) एक ही विशेष अर्थ में नियन्त्रित कर देते हैं । 
अतः उस विशेष अर्थ के सिवा अनेकार्थी शब्द के अन्य अर्थ अवाच्य 
हो जाते हैं | अर्थात्‌, वे अन्य अर्थ अभिधा द्वारा न हो सकने के 
“कारण वाच्यार्थ नहीं होते | ऐसी अवस्था में अनेकार्थी शब्द के वाच्यार्थ 
से मिन्न जिस किसी अन्य अर्थ की प्रतीति होती है, वह अमभिधा-मूला 
व्यज्ञना द्वारा ही हो सकती है | क्योकि अभिधा को शक्ति तो संयोग! 
आदि के कारण से एक अर्थ का बोध कराके रुक जाती है, ओर पूर्वोक्त 
-मुख्यार्थ के बाघ आदि तीन कारणों के समूह के बिना लक्षणा उपस्थित 
नहीं हो सकती | अभिधा की शक्ति रुक जाने पर ही इसे उपस्थित होने 
का अवसर मिलता है | अतः यह व्यञ्जना अमिधा के आश्रित हे और 
इसीलिये यह अभिधा-मूला कही जाती है | 
अनेकार्थी शब्दों के एक अर्थ ( मुख्यार्थ ) का बोध कराके अभिधा की 

शक्ति को नियन्त्रण करनेवाले संयोग आदि जिन कारणों का ऊपर उल्लेख 
हुआ है, वे ( १) संयोग, ( २ ) वियोग, ( ३ ) साहचय, ( ४ ) विरोध, 
(५४ ) अर्थ, (६) प्रकरण, (७) लिड्ग, (८) अन्यसन्निषि, ( £ ) 
ससामथ्य, ( १० ) ओचित्य, (११ ) देश, ( १२ ) काल, ( १३ ) व्यक्ति 
आर ( १४ )-स्वर आदि हैं| इनके उदाहरण इस प्रकार हैं-- 


स्प्डे अभिधा मूला व्यखना 








(१ ) संयोग ! 
“झंख-चक्र-सहित हरि ।” 


हरि-शब्द के इन्द्र, विष्णु, सिंह, वानर, सूर्य ओर चन्द्रमा आदि 
अनेक अर्थ हैं। शंख-चक्र का सम्बन्ध केवल भगवान्‌ श्रीविष्णु के साथ 
ही प्रसिद्ध है, अतः यहों 'शख-चक्र' के सयोग ने---'शख-चक्र-सहित' कहने 
से-हरि शब्द को केवल “विष्णु? के अर्थ में ही नियन्त्रित कर दिया है । 
यहाँ हरि शब्द के इन्द्र आदि अन्य अथ बोध कराने में अभिधा शक्ति 
“शशख-चक्र-सहितो कथन से रुक गई है । इसी प्रकार-- 


पुष्कर सोहत चंद सो चन पल्लास के फूल । 


पुष्कर और वन अनेकार्थी शब्द हैं--पुष्कर का अर्थ आकाश है 
आर तालाब भी । वन का अर्थ जज्ल है ओर जल भी । यहाँ चन्द्रमा के 
सयोग ने “पुष्कर को आकाश के अर्थ मे ओर पलास के फूल के सयोग 
ने 'वर्न को जड्जल के अर्थ में ही नियन्त्रित कर दिया है। अतः यहाँ 
इनका क्रमशः आकाश ओर जद्ञल ही अथ हो सकता है, अभिषा द्वारा 
दूसरा अथ नहीं हो सकता । 


(२) वियोग । 

“शंख-चक्र-रहित हरि ।?? 

इसमे शंख-चक्र के वियोग ने हरि शब्द को श्रीविष्यु के अर्थ में 
नियन्त्रित कर दिया है| हरि शब्द का यहाँ विष्णु के सिवा दूसरा 
अर्थ बोध होने मे शख-चक्र के वियोग ने रुकावट कर दी है। 
'इसी प्रकार-- 

सोहत नाग न मद बिचा, तान बिना नहिं राग । 

नाग ओर राग अनेकार्थी शब्द हैं। नाग का अर्थ हाथी है ओर 

सर्प भी | राग का अर्थ अनुराग, रज्ञ ओर गाने की रागिनी भी | यहाँ मद 


तृतीय स्तवक पछ 


के वियोग ने नाग का अर्थ केवल हाथी और तान के वियोग ने राग 
का अर्थ केवल गाने की रागिनी बोध कराकर अन्य अ्र्थों में रकावट कर 
दी हे। 

(३) साहचय"। 

“राम लक्ष्मण ।?? 

राम ओर लक्ष्मण दोनों अनेकार्थी हैं। राम का अर्थ दाशरथी 
श्रीराम, परशुराम ओर बलराम आदि हैं | लक्ष्मण का अर्थ दशरथ-पुत्र 
लक्ष्मण, सारस पक्षी ओर दुर्योधन का पुत्र, आदि हैं | यहॉ लक्ष्मण 
शब्द के साहचर्य से--साथ होने से--'राम शब्द का श्रीदाशरथी राम 
ओर राम शब्द के साहचर्य से 'लक्ष्मश” का अर्थ दशरथ-कुमार लक्ष्मण 
ही बोध हो सकता है--अ्न्य अर्थ बोध कराने में साहचय के कारण 
रुकावट हो गई है | इसी प्रकार-- 


विजय तहाँ, वेभव तहाँ, हरि-अजुैन जिहि ओर | 


हरि ओर अज्जुन दोनो शब्द अनेकार्थी हैं। इनके परस्पर के साहचर्य 
से हरि का श्रीकृष्ण ओर अजुन का पाण्डुनन्दन अर्जुन ही अर्थ हो 
सकता है | 


(४ ) विरोध । 


४(सम-रावण ।?? 


३ संयोग” ओर साहचर्य में यह सेद है कि जहाँ प्रसिद्ध सामान्य- 
सम्बन्ध! शब्द द्वारा कथन हो वहाँ “संयोग” होता है। जेसे, गाएढीव-सहित 
अर्जुन ( समाण्डीवो<्जुन; ) | इसमें 'सहित' शब्द द्वारा प्रसिद्ध सम्बन्ध 
कहा गया है । जहाँ केवल सम्बन्धियों का कथन मात्र होता है चहाँ 
साहचर्य होता है । जैसे, गाएडीव अजुन (गाणंदीवार्जुनी) इसमें सहित” 
आदि शब्द के बिना सम्बन्धी-मात्र का कथन है। 


सर अभिधा गूला व्यज्जना 





राम शब्द अनेकार्थी है। वह विरोधी 'रावण' शब्द के समीप होने 
के कारण 'रामा का दशरथ-नन्दन राम ही अथ हो सकता है। यहाँ 
विरेध ही प्रधान है, न कि साहचय । 

(४) अथे । 

भव-खेद-छेदन के लिये क्‍यों स्थाणु को भ्जते नहीं । 

स्थाणु' का अर्थ श्रीमहादेवजी और बिना शाखा-पत्र-चाले वृक्ष का' 
हूठ है । यहाँ ससार-ताप-नाश करने रूप अर्थ के बल से स्थाणु का अर्थ 
श्रीमहादेव ही हो सकता है । इसमें चतुर्थी विमक्ति का प्रयोग होता दे । 

(६) ग्रकरण । 

“सैंघव ले आओ |” 

सेंघव' का अर्थ संघा नमक ओर सिन्धु देश मे उत्तन्न घोडा है । 
यह वाक्य भोजन के प्रकरण में कहा जायगा तो इसका अर्थ सेघा नमक 
ही होगा | वाहर जाने के समय कहा जायगा तो घोडा अर्थ होगा। 
प्राकरणिक अर्थ का बोध कराके दूसरे अर्थ के बोध कराने में अमिधा 
रुक जायगी । 

(७)  लिक्ञ । 

लिड़ का अर्थ यहाँ लक्षण या विशेषता-सूचक चिह्न है । 

कुपित सकरध्वज छुआ, मर्याद सब जाती रही । 

भ्करध्वज' का अर्थ समुद्र ओर कामदेव है। यहाँ कोप के चिह्न 
( लिड्ग ) से मकरध्वज का अर्थ कामदेव ही बोध होता है, क्योंकि समुद्र 
में कीय का होना वस्ठुतः सम्भव नहीं है? । 


4 इसमें और पूर्वोक्त संयोग” में यह भेद है कि "संयोग! में 
अनेकार्थक शब्द के अन्य अ्रथों में प्रसिद्ध न होते हुए किसी एक अर्थ में 
पअखिद्ध होनेवाला सम्बन्ध! होता है। और “लिट्ट! में अनेकार्थक शब्द 
के अन्य अथथों में सर्वथा न रहनेवाला चिह्न होता है । 


तृतीय स्तवक ० 





(८) अन्य सन्निधि। 
कर सो सोहत नाग ।? 
नाग! और 'कर' अनेकार्थी हैं | कर शब्द की समीपता से नाग 
का अर्थ हाथी ओर नाग की समीपता से “कर काअर्थ हाथी की सूँड 
ही बोध होता है । 
९ 
(६ ) सामथ्य | 
मधुमत्त कोकिल । 
पर मथु' | हित मकरूद द्वैत्य 
म॒थु' शब्द के मदिरा, मकरन्‍द, एक देत्य, वसन्त-ऋत आदि अनेक 
अर्थ हैं। कोकिल को मतवाली बनाने की सामथ्य वसन्‍्त-ऋठ में ही है, 
इसलिये 'मधु' का अर्थ यहाँ वसन्‍्त ही हो सकता हैं। 
( १० ) ओचित्य । 
“४३ सन, सबसों निरस रहु, सरस राम सो होहि । 
इहे सिखावन देंत है तुलसी निसि-दिन तोहि ।?१७॥ 
“निरस' का अर्थ न्यून आर रस-हीन है । 'सरस' का अर्थ अधिक 
ओर रस-युक्त हैं | यहाँ जगत्‌ से न्यून ओर राम से अधिक यह अर्थ 
अनुचित है, इसलिये राम के विषय में सरस आर जगत्‌ से रस-हीन 
रहना ओचित्य से बोध होता हैं। क्योकि यही अथ उचित है। 
(११) देश | 
यों विहरत घनस्थास नभ, त्यों विहरत नज राम ।? 
“ृनस्यामो का अर्थ श्याम मेव्र ओर श्रीकृष्ण है | 'राम' शब्द भी 
अनेकार्थी है। नभो ओर अज' शब्द देश-वाचक की समीपता से यहाँ 
घनस्यथाम का अथ मेघ ओर राम का अथ श्रीवलराम ही हो सकता है। 
(१२ ) काल | 
चित्रभानु निसि में लसत । 


पक अभिधा मूला व्यश्जना 


“पचित्रभान का अथ सूर्य ओर अग्नि है। किन्तु रात्रि में अग्नि का 
ही प्रकाश होता है, न कि सूर्य का । अतः काल-वाचक “निसि' शब्द ने 
यहाँ चित्रभानु को अग्नि के अर्थ में ही नियन्त्रित कर दिया है। 


( १३ ) व्यक्ति । 
“काहे को सोचतिं सखी! काहे होत बिहाल ; 
बुधि-छुल-बल करि राखिहों पति तेरी नव-बाल ।?”$ ८ा। 

पति शब्द अनेकार्थी है । ये. परकीया नायिका से दूती के वाक्य 
है--तिरी पति मैं रख लू गी' । 'तेरी' स्रीलिड्ग होने से पति का अर्थ यहाँ" 
लजा ही हो सकता है, न कि स्वामी । यहाँ “व्यक्ति! से स्रीलिड्, पुलिद्ज 
का तालये है । 

( १४ ) स्वर । 

आचायों का मत है कि स्वर का प्रायः वेदो मे ही प्रयोग होता है। 
पर बातचीत मे भी स्वर की विलक्षणता से वाक्य का एक विशेष अर्थ 
निर्णय किया जा सकता है। 

ऊपर दिये हुये उदाहरणों द्वारा यह स्पष्ट है कि इन संयोग” आदि 
कारणों से अनेकार्थी शव्दों का एक वाचय अर्थ ही अमिधा द्वारा बोक 
हो सकता हे--अन्य अर्थ बोध कराने मे अभिधा की शक्ति इन (सयोग 
आदि) के द्वारा नियन्त्रित हो जाने के कारण अन्य अर्थ अवाक्ष्य हो जाते 
हैं। ऐसी अवस्था म अन्य अर्थों के अवाच्य हो जानें पर जब किसी: 
अनेकार्थी शब्द में किसी दूसरे अर्थ की प्रतीति होती हे तो अमिधा-मूला 
व्यज्ञना द्वारा ही हो सकती है | अभिधा-मूला व्यज्ञना का उदाहरण--- 

भद्रात्म है अति विशाल सु-वंश उच्च, 
है पास में बहु शिलीसुख भी सन्पक्त; 
जो है सदेव परवारण शोभनीय, 
दानाम्बु - सेचनमयी कर है तदीय ।$ शा 


'तृतीय स्तवक प्प 





इसमें कवि द्वारा किसी राजा की प्रशंसा की गई है। वह राजा भद्वात्म 
(( शुद्ध अन्तःकरणवाला ) है, विशाल वंश में ( उच्च कुल में ) उत्तन्न है, 
जिसके समीय स-पक्तु शिलीमुख ( पंखदार बाणों ) का समूह है, जो परवारण 
( शत्रुओं को निवारण ) करनेवाला है, ओर जिसका कर ( हाथ ) सदा 
ही दान देने के लिये हुए जल से शोभित रहता है। यह वाज््याथ है, 
क्योंकि कवि द्वारा राजा की प्रशंसा किये जाने का प्रकरण है। इस 
प्राकरणिक वाच्यार्थ का वोध कराके अमिधा की शक्ति पूर्वोक्त 'प्रकरण' 
के द्वारा रुक जाती है। प्रकरणगत राजा की प्रशसा के सिवा दूसरा अर्थ 
-अमभिधा द्वारा बोध नहीं हो सकता । इस पद्म में 'भद्वात्म' आदि बहुत से 
ऐसे शब्दों का प्रयोग है जो अनेकार्थी हैं। अतः इस वर्णन में एक 
दूसरा अर्थ--हाथी के वर्णन का--प्रतीत होता है । जैसे--परवारण--श्रेष्ठ 
हाथी, भद्रात्म/ःभद्र जाति का, विशालवश>ब॒डे बॉस के समान ऊँचा 
अथवा जिसकी पीठ का बॉस ऊँचा है, ओर जिसके पास शिलीमुख--भौरों 
के समूह रहते हैं, क्योकि उसकी दानाम्बु-सेचनमयी कर है-नसूंड मद के 
चू ने से सदेव शोमित रहती है । यह दूसरा अर्थ वाच्यार्थ नहीं है, क्योकि 
वाच्यार्थ तो उसे ही कहा जायगा, जो अभिधा शक्ति द्वारा बोध होता है। 
यहां अभिधा की शक्ति तो प्रकरण के कारण राजा के वर्णन का एक 
अर्थ बोध कराकर रुक जाती हे--प्रकरण ने अभिधा की शक्ति को 
'दूसरा अर्थ बोध कराने से रोक दिया है । यह न लक्ष्यार्थ ही है, क्योकि 
“लक्ष्यार्थ तो वहीं ग्रहण किया जाता है जहाँ वाच्यार्थ का बाघ होता है । 
यहाँ राजा के वर्णन का अर्थ, जो वाच्यार्थ है, उसका बाघ नहीं है | श्रतः 
हाथी के वर्णनवाला जो अर्थ हे वह न तो वाच्यार्थ है ओर न लक्ष्यार्थ ही । 
इन दोनो से मिन्न व्यग्यार्थ है, जो अमिधा-मूला व्यञ्ञना का व्यापार है। 
क्योकि इस व्यंग्यार्थ को यहाँ अमिधा की शक्ति रक जाने पर ही उपस्थिति 
'होने का अवसर मिला है। यह व्यज्ञना शाब्दी इसलिये कही जाती है कि 
बह शब्द के आश्रित है। क्योंकि, 'भद्गात्म' के स्थान पर 'कल्याणात्मक 


प्प६ लक्षणप्त-मूला व्खना 
ओर 'शिलीमुख' आदि -े स्थास पर वास अ्कृदिव्पर्यास शब्द बदल 
देने पर-हाथी के वर्णनवाले व्यग्य अर्थ की प्रतीति- नहीं हो सकती है। * 


इस प्रसज्ञ मे एक महत्त्व-यूणा बात यह भी उल्लेखनीय है कि अनेकार्थी 
शब्दों के प्रयोग में श्लेष)” अलड्लार भी होता है। पर श्लेष में अनेकार्थी 
शब्दों के जो एक से अधिक अर्थ होते हैं, वे संभी वाच््यार्थ ही होते हैं, 
क्योंकि वे सब अर्थ प्रकरणगत होते हैं। अर्थात्‌; जिस प्रकार अनेकार्थी 
शब्द का वाच्याथ अमिधा द्वारा बोध हो जाने पर--अ्भिधा की शक्ति 
के रुक जाने पर--अ्रमिधा-मूला व्यज्ञना का व्यग्यांथ होता है। उस 
प्रकार श्लेप में अमिधा की शक्ति रुक जाने पर दूसरा अर्थ नहीं होता । 
चहॉ सभी अर्थ अभिधा शक्ति द्वारा ही एक साथ बोध होतें हैं | श्लिष्ट- 
रूपक" अलड्लार भ भी अनेकार्थी शब्दों के एक से अधिक अथ होते 
हैं। वहों विशेष्य-बाचक पद अनेकार्थी नहीं होता--केवल विशेषण 
डी श्लिष्ट होते हैं। व्यज्ञना मे विशेष्य-वाचक ओर विशेषण-वार्चक समी 

शिब्द अनेकार्थी होते हैं। इनम यही भेद हैं । 


लक्ष णा-मूला शाब्दी व्यञ्ञना 


लिस प्रयोजन के लिये लाक्षणिक शब्द का ग्रयोग 
किया जाता है, उस प्रयोजन की ग्रतीति करानेवाली शक्ति 
की लक्षणा-मूला व्यज्जना कहते हैं । 


लक्षणा प्रकरण मे पहिले कह आये हैं कि प्रयोजनवती लक्षणा में 
जिसे प्रयोजन कहा जाता है वह व्यग्यार्थ ढै। उस व्यग्यार्थ का ज्ञान 


५०७७ ७७ ५० ५ध ५० ५ध५० ५० ५त 323 3ल ७० ७८2 ५०5० ५०५ट रत ५० ५० ५८७० ५७० ५०९० ५८० कक 


१ इस अलक्कार के विस्तृत विवेचन के लिये इस अन्थ का दूखरा 


आग श्रत्नज्वारम]ञ्जरी देखिये । 
हु 


ठृतीय स्तवक _ ६० 





करानेवाली लक्षणा-मूला व्यह्षगा ही है, अभिषा और लक्षणा नहीं ॥ 
जैसे गड़ा पर गाँव इस लक्षुणा के उदाहरण में लाह्ृणिक शब्द 'गल्ां 
का प्रयोग तठ में पवित्रता आदि धर्म सूचित करने के प्रयोजन से किया 
गया है। इस प्रयोजन का अर्थात्‌ तय में पवित्रतादि धर्मों का सूचन न 
तो अभिंधा ही करा सकती है ( क्‍योंकि अभिधा तो गरद्मा शब्द का 
सकेतित वाच्यार्थ जो प्रवाह-घारा है उसी का बोध करा सकती है ) और 
न लक्षणा ही ( क्योंकि जहाँ मुख्यार्थ का बाघ, मुख्यार्थ का लक्ष्यार्थ के 
साथ सम्बन्ध ओर प्रयोजन, ये तीन कारण होते हैं, वहीं लक्षणा हो 
सकती है ) | 'तठ' गड़ा शब्द का लक्ष्यार्थ है, न कि मुख्यार्थ । लक्ष्यार्थ 
“तट का बाघ नहीं है, क्योंकि तठ पर गॉव का होना सम्भव है। 
ध्त्ट का पवित्रादि धर्मों से सम्बन्ध नहीं है, क्योकि पवित्रतादि धर्म गड़ा 
के प्रवाह के हैं न कि तठ के । न पवित्रतादि धर्मों का ( जो स्वयं प्रयोजन 
हैं ) बोध होने में कोई दूसरा प्रयोजन ही है । अर्थात्‌ , पवित्रतादि धर्म 
ध्तट! मे सूचन करने के प्रयोजन के लिये तो लाक्ष॒णिक शब्द गजल्ञा' का 
प्रयोग ही किया गया है, फिर प्रयोजन में दूसरा प्रयोजन क्या हो सकता 
है ! यदि एक प्रयोजन में दूसरा, दुसरे मे तीसरा, तीसरे में चोथा प्रयोजन 
स्वीकार किया जाय, तो इस प्रयोजन-श्य खला का तो कहीं अन्त. ही न 
हो सकेगा | फलतः अनवस्था" के कारण मूलभूत प्रयोजन भी जिसके 
लिये लक्षणा की जाती है निमू ल हो जायगा | 


निष्कर्ष यह है कि लक्षणा मे जो प्रयोजन अर्थात्‌ व्यंग्यार्थ होता है 
उसे अभिषा ओर लक्षणा दोनो ही प्रतीत नहीं करा सकतीं--केवल 


ब्क््त्जजी जज जज जज जज जज च् ज जजचचच जज जज जज न-्न्‍्त्घ््््त्न्‍्ज्ज जज +5_ 


3 अनवस्था' झूठे तक को कहते हैं, जो श्रप्नामाणिक, अन्त-रहितत 
भवाह-मुखक है--'मूलक्यकरी चाहुरनवस्थां च दूषणमः ॥ 


६१ हे अआ्रार्थी व्यज्लनाः 


लक्षणा-मूला व्यञ्ञना द्वारा ही वह प्रतीत हो सकता हे" | 
उपयुक्त अ्मिंधा-मूला ओर लक्षणा-मूला व्यज्ञना शाब्दी इसलिये 
हं कि ये शब्द के आश्रित हैं--श्र॑मिधा-मूला' तो अनेकार्थी शब्दों पर 
* निभर है, ओर लक्षणा-मूला लाक्षणिक शब्दों पर | 


श्रार्थी व्यज्ञना 


(१) वक्‍त, ( २) बोधव्य, ( ३ ) काकु, ( ४ ) वाक्य, 
(५) वाच्य, (६) अन्यसन्निधि, (७) प्रस्ताव, 
(८ ) देश, ( & ) काल और (१०) चेश्ट के वेशिष्टयर 
से जिस शक्ति द्वारा व्यंग्यार्थ की प्रतीति होती है, वह 
आर्थी व्यत्जना कही जाती है | 


(१ ) वक्‍त-वेशिष्य्य--वाक्य के कहनेवाले को वक्‍त कहते हैं | 
वक्ता स्वयं कवि होता है या कवि-निबद्ध पात्र अर्थात्‌ कवि द्वारा कल्यित 
व्यक्ति । वक्ता की उक्ति की विशेषता से जहाँ व्यग्यार्थ सूचित होता है, 
उसे वक्‍तृवेशिष्य्य कहते हैं । 

उदाहरणु--- 

“प्रीतवम की यह रीति सखि, मोपे कही न जाय ; 
मिकरकत हू दिंग ही रहत, पल न वियोग सुहाय 7२० 





१ अस्य प्रतीतिमाधातु' लक्षणा समुपास्यते ; 
फले शब्देकगम्येउत्न ज्यब्जनाझापरा क्रिया। 
नाभिधा समयाभावात्‌ हेत्वसासान्न लक्षणा | 

( काव्यम्रकाश, २। १४-३२ ) 
२ विशेषता या विलक्षणता । के हो जे क 


ंतीय॑' स्तवेक हर 








यहाँ कवि-कल्पित नांयिंका वक्ता है । उसकी इस उक्ति के वेशिप्य्य 
से यह व्यंग्यार्थ सूचित होता है कि "मैं अत्यन्त रूपवती हैँ, मेरा पति मुझ 
पर अत्यन्त आसक्त है! ) यह आर्थी व्यज्ञना इसलिये है कि यहाँ 
मिमकत' के स्थान पर अनादरं आदि ओर “िंग! के स्थान पर ' 
समीप आदि पर्यायशब्द ( उसी अर्थ के बोधक शब्द ) बदल देने पर 
भी उक्त व्यग्याथ प्रतीत हो सकता है-शाब्दी व्यज्ञना की तरह शब्दों पर 
अवलम्बित नहीं है, किन्तु अर्थ के आश्रित है ।आर्थी व्यज्ञना के 
उपयुक्त सभी भेदों के शब्द-परिवर्तन करने पर व्यग्यार्थ की प्रंतीति 
होती रहती है।.... *' 

“मनरंजन अजन के तन में अँंगराग रचें 'रति रंगन में ; 

गृह के सिगरे नित काज करे गुरु लोगन के सतसंगन सें । 

कहिए कहि कौन सो कोन सुने सु सहैं बने प्रेम श्रसंगन में ; 

धनि वे, धनि हैं तिनके लहने, पहिरें गहने नित अन्न में ।?२१॥ 

यहों प्रेम-गर्विता रूपवती नायिक्रा वक्ता है। इसमें 'मेरा पति मुझे 
कहीं भी बाहर नहीं जाने देता यह जो व्यंग्य है, वह वक्ता की उक्ति- 
वेशिप्य्य से सूचित होता है । 

(३ ) बोधव्य-वेशिष्व्य--श्रोता को बोधव्य कहते हैं। जहाँ 
वाक्य को सुननेवाले की विशेषता से व्यंग्यार्थ का सूचन हो, वहाँ यह 
भेद माना जाता है। 


कुच के तट चंदन छूव्यों सब्रे, अधरानहु पे न रही झअसरुनाई ; 
इग-कंजन-कोर निरंजन भे तनु अंगन मे पुलकावलि छाई। 
नहि जानत पीर हितुन की तू, अरी ! ग्रोलियो मूठ कहाँ पढ़ि आई ; 
इतसाों गई न्‍हाइबे वापी ही तू न गईं तिहि पापी के पास तहोंई !२२॥ 

अपने नायक को बुलाने के लिये भेजी हुई, किन्तु वहाँ जाकर 
उसके साथ रमण करके लौटी हुई, पर अपने को वापी ( तालाब ) पर 


श्ढ्र आर्थी व्यज्जना 


स्नान करके आई हुई, बतलानेकेली दूती से यह अन्यसम्भोगदुःखिता 
नायिका की उक्ति है | यहाँ दूती बोध॑व्य ( सुननेवाली ) है । नायिका के 
इन वाक्यों से 'तू वापी स्नान करने को कब गई थीं? तुझे! तो नायक'के 
-पास बुलाने को भेजा था, ओर तू उसके साथ रमण करके आई हे? 
यह जो व्यंग्याथ सूचित होता है, वह तभी सूचित हो सकता है, जब 
तादश दूती--श्रोता--के प्रति ये वाक्य कहे जायें | यदि इस प्रकार की 
दूती के अतिरिक्त किसी दूसरे को कहे जायें, तो उक्त व्यग्यार्थ सूचित नहीं 
हो सकता | इसलिये वोधव्य की विशेषता से ही यहां व्यग्यार्थ है । 


“घाम घरीक निवारिए कलित ललित अलि-पुज़ , 
जमुना-तीर-तमाल त्तरु मिलत मारूती कुज ।” 


नायक के प्रति स्वयदूतिका नायिका की इस उक्कि मे सड्लेत-स्थान का 
सूचित किया जाना व्यंग्यार्थ है। यहाँ बोधव्य नायक होने से ही यह 
व्यग्याथ प्रतीत हो सकता है | 


लक 





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१ इस पद्म से सतान के कथन की पुष्टि करने के लिये जो वाक्य 
नायिका के हैं उनमें रति-चिह्-सूचक व्यंग्यार्थ है । जेसे, 'कुर्चों के तट का 
चन्दन छुट गया? कहने में च्यंग्य यह है कि स्नान करने से केचल ऊपरी 
भाग का चन्दन ही छुटता है, न कि सन्धि भाग का सन्धि-माग का चन्दन 
मर्दनाधिक्य से ही छुट सकता है | अ्रधर ( नीचे का होठ ) की श्ररुणता 
छुट जाने में व्यंग्य यह है कि स्नान से ऊपर के होठ का भी रंग घुले 
विना नहीं रह सकता (कास-शास्त्र में नीचे के अधर के चुम्बन का ही 
विधान है ) नेत्रों के आ्रन्त भाग का श्रञ्ञन भी चुम्बनाधिक्य से ही छुटता 
है, न कि स्नान-मात्र से। रोमाल्च का होना स्तान और रति दोनो में 
समान है। 


तृतीय स्तवक ६४ 


(३ ) काकु-वेशिष्ट्य--एक.विशेष प्रकार की कंण्-ध्वनि से कहे 
हुए. वाक्य को “काकु कहते हैं" | जहाँ केवल काकु-उक्ति मात्र से 
व्यंग्याथ प्रतीत होता है वहाँ तो 'काक्काक्षिप्त! गुणीभूत व्यंग्यहोता है। 
जहाँ काकु उक्ति की विशेषता से व्यंग्यार्थ प्रतीत होता है वहाँ काकु- 
वैशिष्य्य होता है। ' 


उदाहरण 


“क्रिती न गोकुल कुल-अघू ? काहि न किहिं सिख दीन ? 
कोने तजी न कुल-गली हो मुरली-सुर-लीन ??२४॥ 


मुरली की ध्वनि सुनकर विवश हो श्रीनन्दनन्दन के समीप जाने को 
उद्यत किसी गोपी की अपनी उस सखी के प्रति यह उक्ति है जो उसे वहाँ 
न जाने की शिक्षा दे रही थी । इसमें तीन काकु उक्ति हैं--( १ ) 'किती 
न गोकुल कुल-अधू'--गोकुल में कितनी कुलाज्जनाएँ नहीं हैं ! इस 
काकु उक्ति से यह अर्थ खिंचकर आता है कि प्रायः सभी कुल-बघू ही ते 
हेैं। ( २) 'काहि न किहि सिख दीनः--किसको किसने शिक्षा नहीं 
डी ? सभी को सब ऐसी शिक्षाएं देती रहती हैं | (३) 'कोने तजी न कुल 
गली--पर यह बता कि वंशी की मनोहर ध्वनि को सुनकर किसने कुल 
की मयांदा नहीं छोड़ी ! सभी ने तो छोड दी है | यहाँ इन काकु उक्तियो 
के आगे जो वाक्य लिखे गए, हैं, वे काकु अक्ति मात्र के व्यंग्य अर्थ हैं, 
उन्हीं में इन काकु उक्तियों के प्रश्नों का उत्तर तत्काल हो जाता है अतः 
यह काक्काक्तित गुणीभूत व्यंग्य का विषय है। किन्तु “तू जो अब मुझे 
उपदेश दे रही है, क्या कभी मुरलीमनोहर की मुरली की चेतोहारी ध्वनि 
सुनकर ओर मेरे जैसी दशा को प्राप्त होकर तथा उस अवसर पर तुमे भी 
ऐसी शिक्षा मिलने पर क्‍या तू श्रीनन्दकुमार के समीप न पहुँची थी ! 


०. 


३ 'भिश्चकण्ठघ्वनिर्धरिः काकुरित्यभिद्दीयते! । 


३ आर्थी व्यज्नना 





फिर मुझे यह भ्ूूठा उपदेश क्‍यों सुना रही है! सच हे, उपदेश दूसरों को 
ही देने के लिये हुआ करते हैं ।” यह व्यग्यार्थ काकु-वेशिष्य्य द्वारा ही 
सूचित होता है, ओर यही व्यग्यार्थ प्रधान हे । यह काकु उक्ति द्वारा 
आक्तिस नहीं होता--काकु उक्ति तो यहाँ केवल सहायक मात्र है" | 


(४ ) वाक्य-वशिष्ट्य--जहों सारे वाक्य की विशेषता से व्यग्या्थ 
ग्तीत होता है वहाँ यह भेद माना जाता है। 


मम कपोल तजि भनत तब रग न कियो कित गोन ? 
मैं हूँ वही, कपोल्न वह, पिय ! अब वह न चितोन रर॥ 


अपने प्रचछन्न-कामुक नायक के प्रति यह नायिका की उक्ति है। 'तब 
६ जब मेरे समीप बेठी हुई ठुम्हारी प्रेमिका का प्रतित्रिम्ब मेरी कपोलस्थली 
पर पड़ रहा था ) मेरे कपोलों को छोडकर तुम्हारी दृष्टि अन्यत्र कहीं भी 
नहीं जाती थी, किन्तु अब ( जब कि वह आपकी प्रेमिका यहाँ से चली 
गई है, ओर उसका प्रतिबिम्ब मेरी कपोलस्थली पर नही रहा है ) यत्रपि 
मैं वही हूँ, और मेरे कोल भी वही हैं, पर आपकी दृष्टि वह नहीं--मेरे 
कपोल पर नहीं आती ।' इस सारे वाक्य की विशेषता से यह व्यग्य सूचित 
होता है कि आपका प्रेम मुझ पर नहीं, उसी युवती पर हे, जो अभी यहाँ 
बैठी हुई थी | अतः यह वाक्य-वेशिष्य्य है । 

१ गुणीमूत ब्यंग्य का एक भेद 'काक्ाक्षिप्त ध्यंग्य” है। उसमें भी 
काऊु उक्ि द्वारा न्यंग्याथ होता है। सेद यह है कि वहाँ ब्यंग्याथ प्रधान 
नहीं, किन्तु गौण होता है। काक्कादिप्त सात्र है--काकु उक्कि के साथ 
तत्काल ही खिंचकर सूचित हो जाता है। जेसा कि ऊपर की तीनों काकु 
तक्कियों के आगे लिखे हुए वाक्यों के ब्यंग्याथे, चाच्यार्थ के प्रश्न के साथ 
डी तत्काल प्रतीत हो जाते हैं। 


तृतीय स्तवेक ६६% 


जन जज 





( ५ )बाच्य-वशिष्ट्ये--जहों, उत्कृष्ट विशेषणोबाले वाक्य की। 
विशेषता, से व्यंग्याथ' सूचित होता: है वहाँ यह भेद माना जाता है । 


घन रंभन थंभन पॉँतन सो रु कर्दंबन सों सरसावनो है 
अति संजु लतानि के कजन में अलि-गुंजन सो मनभावनो है। 
मलयानिल सीतल _संद्र बहै, हिय काम-उमंग बढ़ावनो है; 
श्रवलोकु प्रिये ! जम्लुना-तट को सहजें यह कैसो लुभावनों है २६॥॥ 


यहाँ श्रेणी-बद्ध सघन कदली ओर कठम्ब-नइक्ष, लता-कुल्लो में भ्रमरों 
का गुज्लार ओर मलय-मारुत आदि कामोद्दीपक विशेषणोवाले वाक्यार्थ कीः 
विशेषता द्वारा रमणुत्सुंक नायक की नायिका के प्रति रति-प्रार्थना-रूप 
ब्यंग्याथं सूचेन होता है । 


( ६) अन्य-सन्निधि-- जहों वक्ता और सम्बोध्य ( जिसको कहा' 
जाय ) के अतिरिक्त तीसरे पुरुष की समीपता के कारण व्यंग्यार्थ सूचित 
होता है वहाँ यह भेठ माना जाता है । 


सोंप्यो सब गृह-काज मुहि श्रहों निरदई खास! 
साँस समय में छिनक अलि ! मिलत कबहूँ अवकास ।२०॥' 


अपने प्रेम-यात्र को सुनाकर अपने समीप बेठी हुईं सखी के प्रति यह 
परकीया नायिका की उक्ति है। यहाँ वक्ता नायिका हैं ओर सम्बोध्य उसकी 
सखी है, क्योकि सखी के प्रति ही उसने यह वाक्य कहा है। यहाँ तीसरे 
व्यक्ति ( अपने प्रेम पात्र ) को सूचन किये हुए इस वाक्य मे नायिका ने: 
सन्थ्या समय में मिलने को व्यंग्यार्थ म सूचन किया है । 
(७ ) प्रकरण-चैशिष्ट्य--जहों विशेष प्रकरण होने के कारण 
व्यग्यार्थ सूचित होता है वहाँ यह भेठ माना जाता है। 
सुनियत्र तव पिय भातु है साफ. समय सखि झाज ; 
कात न क्यों उपकरन तू, क्यों. जैठी बेकाज़ ? रघा। 


घ्ज . आर्थी व्यखंना 


यह उप-नायक के समीष अभिसार को, जाने के लिये उद्यत 
नायिका के प्रति उसकी अन्तरड् सखी की उक्ति है। यहाँ अभिसार को 
रोकना व्यग्याथ है| यह व्यंग्य अमिसार को जाते का प्रकरण होने के 
कारण ही सूचित हो सकता है। 
(८) देश-वशिष्व्य-स्थान की विशेषता से व्यग्यार्थ का 
सूचित होना | 
चित्रकूट-गिरि है वही; जहेँ' सिय-लछुमनस्साथ -- 
पास सरित मंदाकिनी चास कियो रघुनाथ ॥२९॥ 
यहाँ श्रीरधुनाथजी के निवास के कारण चित्रकूट के स्थल कीः 
विशेषता से उसओ॥ी परम पावनता व्यग्यार्थ में सूचित होती है । 
“बेलिन सो लपटाय रही हैं तमालन की अवली शति कारी; 
कोकिल, केकी, कपोतन के कुल केलि करें जहँ आनंद भारी । 
सोच करो जिन, होहु सुखी, 'मतिराम! प्रबीन सबें नर-नारी; 
मंजुल वंजल कजन में घन पुंज सखी ससुरारि तिहारी ॥7३०॥» 


अनुशयाना नायिका के प्रति सखी को इस उक्ति मे जो वजुल, 
कुज आदि का होना कहा गया है, उसके द्वास नायिका को उसकीः 
ससुरार में संकेत-स्थान का सूचन किया गया है। 


(६ ) काल-वबेशिष्व्य--समय की विशेषता के कारण व्यग्यार्थ 
का सूचित होना । 
गुरु जन परबस पीय ! तुम गमन. करत मधुकाल; 
हतभागिनि हों, का कहों, सुनि हो सब मो हात़,।३१॥ 
यहों वसन्त-काल के कारण यह व्यंग्यार्थ सूचित होता है कि 'वसन्त 
का समय घर पर आने का है, न कि विदेश गमन का। आप भले 
ही जाइए, पर मेरी दशा आप वहीं यह सुनेंगे कि वह जीवित नहीं है ।”* 


लतीय स्तवक ध्द 





(१०) चेष्टा-वेशिष्ट्य--चेश द्वारा व्यंग्यार्थ का सूचित होना । 


“हाय पहरि पट उठि कियो बैंदी मिस परनाम ; 
“इग चलाय घर को चली, बिदा किए घनस्पाम ।देर। ' 


कोई गोपाडना यमुना-तट पर स्तान कर रही थी। वहाँ श्रीनन्दनन्दन 
को आए देखकर नेत्रों की चेश से उसने संकेतस्थल पर अपना आना 
सूचित किया हे । 

ये सब उदाहरण एक-एक वैशिष्टय के हैं । कहीं वक्त, बोधव्य आदि 
अनेक वैशिष्टय एक ही पद्म में एकत्रित हो जाते हैं। जैसे-- 


यह काल रसाल वसंत अहो ! कुसुमायुध चान चलाचतु रो; 
फिर धीरसमीर सुरंघधित ये तरुनीन अधीर बनावतु री। 
चनसंजुल-चंजुल-कंज बनी सजनी ये घनी ललचावतु री; 
न्नहिं पास पिया, करिए जु कहा, श्रब तू ही तो क्यों न वतावतु री ॥३३॥ 


अन्तरज्ञ सखो के प्रति यह किसी नायिंकरा की उक्ति है। वसन्‍्त के 
कथन से काल-वैशिष्य ओर वजुल-कुज के कथन से देश-वैशिष्टय है। 
चायिकर वक्ता है, अतः वक्‍तृ-वेशिश्टय है। सम्पूर्ण वाक्यार्थ में सखी को 
अच्छन्न कामुक के बुलाने के लिये कहा जाना वाक्य-बैशिष्टय भी है | 
इसमें वक्त आदि वैशिष्य्य से प्रथकश्थक्‌ व्यंग्याथ सूचित होता है | 
कहीं अनेक वैशिष्य्यों के सयोग से भी एक्र ही व्यंग्याथ सूचित 
होता है। जैसे-- 
हों इत सोवरतु, सास उत, लखि किन ले दिन माय ; 
अरे पथिक! निसि-अंघ तू गिरियो जिन कहूँ आय ॥३४॥ 


यह कामुक-पथिक के प्रति स्वयदूतिका नायिका की उक्ति है। 'मैं 
न्यहाँ सोती हूँ, ओर मेरी सास वहाँ। तू दिन में यह स्थान देख ले। तुमे 


8३ श्रार्थी व्यक्नना 





रतोंघ आती है। रात में कहीं हम लोगों के ऊपर आकर न गिर जाना ।? 
इस अक्ति में वक्ता नायिका ओर बोधव्य पथिक दोनों के वेशिष्य्य से 
नाग्रिका द्वारा अपना शयन-स्थल सूचन-रूप व्यंग्यार्थ है। इसी प्रकार दो 
से अधिक वेशिष्य्य के मिलने पर भी व्यज्ञना होती है । 


आर्थी व्यज्ञना का व्यंग्याथ कवि के इच्छानुसार वाच्ष्य, लक्ष्य 
ओर व्यग्य तीनो अर्थों में हो सकता है। अञ्रत. उपयुक्त वक्त आदि 
वेशिष्य्यों द्वारा होनेवाली व्यज्ञगा तीन प्रकार की होती है-- 


वाच्यसम्भवा, लक्ष्यसम्भवा ओर व्यंग्यसम्भवा । 
वाच्यसम्भवा व्यज्जना । 


गृह-उपकरन जु आज कछु तू न बतावति मातु ; 
कहहु कहा करतव्य अब चौस चलयो यह जातु ।३९॥ 


उप-नायक से मिलने को उत्सुक तरुणी का अपनी माता के प्रति 
यह वाक्य है--अरी मा ! गरह-उपकरणु--ई धन, शाक आदि--आराज 
तू घर में नहीं बतलाती है, क्या कुछ बाजार से लाना है ? दिन छिपना 
चाहता है |? इस वाच्ष्याथ द्वारा वक्ता के वेशिष्य्य से 'उस तरुणी की 
अपने प्रेम-पात्र के समीप जाने की इच्छा व्यग्यार्थ है। अतः यहाँ 
वाचयाथ्थ ही व्यग्याथ का व्यज्ञक हैं। 
लक्ष्यसम्भवा व्यज्जना । | 
तन स्वेद कदयो, अति स्वास बढ़यो छिन-ही-छिन आाइबे-जाइबे में ; 
अरी मो हित तू बहु खिन्न भई, पिय मेरे को पएुतो मनाइये में । 
कछु दोस न हों पर तेरे मढ़ों, अब का घनी बात बनाइने में ; 
सब तेरे ही जोग कियो सखि, तू त्रुटि राखी न नेह बिभाइने में ।३६॥ 


अपने नायक को बुलाने को भेजी हुईं, पर उसके साथ रमण करके 
लोटी हुई दूती के प्रति अन्यसम्भोग-दुःखिता नायिका की यह उक्ति है। 


तृतीयकह्तवक १०५० 
वाच्यार्थ में दूती के कार्य की प्रशंसा है। पर जिस दूती के अडद्जों, मे 
थकावट आदि रति-चिह्न देखकर यह जात्न लेने पर कि,यह मेरे प्रिय के 
साथ रमण करके आई है, उसको नायिका द्वारा प्रशंसात्यक वाक्य 
कहना असम्भव है| अतः मुख्याथ का बाघ है। उक्त वाच्याथ (मुख्यार्थ) 
का लक्ष्याथ विपरीत लक्षणा द्वारा यह ग्रहण किया जाता है कि (ने 
उचित कार्य नहीं किया मेरे प्रियतम के साथ स्मण करके वूने मेरे साथ 
स्नेह नहीं, किन्तु विश्वासधात किया है?! । इस लक्ष्यार्थ द्वारा बोधव्य 
( दूती ) के वेशिष्य्य से उस दूती का अपराध-प्रकाशन-रूप जो व्यंग्या्थ 
प्रतीत होता है वह तो लक्षणा का प्रयोजन-रूप व्यग्यार्थ है | इसके 
सिवा नायिका के इस वाक्य में अपने नायक के विषय में जो अपराध- 
सूचन-रूप व्यग्यार्थ है, वह इस लक्ष्यार्थ द्वारा सूचित होता है। अतः 
लक्ष्यसम्भवा व्यज्ञना है। वह ध्यान देने योग्य है कि जहाँ लक्ष्यसम्भवा 
आर्थी-व्यज्ञना होती है वहाँ लक्षणा-मूला शाब्दी व्यज्ञगा भी उसके 
अन्तगंत लगी रहती है। क्योंकि, जो व्यंग्य लक्षणा का प्रयोजन-रूप 
होता दे वह लक्षणा-मूला शाब्दी व्यज्ञना का विषय है | दूसरा व्यग्याथ्थ 
जो लक्ष्यार्थ द्वारा प्रतीत होता है वह लक्ष्यसम्भवा आर्थों व्यज्ञना का 
विषय है। जैसे दूती के विषय में विश्वासधात सूचक व्यंग्य, जो लक्षणा 
का प्रयोजन-रूप है, लक्षणा-मूला शाब्दी व्यज्ञना -का विषय है । ओर 
अपने नायक के विषय में जो अपराध-सूचक व्यंग्याथ है, वह लक्ष्य- 
सम्भवा आर्थी व्यज्ञना का विषय है | इसके द्वारा शाब्दी व्यज्ञना और 
आर्थी व्यज्ञगा का विषय विभाजन भी स्पष्टतया सिद्ध हो जाता है । 
व्यंग्यसम्भवा व्यझ्ञना-- 
लखहु बलाका कमल-दल बेठी अचल सुहाहि ; 
मरंकत-भाजन माहिं ज्यों संख-सीप विजसाहि ॥शणा 


उपनायक के प्रति किसी युवती की यह उक्ति है--'देखो, कमलिनी 
के पत्ते पर बेंठी हुई बलाका बडी सुन्दर लगती, है; जैसे नीलमणि .के-पात्र 


9०४ व्यज्जना का विषय विभाजन 


३ 








में स्थित शंड्ड' की सीप--शह्ठ के औकार की बनी कटोरी । इस चाच्यार्थ 
में बलाका'(बक पत्ती की मादा) की निर्मयता-सूचक “व्यंग्याथ है। इस 
पनिर्भयता-सूचक व्यग्यार्थ द्वारा उस स्थान का एकान्त होना सूचित होने के 
कारण रतिय्रार्थना-सूचक दूसरा व्यंग्याथ प्रतीत होता है | अर्थात्‌ , एक 
व्यंग्यार्थ दूसरे व्यंग्यार्थ का व्यज्ञेक है अतः व्यग्यसम्भवा आर्थी व्यञ्ञना 
है । पहले व्यग्य को प्रतीत करानेत्राली वाचयसम्भवा ओर दूसरे. व्यग्य 
को प्रतीत करानेवाली व्यंग्यसम्मवा है | 
वक्त तीनों ही प्रकार की व्यज्ञनाओं के पूर्वोक्त 'वक्‍तृ?, बोधव्य' आदि 
बेशिष्य्यों से अनेक भेद होते हैं। उनकी वाच्यसम्भवा-वक्‍तृ-वेशिष्ट्य- 
अयुक्ता, लक्ष्यसम्भवा-बकतृ-वेशिष्य्यप्रयुक्ता, व्यग्यसम्मवा-चक्‍तृ-वैशिष्स्य- 
गयुक्ता इत्यादि सज्ञा होती हैं। यह व्यज्ञना की तालिका में दिखाया जा 
चुका है । 
ओर ८५: हक ८ विभाजन 
शाब्दी ओर आर्थी व्यज्ञना का विषय- 
शाब्दी ओर आर्थी व्यज्ञना के विषय में प्रश्न होता है कि काव्य तो 
शब्द ओर अर्थ उभयात्मक है, अर्थात्‌ शब्द और अर्थ परस्पर में 
अन्योन्याश्रित हैं, फिर शाव्दी ओर आर्थी दो भेद क्‍यों किये गये ! 
काव्य अवश्य ही शब्दार्थ उमयात्मक है । व्यञ्ञना व्यापार में भी एक के 
कार्य में दूसरे की सहकारिता अवश्य रहती है--शाब्दी व्यज्ञना में अर्थ 
की ओर आर्थी व्यज्ञना में शब्द की सहायता रहती है । अर्थात्‌ , केवल 
शब्द द्वारा या केवल त्रर्थ द्वारा व्यज्नना व्यापार नहीं हो सकता। पर 
जहाँ शब्द की ग्रधानता होती है वहाँ शाब्दी ओर जहाँ अर्थ की प्रधानता 
होती है वहाँ आर्थी व्यज्ञना मानी गई है । शाब्दी में शब्द की प्रधानता 
ओर आर्थी में अर्थ की प्रधानता किस प्रकार होती है, इसकी स्पष्टता की 
जा चुकी है । जिसकी जहों प्रधानता होती है, उसको उस्री नाम से कहा 


जाता है--'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति! | 
--द्व्ति 8922 /--- 


तृतीयस्तवक , - १०२ 


अभिधा, लक्षणा ओर व्यञ्ञना क्षैत्तियों के सिवा एक इत्ति 
तात्प्याख्या” भी होती है । यह सर्व॑मान्य नहीं है। साहित्याचार्य मम्मट 
आदि ने इसको माना है | 


ताययास्या वृत्ति 
वाक्य के भिन्न-भिन्न पदों के अर्थ का परस्पर अन्वंय॥ 
बोध करानेवाली शक्कि को तात्पर्यार्या इत्ति कहते हैं। 


'इस वृत्ति को समभने के लिये पद ओर वाक्य का विश्लेषण 
आवश्यक है | 
ह पद्‌ 
पद उस वर्ण-समूह को कहते हैं जो प्रयोग करने के योग्य, अनन्वित 
अर्थात्‌ किसी दूसरे पद के अर्थ से असम्बद्ध ( न जुटा हुआ ), एक, ओर 
अर्थवोधक होता है। जैसे, 'घट' यह दो वर्णों का समूह “पद है। 
व्याकरणादि से शुद्ध होने के कारण इसका प्रयोग हो सकता है। यह 
किसी दूसरे पद के अर्थ से सम्बद्ध भी नहीं है, एक है, तथा घट अर्थ का 
बोधक भी है। “पद को अनन्वित इसलिये कहा गया है कि यह वाक्य 
की तरह दूसरे पद के अर्थ से जुडा हुआ नहीं होता। एक” इसलिये 
कहा गया है कि पद आकाक्षा-रहित होता है--वाक्य की तरह दूसरे 
पदों की आकाक्षावाला नहीं होता | अथै-बोधक कहने का तात्पर्य॑यह है 
कि जिसका अर्थ हो सके वही पद कहा जाता है। क, च, 2, प, 
इत्यादि निरर्थक वर्ण प्रयोग के योग्य होने पर भी पद नहीं कहा जा सकता। 
यदि साथंक हो तो एक वर्ण भं. पद कहा जा सकता है। 


4 एक पद के अर्थ का दूसरे पद के अर्थ के साथ सम्बन्ध । 


१०३ तात्पयोख्या बृत्ति 


वाक्य 


वाक्य उस पदस्समूह की कहते हैं जो योग्यता, आकाच्षा और 
सम्निधि से युक्त होता है। 

योग्यता--एक पद कें अर्थ का अन्य पदों के श्रर्थों के साथ 
सम्बन्ध करने में कोई बाधा उपस्थित नहीं होना योग्यता है। जैसे, 'पारनी 
से सींचता है” | इस वाक्य में योग्यता है | अग्नि से सींचता है इसमें 
योग्यता नहीं है, क्योंकि अम्नि जलाने का साधन है, न कि सींचने का । 
ख्रतः अग्नि का सींचने पद के अर्थ के साथ विपरीत सम्बन्ध होने के 


कारण बाघा उपस्थित होती है। जहाँ ऐसी बाघा न हो, वह 
धोग्यता! है । 


अआकांक्षा--किसी ज्ञान की समाप्ति (पूत्ति ) का न होना, अर्थात्‌ 
वाक्यार्थ को पूरा करने के लिये क़िंसी दूसरे पद की अपेक्षा--जिज्ञासा-- 
का रहना आकाक्ता' है। जैसे, 'देवदत्त घर को! इतना कहने पर 'जा 
रहा है? क्रिया अपेक्षित हे । क्योंकि, 'जा रहा है” के विना वाक्यार्थ के ज्ञान 
की पूर्णता नहीं होती है । अतः, गाय, धोड़ा, पुरुष इत्यादि निराकाक्षु 
( एक पद दूसरे पद से सम्बन्ध न रखनेवाला ) पद-समूह वाक्य नहीं 
कहा जा सकता, क्योंकि वे निराकाक्ष स्वतत्र पद है। पद निराकाक्ष होता 
है, वाक्य नहीं । 


सन्निधि--एक पद का उच्चारण करने के बाद दूसरे पद के 
उच्चारण में विलम्ब न होना ( अर्थात्‌ , जिस पद के अर्थ की जिस अन्य 
पद के सम्बन्ध की अपेक्षा हो, उसके बीच में व्यवधान का न होना ) 
सन्निधि' है। व्यवधान दो प्रकार का होता है। काल' द्वारा ओर 
अनुपयुक्त शब्द द्वारा | एक पद के कहने के बाद दूसरे पद के कहे 
जाने में अधिक समय होना काल द्वारा व्यवधान है| जैसे, 'रामगोपाल” 


ढँतीय॑ स्व १०४ 


यह तो अब कहा जाय ओर 'जा रहा है? यह घंटे-दो घंटे बाद या दूसरे 
दिन कहा जाय; तो विलम्ब हो जाने से किसी को 'रामगोपाल' ओर “जा 
"रहा है इन पदार्थों का सम्बन्ध मालूम जही-'होगा। यह हुआ काल 
द्वारा व्यवधान ।अनुपयुक्त पद द्वारा व्यवधान तब होता है, जब प्रकरणोप- 
योगी पदो के ब्रीच में प्रयोग के अग्रोग्य पद आ जाता है। जैसे, 'पर्वत 
भोजन किया ऊँचा है देवदत्त “ने! । इसमें दो वाक्य हैं--'पवत ऊँचा है' 
ओर दिवदत्त ने भोजन किया! । पव॑त का सम्बन्ध 'ऊँचा है के साथ है, 
यर बीच मे भोजन किया यह पद अनुपयुक्त आ पड़ा है। दिवदत्त ने 
'के पहले ऊँचा है! पद अनुपयुक्त आ पड़ा है | इस व्यवधान के कारण 
सन्निधि के नष्ट हो जाने से इन पदों का सम्बन्ध ज्ञात नहीं हो सकता है । 
इसलिये वाक्य वही कहा जा सकता है, जिसके पदो के बीच में 
व्यबधान न हो | 


निष्कर्ष यह कि वाक्य मे श्रोग्यता, आकाजक्षा ओर सन्निधि का 
होना आवश्यक है। वाक्य अनेक पदों से युक्त होता है। वाक्य में जो 
प्रथकृश्नथक्‌ स्वतंत्र पद होते हैं, उनके प्रथकृप्रथक अर्थ का बोध 
कराना, अर्थात्‌ सम्बन्ध-रहित पदो का अर्थ बतलाना, अभिधा का कार्य 
है । उन ब्रिखरे हुए, पदो के अथों को परस्पर--एक को दूसरे के साथ-- 
'जोडकर जो वाक्य बनता है उस वाक्य के अर्थ का जो शक्ति बोध कराती 
है उसे तालयाख्या दृत्ति कहतें हैं। इस द्वत्ति का प्रतिपाद्र अर्थ तात्पयांर्थ 
'कहा जाता है । इस-डइत्ति-का बोधघक वाक्य होता है। 

इस दृत्ति का स्थान अमिधा के बाद दूसरा है। किन्ठु, जहां अमिधा 


के वाच्यार्थ के तालये का ब्राध होने पर 'लक्षुणा की जाती है, वहाँ 
वआमभिधा के बाद लक्षुणा ओर लक्ष॒णा के बाद तात्पय्या जृत्ति आती है। 





चतुर्थ स्तवक 
--“&0&#२४१,-- 
प्रथम पुष्प 


कि 3 
ध्वनि 
चाच्यार्थ से अधिक चमत्कारक व्यंग्यांथ को ध्वनि 
कहते हैं | 


अर्थात्‌ जहां वाच्यार्थ से व्यग्याथ मु अधिक चमत्कार होता है वहाँ 
ध्वनि होती है 4 ध्वनि में व्यग्यार्थ प्रधान होता है। प्रधान का अर्थ है 
अधिक चमत्कारक होना । चमत्कार के उत्क पर ही वाच्य ओर 
व्यग्य की प्रधानता निर्भर है--जहाों वाच्यार्थ मे अधिक चमत्कार होता है 
वहों वाच्ष्यार्थ की प्रधानता, ओर जहां व्यग्यार्थ में अधिक चमत्कार होता 
है वहा व्यंग्यार्थ की प्रधानता समझी जाती है! । 

वाच्यार्थ का शब्द द्वारा कथन किया जाता है । व्यग्यार्थ का 
शब्द द्वारा कथन नहीं किया जा सकता>+्यग्यार्थ की तो ध्वनि ही 
निकलती है । जैसे, घडावल ( भझालर ) पर चोट लगाने पर पहले ट्ड्लार 
होता है, फिर उसमे से मीठी-मीठी भड्लार--व्वनि--निकलती है | इसी 
भ्रकार वाच्ष्यार्थ को ठड्जार ओर व्यंग्याथ को भड्डार समझना चाहिए। 

ध्वनि के भेद नीचे की तालिका के अनुसार होते हैं--- 


४८७ध तल 








१ चघारत्वोत्कषेनिबन्धना हि वाच्य्रज्यंग्यथोः प्राधान्यवित्रक्ताः । 
“-वध्वन्याज्ञोक । 
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१०६ 


९ 


चतुथ स्तवक 





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१०७ लक्षणा-मूला ध्वनि 


इस तालिका के अनुसार ध्वनि के मुख्य दो भेद हैं--( १ ) लक्षणा- 

मूला ओर ( २ ) अभिधा-मूला । 
लक्तणा-सूला ध्वनि 

लक्षणा-मूला ध्वनि को अविवज्षितवाच्य ध्वनि 
कहते हैं । 

अविवज्षितवाच्य का अथ है--वचाच्यार्थ की विवक्षा का नहीं रहना | 
श्रर्थात्‌ इस ध्वनि में वाच््याथ का वाध" रहने के कारण वह (वाच्यार्थ) 
उपयोग में नहीं लाया जा सकता-अहण नहीं किया जा सकता 
लक्षणा प्रकरण में यह स्पष्ट किया जा चुका है। अतः इस ध्वनि के मूल 
मे लक्षणा रहती है, ओर इसी से इसे लक्षणा-मूला कहते हैं। इसमे 
प्रयोजनवती गूढ्-व्यंग्या लक्षणा रहती है, न कि रूढि लक्षणा । क्योंकि 
रूढ़ि लक्षणा मे व्यंग्यार्थ (प्रयोजन) होता ही नहीं, और व्वनि तो व्यग्यार्थ 
रूप ही है। ध्वनि मे व्यग्यार्थ की प्रधानता रहने के कारण अगूढ-व्यग्य 
भी ध्वनि का विषय नहीं, किन्तु वह ( अगूढ व्यग्य ) गुणीभूत व्यंग्य के 
अन्तगंत है | 

लक्षणा के मुख्य दो भेदों ( उपादान-लक्षणा ओर लक्षण-लक्षणा )' 
के अनुसार लक्षणा-मूला ध्वनि के भी दो भेद होते हैं-- 

( १ ) अर्थान्तरसक्रमितवात्य ध्वनि! ओर (२) अत्यन्तति- 
रस्कृतवाच्य ध्वनि | 


अथोन्‍तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि 
जहाँ वाच्यार्थ अर्थान्तर में संक्रमण करता है--बदल 
जाता है--वहाँ अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि होती है। 


3 23०2३ 2९3 3.८3 23 ५ 3 25 2७८४ 23 /५ /5७+६-८६४५७ ४६ २५ /५८४ 


१ बाघ का स्पष्टीकरण लक्षणा प्रकरण पृष्ठ €७ सें देखिये । 


चतुथ स्तवक १०्घ 





इस ध्वनि के मूल में उपादान लक्षणा रहती है। उपादान लक्षणा 
में जिस प्रकार वाच्या्थ का धाघ होने पर वह लक्ष्यार्य मे बदल जाता है, 
उसी प्रकार इस ध्वनि में वाच्यार्थ बाधित अर्थात्‌ अनुपयुक्त ( उपयोग में 
लाने के अयोग्य ) होने से अर्थान्तर संक्रमित हो जाता है, अर्थात्‌ दूसरे 
अर्थ में बदल जाता है। इसी कारण इसको अ्र्थान्तरसंक्रमितव्राच्य 
ध्वनि कहते हैं। वाच्यार्थ दो प्रकार से अनुपयुक्त हो सकता है--पुनरुक्ति 
से, या जब वह किसी विशेष अर्थ को न बतलाता हो, अर्थात्‌ वाच्यार्थ 
द्वारा वक्ता के कहने का तात्पय भू निकलता हो | यह ध्वनि पदगत ( एक 
ही पद में ) ओर वाक्यगत ( कई पदो के बने हुए वाक्य मे ) होती है। 


पुनरुक्ति से वाच्यार्थ के अनुपयोगी होने का उदाहरण--- 


कदली कदुली ही तथा करभ हु करभ लखाथ ; 
झगनेनी के उरुन की समता कितहु न पाय ।शेय॥। 


उस्झ्रो को केले के बक्च के स्तम्भ की अथवा करभ" की उपमा दी 
जाती है। यहाँ कहा गया है--'कदली कदली ही है” अर्थात्‌ केला केला 
ही है, ओर करभ करम ही । मृगनयनी के उरुओ (जंघाओ ) का साहश्य 
तीनो लोक में कहीं भी नहीं मिलता | दुबारा कहें हुए “कदली ओर 
करभ शब्दों का वाच्यार्थ कदली ओर करभ ही है | यदि इसी वाचयार्थ 
को ग्रहण किया जाय तो पुनरुक्ति दोष हो जाता है--एकार्थक शब्दों का 
दो बार कहा जाना व्यर्थ है । अ्रतः यहाँ वाच्यार्थ का बाघ है--अनुप- 
योगी होने के कारण यह ग्रहण नहीं किया जा सकता | इसलिये दुबारा 
कहे हुए, कदली ओर करभ का जो वाच्यार्थ है वह,--“कदली कदली ही 
है, अर्थात्‌ जड है; ओर करभ करम ही है, अथांत्‌ हथेली के एक तरफ 


३ / 2५३5 2५ 4६2३ ८५ /५:५८७५ /५/५ ४६ /५/५ 2५ ४५ ४७/५८/६४८५ /६८०४०६०४८४/८/ २४०५४८४/६: 


१ हाथ की छोटी उँगली से पहुँचे तक हयेली के बाहरी भाग 
का नाम करभ है---'सणिबन्धादाकनिष्ट' करस्य करभोबहिः” । 


१०६ अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि 








का भाग-मात्र है--इस दूसरे अर्थ में ( जो वाच्ष्यार्थ का ही विशेष रूप 
है ) परिणत हो जाता है, यही अर्थान्तर में सक्रमण है। यह अर्थान्तर 
वही व्यग्यार्थ है, जिसको उपादान लक्षणा में प्रयोजन कहते £। किसी 
के शुणु या अवगुण को सूचन करने के लिये ही एक शब्द को प्रायः 
दो बार कहा जाता है । जैसे, 'कोंआ कोआ ही है, ओर कोकिल कोकिल 
ही! । इस वाक्य में भी दूसरी बार कहे हुए कौआ ओर कोकिल का 
वाच्यार्थ ग्रहण नहीं किया जाता, किन्दु दूसरी बार कहे हुए कोआ का “कर्ण- 
कटु शब्द करनेवाला' और कोकिल का “मधुर ध्वनि करनेवाली' लक्ष्या्थ 
ग्रहण किया जाता है | यह लक्ष्यार्थ, वाच्याथ का विशेष रूप है--वाच्यार्थ 
से सर्वथा मिन्न नहीं। उपादान लक्षणा के प्रकरण में इस विषय का 
विवेचन किया जा चुका है । 


इस विवेचन से स्पष्ट है कि “व्यंग्यार्थ' शब्द द्वारा कहा नहीं जा 
सकता, उसकी वाच्याथ्थ से ध्वनि ही निकलती है | जैसे, “कदली कदली' 
आदि के वाच्यार्थ मे दूसरे अर्थ की ध्वनि निकलती है | इसी प्रकार 
व्यग्याथ की सवंत्र व्यनि ही निकलती है। 


तब ही गुन सोभा लहें, जश्न सहदय सु सराहि ; 
कमल कमन्न हैं तबहि, जब रवि-कर सो विकसाहिं ।३९॥ 


यहां दूसरी बार प्रयुक्त कमल शब्द का यदि 'कमल' अर्थ ग्रहण 
किया जाय तो पुनरुक्ति दोष आ जाता है। अतः यह वाच्या्थ अनुपयोगी 
है | दूसरी बार के 'कमल' शब्द का वाच्यार्थ 'सौरम और सौन्दर्य-युक्त 
विकसित कमल इस अर्थान्तर में सक्रमण करता है । 


दूसरे प्रकार के अनुपयोगी वाच्यार्थ का उदाहरण-- 


श्याम घटा घन घोर भल्तें उमर यह जोरन सो चहुँ ओरन, 
सीतल घीर समीर चले भले होहु घनी घुनि चातक मोरन; 


चतुथ स्तवक ११० 


राम हों, मेरो कठोर हियो हों, सहोंगो सबैं दुख ऐसे करोरन, 
हा! हा! विदेह-सुता की दसा अब हो है कहा इनके रकमोोरन ।४०४॥ 
रब 
वर्षाकालिक उद्यीयक सामग्रियों को देखकर जानकीजी के वियोग में 
ओऔरघुनाथजी की यह उक्ति है। इसमें 'राम हो? इस पद के मुख्याथ का 
यहाँ कुछ उपयोग नहीं हो सकता है । क्योंकि, इस वाक्य के वक्ता जब 
स्वयं श्रीराम ही हैं, तब राम हो! कहने की क्या आवश्यकता थी। केवल 
हों सहौंगो' कहनेमात्र ही से वाक्य पूरा हो जाता है। अतः राम हों 
का वाच्याथथ बाधित है | -इसलिये 'राम हों! पद राज्यश्रष्ट, वनवासी, 
जठा-वल्फल धारण करनेवाला ओर प्राणप्रिया जानकी के हरण आदि के 
असच्य दुःखो को सहन करनेवाला क्ररहृदय मैं राम हैँ, इस अथन्तिर 
€ व्यग्याथ ) में सक्रमण करता है | 


सुंदर श्वेत पर्टबर कों कसि के रूद ख्रोनि पे बॉधघि सँवारिए, 
भाल में बाल-सयंक-किरी< हु पतन्नग के गन खाज सुधारिए; 
पापी हजारन तारन की-सी सघारन बात न याहि निहारिए, 
समोहि उधारन को है समौ यह, भागीरथी ! जिय क्‍यों न विचारिए ।४१ 


यह मगवती गड्जा के प्रति परिडतराज की प्रार्थना है। 'मोहि उधा- 
रन को है समो यह, इस वाक्य के प्रकरणगत अर्थ मे यह! शब्द का 
वाच्या्थ अनुपयोगी है । क्योकि, 'मोहि उधारन को है समो' यह है ही, 
फिर “यह पद के वाच्यार्थ की कोई आवश्यकता नहीं रहती है । “यह 
शब्द का वाच्यार्थ 'मै निरन्‍्तर पाप करनेवाला हूँ, ऐसे घोर पातकी के 
उद्घार करने का यहा समय है, इस अशथोन्तर में सक्रमण करता है. 
इसमे व्यग्य यह है कि "मेरे पाप अनिर्वाच्य हैं, कहे नहीं जा सकते; ऐसे 
श्ार पायी का उद्धार करना है! । यहाँ पुनरुक्ति नहीं, किन्ठु जब तक “यह 
शब्द का लक्ष्या्थ ग्रहण नहीं किया जाता, वाच्यार्थ अठुपयोगी रहता है | 


१११ अत्यन्ततिरस्क्तवाच्य ध्वनि 


इन दोनो उदाहरणो में पदगत ध्वनि है। पहले उदाहरण में 'राम हो! मे 
आर इस उदाहरण में 'यह' पद में । 


अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनि 


जहाँ वाच्यार्थ का सर्वथा तिरस्कार होता है, पहाँ 
अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनि होती है | 


इसमें वाच्यार्थ का अत्यन्त तिरसकार किया जाता है। अर्थात्‌ 
वाचय अर्थ को सर्वधा छोड दिया जाता है। इसी से इसे अत्यन्त 
तिरस्कृतवात्ष्य ध्वनि कहते हैं। इस ध्वनि में प्रयोजनवती लक्षण-लक्षणा 
रहती है | यह मी पदगत ओर वाक्यगत दोनो प्रकार की होती है । वाक्य- 
गत का उदाहरणु-- 


सुबरन फूलन की घरा जोरत हैं नर तीन--- 
सूर और विद्या-निषुन सेवा में ज्ु प्रबीन ।४२॥ 


इसका वाच्यार्थ सुबण के फूलों की पृथ्वी को इकट्ठा करना है। न 
तो सुबर्ण के फूलों की कहीं प्रथिवी ही होती है, ओर न प्रथिदी इकट॒ठी 
ही की जा सकती है। अतः वाच्यार्थ का बाघ होने के कारण वाच््यार्थ 
को सर्वथा छोड देना चाहिये । ओर लक्षणा से 'शूर आदि तीनो प्रकार 
के पुरुष अपने बल, अम्यास ओर क्रिया-कोशल से अठुल समृद्धि को 
ग्राप्त करते हैँ? यह लक्ष्यार्थ ग्रहण कर लेना चाहिये। यहाँ शूर-वीरो की, 
विद्वानो की तथा सेवा में प्रवीण सेवकों की प्रशसा व्यग्य से ध्वनित होती 
है । यह ध्वनि अनेक पदों के समूहरूप सारे वाक्य से निकलती है, अतः 
चाक्यगत ध्वनि है । 


चतुर्थ स्तवक ११६ 





पदगत का उदाहरणु-- 
लगि मुख के निःस्वास अन्ध भये आदस" डैँयों, 
लखत न चंद्र-प्रकास छादित परिघ तुषार सो ।छ४शा 
यह हेमनत ऋठ का वन है । वाच्यार्थ तो यह है कि मुख के 

निःश्वास से अन्धे ( मलीन हुए, ) दर्पण के समान ठुपारावइत--कुहरे से 
घिरा हुआ--चन्द्रमा प्रकाशित नहीं हो रहा है| अन्धा तो वही कहा जा 
सकता है, जिसके पहले नेत्र रहे हो या जिसमे नेत्रों की योग्यता हो | 
दर्यण के न तो कभी नेत्र थे, ओर न उसमे नेत्रो की योग्यता ही है। 
उसे अन्घा केसे कह सकते है ? अतः यहाँ अन्ध' शब्द के मुख्य अर्य का 
बाघ होने के कारण सर्वथा छोड़ देना चाहिये, ओर इसका लक्ष्यार्थ 
धप्रकाश-हीन' ग्रहण कर लेना चाहिये । वहाँ प्रयोजनवती लक्षण-लक्षणा 
है। “अ्रन्धा पद मे ध्वनि है; अतः पदगत व्यनि है । 


इस ध्वनि का विपरीत लक्षणा के रूप में भी उदाहरण हो 
सकता है । जैसे-- 


कहि न सकी तब सुजनता ? श्रति कीन्हों उपकार ? 
सखे ! करत यो रहु सुखी जीवहु बरस हजार ।४४॥ 


यह अपकार करनेवाले के प्रति उसके कार्यो से दुखित किसी पुरुष 
की उक्कि है| वाच्यार्थ .भम उसकी प्रशंसा है। किन्द्र अपकारी के प्रति: 
प्रशंसात्मक वचन नहीं कहे जा सकते, अतः वाच्यार्थ का बाघ है | इस: 
वाच्यार्थ को सर्वंथा छोड़कर विपरीत लक्षणा से उपकार का 'अपकार'+ 
सुजनता का डुजनता” ओर सखे का “शत्र लक्ष्यार्थ अहण किया जातः 
है। इसमे अत्यन्त अपकार करना ब्यंग्यार्थ है | 


कट ५धचआ अल 5० ४ढ५४औ तल तल 3 जध्जिआलिबश अऑज अ+औ £?४ 


९ दर्षण । 


११३ अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनि 


“मस्को तुम एक, अनेक तुम्हें, उनहीं के विवेक बनाय बहौ , 
इत चाह तिहारी बिहारी, उते सरसाय के नेह सदा निबही ;. 
अब कीबो “मुबारक' सोई करो श्रनुराग-लता जिन बोय दही , 
घनस्याम ! सुखी रहो आनंद सौं, तुम नीके रहो, उनही के रही 7” 


अन्यासक्त नायक के प्रति नायिका के वाक्य हैं। वाच्याथ में तो 
“सुखी रहो), 'उनही के रहो” कहा गया है, किन्तु लम्पट नायक के प्रति 
नायिका द्वारा ऐसा कथन असम्भव है | अतः वाच्याथ का बाघ है| इस 
वाच्यार्थ के विपरीत 'उसके पास न रहो” इत्यादि लक्ष्या्थ समझना 
चाहिये । 


वाच्याथ से व्यंग्यार्थ विपरीत होने पर भी अत्यन्ततिरस्कृतवाक्ष्य 
घ्वनि कहीं नहीं भी होती है। जैसे-- 


इत न स्वान वह आज, अहो भगत ! निधरक बिचर , 
हत्यो ताहि रूगराज, जो या सरिता-तट रहतु ॥8४॥ 


किसी कुलय स्त्री के सब्लेत कुज्ञ के समीप कोई भक्त पुरुष पुष्प लेने 
के लिये आने जाने लगा था । कुलणा अपने कुत्ते को उसके पीछे लगा 
दिया करती थी, जिससे वह तंग आकर वहाँ आना छोड दे, ओर उसके 
एकान्त स्थल में विष्न न हो | इस पर भी वह आता रहा तो एक दिन 
उस कुलण ने कहा--“भक्तजी, अब आप यहों निःशद्ल आया करे, 
क्योंकि जो कुत्ता तुम्हें तंग किया करता था, उसे इसी वन के निवासी 
सिंह ने मार डाला है” | 'निधरक बिचर के कथन से वाच्याथ में उसे 
आने के लिये कहा गया है, किन्तु कुत्ते से डरनेवाले उस पुरुष को उस 
कुलण के कहने का अभिप्राय यह है कि “जो कुत्ता तुम्हें तंग किया 
करता था वह तो मारा गया, पर जिसने उसे मारा है वह सिह इस नदी- 
तट के वन में ही रहता है, कभी उसकी भपेट में आ गए, तो मारे 


चतुर्थ स्तवक ११४ 





जाओगे! | निश्कर्ष यह है कि वाच्याथथ में तो आने को कहा गया है, पर 
व्यंग्यार्थ में आने का निषेध है। अर्थात्‌ वाच्यार्थ से व्यंग्यार्थ विपरीत 
है | यहाँ न तो विपरीतलक्षणा ही है ओर न यह लक्षणा-मूला अत्यन्त- 
तिरस्क्ृतवाच्यध्वनि ही। विपरीत लक्षणा तो वहीं हो सकती है जहाँ 
वाच्यार्थ के अन्वयय का या वक्ता के तात्पय का बाध होने के कारण 
वाक्य कहने के साथ ही वाच्यार्थ विपरीत अर्थ में अर्थात्‌ लक्ष्यार्थ मे 
बदल जाता है। जैसे, उपरोक्त हमको तुम एक" एडड ? इत्यादि 
उदाहरणो से स्पष्ट है। यहाँ मुख्यार्थ का बाघ नहीं है, क्योकि वाच्यार्थ 
असम्भव नहीं है । यहाँ तो प्रकरणादि का विचार करने पर वाच्यार्थ 
"विपरीत अर्थ मे परिणत होता है | अ्रतः ऐसे स्थलो में लक्षणा-मूला ध्वनि 
-नहीं होती, किन्तु अभिधा-मूला ध्वनि हुआ करती है । 


अभिधा-मूला ध्वनि 
अभिधा-मूला ध्वनि की “विवज्षितअन्यपरवाच्य” ध्वनि 


७ धरे 


कहते है | 


इसमे वाच्यार्थ की विवज्ञा रहती है। अर्थात्‌ वाच्यार्थ भी वाज्छुनीय 
रहता है, पर वह अन्यपरक अर्थात्‌ व्यग्यनिष्ठ होता है । इसीलिये यह 
पविवन्नितअश्रन्यपरवाच्य ध्वनि कही जाती है । 


इस ध्वनि मे वाच्ष्यार्थ का बोध होने के बाद क्रमशः व्यग्यार्थ की 
ध्वनि निकलती है। जैसे, दीपक अपने स्वरूप को प्रकाशित करता हुआ 
अन्य वस्तुओं को भी प्रकाशित करता है | इसम वाच्या्थ और व्यग्याथ 
का क्रम कहाँ तो स्पष्ट प्रतीत होता है ओर कहीं स्पष्ट प्रतीत नहीं होता । 
इसलिये इसके मुख्य दो भेद हैं--( १) असलक्ष्यक्रमव्यग्य, ओर 
'( २ ) संलक्ष्यक्रम व्यंग्य । ये दोनो भेद लक्षणा-मूला ध्वनि के इसलिये 


५१५ असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि 





नहीं हो सकते हैं कि उसमें वाचयार्थ की विवज्ञों नहीं रहती--चाक््याथ 
उपयोग के योग्य ही नहीं रहँता, अतः .वाचय अर्थ के साथ व्यंग्यार्थ का 
क्रम लक्षित या अलक्षित होने का वहाँ प्रश्न ही नहीं है । 


असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि 


जहाँ वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ का पौर्वापर्य क्रम 
असंलक्ष्ष हो' वहाँ असलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्यनि होती है । 


अर्थात्‌ जहां वाच्यार्थ ओर व्यग्याथ में पोर्वापय--पहले-यीछे का-- 
कम सलदूय होता है--भले प्रकार प्रतीत होता है, अर्थात्‌ वाच्या्थ का 
बोध हो जाने के बाद क्रमशः व्यग्याथ की ध्वनि निकलती है, वहाँ 
संलक्ष्यक्रमव्यग्य होता है। असलक्ष्यक्रंमव्यग्य में बाच्यार्थ ओर व्यग्याथ 
में पहले-पीछे का क्रम प्रतीत नहीं होता है। इस ध्वनि मे रस, भाव, 
रसाभास ओर भावाभास आदि व्यग्यार्थ होते हैं। ये रस भावादि जो 
व्यग्याथ हैं, विभावातुभावादि ( जो वाच्यार्थ होते हैं ) के द्वारा ध्वनित 
होते हैं । विभावादि ओर रस-भावादि का पीर्वापर्य क्रम भले प्रकार प्रतीत 
नहीं हो सकता है । यद्यपि विभाव, अनुमाव आदि कारणों के वाच्याथ का 
बोध होने के बाद ही रस-भावादि की प्रतीति होती है। अतः कारण-कार्य 
रूप पोर्वापयं-क्रम तो असलक्ष्यक्रमव्यग्य व्वनि मे भी रहता है, किन्दठु. 
अल्पयकालिक होने के कारण 'शतप्त्र-पत्रभेदन * न्याय के अनुसार वह 


१ भली प्रकार से प्रतीत न हो। 

२ शतपत्र-पत्रमेदून न्‍्याय यह है कि जब शतपत्र ( कमल ) के 
सैकड़ों पर्तों को एक के ऊपर एक रखकर उनमें सुई की नोक से छेद 
फिया जाता है, तब यद्यपि उन पत्तों का छेंदन एक के बाद दूसरे का 
क्रमशः ही होता है, पर वह कार्य इतना शोध्र होता है, जिससे सब पत्तों 


चतुर्थ स्तवक ११६ 





( क्रम ) लक्ष्य में नहीं आ सकता । इसीलिये इसे “असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य' 

कहा जाता है। यदि इसमे क्रम का सवंधा अमाव होता तो इसे अक्रम 
व्यंग्य कहा जाता । सम! उपसर्ग के प्रयोग का यहाँ यही तालय॑ है कि 
क्रम भले प्रकार नही जाना जाता है | 


“हरि-सुत "-श्रोन हर-श्रोन* हरि3दे है कर, 
घरी-घधरी घोर धरु-घंट  घननादे 
भूरि रत भूरि भट-भीर भार भूमि-भार , 
भूधघर भरंगे भिंदिपाल भननाटे तें। 
खप्पर खनक हों न खेटक के खप्पर हॉँ, 
खेटको ४ खिसकि जेहें रूग्ग” खननादे ते; 
भूतलि जेहेँ जानघधर६ जान» को चलान, बान--- 
बानघर* सेरे पान” बान सननाटे तें।?४६॥ 


श्ूद 


० 


ये कण के वाक्य हैं । श्रीकृष्ण ओर अजु न आलम्बन हैं। उनके: 
द्वारा भीष्मादि के पतन का स्मरण उद्दीपन है। कर्ण के ये वाक्य 
अनुभाव हैं| हषं, गवे, ओत्सुक्यादि व्यभिचारी भाव " हैं। इनके द्वारा 
में सुई एक ही साथ छोर करती हुईं-सी मालूम होती है--यह प्रतीत 
नहीं होता कि उनमें से कौन पहले और कोन पीछे बिंध गया है; अतः 
वह अ्रल्पकालिक क्रम जाना नहीं जा सकता | १ इन्द्र का सुत अजु न | 
२ रथ के घोडों के कानों पर। ३ श्रीकृष्ण । ७ ढालों को धारण 
करनेवाले । <& तलवार । ६ रथ को धारण करनेवाले सारथी--- 
श्रीकृष्ण । ७ रथ | ८ बाणों को धारण करनेवाला श्रर्थात्‌ अजुन ॥ 
< हाथ । १० आलस्बन, उद्दीपन, अ्नुभाव ओऔर व्यभिचारियों 
का स्पष्टीकाण श्रागे किया जायगा | 


११६ ' “अनुसावः 





भावों को ये विभावन करते हँ--आस्वाद के योग्य बनाते हैं, अतः स्सः 
के उत्पादक ( कारण ) होने से इनको विभाव कहते हैं | 


विभाव दो प्रकार के होते हैं--( १) आलम्बन विभाव ओर 
(२ ) उद्दीपन विभाव | ह 


आलम्बन विभाव । 
जिसका सका आलम्बन, करके स्थायी भाव भाव ( रति आदि मनोविकारः) 


उत्चन्न होते हैं, वे आलम्बन विभाव हैं हा] आप 
ब , वे आलम्पन विभाव हैं। जैसे, »ज्ञार-रस में रति स्थायीः 


भाव के नायक-नायिका आलम्बन होते हैं। आलम्बन विभाव प्रत्येक रस 
के भिन्न-मिन्न होते हैं। 
उद्दीपन विभाव । 

रति आदि मनोविकारों को जो अतिशय _ उद्दीपन करते हैं--बढ़ाते 
हैं---वे उद्दीपन विभाव कहे जाते हैं। जैसे,>छज्जार-रस मे सुन्दर वेष-भूषणादि 
की रचना, पुष्प-वाटिका, एकान्त स्थान, सुन्दर केलि-कुज्ल, कोकिलादि का 
मधुर आलाप, चन्द्रोदय, अ र शीतल धीर समीर, आदि रति के बढानेवाले 
होने से उद्दीपन विभाव कहे जाते हैं । उद्दीपक पदार्थ, स्थायी भाव के 
उत्पादक कारण नहीं, केवल उद्दीपक हैं, किन्त॒ उत्पन्न स्थायी भाव को, 
इनके द्वारा यदि उत्तेजना न मिले तो वह अनुत्पन्न के समान ही है। जैसे, 
उत्पन्न अड्कुर को जले न मिलने से वह नष्ट हो जाता है। उद्दौपन 
विभाव भी प्रत्येक रस के भिन्न-भिन्न होते हैं । । 


( २ ) अनुभाव 
विभावों के बाद जो भाव उत्पन्न होते हैं, उन्हें अनुमाव कहते हैं ।- 


ये उत्पन्न हुए स्थायी भाव का अनुमव कराते हैं? । जैसे, अद्भाररस में 


/४७७४६०४४४६० 
७>७>>दर9५ध९ञ3ग५७८ध3त ५७०७८ ७८ध७३ ९२ ०ञ७तभतण 2७+/ै++ ४४७०++ ४४ 


१ “अनुभावयन्ति इति अनुभावा:। 


चतुर्थ स्तवक 0 





सांयिका आलम्बन ओर चन्द्रोदय आदि उद्दीपन विभावों द्वारा नायक के 
छुदय में रति ( मनोविकार ) उत्पन्न और उद्दीपित होती है, किन्तु उसको 
अकट करने वाली कठाक्ष ओर श्र -च्षेप एबं हस्तसश्चालनादि शारीरिक 
चेष्टाएँ जब तक न हो, तब तक उस अनुराग का उनको परस्पर या समीपस्थ 
अन्य जनों को कुछ ज्ञान नही हो सकता । रति आदि स्थायी भाव काव्य 
मे शब्दों द्वारा ओर नायक मे आलम्बन विभावों की चेशओ द्वारा प्रकट 
होते हैं) । इन चेशओरं की ही अनुभाव संज्ञा है। अनुभाव असख्य हैं | 
जिस-जिस रस में जो-जो अनुभाव होते हैं, उनका दिग्दशन रसों के प्रकरण 
से कराया जायगा । 


सात्विक भाव । 


...सच्च से उत्पन्न भावों को सात्विक कहते हैं । ये आठ प्रकार के होते 
हैँ--( १ ) स्तम्भ, (२ ) स्वेद, (३ ) रोमाश्च, ( ४ ) स्वस्भमड्ध (५) 
हल दर पु तः न 

वेपथु ( कम्प ); ( ६ ) वेवण्य, (७ ) अश्रू ओर ( ८) प्रलय । इनकी 
सात्विक संज्ञा क्यो है, इसकी विवेचना साहित्याचारयों ने बहुत कुछ की 
है। आचार्य मम्म ने तो इनका एथक नामोल्लेख भी नहीं किया है--- 
सम्भवतः उन्होने इन्हें अनुभावो के अन्तर्गत माना है | 


विश्वनाथ का मत है कि सात्तिक भाव रस के प्रकाशक 
होने फे कारण अनुभाव ही हैं। किन्तु, गोवलीवर्द 





4 अ्ज्लुभावों भावबोधक; । 


१२१ साक्तवविक भाव 





न्याय” के अनुसार ये पथक्‌ भी कहे जा सफते हैं? | महाराजा भोज 
कहते हैं कि सत््व का अथथ रजोगुण ओर तमोगुण से रहित मन है। 
सत्त्व के योग से उत्नन्न भाव सात्त्विक कहे जाते हैं? | प्रश्न यह होता है 
कि क्‍या अन्य भाव सत्त्व के विना ही उत्मन्न होते हैं ? भरत सुनि कहते 
हैं--/हों, ऐसा ही है। सत््व मन-प्रभव है--समाहित मन .,से सत््व की 
निष्पत्ति है। मनोविकार द्वारा उत्तन्न रोमाश्चन, अश्र॒ ओर वेवण्य आदि 
जो स्वभाव हैं, वे अन्य-मनस्क होने पर उलन्न नहीं हो सकते । जैसे, 
रोदनात्मक दुःख ओर हर्षात्मक सुख, दुःख ओर सुख के विना केसे उत्पन्न 
हो सकते हैं ४? १ हेमचन्द्राचार्य कहते हैं--“प्राण ही सत्त्व है। उससे 
उत्पन्न भाव सात्त्विक हैं । प्राण में जब एथ्वी का भाग प्रधान होता हैं, 
तब स्तम्म, जल का भाग प्रधान होता है, तब वाप्प (अ्रश्र ), तेज का 
भाग तीव्रता से प्रधान होता है, तब स्वेद ( पसीना ), ओर जब वह 
तीत्रता-रहित प्रधान होता है, तब बेवण्ये, आकाश का भाग प्रधान होने 
पर प्रलय, ओर वायु का स्वातन्त्र्य होता है, तब उसके मन्द, मध्य और 





१ जैसे, गाएँ आ गईं, बेल भी आ गया! । गाएं कहने मात्र से 
ही बैल का आ्राना भी जान लिया जाता है, पर गायों की अपेक्षा बैल की 
प्रधानता सूचन करने के लिये बैल का प्रथकू कथन किया जाता है। 
इसी को “गोवलीवद्द” न्याय कहते हैं। इसी प्रकार साच्विक भाव अनुभावो 
के श्रन्तर्गत होने पर भी सास्विक भावों की उत्कृष्टता सूचन करने के 
लिये इनको सात्तिषक भाव कहते हैं । 


२ साहित्यदपंण, परिच्छेद ३१३४-३९ । 


३ 'रजस्तमोम्या मस्पृष्ट मनः सच्चमिहोच्णते । नि्र तयेवस्य तथ्यो- 
शगात्प्रभवन्तीति सात्तिकाः !!--सरस्वतीकण्ठाभरण, <€|२०॥४ । 


४ नाव्यशासत्र, गायकवाढ-संस्करण, पृष्ठ ३७६ | 
६ 


चतुथ स्तवक १२२ 





उत्कृष्ट आवेंश से रोमाथ्, कम्प एवं स्वस्भेद होता है। और शरीर के 
धर्म जो स्तम्मादिक बाह्य अनुभाव हैं, वे इन आन्तरिक स्तम्भादिक 
भावों की व्यज्ञना करते हैं??? | इनके लक्षण नाय्यशासत्र के श्रनुसार* 
इस प्रकार हं--- 

(१) स्तम्स--यह हर, भय, रोगं, विस्मय, विषाद और रोषादि 
से उत्पन्न होता है। इसमें निस्सश, निष्कम्प;, खड़ा रह जाना; शुक््यता 
ओर जडता आदि अनुभाव होते हैं । 

(२) स्वेद ( पसीना )--यह क्रोध, भय, हष, लजा, दुःख, श्रम, 
रोग, उपघात ओर व्यायाम आदि से उत्पन्न होता है। इसमें शरीर के 
पसीने आना आदि अनुभाव होते हैं। 

. (३) रोसाव्य--यह स्पर्श, श्रम, शीत, हे, क्रोध ओर रोगादि से 
उत्पन्न होता है। इसमे शरीर का कण्टकित होना, पुलकित होना ओर 
रोमाश्चित होना अनुभाव होते हैं | 

( ४ ) स्व॒र-भज्ञ--यह मय, हुं, क्रोध, मद, इद्धावस्था और रोगादि 
से उत्पन्न होता है। इसमें स्वर का गद्गद होना, आदि अनुभाव होते हैं। 


( ४ ) वेपषथु ( कम्प )--यह शीत, क्रोध, भय, श्रम, रोग और 
ताप आदि से उत्पन्न होता है। इसमें कम्पादि अनुभाव होते हैं। 


ध्५ यु < 
(६ ) ववण्यं--यह शीत, क्रोष, भय, श्रम, रोग ओर ताप आदि 


से उत्पन्न होता है। इसमे मुख का वर्ण बदल जाना, आदि अनुभाव 
होते है । ' 


(७) अश्रु--यह आनन्द, अमर्ष, घुआओँ, जेंभाई, भय, शोक, 
अनिमेष-प्रेत्ञण ( विना पलक लगाये देखना ), शीत और रोगादि से 


0८४ ७१७० ७३ ४त 3 वत 3०2 +झ>2 ५ध थे. 


$ काव्यानुशासन, अध्याय २, पृष्ठ १८० | शत 
२ नाट्यशासत्र, गायकवाड़-संस्करण, पृष्ठ ३४१-३८२॥। 


०] 


श्२३ सबव्य्वारी भाव 


उतन्न होता है | इसमें नेत्रों से अश्रओं का गिरना ओर उनका पोछुना 
आदि अनुभाव होते हैं । 

(८) प्रलय--यह श्रम, मूर्र्छा, मद, निद्रा, अभिघात ओर मोहादि 
से उत्पन्न होता है | इसमे निश्चेष्ट हो जाना, निष्प्रकम्प हो जाना,' श्वास 
का रुक जाना ओर प्रथ्वी पर गिर जाना, आदि अनुभाव होते हैं । 

स्तम्म ओर प्रलय में यह भेद है कि स्तम्म में चेष्णा करने का ज्ञान 
रहता हैं, किन्तु 'प्रलय” में शरीर जड़ हो जाने के कारण चेश नहीं हो 
सकती । जैसे-- 

स्तम्भ । 

“पाय कंज एकांत में भरी अंक घजनाथ ; 

रोकन को तिय करत, पे कह्ो करत नहिं हाथ।” 
प्रलय । 

“दे चख-चोट अगोट मग तजी जवति चन माहि ; 

खरी विकल कब की परी, सुधि सरीर की नाहि ।” 


(३) सद्जारी या व्यभिचारी भाव 


चिन्ता आदि चित्त की बतियों को व्यभिचारी या 
सञ्चारी भाव कहते हैं । 


ये स्थायी भाव ( रस ) के सहकारी कारण हैं। ये सभी रसों 
में यथासम्मव स्ञार करते हैं। इसी से इनकी सश्चजारी या व्यमिचारी 
सज्ञा हैं) | स्थायी भावे की तरह ये रस की सिद्धि तक स्थिर नहीं रहते । 





१ विविधाभिमुख्येन रसेषु चरन्तीति व्यभिचारिणः (--नाव्यशास्त्र, 
गायकवाड-संस्करण । एष्ठ ३९६ ॥। 


चतुर्थ स्तवक श्र 





अर्थात्‌ ये अवस्था विशेष में उत्पन्न होते हैं और अपना प्रयोजन पूरा हो 
जाने पर स्थायी भाव को उचित सहायता देकर लुप्त हो जाते हैं! । 


निष्कर्ष यह है कि ये जल के भाग यां बुदूबुदो की मॉति प्रकट हो- 
होकर शीघ्र लुप्त हो जाते हैं--बिजली की चमक की भोंति दिखलाई देकर 
ये फट अच्श्य हो जाते हैं । इनकी सख्या रे३ है । 


यह ध्यान देने योग्य है कि सश्चारी भावों की भी, स्थायी माव और 
रस के समान, व्यंग्याथ द्वारा ध्वनि ही निकलती है, ओर वही आस्वादनीय 
होती है । इनका शब्द द्वारा स्पष्ट कथन किया जाना दोष माना गया है*। 
इनके नाम, लक्षण और उदाहरण इस प्रकार हैं-- 


( १ ) निर्वद--वेराग्य के कारण या इष्ट वस्तु के वियोगादि के या 
दारिद्रय, व्याधि, अपमान एवं आज्ञेप आदि के कारण अपने आप को 
धिक्कारने को निवेद्‌ कहते हैं | जहोँ निवेद वेराग्य से उत्पन्न होता है वहाँ 
निवंद शान्त रस का व्यञ्जक होकर शान्त रस का स्थायी माव होता है, 
न कि व्यभिचारी । वेराग्य या तत्त्वजान के विना जहों इष्ट-वियोगादि-जन्य 
उपयु क्त कारणों से निवेद्‌ उत्पन्न होता है वहाँ यह शान्‍्त रस के अतिरिक्त 
अन्य रसों में व्यभिचारी रहता है । क्योकि, जहाँ इष्ट-वियोगादि से निर्वेद 
उत्न्न होता है, वहों शान्त रस की व्यज्जना नहीं हो सकती। निवेद्‌ 
व्यमिचारी में दीनता, चिन्ता, अश्रपात, दीर्ोच्छास ए़॑ं विवर्णतादि 
अनुभाव होते हैं | उदाहरणु--- 








१ “ये तूपकतुमायान्ति स्थायिनं रसमुत्तमस्‌ ; 
उपकृत्य च गच्छुन्ति ते मता व्यभिचारिणः ।?! 


२ इस विषय का विवेचन सप्तम स्तवक में, आगे रसों के दोष-विवेचन 
के प्रस्तड्ठ में, चिस्तार से किया जायगा | 


१२४५ सव्चारी भाव 


“अरब या तनहिं राखि का कीजे | 

सुनु रो सखी! स्थाससंदर बिन बॉटि बिषम-बिष पीजे। 

के गिरिए गिरि चढ़िके सजनी ! स्वकर सीस सिव दौजे ; 

के दुहिए दारुन दावानल जाय ज॑मुन धसि लीजे। 
हुसह बियोग बिरह माधव के कौन दिनहि दिन छीजे ; 
'सूरदास! प्रीतम बिन राधे सोचि-सोचि मन खीजे ।”?४णा 


यहाँ व्रजराज श्रीकृष्ण के वियोग में श्रीराधिकाजी द्वारा अपने जीवन 
का तिरस्कार किए जाने मे निरवेंद की व्यज्ञना है। 


कबहूँ नहिं साथी समाधि इकंत न काम कलान की जोति जगी ; 
न सुनी भगवंत कथा न तथा रप्त की बतियाँ झ्दु प्रेम पगी। 
सहि कष्ट न जोग की आँच तयो न वियोग की आग हिए सुलगी ; 
,यह वादि ही वैस वितीत भईं गल सेली लगी न नवेली लगी ।४८ 


यहाँ व्यथ जीवन व्यतीत होने से उत्पन्न निर्वेद की व्यक्षना है | 


( २ ) ग्लानि--आधि ( मानसिक ताप ) या व्याधि ( शारीरिक 
कष्ट ) के कारण शरीर का वेवरण्य ( अद्भों की शिथिलता ) ओर कार्य 
में अनुत्साह आदि अनुभावों को उत्पन्न करनेवाले दुःखों को ग्लानि 
कहते हैं | उदाहरण-- 

“सूत्ती किसललय-सयन पे जिमि नव ससि की रेख ; 
आयो पिय आदर कियो केवल मधुरहि' देख ।॥”?४धा 

यहाँ विरह-जनित सन्‍्ताप से तापित नायिका द्वारा विदेश से आए 
हुए. अपने पति का केवल मधुर कटाक्षु से सम्मान किए. जाने में ग्लानि 
भाव की व्यक्षना है | 


यों कहि अरज्॒न अ्रति विकल समुझ्ति महा कुलहान 
बेब्यो रथ रन-विमुख हो छाड़ि दिये घनुबान |?९०॥७ 


चंतुथ स्तवंक १२६ 





यहों अजन के रण-विमुख होकर धनुषबान छोड कर बेठ जाने 
में ग्लानि की व्यक्षना है । पक 

(३ ) शक्ला-मेरा क्या अनिष्ट होनेवाला है! इस प्रकार की 
चित्तवृत्ति को 'शड्भा' कहते हैं | इसमें मुख वैवरय, स्वर-मंज्ञ, कम्प, ओ£8 
ओर करण्ठ का सखना, आदि अनुभाव होते हैं । 


उदाहरणु--- 


“हे मित्र, मेरा मन न-जाने हो रहा क्यों ब्यस्त है ; 
इस समय पल्-पल में मुझे अ्रपशकुन करता त्रस्त है। 
तुम धर्मराज-समीप रथ को शीघ्रता से ले चल्लो ; 
भगवान मेरे शत्रुओं की सब दुराशाएँ दलों /7४१॥ 


महाभारत में संसप्तकगणों के युद्ध से लोगते समय श्रीकृष्ण के 
अति अजु न के ये वाक्य हैं | इसमे 'शड्डा' की व्यक्षना है । 'शड्ला” में 
भय आदि से उत्पन्न कम्प होता है | चिन्ता में भय नही होता है। जैसे-- 
“अरब छहो है कहा अरधिंद सो आनन इंदु के हाय हवाले परथणो , 
इक मीन बिचारो विंध्यो बनसी घुनि जाल के जाय दुमाले परथो ; 
“पदमाकर! भाषे न भाषें बने जिय केसो कछूक कखाले परथो , 
मन तो मनमोहन के सेंग गो, तन लाज-मनोज के पाले परयो ।”२२ 


यहाँ चिन्ता है | इन दोनो में यही भेद है । 


|. (४) असूया--दूसरे का सौभाग्य, ऐड्वर्य, विद्या आदि का 
उत्कष देखने से या सुनने से उत्पन्न चित्तवृत्ति को असया कहते हैं । इसमें 





$ शक्का की स्पष्टता सें कहा है---'इयं तु भयाण््‌ त्पादनेन कम्पादि- 
कारिणी, नतु चिन्ता ।?--रसगद्भाधर, पृष्ठ ८० 


१२७ सब्चारी भाव 


अआवज्ञा, श्र्‌ कुटी चढाना, ईष्यों के वाक्य कहना, दूसरे के दोषों को प्रकट 
करना, आदि श्रनुभाव होते हैं । 


उदाहरण--- 
अद्लि ! फितव सख्त! क्‍यों पाद छूता हमारे ; 
विरह-विकलिता हैं, मानिनी हैं न प्यारे! 
श्रनुनंग यह तेरा है सुहाता न, जा रे; 
प्रिय-प्रणयिनि है वो, तू उसे हो रिममा रे ।६३॥ 


अ्रमर के प्रति विरहिणी त्रजाड़नाओं के इन वाक्यों में कुब्जा के 
एविषय में असूया की व्यञ्जना है। 


“सुघर सलोने स्यामसुद्र सुजान कान्ह, 
,. करुनानिधान के वसीठ बन आये हो। 

प्रेम पन धारी गिरघारी को संदेसो नाहीं, 

होत है ऑदेसोी मूठ बोलत बनाये हो॥ 
ज्ञान-गुन-गौरव-गुमान भरे. फूले. फिरो, 

बंचक के काज पे न रंचक बराये हो। - 
रसिक-सिरोमनि को नाम बदनाम करो, 

मेरी जान ऊघो कूर कूबरी पठाये हो ॥”#श॥। 


गोपी जन्नों की उद्धव के प्रति इस अक्ति में कुब्जा के विषय में असया 
की व्यक्षना है। 


है वे वृद्ध विचार-शील न, वृथा कैसी बढ़ा दी कथा, 

गाते हैं वह ताढ़िका-बध श्रहो !स्त्री-लच्य ही जो न था; 
चीरों को खरदूषणादि, बध भी क्या गण्य युद्धत्व है ९ 

बाली का बचें कृत्य, सत्य कहना, क्‍या उम्र चीरत्व है ११५॥ 


चतुर्थ स्तव॒क श्र्प 





, - ये खुकुलकुमार लव के वाक्य हैं | इनमें श्रीरुनाथजी को अवज्ञाः 
के कथन में असूया की व्यञ्जना है । 


(४ ) सद--मद्रपानादि से उत्पन्न अज्ञ एवं वचनो की स्खलद्गति 
आदि अनुभावो की उत्पादक चित्तद्तत्ति मद है | उदाहरण-- 


डगमगात पग परत भग सिथलित तन दृग लाल ; 
कहन चहत्ु कछु कहतु कछु कीन्ह सुरा यह हाल ।९६॥ 


(६ ) श्रम--मार्ग चलने और व्यायाम आदि से थक जाना श्रम 
है। मुख सूख जाना, श्रंगडाई एवं जेभाई लेना ओर निःश्वास आदि 
इसके अनुभाव हैं। उदाहरणु--- 


“पुर ते निकसी रघुवीर-बधू धरि घीर हिए मग में डग हो , 

मलकी भरि भाज् कनी जल की पढु सूखि गए अधराधर वे; 

फिर बूऊूति है चलिकोब कितो ? पिय, पर्नक्टी करिहो कित द्वी , 
तियकी लखि आतुरता पिय की अखियाँ अति चारू चलीं जल च्वे।”?€ ७ 


यहाँ वनवास के समय श्रीजनकनन्दिनी के थक जाने में श्रम कीं 
व्यज्जना है | 


“घट वहन से स्क्रध नत थे और करतज्ञ लाल , 

उठ रहा था स्वास गति से वक्त-देश विशाल । 
श्रवण-पुष्प-परिमही था स्वेद खीकर-जाल ;, 

एक कर से थी संभाले मुक्त काले बाल ॥7/&दा 


यहाँ घय्वहन से शकुन्तला के थक जाने में श्रम की व्यञ्ञना है | 


ग्लानि प्रधानतः मानसिक आधि ओर शारीरिक व्याधि के कारण 
होती है, ओर श्रम म परिश्रम से उत्पन्न थकावट होती है । 


१२६ सब्चारी भाव 


(७ ) आलस्य--श्रम, गर्भ, व्याधि, जागरण आदि से कार्य करने 
से विमुख होना आलस्य है। इसमें जेंभुआई आना, एक ही स्थान पर 
स्थित रहना आदि अ्नुभाव होते हैं। उदाहरण-- 


“ज्ञीडि-नीठि उठि बेठिहू प्यो प्यारी परभात; 
दोऊ नींद-भरे खरें गरें लागि गिरि जात ।&ध्य 


यहाँ निद्रान्त आलस्य की व्यज्ञना है । 


(८) देन्य--दुःख, दारिद्रय, मन के सन्‍्ताप और दुर्गति आदि 
से उत्पन्न अपने अपकर्ष (दुर्दशा ) के वन में देन्य भाव होता है। 
उदाहरणु--- 

नेंदनंदन के स्मित-आनन पास लगी रहै कान सदा भर जी ; 

अधरामस्तत को रस पान करे ब्जगोपिन सॉन रहे बरजी। 

कर जोरि निहोरि के तोहि कहों मुरली ! सुचु एक यहै अरजी ; 

मुरलीधर सो यह मेरी दूसा कहियो, फिर है उनकी मरजी |६ ० 


यहाँ भगवान्‌ श्रीनन्दनन्दन के मुंहलगी वशी से ससारताप से 
सन्तापित इस दीन की इस प्रार्थना मे यह मेरी दशा' इन शब्दों द्वास 
देन्य की व्यज्ञना है। 
“पांडु की पतोहू भरी स्वजन सभा में जब, 
आई एक चोर सो तो घीर सब ख्वें छुकी। 
कहै 'रतनाकर!ः जो रोइवो हुतो, सो तबे, 
धार मारि बिलखि गुहारि सब रचे खुकी। 
रूटकत सोऊ पट विकट दुसासन है, 
अरब तो तिद्दारी हू कृपा की बाट ज्वे चुकी । 
पाँच पांच नाथ होत नाथनि के नाथ होत, 
हाय ! हों अनाथ होति नाथ ! अरब दो चुकी ॥?६१॥ 


चतुथ ' स्तवक १३०. 


ड्रोपदी की इस उक्ति में देन्‍्च भाव की व्यञ्ञना है। 


-कुछु सेष रहो घर में न, परथो पति खाट पे, बद है अन्ध भयो ; 
सुत को चहिं हाल मिलयो कितरलों जब सो वह हाय ! बिदेस गयो। 
ऋतु-पावल बासन हु गयो फ़ूटि जो ठेल परोसिन पास ख्यो; 
वलखि आरत गर्मिनि पुत्र-बधू दुख सों भरि सास को आयो हियो ।६२ 


यहाँ दारिय-दशा-जनित देन्य की व्यञ्ञना है | 


“उदर भरे की जो पे गोत -की गुजर होती, 
घर की गरीबी मॉहि गाल्निब गठोती ना; 
रावरे चरन अरविंद अनुरागत हों, 
माँगत हों दूध, दही, साखन, सठौती ना । 
याहू ते कहो तो और होतो अनहोतो कहा, 
साबुत दिखात कंत ! काठ की कठौती ना ; 
छुघा-छीन दीन बाल-बालिका बसन-हीन, 
हेरत न होती देव ! द्वारिका पोती ना।”६१॥ 


सुदामाजी की पत्नी के इन वाक्यों में दारिदिय-जन्य देन्य की 
व्यज्ञना है । 


(६ ) चिन्ता--इष्ट वस्तु की अप्राप्ति या अनिष्ट की प्राप्ति, आदि 
से उत्पन्न चित्तद्तत्ति ही चिन्ता है। सन्‍्ताप, चित्त की शूत्यता, कशता, 
अधोमुख आदि अनुमावों द्वारा इसका वर्णन होता है। उदाहरण-- 


सींची भू-सा सुरभित श्रहो वक्त्र तेरा न दीखे ; 

छेंदे मेरा क्शित तनु भो काम के याख तीखे । 
काह केसे श्रब दिवस ये हे प्रिये ! सोच तू में ; 

छाई सारी दिशि घनघटा देख वर्षा-ऋतू में ।६४॥ 


१३१ सब्चारी भाव 





थहाँ यक् द्वारा अपनी वियोग-जनित अवस्था के वर्णन में चिन्ता की 
व्यब्जना है। 


“इन मूँदि भोहन जुरें करतिय राखि कपोल ; 
अवधि बिली आए न पिय सोचत भई अडोल 7” &०॥ 


प्रोषितपतिका नायिका को इस दशा के वणन में चिन्ता की 
व्यज्जना है । 

( १० ) मोह--प्रिय-वियोग, भय, व्याधि ओर शत्रु के प्रतिकार मे 
असमर्थ होने आदि से चित्त का विक्षिस हो जाना अर्थात्‌ वस्तु का यथार्थ 
ज्ञान न रहना ही मोह है। इसका वर्णन चित्त-श्रम, हतचेतना आदि 
अनुभावों से होता है । उदाहरण-- 

“कहती हुई बहु भाँति यों ही भारती करुणामई , 

फिर भी हुईं मुच्छित अहो ! वह दुःखिनी विघवा नई । 
कुछ देर को फिर शोक उसका सो गया मानो वहाँ , 
हतचेत होना भी विपद्‌ में लाभदाई है महा।”&६॥ 
इसमे अपने पति अभिमन्यु के शोक में उत्तरा के हत-चेतना हो जाने 
में मोह की व्यञ्जना है। सुख-जन्य भी मोह होता है” । जेसे--- 
“दूलह श्रीरघुवीर बने, दुलही सिय संदर मंदिर माँहीं ; 

गावत गीत सबे मिलि सुंदरि, वेद जुवा जुरि विप्र पढ़ाँहीं । 

राम को रूप निहारत जानकी कंकन के नग कौ परिद्धाँहीं , 

याते सबे सुधि मूलि गई, कर टेकि रही पल टारत नॉंहीं।?६७॥ 

यहाँ श्रीरघुनाथजी का प्रतिबिम्न अपने कड्डुण के रक्ष में गिरने पर 
जनकनन्दिनी के सुधि भूल जाने में सुख से उत्पन्न मोह की व्यम्जना है। 


$ 'सुखजन्यापि मोहो भवत्ति'--हेमचन्द्र का काव्यानुशासन । 


द्वितीय स्तवक १३९ 





(११ ) स्ृति--पहले के अनुभव किये हुए, सुख एवं दुःख आदि 
विप्रयो का स्मरण ही स्मृति है | 


“है विद्वित, जिसकी लपट से सुरलोक संतापित हुआ; 
होकर ज्वलित सहसा गगन का छोर था जिसने छुआ, 
उस प्रब॒ज्न जतुग्ृह के अ्नल की बात भी मन से कहीं-- 
हे त्ात ! संधि-विचार करते तुम भुला देना नहीं ।” क्षय 


दुर्योधन से सन्धि करने को जाते हुए, श्रीकृष्ण के प्रति द्रोपदी के 
इन वाक्यों मं अपमान-जन्य स्मृति की व्यञ्जना है । 


हे सरसीरुहलोचनि, मोहि बताओ प्रिये 4 कब्रों आवतु है चित ; 
वा गिरि-कानन के बहुरंग विहंग कुरंगन सों अभ्रति सोभित--- 
कुजन के रज-रंजित नीर सु तीर गुदावरि के निकटें जित ; 
मंजुल वंजुल कुजन मे मनरंजन मंज्ञ विहार किए नित ६६ 


जनकनन्दिनी के प्रति भगवानू श्रीरामचन्द्र की इस अक्ति में 
चित्रकूट-विपयक स्म्रति की व्यञ्जना है । 


“केसव” एक समें हरिराधिका आसन एक लसें रँगमीने ; 
आनंद सरों तिय-आनन की दुति देखत दर्पन त्यो दग दीने। 

भाल के लाल में बाल विलोकत ही भर लालन लोचन लीने, 
सासन-पीय स-वासन-सीय हुतासन सें जनु आसन कोने ।??७०॥ 


यहाँ दपण देखते हुए श्रीकृष्ण को राधिकाजी के भाल की रक्तमणि 
म उनका ( राधिकाजी का ) प्रतिबिम्ब देखकर वस्त्रोंसहित श्रीजानकीजी 


की अग्मि-परीक्षा-समय के अग्मि-प्रवेश के दृश्य का स्मरण हो आने 
में स्मृति की व्यक्षना है । 


१३३ सब्चोरी भाव 





“बालम के बिछुरे बढ़ी बालके व्याकुलता विरेहा दुख दान तें ; 
चौपरि श्रानि रची 'नृप शंभु' सहेलिनी साहबिनी सुखदान ते। 
तू जुग फूटे न मेरी भट्ट! यह काहू,कही सखियाँ सखियान तें , 
कंज-से पानि से पासे गिरे,असुत्रा गिरे खंजन-सी अखियान तें ।?७१॥ 


चोपड के खेल मे सल्ली से जुग न फूट! सुनकर वियोगिनी को 
अपनी वियोग-दशा का स्मरण हो आने में दुःख-जन्य स्पृति भाव है। 
पहले उदाहरण मे साहश्य वस्तु देखने पर ओर इसमे श्रवण से, 
स्वरति की व्यक्षना है | 


“पन्चव-पलंग पे प्रभात में मलिन्दु-वृन्द , 

गाता महा सोद से तराना? कुसुमी का था। 
दोड पडता था कलियों के खुलते ही वह , 

ज्ण में ही लुटता खजाना कुसुर्मों का था। 
सांक को घिलम्ब मुरमाने में न होता कभी , 

एक ही दिवस का फिसप्ताना: कुसुम्मों का था। 
आन में बदलती हवा थी कुसुमाकर की , 

बात सें बदलता जमाना कुसुर्मों का था।”७रा। 


यहों कवि द्वारा अपने ग्राम की पूर्व कालिक अवस्था के वर्णन में 
स्मृति भाव की व्यज्जना है | 


“गोकुल्न की गेल गेल गेल गेल ग्वालनि की , 
गोरत के काज लाज-बपस के बहाइबो। 

कहे 'रतनाकर! रिराइबो नवेलिनि को, 
गाइबो गवाहबो श्रो नाचबत्रो नचाहवो। 


१ गीत । २ कहानी | 


चतुथ स्तवक १३४ 


कीबोौ खमहार मनुहार के विविध विधि, 
मोहिनी झदुल संज बॉसुरी बजाइबौ। 
ऊधौी. सुख-सम्पति-लमाज वृजमण्डल् के , 
भूलें हैँ व भूले भूलें हमको भुलाइबो ॥७शा। 
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण की उक्ति में स्मृति भाव की व्यज्जना हे । 


( १२ ) घृति--लोभ, मोह, भय आदि से उत्तन्न होनेवाले उपद्रवों 
को दूर करनेवाली चित्तन्नत्ति धृति है। इसमे प्राप्त, अप्राप्त और नष्ट 
वस्ठुओं का शोक न करना आदि अनुभाव होते हैं | उदाहरण--- 

क्यों संतापित हिय करों भ्जि-भजि घनिकन द्वार; 
मो सिर पर राजत सदा प्रभु श्रीनंदकुमार ।७४॥ 
यहाँ चित्त की चशञ्जलता का दूर होना घृति है। 


हो तुम वित्त सा तुष्ट रु त्यों हम बल्कल चीर सं तुष्ट सदा हैं ; 
है परितोष समान जबे, कहु तो इहि में तब भेद कहा है। 
है जिनको तूसनाकुल चित्त, वही जग मॉहि दरिद्र महा है; 
जो मन होय संतोषित तो फिर को धनवान दरिद्र यहाँ है।णध्षा 
सन्‍्तोष होने पर धनवान्‌ ओर दरिद्री दोनो की समान अवस्था के 
वरणन में यहाँ 'घृति” भाव की व्यञ्जना है। 

( १३ ) ब्रीड़ा--छ्लियो को पुरुष के देखने आदि से ओर पुरुषों 
को प्रतिज्ञा-भद्भ, पराभव एवं निन्दित काय करने आदि से बेवरण्य ओर 
अधोमुख आदि करनेवाली लजा ही त्रीडा है । उदाहरण--- 

“सुनि सुंदर वैन सुधा-रस-साने सयानि है जानकी जान भली ; 
तिरछ्े करि नेन दे सेन तिन्हें समुकाय कछू मुसकाय चली | 
तुलसी? तिहिं. श्रौसर सोहें सबे अवलोकत लोचन-लाइु अली ; 
अनुराग-तढ़ाग में भानु उदे विकसी मनो मंजुल कंज-कली ।?७६॥ 


१३५ सब्चारी भावः 


यहाँ ग्राम-बधुओं द्वारा श्रीरुनाथजी के विषय में यह पूछने पर कि 
“थयह आपके कोन हैं !? श्रीजानकीजी द्वारा नेत्रों की चेष्टा से उनको अपना 
प्राणनाथ बतलाने में त्रीडा की व्यज्जना है। 


नेंद्लाल के प्रेम तू बा ! पगी, उनके बिन तोहि कछू न सुहातु है ; 
तन ओऔ' मन सौंप चुकी सब ही घरचा उनही की सदा मन भातु है । 
फिर काहे को नाहक मेरी भट्ट ! दुग-दान के हेत उन्हें तरसाठु है ; 
सखि, बेचि गयंदहि अंकुस लो रूगरों' करिबो कहा जोग कहातु है ।७७ 


यहाँ प्रेम-कठाज्ष के दान देने को सखी द्वारा दी गई शिक्षा मे 
नायिका-निष्ठ लजा-भाव की व्यञ्जना है । 


५मानी न सानवती भयो भोर, सु सोचते सोह गयो मनभावन' ; 
तेह्डी ते साल कही दुलही! सई बार कुमार कोः जाहु जगावन। 
होंस मनाइबे को जु गयो उडि, पे न गई हिय की अनखावन ; 
पंदमुखी पत्का ढिंग जाय लगी पग-नूपुर पाटी बजावक।”उ८ 


यहों मानिनी नायिका द्वार नायक को जगाने के लिये पर्यक की 
पार्टी का नूपुर से बजाने में स्री-स्वभाव-सुलम अपमान की शड्भा-जनित 
ब्रीडा की व्यञ्जना है । 


( १४ ) चपलता--मात्सर्य, अ्रमर्ष, ईर्ष्या, दष और अनुराग 
आदि से चित्त का अस्थिर होना ही चपलता है। चपलता में दूसरों को 
धमकी देना, कठोर शब्द बोलना और अबविचार पूर्वक उच्छ,डल 
आचरण करना आदि अनुभाव होते हैं | उदाहरण-- 

उत्फुल्ल मंजल अनेक लता बलो हैं 
जो ग्रौ और उपमर्दन योग्य भी हैं। 


मुग्धा विहीन-रज है इल साल॒ती को 
क्यों भृद्ध तू व्यथित है करता कली को ॥७ शा 


चतुर्थ स्तवक ४१३६ 





् 


यहाँ भड्ड' के प्रति इस अन्योक्ति को वर्णन में चपलता की 


ध्यज्जना है। 

( १५ ) हष--इष्ट की प्राप्ति, अभीश्टजनके समागम आदि से 
उत्पन्न सुख हर है | इसमे मन की प्रसन्नता, प्रिय भाषण, रोमाश्, 
गद्गद होना ओर स्वेदादि अनुभाव होते हैं | उदाहरण-- 

“मुगनेनी द॒ग की फरक उर उछाह तन फूल ; 
बिन-ही पिय-आगस उर्सेंगि पलटन लगी दुकूल (!८०ा। 


इसमे वाम नेत्र का फडकना प्रिय-आगम-सूचक समेककर, उत्साह 
से पुराने वस्त्रों को त्यागकर नवीन वस्त्र धारण करने में नायिका के 
हप॑ की व्यञ्जना है । 
“नव गयंद रघुबीर-मन, राज अलान-समान ; 
छूटि जानि बन-गमन सुनि उर अनंद अधिकान ।??८१॥ 


यहा बनवास की आज को सुनकर भगवान श्रीरामचन्द्र के मन की 
अवस्था वणन मे हप॑ भाव की व्यज्जना है | 

( १६ ) आवेग--मयड्जर उत्पात एव प्रिय और अप्रिय बात के 
सुनने आदि से उत्पन्न चित्त की घबराहट आवेग है। इसमे विस्मय, 
स्तम्म, स्वेद, शोघ्र गमन, वेबण्य, कम्म आदि अनुभाव होते हैं 
उदाहरस्णु--- 

“सुनत अ्रवन धारिधि-बंधाना, दससुख बोलि उठा झकुलाना- 


वबॉधे बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस 
सत्य तोयनिधि कंपती उद्धि पयोद्ि नदीस ।”८रशा 


सेतु बॉधने का समाचार सुनकर रावण के चित्त में व्याकुलता होने 
सम आवेग की व्यञ्जना है । यह अप्रिय श्रवसु-जनित आवेग है | 


१३७ सच्चारी भाव 


“८ हा लक्ष्मण हा सीते! दारुण, शअआर्तनाद गूजा ऊपर, 
ओर एक तारक-ला तत्तण टूट गिरा सम्मुख भू पर। 
चौंक उठे सब “हरे ! हरे !” कह हा! मैंने किसको मारा, 
आहतजन के श्रोशित पर ही गिरी भरत-रोदन-घारा | 
दौड पडी बहु दास-दासियाँ, मूर्च्छित-ला था वह जन मौन, 
भरत कह रहे' थे सहलाकर--'बोलो भाई तुम हो कौन! ।”मश्ा 


यहाँ सञ्जीवनी जडी को लेकर आते हुये हनुमानजी के ऊपर मार्ग मे 
राक्षस के भ्रम से छोडे हुए. बाण के लगने पर हनुमानजी का आतंनाद 
सुनकर भरतजी की तात्कालिक अवस्था के वर्णन में आवेग भाव 
की व्यज्जना है । 


(१७ ) जड़ता--इष्ट तथा अनिष्ट के देखने ओर सुनने से 
किंकतंव्य-विमूढ होजाना जडता है | इसमे अनिमिष होकर ( पलक न लगा- 
ऋर ) देखना ओर चुप रहना इत्यादि अनुभाव होते हे | उदाहरण-- 


“आई संग शअभ्रालिन के ननद पठाई नीढि 

सोहत सुहाई सीस इंडुरी सु पट की ; 
कहै 'पदमाकर!ः गेंभीर जमुना के तीर 

लागी घट भरन नवेली नई अटकी। 
ताही समे मोहन सु बॉसुरी बजाई, तामे 

मधुर मलार गाई ओर बवंसीबट की , 
तान लगे लटकी रही न सुधि घूंघट की, 

घाट की न श्रौघट की बाद की न घट की ।८४॥ 


यहाँ वशी की ध्वनि को सुनकर व्रजाद्ञना की दशा के वर्णन में 


जडता की व्यज्जना है । 
५9 


चतुथ स्तवक १३८: 





“कर-सरोज- जयमाल सुहाई, विश्व-विजय-छोभा जनु पाईं। 

९ रे चर 
तन सेकीच मन परम उद्धाहू, गृढ प्रेम लखि पर न काहू । 
जाइ समीप रास-छुवि देखी, रहि जनु कु वरि चित्र-अवरेखी ।“परा' 


यहाँ जयमाला धारण कराने को श्रीरघुनाथजी के समीप गई हुई 
किक री बिक... च् यह प्रः ९ -दशन 
सीताजी की दशा के वर्शन मे 'जडता' की व्यज्ञना है। यह इश्-दशन-जन्य 
जडता है। अनि४"्ट-दर्शन-जन्य जडता का उदाहरणु-- 


गर्व भरे आए प्रथम थकित रहे ढिंग तीर ; 
अनिभिष-दृग देखन लगे वारिधि वानर वीर ॥:६॥ 


यहाँ सीताजी की खोज म॑ गए, हुए वानर वीर द्वारा अगाध समुद्र को 
देखकर ओर उसको पार करना दुःसाध्य समझकर उनकी--दृष्टि के 
स्थगित हो जाने मे जडता की व्यञ्जना है । 


( १८ ) गवें--रूप, घन, बल ओर विद्यादि के कारण उत्तन्न 
अमभिमान ही गर्व है| जहाँ उत्साह-प्रघान गूढ-गव होता है, वहाँ वीर-रस 
की ध्वनि होती हैं। गव मे अविनय ( नम्नता का अभाव ), अवज्ञा आदि 
अनुभाव होते है | उठाहरणु--- 


मम नेनन नील सरोज युनें रु उरोजन कंजकली अनुमानहि ; 
अम बंधुक-फ़ूलन के अधरान रु पानन पद्म स-नाल सु जानहिं । 
मनि-मोतिन चारु युही कबरी लखि बंघुन की अचली मन ठानहि ; 
अतिमंद मिलिंद के व्‌ ढ सखी ! दुरबार घनो दुख देत न सानहिं ।८णां 
रूप-गविता नायिका की अपनी सखी के प्रति इस उक्ति में रूप-जनिढ 
गय की व्यज्जना है | 
“भीपम भयानक पुकारयो रन-भूमि आनि, 
छाई छिति छतन्रिनि की गीति उठि जाइगी | 


१३६ सब्चारी भाव 


कहे 'रतनाकर! रुधिर सौ रुँधेगी धरा, 
लोथनि पे ल्ोथनि की भी ति उठि जायगी ॥ 
जीति उठिजाइगी अ्रजीत पांडपूतनि की, 
भूप दुरजोधन की भीति उठि जायगी। 
केतो प्रीति-रीति की सुनीति उठि जाइगी के, 
आ्राज हरि-पन की अत्ीति उठि जाइगी” ॥८पा 
यहाँ भीष्मजी की इस उक्ति मे गव॑ सज्चारी की व्यब्जना है । 

( १६ ) विषाद--आरम्भ किए, हुए काय की असिद्धि आदि से 
उत्साह-भद्भ ओर अनुताप होना विषाद है। इसमे दीघोंच्छ वास, सनन्‍्ताप 
आदि अनुभाव होते है | उदाहरण-- 

पनिज शक्लि-भर मे आपकी सेवा सदा करता रहा , 

त्रुटि हो न कोई भी कभी, इस बात से डरता रहा । 
सम्मान्य ! मैंने आपका अपराध ऐसा क्या किया , 

जो सामने से आ्रापने उसको निकल जाने दिया। 
में जानता जो पांडवो पर प्रीति ऐसी श्रापकी , 

भ्राती नहीं तो यह कभी बेला विकट संताप की ।?८धा॥ 


शकटाकार व्यूह से अजु न के प्रवेश करने पर उत्साह भद्ग होकर 
द्रोणाचार्य से कहे हुए दुर्योधन के इन वाक्यो में विषाद की व्यज्ञना है । 

“ठाढ़े भएु कर जोरिके आगे, अधीन छ्लो पॉयन सीस नवायो ; 

केती करी बिनती “सतिराम! पे मैं न कियो हठतें मन भायो। 

देखत ही सिगरी सजनो तुम मेरो तो मान महामद छायो ; 

रूठि गयो उठि प्रानपियारो, कहा कहिए तुमहूँ न मनायो ।?६०॥ 


कलहान्तरिता नायिका की इस उक्ति में नायक के रूठकर चले जाने 
पर यहाँ भी विषाद की व्यव्जना है | 


चतुथ स्तबक १४० 





< ऐसेहु बचन कठोर सुनि जो न हृदय बिलगान , 
तो प्रभु विषम-वियोग-दुख सहिहहिं पावर प्रान ।?३१॥ 


श्रीराम-चन-गमन के समय जानकीजी के इन वाक्यों में विषाद 
की व्यञ्जना है । 

( २० ) ओत्सुक्य--अमुक वस्ठु का अरमी लाभ हो, ऐसी इच्छा 
होना ओत्सुक्य है। इसमे वाड्छित वस्तु के न मिलने के विलम्ब का 
असहन, मन को सन्ताय, शीघ्रता, पसीना ओर निःश्वास आदि अनुभाव 
होते है| उदाहरण-- 

दृग-कंजन अंजन श्रॉजि तथा तन सूषन साज़ि कहा करि है; 
मेहँदी एक हाथ लगी न लगी रहिबे दे सखी ! न कछू डरि है। 
अरी ! बावरी का नहिं ,जानत तू , मोहि देखिवे की जु उतावरि है ; 
बजगोपिन के धन प्रान वही अब आय रहे मथुरा हरि है ।|#२ 

यहाँ श्रीकृष्ण के दर्शन की अमभिलापा-जन्य ओत्सुक्य को 

व्यञ्जना है | 

“मानुष होंहु वही 'रसखान! बसों सिलि मोकुल गाँव के ग्वारन ; 

जो पसु होंहु कहा बस मेरो चरें नित नंद की घेनु मस्तारन । 

पाहन होंहु चही गिरि को जो कियो ब्रज छुत्र धुरंधर घारन; 

जो खरा होंहु बसेरो करों वहिं कालिंदी-कुल कदंब की डारन।”&३१॥ 


यहाँ त्रजवास की इच्छा म ओत्सुक्य की व्य्जना है | 
(२१ ) निद्रा-परिश्रम आदि के कारण बाह्य विषयोा से निव्ृवत 
होना निद्रा है। इसमे जेभाई आना, आँख मिचना, उच्छास ओर 
अंगडाई आदि चेशए होती है | उदाहरण-- 
कन्न कालिंदी-कूल कदंवन फूल सुगंधित केलि के कुजन से ; 
थकि कूलन के भकफोरन सो बिखरी अलके कच-पुंजन में । 


१४१ सब्चारी भाव 


कब देखहुँगी पिय अंक मे पोढ़त लाढिली को मुख रंजन मैं ; 
कहियो यह हंस ! वहाँ जब तू नंदनंदन ले कर-कंजन में ।६४॥ 


ललिता की हस के प्रति इस उक्कि में राधिकाजी की निन्द्रावस्था 
की व्यज्ञना है | 


शआ्रायो विदेश ते प्रानपिया, अभिलाष समात नही तिय-गात में ; 
बीत गई रतियाँ जग्रि के रस की बतियाँ न बिती बतरात में। 
आनन-कंज पे गंध-अलुब्ध लगे करिबे अलि गज प्रभात में; 
ताह पे कंजसुखी न जगी वह सीतल मंद सुगंधित बात में ।8% 


यहों रात्रि का जागरण विभाव ओर मुख पर शभ्रमरावली के गुल्नन 
करने पर भी न जगना अनुभाव है, इससे निद्राभाव की व्यज्ञना है | 

( २२ ) अपस्मार--मानसिक सन्‍्ताप के अत्यन्त दुःख से उत्पन्न 
एकव्याधि को अपस्मार ( म्गी रोग ) कहते हैं | अपस्मार एक व्याधि है, 
पर बीमत्स ओर भयानक रस में यह सञ्जारी होता है| उदाहरण-- 


सुनिके श्राए मधुपुरी हरि जदुकुल-अवतस , 
बढ़यो स्वास भूतल परयो श्रति कंपित छो कंस ।£ ६॥ 


यहो कस राजा की दशा के वर्णन मे अपस्मार की व्यञ्जना है । 
वियोग-शज्भार म भी अपस्मार की व्यज्जना देखी जाती है। जैसे-- 


“उधरि परे हैं नोल पल्लव अ्रधर तेसे , 

फेलि रहे साखा बाहु बेसक बहरि परी , 
“'उलियारे! कलिका-कपोल फेन फूलि रहे , 

अल्वकावलि भारी भरे भीर-सी भहरि परी | 
चारों श्रोर छोर कोस-कोर न्रजबाल ठाढ़ी , 

चित्र की-सी काढ़ी वादी सोचति सिहरि परी ; 


चतुथ स्तवक १४२ 





अधिक अधीर ताती तीर की समीर लागें , 
बनिता लता-सी छीन छिति पे छुहरि परी ।?8 ७ 


यहाँ वंशी की ध्वनि से उत्करिठित होकर शारदीय रासलीला के लिये 
आई हुई गोपीजनों को जब श्रीकृष्ण ने घर लोट जाने की आज्ञा दी, 
उस समय की गोपीजनो की दशा के वर्णन में अपस्मार भाव की व्यज्जना 
है। यह प्रिय-वियोग-जनित है । 


( २३ ) सुप्त-ख्वम्त ही सुत कहा जाता है। उदाहरण-- 


सुनु लच्मण ! हा! बिन जानकी के तन-दाहक भे घन ये नभ में ; 
पुनि धीर समीर कदंवबन की अति पीर करे धँसिके तन में। 


हरि के मुख सोवत में निकप्ती पिछली यह बात श्रचानक मे; 
वृषभानुसुता सुनि संकित छो लगी वंक चिलोकिबे ता छिंन मे ।€८ 


इसमे श्रीकृष्ण की स्वप्नावस्था की व्यञ्जना है | 


साँचे हो, बोलो न क_ूठ क्बों, बस छाडौ हमारो पिया ! अ्रब आँचर ; 
प्रेम तिहारो भली विधि सें हम जानती, यो करती जु निरादर-- 
ढारत अँखिन सो अँसुआ, हों लखी वह कंजमुखी पलका पर । 
तेरे बिना निदिया! हमें कौत करावे प्रिया संग सेट इहॉँ पर ॥8 8 


पूव'द्व के वाक्‍्यार्थ के अतुसार कथन करती हुई अपनी .मानवती 
प्रिया को स्वप्न मे देखकर किसी प्रवासी का निद्रा के प्रति कथन है। 
इसम स्पप्त की व्यब्जना है । 


( २४ ) विबोध--निद्रा दूर होने के बाद या अविद्या के नाश होने 
के बाद चेतन्य-लाम होना विबोध हे | उदाहरणु-- 


तब प्रसाद सब मोह सिटि भो स्वरूप को ज्ञान ; 
गत-संसय ग्रोविंद ! तव करि हों वचन प्रसान ।६००॥ 


२१७४३ सच्चचारी भाव 


यहाँ मोह-जन्य अविद्या के नष्ट होने पर जान प्राप्त अजु न के इस 
चाक्य में विव्रोत्र की व्यञ्जना है। 


“विषया पर-नारि निम्ता तरुनाइ सुवाह परयो अनुरागहि रे , 

यम के पहरू दुख, रोग, वियोग विलोकत हू न विरागहि रे । 
ममता-बस ते सब भूलि गयो, भयो भोर महाभ्रय भागहि रे , 
जरठाह-दिसा रवि-काल डयो, अजहूँ जड जीव ! न जागहि रे ।!१०१॥ 
श्रीगोसाई जी के इस कथन मे विबोध की व्यञ्जना है । 


(२४ ) अमषे--निनन्‍्दा, आक्षेप ओर अपमान आदि से उत्न्न 
चित्त का अभिनिवेश अमर्प है। इसम नेत्रों का रक्त होना, शिरःकम्प, 
अ्रभज्ञ, तर्जन और प्रतिकार के उपाय, आदि चेशएं दोती हैं। 
उदाहरणु-- 


“ब्रिया-सात्र ताडका, दीन ह्विजराम बिना दल , 

मुग सभीत, मारीच बंध सु तिहिँ कहां कहा बल । 

सप्त ताल जड़ जोनि दुद सी झत्तक देह डगि, 

बाली साखास्ूग वराक हति गत जु तिहि लगि। 
को जयो वीर ते जुद्ध करि, मिध्या अहमिति बहत मन ; 
कोदंड-बान संघान कर, रे काकुस्थ ! सेमारि रन ।?१०२॥ 


भगवान्‌ श्रीरामचन्द्र के प्रति रावण का यह त्जन है | इसमे अमर्ष 
की व्यञ्जना है । 


“खुले केस रजस्तवला सभा बीच दु'सासन , 
लायो सो पुकार रही सारे सभाचारी को; 

आदि आपो हारथो किचो आदि सोकों हास्यो तृप , 
करन बिगारी बात बिकरन सुधारी को। 


चतुर्थ स्तवक १४४ 





भीम कहै ऐच्यो चीर तेई भुज एऐंचें जेहै , 

दिखाने है जंघा सो दिखे हों तोरि डारी को ; 
द्ुपददुलारी ! खुली लटें कर देहों सारी, 

एक नृप-नारी ना अनेक नृप-नारी को।?१०१॥ 


दुःशासन द्वारा द्रॉपदी के चीर्हरुण के समय द्रोपदी के प्रति 
भीमसेन के इन वाक्यो मे अ्मप की व्यञ्जना है । 

क्रोध भाव (जो रोड रस का स्थायी भाव है ) ओर इस अमर्ष 
भाव में यह भिन्नता है कि क्रोध की कोमलावस्था ( पूर्वावस्था ) अमर 
है, ओर उसकी उत्कट अवस्था क्रोध । 


(२६ ) अवहित्था "--लजा आदि से उत्पन्न हषांदि भावों का 

शो ८९ आप बज भर ( ४७» कः 
छिपाया जाना अवहित्था है | किसी बहाने से दूसरे कार्य में संलग्न हो 
जाना, मुख नीचा कर लेना आदि इसके अनुभाव होते हैं । उदाहरण-- 


सुनि नारद की बात तात निकट छहो नमित सुख; 
उसा कमल के पात कर उठाय गिनबे लगी ।॥१०४४ 


नारदजी द्वारा भगवान्‌ शड्भर के गुण सुनकर जो हप॑ हुआ, उसे 
पिता के सम्मुख लजा के कारण नम्रमुखी होकर पावतीजी द्वारा कमल के 
पत्रा की गणना के बहाने से छिपाए जाने मे अवहित्था की व्यञ्जना है । 


“क्ंपित छह तुब नास सुनि हिमगिरि-गृहन विपच्छ ; 
कहत सीत श्रति है तऊ स्थल यह सुंदर स्वच्छु ।7१०९॥ 
यह किसी कवि द्वारा राजा की प्रशंसा है। राजा के भय से हिमालय 





३ न-वहिस्थं चित्त येनः | पर्थात्‌, जिससे चित्त वहिस्थ न हो, 
उसे अवहिस्थ कहते टै--हेमचन्द्र का काव्यानुशासन, पुष्ठ६० । 


१४ सज्ज्वारी भाव 


की गुफा में जाकर छिपे हुए शत्रुओं द्वारा यह कहकर कि हिमाचल पर 
बडा शीत है, भय-जनित कम्प को छिपाया गया है । 


(२७ ) उग्नता--अपमान आदि से उत्पन्न होने वाली निर्दंयता ही 
उमग्रता कही जाती है। इसमे बध, वन्ध, भत्संन ओर ताडन आदि 
अनुभाव होते हैं | अमष ओर उग्रता मे यह भेद है कि अमप निदयता 
रूप नहीं है, पर उम्रता निदंयता रूप है। क्रोध ओर उप्रता में यह 
भिन्नता है कि क्रोध स्थायी भाव है, ओर उग्रता सजख्जारी भाव अर्थात्‌ 
जहाँ यह भाव स्थायी रूप से हो बहाँ क्रोध ओर जहाँ सम्वारी रूप से हो 
वहाँ उग्रता कही जाती है" | उदाहरण--- 


“मातु-पितहि जिन सोच बस करसि महीपकिसोर , 
गन के अर्भक दुलन परसु मोर अति घोर ।?१०६॥ 


यहाँ लक्ष्मणजी के प्रति परशुरामजी के वाक्य मे उग्रता माव की 
व्यज्ञना है । किन्तु-- 


“तत्र सप्त रथियों ने चहाँ रत हो महा दुष्कर्म में ; 
मिलकर किया आरंभ उसको बिद्ध करना मर्म में। 
कृप, कर्ण, दु.शासन, सुयोधन, शकुनि सुत-युत्त द्वोण भी ; 
उस एक बालक को लगे थे मारने बहुविध सभी ।?१०७॥ 


अभिमन्यु पर सात महारथियों का एक साथ प्रहार करने मे यहाँ क्रोध 
स्थायी रूप से होने से रोद्र रस की व्यज्ञना है--न कि उम्रता सब्चारी । 





३ 'तस्य स्थायित्वेनास्थाः संचारिणीत्वेनेव भेदात्‌।! रसगद्जाघर, 
पृष्ठ ६० । 


चतुर्थ स्वचक १४६ 





“भरत कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोहीं ॥ 
जो सुनि सर अस लागु तुम्हारे | काहे न वोलेहु बचन बिचारे ॥ 
देंहु उतर अरु कहहु कि नाहीं। सत्यसिंधु तुम रघुकुल माहीं 0 
सत्य सराहिं कहेहु वर देना। जानेहु लेइहि माँगि चबेना॥ 
सिबि दधीचि बलि जो कछु भाखा | तनु धनु तजेड बचनपन राखा॥”?३०४ 


यहाँ दशरथजी के प्रति केकेयी द्वारा की हुई भत्सना में उम्रता 
"की व्यञ्जना है | 


( २८ ) सति--शास्त्रादि के विचार एवं तर्कादि से क्रिसी बात का 
निणय कर लेना ही मति है । इसम निश्चित वस्तु का संशयरहित स्वयं 
अनुछान या उपदेश ओर सनन्‍्तोप आदि अनुभाव होते हैं । उदाहरणु-- 


“श्रीनिमि के कुल दासिन हू की निमेष कुपंथ न है समुह्दाती , 
तापर हों हिय सेरो सुभाव विचार यहै निहचे ठहराती। 
दासजू! भावी स्वयंबर मेरे को बीस बिसे इनके रंगराती ; 
सातरु साँवरी मरति राम की सो अखियान से क्यो गडढ़ि जाती ।” १० 


यहाँ श्रीजनकनन्दिनीजी के वाक्यो में 'मति' की व्यञ्जना है। 


“उ्याल कराल महाविष पावक मत्त गयंदन के रद तोरे , 
सासति संकि चली डरपेहुते किंकर ते करनी मुख मोरे । 
नेक बिषाद नहीं प्रहलादहि कारन केहरि के बच्न हो रे ; 
कौन की त्रास करे 'तुलपी' जोपे राखि हैं राम तो मारि है को रे ११० 


प्रह्मादहजी की रक्षा! विभाव है। 'जोबे राखि हैं राम, तो मारि है को 
रे! अनुमभाव है | इनके हारा 'मति' की व्यञ्जना है | 


“सुनती हो कद्दा,भजि जाहु घरें, बिंघ जाओगी काम के बानन में ; 
यह बंसी 'निवाज” भरी विष सा विष-सो भर देत है प्रानन' में । 


१४७ सब्चारी भाव 


अब ही सुधि भूलि हो भोरी भट्ट ! विरमों जिन मीठी-सी तानन में ; 
कुल-कान जो आधुनी राख्यो चहो, अ्रगुरी दे रहो दुड कानन में ।?१११ 


मुग्घा नायिका को सखी के इस उपदेश में मति' की व्यञ्जना है। 


जाइबो चाहतु है जमुना तट तो सुनु बात कहों हितकारी , 
संजुल वंजुल कुजन सें सखि ! भूलिहू तू जइंयो न वहाँ री । 
जो उतहू कबों जा निकसे रखियो यह याद कही जु हमारी , 
वा मनमोहन की मधुरी मुरल्ली-धुनि तू सुनियो न तहाँ री ।११२॥ 


यहाँ भी किसी गोपाड़ना को उसकी सखी द्वारा दिए गए उपदेश में 
ति' की व्यञ्जना है। 


( २६ ) व्याधि--रोग और वियोग आदि से उत्पन्न मन का सन्ताप 
ही व्याधि है। इसमें प्रस्वेद,कम्प,ताप आदि अनुभाव होते हैं। उदाहरण-- 
“पत्नन प्रकट बरुनीन बढि नहिं कपोल ठहराइ , 

ते अँसुवा छतियाँ परें छुनछुनाइ छिप जाह ।?११३॥ 


ट्री 


वियोगिनी की इस दशा के वर्णन मे व्याधि की व्यक्षना है | 


( ३० ) उन्माद--काम, शोक और भय आदि से चित्त का 
अमित होना उन्माद है| इसमे वेमोके हँसना, रोना ओर गाना तथा 
विचार-शूत्य वाक्य कहना आदि अनुभाव होते हैँ | उदाहरण--- 

“अ्ाके जूही-निकट फिर यों बालिका व्यप्न बोली-- 

सेरी बातें तबक न सुनीं पातकी पाठलों ने। 
पीढा नारी-हृदय-तल की नारि ही जानती है , 
जूही ! तू है विकच-चदुना, शान्ति तू ही मुझे दे ।?११४॥ 


यहाँ श्रीकृष्ण के वियोग में जुही लता के प्रति राध्िकाजी के इस 
चाक्य में उन्माद की व्यज्जना है। 


चतुर्थ स्तवक (४८ 





“नाहिने नंद को मंदिर ये, कृषभावु को भौन, कहा जकती हौ ; 
हों ही अकेली ठुही कवि दिवजू! घूँघट के किह्टिं कों सकती हो? 
सेटती मोहि भद्द किहिं कारन, कौन-सी धो छवि सो छुकती हो 
काह भयो है, कहा कहौ, कैसी हो, कान्ह कहाँ है, कहा बकती हो १”११५ 


श्रीकृष्ण के वियोग में इषभानुनन्दिनी की इस दशा में “उन्माद 
की व्यञ्जना है । 


(३१ ) मरण-मस्ण तो प्रसिद्ध ही है। रोद्रादि रसों मं नायक 
के वीरत्व के लिये शत्रु के मरण का भी वर्णन हो सकता है? | शज्ञार- 
सस में साक्षात्‌ मस्ण की व्यज्जना अमाड्लिक होने के कारण मरण के 
प्रथम की अवस्था (अर्थात्‌ वियोग-शज्ञार में शरीस्त्याग करने को चेश) 
का ही वर्णन किया जाता हे* | अथवा मरण का वर्णन ऐसे ढंग से 
किया जाना चाहिये, जिससे शोक उत्पन्न न हो3 | उदाहरण-- 


मलयानिल ! यह सुना गया है तेरी गति रुकती न कहीं ; 
प्राण-पखेरू डढ़ा, साथ ले चल राधा को शीघ्र वहीं | 
सब सखियो से कह देना बस सबिनय यही वियोग-कथा ; 
जीवतेश के धाम गई वह सह न श्रघिक मसधु-विरह-ब्यथा ।११६: 


यहाँ मलय-मारुत के प्रति विरहिणी राधिकाजी के इस कथन में 
मरण की प्रथम अवस्था के वर्णन में मरण की व्यञ्जना है । 


4 किन्तु नायकवीर्या्थ शत्रो मरणमुच्यते ।!-- हरिभक्विरसास्टतसिन्धु ? 
२ शद्भाराक्षयालम्बनत्वेव मरणे व्यवसायमाशत्रमुपनिबन्धनीयम--- 
दुशरूपक ४ । २१ । 


३ मरणमचिरकालप्रत्यापत्तिमयमत्र मन्तव्यं येन शोकोडवस्थानसमेक 
न लभते !--नाव्यूश/स्त्र, अभिनवभारती, पृष्ठ ३०८। 


९2६ सब्भचारी भाव 





“पूछुत हों पछिताने कहा फिरि पीछे ते पावक ही को पिलोगे ; 

“ काल की हाल में बृढति बाल विल्ोकि हलाहल ही को हिलोगे। 
लीजिए ज्याय सुधा-सघु प्याय के न्याय नहीं विष-गोली गिलौगे ; 
पंचनि) पंच मिले परपंच में वाहि मिले तुम काहि मिलौगे ११७ 


यहाँ भी मरण को पूर्वावस्था के वर्णन में मरण भाव की व्यञ्जना है| 


वह भागीरथी-सरजू जल-संगम-तीरथ में तन त्यागन सी , 
भझूट देवन की गिनती में गिनाय समोद सिधाय विसानन सो | 
तहँ पूरब रूपहु सो अधिको रमनी सेंग मंजु बिहारन सं ; 
चन-नंदन में करिबे जु बिलास लग्यो नप पुन्य प्रभावव सो ।११८। 


इसमे साज्ञात्‌ मरण की व्यञ्जना होने पर भी महाकवि कालिदास ने 
रघुवश मे महाराजा अज के स्वर्ग गमन का शज्भास्मिश्रित वर्णन ऐसे 
डड्ढ से किया है कि जिससे शोक का आभास भी नहीं होता है | 


( ३२ ) त्रास--वक्-निर्मात, उल्का-पात आदि उल्यातों से ओर 
अपने से प्रबल का अपराध करने पर उत्तन्न चित्त की व्यग्रता च्ास है। 
तजास? सद्चारी ओर भय स्थायी मे यह भेद है* कि न्वास में सहसा 


कम्प होता है, किन्ठ॒ भय पूर्वापर के विचार से उत्यन्न होता है। 
उदाहरणु--- 
“चहूँ ओर मरोर सो मेह परे घनघोर-घटा धनी छाइ गईसी; 
त्तरराय परी बिजुरी कितहूँ दसहू दिल्लि सानहु ज्वाल बई सी। 


१ पञ्चभूतों में पनन्‍्चभूत मिल जाने के बाद अर्थात्‌ प्राणान्त हो 
जाने केबाद | 

२ 'गात्रोत्कम्पो मन; कम्पः सहसा न्ञास उच्यते। पूर्वापरविचारोत्थ॑ 
भय त्रासात्यथक्‌ भसवेतः--हरिभक्षिरसारूतसिन्धु । 


चतुथ स्तवक १४० 





कवि 'ग्वाल” चमंक अचानक की लखतें ललना मुरकाय गईं सी ; 
थहराष्ट गई, हहराइ गई, पुलकाय गई, पल नहाय गईं सी ।?”११६ 


यहाँ वज्जनिर्धात-जन्य त्रास की व्यज्जना है । 


“भागे सीरजादे, पीरजादे ओऔ”? अश्रमीरजादे , 

भागे खानजादे प्रान मरत बचाय के; 
भागे गज बाजि रथपथ न सँमारें परें, 

गोलन पे गोल सूर सहसि सकाय के। 
भाग्यो सुलतान जान बचत न जानि, वेगि-- 

वलित वितुंड पै विराजि बिलखाय के; 
जैसे लगे जंगल में ग्रीपम की आगि चल्लैं, 

भागि संग महिष वराह बिलखाय के।”१२०॥७ 


यहाँ मीरजादे आदि के भागने मे प्रधानतया त्रास की व्यज्ञना है । 


वितक जप 
(२३ ) “सन्देह के कारण विचार उत्पन्न होना ही वितर्क 
है। इसमें श्र-भद्ग, शिरःकम्प ओर उँगली उठाना आदि चेशओ का 
वर्णन होता है | उदाहरणु-- 


“क्रथों मोर सोर तजि गए री श्रनत भाजि , 

केधों उत दादुर न बोलत हैं ए दुई , 
कैथों पिक-चातक, महीप काहू मार डारे, 

कैधों बगपाँत उत अंत गति हो गई। 
आलसम' कहे हो अली अजहूँ न आए प्यारे, 

केघों उत रीति विपरीत विधि ने 5ई; 
मदन-महीप की दुहाई फिरिबे ते रही, 

जूकि गए मेघ, केधों बीजुरी सती भई।?१२१॥ 


१५१ स्थायी भाव 


यहाँ विरहिणी नायिका के इस कथन में वितक की व्यज्जना है। 
प्रेम-निकुज में रोके कहा लक्षिता सखि वंक-विल्ोकन डारि के ; 
कोपित केधों बिसाखा किए हरि को समुरावत में न विचारि के । 
सोचत यों ब्ृषभान-लली चिर लो मग कुज गली को निहारि के ; 
ले कर सो कूटकी पटकी भुवि मे गल फूल की साल उतारि के ।१२२ 


यहाँ राधिकाजी की उत्करिठतावस्था मे वितक की व्यज्जना होने 
पर भी चोथे चरण में जो विषाद व्यज्जित होता है वही प्रधान है। 

एक मत-यह मी है कि वितक निणयान्त होता है, अर्थात्‌ अन्त में 
निश्चय हो जाता हे? | 

मुख्य सम्जारी भाव तो ये ही ३३ हैं। इनके सिवा ओर भी चित्त- 
वृत्तियों--भावों--की प्रायः व्यञ्जना होती है। जैसे, मात्सये, उद्दंग, 
दम्भ, ईर्ष्या, विवेक, निर्णय, क्षमा, उत्करठा ओर माधुय आदि | किन्तु, 
ये सभी भाव उक्त ३३ भावों के अन्तर्गत मान लिए. गए हं। जैसे, 
मात्सय को असया में, उद्दंग को त्रास में, दम्म को अवहित्थ में, 
ईर्ष्या को अमष में, क्षमा को ध्ति में, उत्करठा को ओत्सुक्य में ओर 
धाष्टय को चपलता के अन्तर्गत माना गया है। इनके सिवा स्थायी भाव 
भी अवस्था विशेष में अपने नियत रस से अन्यत्र सख्वारी हो जाते हैं। 
यह आगे स्पष्ट किया जायगा | 


स्थायी भाव 


जो भाव चिरकाल तक चित्त में स्थिर रूता है, एवं 
जिसको विरुद्ध या अविरुद्ध भाव छिपा या दवा नहीं 


१ 'विनिर्णयन्तएवायंतर्कइत्यूचिरे परे :--हरिभक्लिरसामृतसिन्धु, 
पृष्ठ २६४। 





चतुरथ स्तवक १श२ 


सकते, और जो विभावादि से सम्बन्ध होने पर रस-रूप में 
व्यक्ष होता है, उस आनन्द के मूल-भूत भाव को स्थायी 


भाव कहते हैं | 

स्थायी भाव नो हैं--( १) रति, (२) हास, (३) शोक, 
(४ ) क्रोच, (५) उत्साह, ( ६ ) भय, ( ७ ) जुगुप्सा, ( ८ ) विस्मय 
ओर (६ ) निर्बंद या शम | 


सख्जारी माव अपने विरोधी' या अनुकूल * माव से घटते-बढ़ते एवं 
उत्पन्न और विनष्ट होते रहते हैं। किन्तु स्थायी भाव विक्ृत नहीं होते, 
इसीलिये ये 'स्थायी' कहे जाते हैँ। सख्बारी भाव स्थायी भावो के अ्रनुचचर 
हैं। रसकी परिपक्ष अवस्था में ही रति आदि स्थायी ओर निवेंद्‌ आदि 
सश्चारी भावोा की स्थायी ओर सजश्जारी संज्ञा है--रस के विना ये सभी 
“भाव? मात्र है| वास्तविक स्थायी भाव के उदाहरण तो रस को परिपक्क 
अवस्था म ही मिल सकते हैं, अन्यत्र नहीं | किन्ठु जहाँ स्थायी भाव रस- 
अवस्था को प्रात्त नही होता वहाँ वह भाव तो रहता ही है, पर उसकी 
स्थायी संज्ञा न रहकर केवल वहाँ वह भाव मात्र रहृजाता है। जो 
उद्ाहस्ण नीचे दिये गये है, वे रति आदि की भाव अ्रवस्था के ही हैं । 


(१) रति-रति का अर्थ है प्रीति, अनुराग या प्रेम | श्यज्धार्रस 
का रति स्थायी भाव है | यह ध्यान मे रखना चाहिए कि स्त्री मे पुरुष 


१ विरोधी साव दूसरे भाव को इस प्रकार नष्ट कर देता है जिस 
अकार अस्नि को जल । 

२ अनुकूल भाव दूसरे भाव को इस प्रकार छिपा या दबा देंता है 
जि प्रकार सूर्य का प्रकाश श्रन्य प्रकाश को | 


३ भावों की अ्रधिक स्पष्ठता साव-प्रकरण में की जायगी। 


श्श्३ - स्थायी भाव 





की ओर पुरुष में स्री की रति ही »ज्ञाररस मे स्थायी मानी जाती है। 
गुरु, देवता और पुत्रादि में प्रेम होना भी रति है, पर वह रति »ज्ञार-रस 
का स्थायी नहीं, उसकी केवल भाव सज्ञा है | 


रति भाव । 
निकप्तत ही ससि उदधि जिमि घोरज कछु इक छौरि , 
गंगाधर देखन लगे बिंबाधर-मुख-गोरि ।१२३॥ 


यहाँ श्रीशड्डर का पाव॑ंतीजी के मुख के सम्मुख कुछ ही सामिलाप 
निरीक्षण हुआ है, ओर सश्चारी भावो से इसकी पुष्टि नहीं की गई है, 
अतः शद्भार-रस का परिपाक नहीं हुआ है। केवल रति-भाव है। 
“सजन लगी है कहूँ कबहूँ सिंगारन को , 
तजन लगी है कछु बेस वसवारी की; 
चखन लगी है कछु चाह 'पदमाकर! त्यों , 
लखन लगी है मंज मूरति मुरारी की। 
खसुदर गुविंद-युन ग्रुनन लगो है कछु , 
सुनन लगी है बात बॉकुरे बिहारी की , 
'एगन लगी है लगि लगन हिए सौं नेकु , 
लगनु लगी है कछु पी की प्रानप्यारी की ।?१२४॥ 


यहाँ नायक में विश्र्ध नवोढा नायिका की रति, भाव मात्र है, 
श्ज्ञार का परिपाक नहीं हुआ है । 

(२ ) हास--बचन, अद्भध आदि की विक्रतता देखकर चित्त का 
विकसित होना हास है | उदाहरणु-- 

“यह में तोही में लखी भगति अपूरब बाल , 
लहि प्रसाद-माला जु भो तन कर्दंब की माल ।7१२०॥ 

प्रेमी द्वारा स्प्श की हुईं माला के धारण करने से नायिका के 

रोमाख़ित हो जाने पर नायिका के प्रति सखी के इस विनोद में 'हास-भाव 


की व्यज्जना है | 
प्प 


चतुर्थ स्तवक १४७ 


“कबहूँ नहिं. कान सुने हमने यह कोतुक मंत्र विचार के हैं ; 
कहि कैसे भए करि कोने दए सिखए कोड साधु अपार के हैं । 
कवि“ग्वालाकपोल तिहारे अ्रली [ दुढ़ँ ओर मे बाग बहार के हैं ; 
चमकें ये चुनी-सी चुनी इतमे, उतसमें पके दाने अनार के हैं ।?१२६॥ 


नायिका के प्रति सखी की इस उक्ति म हास के अड्लरुमात्र की 
व्यजञ्ञना है। हास का परिपाक नहीं है । 


(३ ) शोक--इृष्ट जन के एवं विभव के विनाश आदि कारणों से 
चित्त का व्याकुल होना शोक है । जहाँ क्ली ओर पुरुष के पारस्परिक 
वियोग में जीवित अवस्था का ज्ञान रहते हुए. चित्त की व्याकुलता होती 
है, वहाँ विप्रलम्भ »ड्भार मं शोक स्थायी भाव नहीं रहता है, किन्तु 
सम्जारी भाव हो जाता हैं| उदाहरण-- 


“रास के राज-सिंहासन बैठत आनंद की सरिता उसही है ; 
त्यो 'नँंद्रामजू! राजसिरी सियराम के आनन राजि रही है । 
भूषण हार भंडार लुटावत कोसिला कामद बानि गही है ; 
केकई के पछिताव यहै इहिं. ओसर ओपध-भ्ुवाल नहीं है ।?१२७ 


यहाँ श्रीरामराज्याभिपेक के आनन्दोत्सव मे दशरथजी के न होने 
का केकेई को पश्चाताप होने मे शोक उदबुद्ध मात्र है । 


“सोरन को लेके दच्छिन समीर धीर , 

डोलति है मंद अब तुम थों किते रहे ; 
कहे कवि “श्रीपति' हो प्रबल वसंत सति-- 

मंत सेरे कंत के सहायक जिले रहे । 
लागत विरह-जुर जोर तें पवन ड्ोके , 

परे घूमि भूमि पे सम्हारत नितें रहे 


- १४४ स्थायी, भाव 


रति को ब्रिलाप: देखि करुनाअगार कछु -- 
ह लोचन को मूदि के त्रिलोचन चिते रहे ।?१२८॥ 


कामदेव के भस्म हो जाने पर रति की विकलता देखकर श्रीशड्ढर के 
हृदय में करुणा उत्पन्न होने मे शोक भाव है। 'कुछ' शब्द अपूर्णता- 
सूचक है, अतः करुण का परिपाक नहीं हुआ है। 


(४ ) क्रोध--ग़ुरु ओर बन्धुजनों के बध करने के अपराध आदि 
से एवं कलह, विवाद आदि से क्रोध उत्पन्न होता है। जहाँ साधारण 
अपराध के कारण ऋर वाक्य कहे जाते हैं, वहाँ अमर्प' सश्जारी भाव 
होता है | उदाहरण-- 

सीषस-रन-कौसल निरखि मान न जिय कछु त्रास ; 
भगुनंदन के दगन से भयो अरुन आभास ॥१२९॥ 
यहाँ भीष्मजी के साथ युद्ध करते समय, परशुरामजी के नेत्रों मे 
अरुणता के आभास मे क्रोध भाव की व्यज्ञना है । 

(४ ) उत्साह--कार्य करने में आवेश होने को उत्साह कहते है | 
यह धैर्य ओर शौर्यादि से उत्पन्न होता है। उदाहरण-- 
भट-हीन मही मिथिल्ेस कही, सो सुनी सहि क्‍यों निज बंस लजाऊं , 
यह जीरन चाप चढ़ाइबो का , सिसु-छुन्नक ज्यो छिन मौंहि तुराऊ। 
भ्रुचि-खंड कहा ब्रहमंड अखंड , उठा कर-कंदुक लों छु अमाऊ; 
रघुराज को हों लघु डावरो हू” , प्रभु ! रावरों जो अनुसासन पाऊे ३३० 

यहाँ उत्साह भाव की व्यज्ञना है। 'रावरों जो अनुसासन पाऊँ के 
कथन से वीर-रस की अभिव्यक्ति मे अपूर्णता है। 

“तेरी ही निगाह को निहारते सुरेस सेस , 
गिनती कहा है और नृपति विचारे की; 
को हो तिहईुँलोकन में राजा दुरजोधन ! जो , 
करतो बिने ना आन चर्नन तिहारे की ; 


चतुथ स्तवक १५६ 





“बेनी द्विज' रन में चुकारि कहे भोीषम यों , 
देखतो बहार बीर बानन हमारे की; 
छह पांडु-दल की ना दिखाती या दुनी में कहूँ , 
होती ना पनाह जो पे पीत पटवारे की ।१३१॥ 
भीष्म के इन वाक्यों में उत्साह-माव की व्यज्ञना है। "होवी न 
पनाह जो पें पीत पण्वारे की? कथन से वीररस का परिपाक 
रुक गया है | 
(६ ) भय--सर्प, सिंह आदि हिसक प्राणियों के देखने पर ओर 
प्रबल शत्रु आदि से उत्पन्न चित्त की व्याकुलता मय है। उदाहरण--- 
कालो-हद कालो लख्यो वनमाली ढिंग आतु ; 
संद-मंद गति भीत ज्यों चलन लग्यो विकलातु ।१३२॥ 
यहाँ भीत ज्यों के कथन से भर्या भाव-मात्र की व्यजञ्ञना है। 
भयानक रस का परिपाक नहीं । 
“निज चित्त से कर सूर्य साक्षी, दोपदी ने यो कहा--- 
अतिरिक्त पतियों के कभी कोई न इस मन में रहा। 
भगवान्‌ ! तुम्ह संतुष्ट हो जो जानकर इस मर्स को, 
तो दुष्ट कीचक कर न पावे नष्ट मेरे धम्म को।”१३श॥ 
मुदेष्णा द्वारा प्रेपित कीचक के समीप जाती हुई द्रोगदी के इन 
वाक्यो मे “स्वभाव की व्यज्ञना है, भयानक रस नहीं है । 
(७ ) जुगुप्सा--ब्ृख्ित वस्ठु को देखने आदि से घृणा उत्पन्न 
होना जुगुप्सा है। उदाहरणु-- 
सूपनखा को रूप लखि खबत रुधिर विकराल, 
तिय-सुभाव सिय हढि कछुक मुख फेरवो तिहिं काल ॥१३४॥ 
यहाँ 'कछुक मुख फेसया' के कथन से जुण॒ुप्सा भाव की व्यजञ्ञना 
हैं। वीभत्सरस का परिपाक नहीं हुआ है। 


१५७ स्थायी भाव 





(८ ) विस्मय--अलोकिक वसर्ु के देखने आदि से आश्चर्य 
उत्पन्न होना विस्मय है । उदाहरण-- 


सुर नर सब सचकित रहे पारथ को रन देखि , 
पै न गिन्‍यो जदुनाथ अति करन-पराक्रम पेखि ।$३५॥ 


यहाँ अर्जुन के रण-कोशल के विषय में विस्मय भाव-मात्र की व्यञ्ञना 
है। पे न गिनयो' के कथन से अद्भुत रस का परियाक नहीं हो सका है । 
(६ ) शम अथवा निर्वेद--नित्य ओर अनित्य वस्तु के विचार 
से विषयो मे वेराग्य उत्पन्न होना शर्म है। उदाहरण-- 
सबहि सुलभ नित विषय-सुख क्यो तू करतु प्रयास , 
दुर्लभ यह नर-तन समसुझि करहु न वृथा बिनास ।१३६॥ 


वेराग्य का उपदेश होने से यहों निववेद्‌ भाव-मात्र है, शान्त रस 
नहीं है। 

जहाँ इष्ट-वियोगादि से उत्पन्न निर्वेंद होता है, वहोँ उस निवेंद को 
सद्चारी सज्ञा है । यह पहले कहा जा चुका हे | 


'रतिः आदि भाव शज्ञार आदि नवो रसो के स्थायी भाव हैं। जैसे, 
(१) »झड्वार का रति, ( २ ) हास्य का हास, ( ३ ) करुण का शोक, 
(४ ) रोद्र का क्रोध, (५ ) वीर का उत्साह, ( ६ ) भयानक का भय, 
(७ ) बीमत्स का जुगुप्सा, (८) अद्भुत का विस्मय ओर (६ ) शान्त 
रस का निवेद | इस प्रकार प्रत्येक रस का एक स्थायी भाव नियत है। 
ये नो भाव अपने-अपने नियत रस मे ही स्थायी भाव फी संज्ञा प्राप्त 
कर सकते हैं। क्योकि इनकी अपने-अपने रस में ही अन्त तक ( रसानुभव 
होता रहे तब तक ) स्थिति रहती है | यदि अपने नियत रस से अन्यत्र 
किसी दूसरे र॑ंस मे इनमे से कोई भाव उत्पन्न होता है तो वह वहाँ स्थायी 
न रहंकर व्यमिचारी हो जाता 'है। उसकी स्थिति वहाँ स्थायी रूप मे 
अन्त सक नहीं रहती--वहाँ वह उत्पन्न और विलीन होता' रहता 


चतुर्थ स्तवक श्श्प 





है। जैसे, 'रति' श्रद्भार-रस का स्थायी भाव है, वह वहाँ तो स्थित रहता 
है, किन्तु हास्य, करुणु एवं शान्त रस मे उत्तन्न और विलीन होता रहने 
के कारण व्यमिचारी हो जाता है। इसी प्रकार »ज्भार ओर वीर रसम 
“दासः; वीर-रस में क्रोध; शान्त ओर मयानक में जुगुप्सा;; रोठ रस 
मे उत्साह, शज्भार-स्स मे भय, सच्चारी हो जाता है। विस्मय! अद्भुत 
के सिवा अन्य सभी रसों म सब्जारी हो जाता है? । 


जब रति आदि भावों का नियत रस मे प्राहुभांव होता है, तब ये 
विभावश्ननुमावादि द्वारा रस अवस्था को पहुँच जाते हैं। ऐसी अवस्था में 
इन स्थायी भावों एवं रसो मे कोई भिन्नता नहीं रहती। रसो के जो 
लक्षण आगे दिखाये जायेंगे वे इन स्थायी भावो के लक्षण भी हैं। 
इसलिये केवल इनकी अपरिपक्कत अवस्था के ही उदाहरण ऊपर 
दिये गये है | 


इस विपय मे यह प्रश्न हाना स्वाभाविक हैं कि जब रति आदि 
भाव भी अपने नियत रस के सिवा अन्य रसो मे सख्जारी ( व्यभिचारी ) हो 
जाते हैं, फिर इन्हे ही स्थायित्व का महत्त्व क्या * निव॑ंदादि अन्य सच्ञारी 
भावो को क्यों नहीं : भरत मुनि कहते हँ--“सभी मनुष्यो के हाथ-पैर 
आदि समान होने पर भी कुल, विद्या ओर शील आदि के कारण कुछ 
मनुष्य राजत्व को प्राप्त कर सकते हैं | इसी प्रकार विशेष गुणशाली होने 
के कारण--रस अवस्था को प्राप्त करने की सामर्थ्य होने के कारण-- 
रति आइरि ही स्थायित्व की प्रतिष्ठा के योग्य हैं |”? 


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$.. रिव्यादयः स्थायिभावाः स्यथुभू यिष्ठविभावजाः; 
स्तोकेर्विभावेस्त्पन्नास्त एवं व्यभिचारिणः -अलकझ्र-रल्ाकर 
डद्योत-सहित कावच्यप्रदीप, आनन्दाभश्रम-संस्करण, सन्‌ १३११, 
शृष्ठ १२३-१२४ और ३८१ | 2 


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चतुर्थ स्तवक शव 


प्तीति रस के उठबोध की प्रथमावस्था में ही होती है--रस के उद्बोध 
के समय यह प्रथकता प्रतीत नहीं होती। उस समय विमावन के 
आलोकिक व्यापार द्वारा ( जिसकी स्पष्टता आगे की जायगी ) ये तीनो 
समूह-रूप से रस को व्यक्त करते हैं, अतएवं उस समय ये तीनो समूह-रूप 
से कारण रूप हो जाते हँ--अ्रर्थात्‌ रस के आनन्दानुभव के समय ये 
तीनो अपनी प्रथकृता को छोडकर, समूह-रूप से संयोग. पाकर, स्थायी 
भाव को, प्रपानक रस की तरह, अखणड रस-रूप म परिणित कर 
देते है। जैसे जल मे डालने के प्रथम चीनी, मिर्च, हींग, नमक ओर 
जीरे आदि का स्वाद भिन्न-भिन्न रहता है, किन्ठु इन सबके मिलने पर 
उनका वह भिन्नत्व न रहकर जीरे के जल की तरह प्रपानक रस ( पिये 
जानेवाले पदार्थ ) का एक विलज्नण आस्वाद हो जाता है । इसी प्रकार 
विभावादि से मिलकर स्थायी भाव अखरड घन चिन्मय रस-रूप में 
परिणत हो जाते हैं। अभिप्राय यह कि विभ्रावादि के सम्मिलित होने पर 
ही उनके व्यज्ञनीय रस की व्यज्ञना हो सकती है। केवल विभाव, 
अनुभाव या व्यभिचारी भाव स्वतन्त्र रूप से किसी रस की व्यज्ञना नहीं. 
कर सकते । क्योंकि, विभाव आदि स्वतन्त्र रूप से किसी रस के नियत 
नहीं हैं। जेसे, सिह आदि हिंसक जीव कायर मनुष्य के लिये भय के 
कारण होने से, भयानक रस भ, आलम्बन विभाव होते हैं, किन्तु वे ही 
( सिहादि ) वीर पुरुष के लिये उत्साह ओर क्रोध के कारण होते हैं ) 
अतः वीर ओर रोड रस के भी ये आलम्बन हो सकते हैं | इसी प्रकार 
अश्रपात आदि प्रिय-वियाग मे होते है, अतः ये विप्रलम्भ-शज्भार के 
अनुमाव हैं । भय ओर शोक मे भी अश्रपात होते हैं, अतएवं भयानक 
एवं करुण-रस के भी ये अनुभाव हैं। चिन्ता आदि मनोभाव प्रिय- 
वियोग मे होने के कारण विप्रलम्भ-शरड्शार के सश्जारी हैं। भव ओर 
शोक में भी चिन्ता | आदि भाव होते हैं, अतणव भयानक ओर करुण के 


६ 


१६१ रस की अभिव्यक्ति 





भी ये सञ्जारी हैं। इससे स्पष्ट है कि विभावादि प्ृथकु-प्थ क्‌ स्व॒तन्त्र रूकर 
किसी विशेष रस के व्यज्ञक नहीं.हो.सकते । जो विभाव, अनुभाव और 
सश्जारी समूह रूप मे एक साथ जिस विशेष रस के होते हैं, वे ज्यो-केन्योः 
मिले हुए, कसी भी दूसरे रस में नही हो सकते । निष्कर्ष यह कि विभावादि्‌ 
तीनो के समूह से ही रस की अभिव्यक्ति होती है। इसीसे रस विभावादि 
समूहालम्बनात्मक है । 

यद्यपि किसी किसी वर्णन में कहीं अनुभाव ओर सच्वारी के 
विना केवल विभाव, कहीं विभाव ओर सश्जारी के विना केवल अनुभाव 
ओर कहीं विभाव और अनुभाव के बिना केवल सशञ्जारी ही दृष्टिगत होते 
है, ओर वहां भी रस की व्यज्ञना होती है | इस अवस्था म॑ यद्यपि यह 
प्रश्न होता है कि विभावादि तीनो के सम्मिलित होने से ही रस की 
अभिव्यक्ति क्यों कही जाती है ? बात यह है कि जहाँ केवल विभाव, 
या अनुभाव अथवा सश्जारी ही होते है वहां भी रस की व्यज्ञना तो 
विभावादि तीनो के समूह द्वारा ही होती है | विभावादि मे से जिस एक 
भाव की स्थिति होती है, वह व्यज्लनीय रस का असाधारण सम्बन्धी होता 
है, ओर वह दूसरे किसी रस की व्यज्ञना नहीं होने देता । ओर उस एक 
भाव से अन्य दो भावों का आज्षेप हो जाता है, अर्थात्‌ वह एक ही 
भाव अपने व्यञ्लननीय रस के अनुकूल अन्य दो भावों का बोध करा. 
देता है। जैसे-- 

केवल विभाव के वर्णन का उदाहरणु-- 

नम में घनघोर ये स्थाम घटा अति जोर भरी घहरान लगी , 

पिक, चातक, मोरन की धुनिहू चहुँओरन घूम मचान लगी ; 

सलयानिल सीतल मंद अली ! मदनानल को घधकानं लगी , 

निरखे किन पीतम पाय परे ? रहि है कबलों अब मान-पगी ११३७ 


मानिनी नायिंका के प्रति सखी के ये वाक्य हैं। यहाँ यद्यपि 
नायिका! आलम्बन-विभाव ओर /वष्नप्काल' उद्दीपन विभाव है, अनुभाव 


चूतुथ स्त बक _ १६२ 


तथा सश्ारी भाव नहीं हैं, पर 'मानिनी नायिका! विप्रलम्भ-श्य्द्धार का 
असाधारण आलम्बन-विभाव है--इसके द्वारा दूसरे किसी रस की व्यञ्जना 
नहीं हो सकती | अतः यहाँ केवल आलम्बन ओर उद्दीपन विभावों के 
बल से अड्भो का वेंवरण्य होना आदि अनुमभाव ओर चिन्ता आदि 
सद्चारी भावों की आवश्यक प्रतीति हो जाती है। क्योकि वर्षाकालिक 
'कामोह्ीपक विभावों द्वारा वियोगावस्था में चिन्ता आदि मनोविकार ओर 
विवरणणता आदि चेशओ का होना अवश्यम्मावी है । अतएवं विभावादि 
तीनो के समूह से यहाँ विप्रलम्भ-श्ड्भार रस की अभिव्यक्ति है । 

कचल अनुभावों के वणणुन का उदाहरणु-- 

कर-मर्दित संज्॒ मुनालिनि ज्यों दुति अंगन की मुरकाय रही , 

सखियान ही के समुकावन सो कछु काम में चित्त लगाय रही ; 

नव-खंडित दंतिन दुंतन-सी” त्यो कपोलन पीत्रता छाय रही , 

निकलंक मग्मंक -कला-छुवि की समता तनुता तन पाय रही ॥११्८७ 


मालतीमाधव नाटक म मालती की विरहावस्था का वणन है। 
चहों अड्भो का मुराना, अलसित होना, कपोल पीत हो जाना, आदि 
वियोगावस्था के केवल अनुभाव है---आलम्बन, उद्घयीपन तथा सश्चारी 
माव नहीं है।उक्त अनुभावो के बल से “'वियोगिनी नायिका रूप 
आलम्बन विभाव का ओर चिन्ता आदि सचख्ारी भावों का आजक्षेप हो 
जाता है। क्योकि अड्ो का मुरकाना आदि चेटष्टाएँ ( जो कि अनुभाव 
हैं ) वियोग-दशा म चिन्ता आदि से ही उत्पन्न होती हैं। अतणव यहाँ 
विभावादि तीनो के समूह से वियोग-शज्जार-रस की अभिव्यक्ति है । 
केवल ठ्यभिचारी भावों के वणन का उदाहरणु-- 
दूर दिखराएं उतकंठ सो भराए घने , 
आवत हो नेरे फेर वैसे सतराएु हैं; 


ही टी हा ता लील ना आल हो + हब लक अल लत ल2आ 


3 तुरत के कटे हुए हाथी के दाँत के समान । २ चन्द्रमा । 


4६३ रस की अभिव्यक्ति 





बोलें विकसाए, अरुनाए हैं छुवातु गातु , 

ख्ेंचत दुकुल भौंह साथ कुटिलाए हैं। 
विने सो मनाए तो हू क्यों हूँ समुहाए नाहिं , 

चरन निपात भएु आंसुन भरए हैं; 
पीतम हताश हो के जात फिरि आवत ही , 

सानिनी के दगन अनेक भाव छाए हैं।१३४६॥ 


मानिनी नायिका को मानमोचन के उपायो से प्रसन्न करने मे निराश 
होकर जाता हुआ नायक जब लोटकर आया, उस समय नायिका के अनेक 
भाव-गर्भित नेत्रो का यह वर्णन है। मानिनी नायिका को प्रसन्न करने मे 
हताश होकर जाते हुए, नायक के दूर रहने तक नायिका के नेत्र इस शड्जा 
से कि वह यहाँ लोट आता है या चला ही जाता है? उत्सुक हुए, ; उसके 
लोटकर समीप आने पर इस लजा से कि “यह मेरी उत्सुकता को जान 
गया वे ठेढ़ें बन गये , जब वह सम्भापण करने लगा, तत्र उसकी 
अपूर्व बातें सुनकर हर्ष से वे विकसित अर्थात्‌ प्रफुल्लित दिखाई पढ़ने 
लगे ; जब वह स्पर्श करने लगा, तब इस अमपष से कि "मुझे प्रसन्न किए 
विना ही स्पश करना चाहता है' क्रोध से रक्त हो गए, ; जब नायिका क्रुद्ध 
होकर जाने लगी, तब अपने वस्त्र को पकडता हुआ उसे देखकर असया 
से मोहो के साथ वे भी टेढ़े हो गए., आखिर जब नायक उसके पेरो पर 
गिर पडा, तब इस भाव से कि 6ुम्हारे इन आचरणो से में तड़ हो गई 
हैँ" नायिका के आँसू गिरने लगे। यहाँ उत्सुकता, लजा, हप॑, क्रोध, 
अखसया ओर प्रसाद केवल व्यमिचारी भाव ही हैं--विभाव अनुभाव 
नहीं? हैं । इन व्यभिचारियो द्वारा ही सम्भोग-श्द्भार के विभाव॑, अनु- 
5 | 
4 यद्यपि यहा नायक! आलम्बन-विभाव का वर्णन तो है, पर उसके 
अपराधी होने के कारण उसे सम्भोग-श्ज्ञार का 'आलस्बन-विभाव नहीं 
माना जा सकता है व 


चतुर्थ स्तवक शा 





भावों का आज्षेप हो जाता है, ओर इन सबके समूह से सम्भोग-शशज्ञार 
व्यक्त होता है । 

इस प्रकार जहाँ स्पष्ट रूप मे, केवल विभाव या केवल अनुभाव या 
केवल व्यभिचारी होता है, वहाँ उपयुक्त रीति से अन्य दो भावों का 
आक्षेप होकर तीनो के समूह से ही रस की व्यक्ति हुआ करती है । 


रस का आरवाद 


रति आदि मनोविकार नायिक-नायकादि आलम्बन विमावो में उत्पन्न होते 
हैं ओर विभावादि के संयोग से रस रूप हो जाते हैं। अतः रस का 
आनन्दानुभव भी नायक-नायिकादि को ही होना चाहिये, दशक या पाठकों 
को नहीं | काव्य ओर नाटकों में जिन पूर्वकालीन दुष्यन्त-शकुन्तलादि के. 
चरित्र का वर्णन या अभिनय होता है, वे सामाजिकों) के सामने नहीं 
रहते, न उनसे सामाजिको का कुछ सम्बन्ध ही है और न सामाजिकों से 
उनका कभी साक्षात्‌ ही हुआ है । ऐसी अवस्था में दुष्यन्त५ आदि 
की रति का आनन्द, अर्थात्‌ रस का आस्वाद, सामाजिकों को किस 
प्रकार हो सकता है? इस विषय का संस्कृत के साहित्याचार्यों ने बहुत 
ही गम्भीर विवेचन किया है। भरतमुनि कहते हैं कि रस की निष्यकत्ति 
विभाव, अनुमभाव ओर व्यमिचारी भाव के संयोग से होती है-- 

“विसावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद््सनिष्पत्ति: + ।?? 


भरतमुनि के इस सूत्र को आधारभूत मानकर भिन्न-भिन्न आचार्यों 
ने प्रथकड्थक मत का प्रतिपादन किया है। 





. १ काव्य के पाठक एवं श्रोता तथा नाइक के दर्शक ही सामाजिक 
कहदे जाते धन 
२ देखो नाव्यशासखर पर अभिनवगुप्ताचार्य की व्याख्या अभिनव 


भारती-गायकवाद संस्करण, पृष्ठ रं७४ एवं काब्यंप्रकाश चतुथ उद्जास, 
रल प्रकरण | कप 2 


बडा 


“4६४ रस का आस्वाद 





भट्ट लोज्लरट का आरोपवाद 


भरतमुनि के इस सूत्र के प्रथम व्याख्याकार मद्द लोज्लयट का कहना 
है कि दुष्यन्त-शकुन्तला के अमिनय मे दुष्यन्त ओर शकुन्तला के प्रेम 
( रति आदि मनोविकारों ) का जो आनन्दानुभव सामाजिकों को होता है, 
वह वास्तव में दुष्यन्त आदि में ही उद्भूत हुआ था अर्थात्‌ उसका 
वास्तविक आनन्द उन्हें ही हुआ था, न कि नाथ्य पात्रों को | परन्ठु 
नास्य पात्रों मे दुष्यन्त आदि का सामाजिक आरोप” कर लेते हैं अर्थात्‌ 
दुष्यन्त आदि ओर नास्य पात्रों मे भिन्‍नता का अनुभव होते हुए भी नाव्य 
पात्रों को वास्तव में दुष्यन्त आदि न समभते हुए भी, नाव्य पात्रों को 
दुष्यन्त आदि मान लेते हैं ओर रसानुभव करने लगते हैं । 


श्रीशडःक का अनुमानवाद 


088... 


भरत सूत्र के द्वितीय व्याख्याकार श्रीशहुक* भद्द लोक्लद के 
मत को भ्रममूलक बताते हैं। उनका कहना है कि नाख्य पात्रों में दुष्यन्त 
आदि का सामाजिक अनुमान करते हैं, न कि आरोप | अर्थात्‌ नास्य 
यात्रो में ओर दुष्यत्त आदि में अमिन्‍नता का अनुमव करते हुए नास्य 


न्न्न 


१ किसी वस्तु में उससे भिन्न अन्य किसी वस्तु के धर्म की बुद्धि 
कर लेने को आरोप कहते हैं | अर्थात्‌, एक वस्तु को दूसरी वस्तु मानना जो 


चास्तव में नहीं है। जैसे, नट को दुष्यन्त न होने पर भी दुष्यन्त 
समझ लेना । 


२ देखो नाव्यशासत्र पर श्री अभिनवगुप्ताचार्य की व्याख्या अभिनव- 
ै रू 
भसारतोी--गायकवाड संस्करण पृष्ठ २७४ एवं काव्यप्रकाश चतुथ उल्लास, 
रस अकरण | 


हु 


चतुथ स्तवक १६६ 





पात्रों में ही दुष्यन्त आदि का अनुमान कर लेते हैं। ओर यह अनुमिति- 
ज्ञान सामाजिकों को रस का आस्वादन कराता है । 


अपने इस मत के प्रंतिपादन में श्रीश्कक कहते हैं-- 


( १ ) जिनमे रतिआदि मनोविकार होगे, उन्हें ही रस का आस्वादनः 
होगा | डुष्यन्त-शकुन्तला आदि मे उद्भूत रति आदि स्थायी भावों का 
दर्शको को केसे आस्वाद हो सकता है ! यह कहना कि दुष्यन्त-शकुन्तला 
का ज्ञान ही सामाजिको को रस का आस्वादन कराता है, युक्ति-युक्त नहीं । 
क्योकि यदि दुष्यन्त आदि के ज्ञान-मात्र से ही रस का अनुभव होने 
लगे तो उनके नामोच्चारण से ही रस का आस्वाद होना चाहिए--- 
सुख का नाम लेने से ही सुख होना चाहिए, पर ऐसा नहीं होता है । 


(२ ) ससार मे चार प्रकार के झान प्रसिद्ध हैं! उनके अतिरिक्त 
एक ओर भी ज्ञान होता है | वह है उपरोक्त अनुमान । जैसे किसी वस्तु 
के चित्र को देखकर उस वस्ठु का अनुमान करना | अर्थात्‌ जैसे घोड़े 
के चित्र को देखकर यह धोडा है” यह ज्ञान होना । इसी चित्र-ठुराग- 
न्याय" से उपयुक्त अनुमान! होता है। 

(३ ) शिक्षा ओर अभ्यास द्वारा अनुकरणीय३ चेणाओ में नठ, 


३ क--सम्वक्‌ ( यथाथे ) ज्ञान । जैसे, देवदत्त को देवदत्त समझना । 
ख--मिथ्या ज्ञान | जेसे, जो देवदत्त नहीं है, उसको देवदत्त 
समझना । 
ग--संशय ज्ञान । जेसे, यह देवदत्त है या नहीं ९ 
घ--सादृश्य ज्ञान | जैसे, यह देवदत्त के समान है । 
२ चित्र में*ज्जेखे घोड़े को देखकर उसको “यह घोडा है? ऐसा ही 
सच कहते हैं, न कि यह घोडे जेसा है । 
हे शकुन्तलादि की चेप्टाओशो की थक़ल करने में । 


१६७ रस का आस्वादः 





निपुण होता है अतः अभिनय के समय उसे स्वयं यह ध्यान नहीं रहता 
कि मैं किसी का अनुकरण कर रहा हैँ? । उस समय वह अपने को 
दुष्यन्तादि ही समझने लगता है | ओर उनकी सारी अवस्थाओ को भी 
वह अपने में उनके समान ही अनुभव करने लगता है। इस प्रकार 
नाव्य-कला के अभ्यास ओर-- 
“हृग चौंकत कोए चले 'चहुँधा अँग बारहि बार लगावत तू , 

लगि कानन गूजत संद कछू मनो मर्म की बात सुनावत तू ; 

कर रोकति को अधरामृत ले रति को सुखसार उठावत् तू , 

हम खोजत जाति ही पॉति मरे धनि रे धनि मोर कहावत तू ।9४०॥ 


इत्यादि काव्य के अनुसन्धान से वह विभावादिको को प्रकट करता है, 
जिससे नय की चेष्टाएं कृत्रिम होने पर भी कृत्रिम प्रतीत नहीं होती हैं, 
ओर दुष्यन्तादि की रति आदि भावों का सामाजिक अनुमान करने 
लगते हैं | वे रति आदि दुष्यन्तादि के शान से ही अनुमान करते हैं, 
परन्तु रति आदि स्थायी भावों के चमत्कार के प्रभाव से, सामाजिको भ 
रति आदि स्थायी वस्तुतः न होने पर भी, उनको रस का आनन्दानुमव 
होने लगता है। इसी प्रकार न भी यद्यपि दूसरो का अनुकरण ही करते 
हैं, पर्दु शिक्षा ओर अभ्यास के प्रमाव से वे भी अनुकृति के समय हम 
किसी का अनुकरण कर रहे हैं' ऐसा अनुसन्धान नहीं रखते | अतएव' 
उनको भी रसास्वाद होने लगता है। 


भट्ट नायक का भोगवाद 
भरत सूत्र के तीसरे व्याख्याता भट्ट नायक श्रीशक्लुक के 
मत का खडन करते हैं। उनका कहना है कि अनुमान ज्ञान की कल्पना 


१ देखो, नाव्यशासत्र पर श्री अभिनवगुप्तचार्थ की व्याख्या 
अभिनवभारती-गायकवाड संस्करण एवं काव्यप्रकाश चतुर्थ उन्लास् 
संस्करण पछू० २७८ रस प्रकरण | 


चतुथ स्तवक श्क्ष्८ 





सर्वथा निस्सार है | एक व्यक्ति में उद्धत्त रस का अन्य व्यक्ति अनुमान 
से आस्वादन नहीं कर सकता प्रत्यक्ष शान से ही आस्वादन कर सकता 
है। ससास्वाद भी प्रत्यक्ष ज्ञान से ही होता है। रस का न तो  नाव्य पात्रों 
भें अनुमान ही होता है, और न अनुमान से सामाजिको को अपने में 
स्थित हुआ रस प्रतीत होता है। वास्तव में सामाजिकों को भोगात्मक 
रसास्वाट होता है। भट्ट नायक अपने इस मत को स्पष्ट करते हुए 
कहते हैं कि काव्य की क्रियाएँ रस के उदबोध का कारण हैं। काव्य 
शब्दात्मक है। शब्द के तीन व्यापार ह--अमभिधा, भावना ओर भोग। 
अ्मिधा' द्वारा काव्य का अथ समझा जाता है | 
भावना का व्यापार है साधारणीकरण । इस व्यापार द्वारा किसी 
विशेष व्यक्ति म॒ उदभूत रति आदि स्थायी भाव, व्यक्तिगत सम्बन्ध 
छोड़कर, सामान्य रूप मे प्रतीत होने लगते हैं। जैसे दुष्यन्त-शकुन्तला 
आदि के प्रेम से उनका ( दुष्यन्त-शकुन्तला आठि का ) ध्यक्तिगत 
सम्बन्ध न रहकर सामान्य दाम्त्य प्रेम की प्रतीति होना । 
धमोग व्यापार से, भावना के महत्त्व द्वारा, साधारणी-कृत विभावादि 
से सामाजिको को रसास्वाद होने लगता है। भोग का अ्रर्थ है--सच्त्गगुण 
के उठ्रेक) से प्रादुभू त प्रकाश रूप आनन्द का ज्ञान*--आननन्‍्द का 
अनुभव । यह आननन्‍्दानुभव वेद्यान्तरसम्पक-शज््य है। अर्थात्‌ अन्य 


नबी --२ग५>0धी जी, रीयलम 0 ३-९७८१७५८५८५२५२७७८५५१३०९७१५)७०७७)५२४७२७२७००५०२०२५५७७२म यम. 24००० धन तनन 





$ सत्गुण, रजोगुण ओर तमोगुण के उद्गेक ( प्राधान्य ) से 
क्रमशः सुख, दुःख ओर मोह प्रकाशित होते हैं । उद्बेक या प्राधान्य 
का अर्थ हे अपने से भिन्न दो गुणों का तिर्कार के अपना 
आदुभाव करना । सच्चोद्वेंक का शर्थ रजोग्रण, तमोगुण को दबाकर 
सच्चगुण का प्रकाश होना है। सच्तवोद्क का प्रभाव आनन्द का प्रकाश 
करना है। ओर उस आनन्द का अनुभव भोग! है । 

२ 'सच्चोद्े कप्रकाशानन्द्संविद्विश्रान्ति:। 


श्द्दर रस का आस्वाद 





सम्बन्धी ज्ञान से रहित है, अतणव लोकिक सुखानुभव से विलक्षण है, 
आ्योर भोग-व्यापार द्वारा इसका आस्वाद होता है। हु 


भ्रष्ट नायक के मत का निष्कष यह है कि काव्य-नाटको के सुनने 
ओर देखने पर तीन कार्य होते हँ--पहले उसका श्रर्थ समझ में आता 
है, फिर उसकी भावना अर्थात्‌ चिन्तन किया जाता है, जिसके प्रभाव से 
सामाजिक यह नहीं समझ पाते कि काव्य-नाठकों भें जो सुना ओर 
देखा जाता है, वह किसी दूसरे से सम्बन्ध रखता है या हमारा ही है| 
इसके बाद सत्त्वगुण के उठ्रेक ओर आत्मचेतन्य से प्रकाशित" 
साधारणीकृत रति आदि स्थायी भावों का सामाजिक आस्वाद करने लगते 
हैं, यही रस है । 


35०3० ५० ५० ५८४८: 





१ आत्मचेतन्य से प्रकाशितः कहने का भाव यह है कि आत्मा 
ओर शअन्तःकरण दो दर्षण रूप हैं। उनमें आत्मा रूप दर्पण चेंतन्य- 
मय आन-दु-स्वरूप स्वेदा स्वच्छु है, ओर अन्तःकरण रूप दर्पण 
रजोगुण एवं तमोगुण के आवरण से सलिन रहता है। सच्चोद्देक से, 
रजोगुय और तमोगुण दब जाने से, वह ( अन्त.करण रूप दर्पण ) भी 
स्वच्छु हो जाता है। स्वच्छु अन्त;करण रूप दर्पण में जब आत्म- 
चैतन्य आनन्‍दु-स्वरूप दपण का प्रतिबिम्ब या श्रकाश पड़ता है तो वह 
सी आननन्‍द-स्वरूप हो जाता है। स्वच्छु दर्पण में अभिम्नुल वस्तु के 
अतिबिम्ब के पडने से दर्पण का तदाकार हो जाना प्रत्यक्ष सिद्ध ही है । 


चतुर्थ स्तवक कि 





अभिनव गुप्ताचार्य और मम्मटाचार्य का व्यक्तिवाद' 


अभिनव गुप्तावाय! ओर आचाय मम्मट, भद्ट नायक के मत को 
निराधार कहते हैं। इनका मत है कि स्थायी भाव और 'विभावादि का 
व्यंग्य-व्यज्ञक ( प्रकाश्य ओर प्रकाशक ) सम्बन्ध है, अर्थात्‌ सामाजिरकों 
के अन्तःकरण मे जो रति आदि मनोबिकार पहले से ही वासनाः रूप मे 
स्थित रहते हैं, वें विभावादि के संयोग से व्यजञ्ञनाजत्ति के अलोकिक 
विभावन व्यापार अर्थात्‌ साघारणीकरण द्वारा जाग्रत्‌ हो जाते हैं, यहीं 
र्सास्वांद है | 


है 


ये महानुमाव मद्ट नायक द्वारा प्रतिपादित साधारणीकरण को 
मानते है, किन्तु इनका कहना है कि सावना और भोग को शब्द के 
व्यापार मानना निमूल कल्पना हैं । क्‍्यांकि केवल शब्दों द्वारा न तौ 
भावना ही हो सकती है और न भोग ही? । वास्तव में भावना और 
भोग की सिद्धि व्यक्ञना द्वारा व्यज्ञित होकर ही हो सकती है, अर्थात्‌ ये 


मजे जन» जा» जज 





३ ठेखो नाव्यशासत्र पर श्री अभिनव युप्ताचारय की व्याख्या अभिनव- 
भारती, गायकवाड़ संस्करण, ७० २७४-२८१ एवं «्वन्यालोक, निर्स॑य- 
सागर प्रेस संस्क्स, पू० ६७-७० शव काव्यप्रकाक्न, चतुर्थ उल्लास, 
रस प्रकरण । 


२ पहले किसी समय की अपनी रति ( प्रेम-ब्यापार ) आदि कै 


आनन्द के अनुभव का अपने अ्नन्‍्तःकरण में जो संस्कार हो जाता है, 
उसी संस्कार को बासना कहते है । 


३ नच काच्यशब्दानां केवलानों भावकत्वम्‌!'"'** भोगोडपि न 
काध्यशब्देन क्रियते-.ध्वन्यावदोकलोचन, पू० ७० । के 


१७१ रस का आस्वाद्र 


भी अन्ततः व्यज्ञना पर ही अवलम्बित है! | निष्कर्ष यह कि उनके 
अनुसार साधारणीकरण भावना का व्यापार नहीं है, किन्तु व्यज्ञना का 
विभावन व्यापार है। साधारणीकरण के प्रभाव से सहृदय सामाजिक 
विभागादिको में “ये मेरे ही हैं? या 'ये दूसरे के हैं" अथवा “ये मेरे नहीं 
हैं? या 'ये दूसरे के नहीं हैं' इस प्रकार के किसी विशेष सम्बन्ध का 
अनुभव नहीं करते | अर्थात्‌ अपने को ओर काब्य-नाठकों के दुष्यन्त- 
शकुन्तलादि को अपने से अभिन्न समभने लगते हैं, उनको "मै 
दुष्यन्त-शकुन्तला के प्रेम-व्यापार का दृश्य देख रहा हैँ ऐसा ज्ञान नहीं 
रहता, ओर न यही ज्ञान रहता है कि "मै अपने प्रेम-व्यापार का 
आनन्दानुभव कर रहा हैं? अर्थात्‌ सामाजिक काव्य-नाठकों के विभावों के 
प्रेम-ब्यापार का आनन्दानुभव अमभिन्नता से करते हैं। यदि यह कल्पना 
की जाय कि सामाजिका को काव्य-नाठको के दुष्यन्तादि विभावों मं केवल 
अपने ही प्रेम-व्यापार आदि की प्रतीति होती है. तो ऐसा होने मे लजा 
ओर पाप्राचरण ३ आदि दोष आते हैं, ओर यदि यह कल्पना की जाय 
कि सामाजिको को दुष्यन्तादि के प्म-व्यापार का ही आनन्दानुभव होता 


१ ध्यंशायामपि भावनायां कारणाशे ध्वननसेव नितति। भोगकू्त 
रसस्य ध्वननीयप्वे सिद्धो सिध्येत्‌ ( ध्वन्यालोकलोचन, पू० ७० ) 


२ अभिनव गुप्ताचार्य और मम्मट के मतानुसार सहृदय सामाजिक! 
काव्य-नाटकों के ऐसे श्रोता और दर्शक होते हैं जो नायक-नायिका की 
चेष्टा श्रादि से उनकी पारस्परिक रति आदि का अलनुभव करने में सुदत्त 
होते हैं श्रोर जिनको तत्काल ही नाटकादि में प्रदर्शित और वर्णित पात्रों 
की रति थ्रादि का श्रनुभव हो जाता हो | 


६ शकुन्तला आदि सम्मान्य व्यक्लकियों के साथ अपने प्रेम-ब्यापार का 
अनुभव करना पापाचरण है । 


चतुर्थ स्तवक श्ष्र 


है तो प्रथम तो साक्षात्‌ सम्बन्ध न होने के कारण अनन्‍्यदीय प्रेम-व्यापार 
का अन्य व्यक्ति को आनन्दानुमव हो,ही नहीं सकता, दूसरे अन्यदीय 
रहस्य-दर्शन लजास्पद और निन्द है ओर ऐसी दशा में काव्य-नाट्कों 
द्वारा आनन्दानुभव कहोँ ? अतएव़ रस के व्यक्त करने वाले जो 
विभावादि हैं उनम जो रस प्रकट करने की शक्ति है वही व्यक्तिगत 
विशेष सम्बन्ध को हटाकर रसास्वाद करानेवाला साधारणीकरण है। 
इस प्रकार साधारणीकरण का महत्व अमिनव ग़ुप्ताचार्य ओर मम्मठाचार्य 
को भी मान्य है। किन्तु ये उसे भावना का व्यापार न मानकर व्यज्ञना 
का व्यापार मानते हैं। अर्थात्‌ जैसे मिद्टी के नवीन पात्र मे गन्‍्य पहले 
से ही रहती है पर वह अव्यक्त (अप्रकट ) होती है, प्रतीत नहीं होती, 
किन्तु जल का संयोग होते ही वह तत्काल व्यक्त ( प्रकट ) हो जाती है, 
उसी प्रकार सामाजिकों के अन्तःकरण म रति आदि की वासना पहले से 
ही अव्यक्त रूप मे विद्यमान रहती है और वह काव्य-नाटकों के विभावादि 
व्यज्जकों के संयोग से अभिव्यक्त (जाग्रत्‌ ) हो जाती है, ओर वासना 
का जाग्रत्‌ होना ही रसास्वाद है | 


हे ्ै 
रस अलोकिक है 


दुष्बन्त-शकुन्तलादि आलम्बन विभाव, चन्द्रोदयादि उद्दीपन विभाव, 
कणन्षादि अनुभाव एवं त्रीढ्ा आदि सश्चारी यद्यपि लोकिक हैं, तथापि 
काव्यनाटको के अन्तर्गत होने से उनमे विभावन आदि अलोकिक व्यापार 
का समावेश हो जाता हैं। इस अलोकिक व्यापार के कारण ही 
विभावादिकों को अलाकिक कहते हैं | जब विभावादि अलोकिक है तो 
उनके द्वारा व्यक्त रस भी अलोकिक होना चाहिये, क्योंकि कारण के 
अनुरूप दी काय होता है । 


१७ रस की अलोकिक॒ता 





यहाँ यह शड्ढा हो सकती है कि उक्त अलोकिक विभावादि के द्वारा 
श्रुद्धारादि लोकिक रस क्योंकर व्यक्त हो सकते हैं। इस शा का 
निवारण निम्नलिखित विवेचना से हो जाता -है ओर यह सिद्धि हो जाता 
है कि रस का चमत्कार वास्तव मे अलोकिक ही है । 


( १ ) शकुन्तला आदि के विषय मे दुष्यन्त आदि के हृदय _म जो 
रति उत्पन्न हुई, वह साधारण दाम्पत्य रति थी--इसम कोई विशेषता या 
विलक्षणता न होने के कारण वह लोकिक अवश्य थी। यदि काव्य- 
नायकों मे दुष्यन्त-शकुन्तलादि की रति को भी लाकिक मान लें तो वह 
अन्यदीय होने के कारण ( पररहस्य-द्शन लज्जास्पद होने के कारण ) 
रस-स्वाद के अयोग्य हो जायगी। वास्तव मे काव्य-नाठको मे दुष्यन्त- 
शकुन्तलादि की रति, विभावन के अले।किक व्यापार द्वारा अपने 
पराएपन के भेद से रहित होकर--लजास्पद न रहकर--रस का आस्वाद 
कराती है, अतएवं रस अलोकिक है | 


(२ ) दुष्यन्त-शकुन्तला आदि मे जो रति उत्तन्न हुई उसका 
आनन्द दुष्यन्त-शकुन्तलादि तक ही सीमित था । किन्तु काव्य-नाथकों मे 
विभावाहि द्वारा प्रदर्शित रति-स्थायी भाव, जो रस-रूप मे व्यक्त होता है, 
दुष्यन्तादि में व्यक्तितः न रहकर अनेक श्रोता ओर ठृष्ठाओ के द्वारा 
एक ही साथ समान रूप से आस्वादित होता है| अतः वह अपरिमित 
होने के कारण अलोकिक है । 


(३ ) लोकिक पढार्थ या तो ज्ञाप्य” होते है या कार्य-रूप | रस 


बह ८ 2 ५/ध४०६४८5४ ४४८ 20४८४ /४ ३४८४८ 4४०५ ४५८ हे हहटलऔ ढ5 लत 


$ जिस वस्तु का ज्ञान किसी दूसरी वस्तु के द्वारा होता है, उसे 
ज्ञाप्य कहते हैं । जिसके द्वारा किपी दूसरी वस्तु का ज्ञान होता है, उसे 
ज्ञापक कहते हैं। जेसे, श्रन्धेरे में दीपक से घढे आदि का ज्ञान होने में 
घडा ज्ञाप्य हे ओर दीपक ज्ञापक । 


चतुर्थ स्तवक १७७ 


जष्य नहों है | घट-पट आदि लोकिक पदाथ अपने ज्ञापक से ढके जासे 
पर प्रतीत नहीं हो सकते | पर रस अपनी स्थिति में कभी व्यभिचरित" 
नहीं होता | रस न कार्य रूप हो है। चन्दन के स्पर्शका ज्ञान जिस क्षण 
मे होता है, उस क्षण में चन्दन के स्पश से उत्पन्न सुख का ज्ञान नहीं 
हो सकता । अर्थात्‌ कार्य ओर कारण का ज्ञान एक साथ नहीं हो सकता। 
अतएव विभावादिकों को कारण ओर रस को काय माना जाय तो रस 
की प्रतीति के समय विभावादि की प्रतीति नहीं होनी चाहिये । किन्तु 
रस ओर विभावादि तो समूहालम्बनात्मकः हैं--रस की प्रतीति के 
समय विभावादि की प्रतीति भी होती रहती है | अतएव़ रस को कार्य 
नहीं कहा जा सकता । 3 

यदि यह शड्ढडा क्री जाय कि 'रस' काय नहीं है, तो विभावादिकों 
को 'रस” के कारण क्यो कहे गये हैं ? इसका समाधान यह है कि रस 
की चर्बणा ( आस्वाद ) की उत्तत्ति के साथ रस उत्पन्न हुआ-सा और 
चर्वेणा के नष्ट हो जाने पर नष्ट हुआ-सा ज्ञात होता है। वास्तव में 
चवंणा की उत्तत्ति ही रस है| लोक-व्यवहार मे रस को विभावादि का 


१ यहाँ व्यभिचरित का अर्थ 'प्रतीति न होना! है । 


२ अनेक पदार्थों का समह रूप से एक ही साथ प्रतीत होना 
समूहालस्व॒न ज्ञान है | जैसे, घट, पट, लकुटादि बहुत' से पदार्थों पर 
इष्टि जाने पर वे एक ही साथ समूह-रूप से प्रतीत होते है। और जैसे- 
दीपक के प्रकाश में घट-पटादि के साथ दीपक भी ग्रतीत होता है, उसी 
प्रकार रसास्वाद के समय सी, विभाव, अ्रनुभाव ओर व्यभिचारों भाव, 
जो स्थायी भाव को व्यक्र ( प्रकाश ) करते है, स्थायी भाव के साथ 
प्रकाशित होते हैं। 


२७४ रस की अलोकिकता 





कार्य कहना केवल उपचार" मात्र है। 

(४ ) लोकिक वस्तु 'की भाँति 'रस! नित्य नहीं है--नित्य वस्तु 
असवेदन२-काल मे नष्ट नहीं होती, पर रस असवेदन-काल मे नही होता। 
अर्थात्‌ रस की विभावाटि के जान के पूर्व स्थिति नहीं होती। अतएव 
रस अलौकिक है। 


'. (७) लोकिक पदार्थ भूत, भविष्यत्‌ अथवा वतंमान होते हैं । रस 
न तो भविष्य में होनेवाला है, ओर न भूतकालीन ही | यदि ऐसा होता 
तो उसका साक्षात्कार कदापि नहीं हो सकता, क्योकि कल होनेवाली 
वस्तु का या जो वस्तु हो चुकी उसका साक्षात्कार आज नहीं हो सकता; 
ओर न 'रस' को वर्तमान ही कह सकते, क्योंकि वर्तमान वस्ठु या तो 
जाप्य होती है या काय, किन्तु रस न ज्ञाप्य है ओर न काय । 


( ६ ) लोकिक वस्तु के समान 'रसो निर्विकल्पक ज्ञान? का विषय 
नहीं है | निर्विकल्पषक ज्ञान मे नाम, रूप, जाति आदि किसी 
विशेष प्रकार के सम्बन्ध का भान नहीं होता है। किन्तु रस विशेष रूप 
से भासित होता है, अर्थात्‌ रस की प्रतीति मं शद्भार, हास्य, करुण 
आदि रस विशेष रूप से विदित होते है । 


रस सविकल्यक ज्ञान का विषय भी नहीं कहा जा सकता। * 
सविकल्पक ज्ञान के विपय, घट-पटठाटि सभी, शब्द द्वारा कहे जा सकते 


१ किप्ती वस्तु के धर्म का, किसी विशेष सम्बन्ध के कारण, दूसरी 
च्स्तु में प्रतीत होना उपचार है | 

२ ज्ञान के अभावकाल में अ्रर्थात्‌ जब वस्तु का ज्ञान नहीं होता, 
डस समय | & 

३ घट-पट आदि किसी विशेष वस्तु की प्रतीति न होकर सासान्यत; 
“कुछ है! ऐसा प्रतीत होना निर्चिकलपक ज्ञान है। | ' 


चतुर्थ सत्वक १७ 





हैं । किन्तु 'रस' शब्द द्वारा नही कहा जा सकता। अर्थात्‌, 'रसररस 
पुकारने से आनन्दानुभव नहीं हो सकता। जब वह विभावादि द्वारा 
व्यक्त होता है, अथांत्‌ व्यञ्जना द्वारा व्यज्जित होता है, तभी आस्वाद- 
नीय हो सकता है अन्यथा नहीं | यह मी अलोकिकता है। 


(७ ) रस का ज्ञान परोक्ष नहीं | परोक्ष वस्तु का साक्षात्कार नहीं 
हो सकता, किन्तु रस का साक्षात्कार होता है| 'रस' अपरोक्ष मी नहीं है । 
अपरोक्त पदाथ का प्रत्यक्ष होना सम्भव है, किन्ठु रस कदापि दृष्टिगत 
नहीं हो सकता । उसकी शब्दार्थ द्वारा केवल व्यञ्जना ही होती है । 


न्डी पी 


कार्य, ज्ञाप्य, नित्य, अनित्य, भूत, भविध्यत , बतंमान, निर्विकल्पक 
ज्ञान का विपय, सविकल्यक ज्ञान का विषय ओर परोक्ष-अपरोक्ष आदि 
जो लोकिक वस्तुओं के गुणागुण ओर धर्म हैं उन सभी का रसम 
अमाव है। प्रश्न यह होता है कि फिर वह है क्या वस्तु ? ओर 
उसके अस्तित्व का प्रमाण ही क्या है? वस्तुतः रस अनिवचनीय, 
स्वप्रकाश, अखण्ड ओर दुर्ञेय हैं। इसीलिये रसास्वाद को '्रह्मानन्द 
सहोदर”” कहा गया है । जैसे ब्रह्मानन्द का अनुभव विरले योगिराज 
ही कर सकते हैं उसी प्रकार रस का आस्वादन भी सहृदय जन ही कर 


4४+२५०4)व333तनीी तीज जन रस तसतल रस ननी+ तल तत-सीत तय ीभीन- तीन नी न नी सर -39>> न 33 





१ यहाँ ब्रह्मानन्द? से संप्ज्ञात ( सविकल्पक ) समाधि से तात्पर्य 
है | क्योकि उसी से आनन्द और अस्मिता आ्रादि आ्रालम्बन रहते है। 
पातश्षल सूत्र में कहा है--'“वितकेंविचारानन्दास्मितास्वरूपानुगमात्‌ 
सम्पज्ञातः ।?--समाधिपाद, सू० १७। इसी अकार रघप्तास्वाद में भी 
विभावादि आलम्बन रहते है अ्रतएवं संग्रज्ञात समाधि के आनन्द के 


समान ही रसास्वाद कहा जा सकता है, न कि अ्सम्पज्ञात समाधि केः 
समान, क्योकि वह तो निरालम्ब है । 


१७७ रस की अलाकिकता- 





सकते हैं) | ओर रस के अस्तित्व में सहृदय काव्य-मर्मजों की चर्बणा 
अर्थात्‌ रस के आस्वाद का अनुभव ही प्रमाण है। चर्वंणा से रस 
अभिन्‍न है। 


यहाँ यह प्रश्न भी हो सकता है कि यदि आनन्दानुभव को ही 'रस' 
कहा जाता है तो करुण, बीभत्स ओर भयानक आदि द्वारा जब प्रत्यक्षतः 
दुःख, घृणा ओर मय आदि उत्पन्न होते हैं तब उन्हे रस क्‍यों माना 
जाता है ! शोकादि कारणो से दुःख का उत्पन्न होना लोक-व्यवहार है--- 
श्रीराम-वनगमनादि लोक में ही दुःख के कारण होते हैं। जब वे काव्य-- 
रचना मे निबद्ध हो जाते हैं, या नाटिकाभिनय में दिखाए, जाते है, तब 
उनमे पूर्वोक्त विभावन-नामक अलोकिक व्यापार उतन्न हो जाता है। 
अतः विभावादि द्वारा उनसे आनन्द ही होता है, लोक मे चाहे वे 
दुःख के ही कारण क्यो न हों। यदि करुण आदि रस दुःखोत्यादक होते 
तो करुणादि-प्रधान काव्य-नाटकों को कोन सुनता ओर ठेखता ” पर 
ऐसे काव्य-नाठकों को भी, शज्जारात्मक काव्य-नाठकों के समान, सभी' 
सह सुनते ओर देखते हैं। इस विषय मे सह्ृदय जनो का अनुभव 
ही सर्वोत्कृष्ट प्रमाण है। यद्यपि करुण-ग्रधान हस्श्रिन्द्रादि के चरित्रों 
द्वारा सामाजिको के अश्रुपातादि अवश्य होते हैं, किन्द्र वे चित्त के 
द्रवीभूत होने से होते हैं। चित्त के द्रवीभूत होने का कारण केवलः 
दु.खोद्रेक ही नहीं, आनन्द भी है। अत' आनन्द-जन्य अश्रुपात भी 
होते हैं? | 

--क#%२९,-- 
३१ “चुण्यवन्त; प्रपिण्वन्ति योगिवद्धससंततिस्‌” । 
२ “आनन्दामर्षास्यां धूमान्‍जनजुम्भणाक्लयाच्छोकात्‌ । 
श्निमेषप्र त्णतःशीतादरोगारवे दासखम?! 
--नाव्यशासत्र गायकवाड अध्याय ७। १९५३- 


चतुथ स्तव॒क '१७्प 





चतुर्थ स्तवक का ढ्वितोय पुष्प 





रसों के नाम, लक्षण ओर उदाहरण 


से तो है+-- 

( १) श्रज्भार । (२) हास्य । (३ ) करुण | 
/(४ ) रोद्र । ( ) वीर। ( ६ ) भयानक | 
( ७ ) बीमत्स | (८)अड्भत। (६) शान्त । 


कुछ आचायों का मत है कि शान्त रस की व्यञ्जना केवल श्रव्य- 
काव्य म॑ ही हा सकती है, दृश्य-काव्य---नाटकादिको--मे नहीं। किन्तु 
नास्य-शास्त्र म भरत मुनि ने नाव्कादिकों मे मी शान्त रस माना हे" । 
कुछ साहित्याचायों ने उक्त नो रसो के अतिरिक्त प्रेयान्‌ , वात्सल्य, 
लाल्य ओर भक्ति आदि और भी रस माने हैं* । पर साहित्य के प्रधाना- 
चाय भरत मुनि इनको स्वतन्त्र रस नहीं मानते । ध्वनिकार, अभिनव 
गुप्ताचाय आर श्रीमम्मट आदि आचायों ने भी नो ही रस माने हैं | ओर 
'पेयान आदि रस्तो को भाव! के अन्तर्गत वतलाया है। 


( १ ) श्वड्भर-रस 


शड़ार शब्द मे शद्धों ओर आर दोअश हैं। ड़ का अर्थ 


१ “ एवं नवरप्ता द्रष्टा नाव्लज्ञेलच्तणान्विता: ?--नाव्यशासत्र, 
गायकवाड़ संस्करण, अ० ६ ।१०६। 

२ रुद्ृट ने प्रयान्‌ रस ओर महाराज्ञा क्रेज एवं विश्वनाथ ने 
चात्सल्य रस माना है । काव्यप्रकाशादि के मतानुसार ये दोनों पुत्रादिवि- 
पयक रत्ति भाव के अन्तर्गत और भक्कि-रप देव विपयक रति भाव के 
अन्तर्गत है । इस विपय का विस्तृत विवेचन आगे किया जायगा । 


पै७६ अआज्भार रस 


कामोद्रेक ( काम फी वृद्धि ) है। आर' शब्द 'ऋ' धातु से बना है। ऋ 
का अथ गमन है। गति का अथ यहाँ प्राति है। अतः “शज्ञार का 
अथ है काम-इद्धि की प्राप्ति। कामी जनों के हृदय में रति स्थायी भाव 
रस-अवस्था को प्राप्त होकर काम की इृद्धि करता है, इसी से इसका 
नाम शड्ार है। »ड्भार रस को साहित्याचायों ने सर्वोपरि स्थान 
दिया है? । 
$ अग्निपुराण में अन्य सभी रसों का द्वार से ही प्रादुर्भाव 
माना है-- 
व्यभिचार्यादिसासान्याच्छ गारइति गीयते , 
तद्धे दा: काममितरे हास्याद्ा अ्प्यनेकशः ।! 
( श्रपश्मिपुराण, अ० ३४६ | ४, ९ ) 


महाराजा भोज ने शड्रार को ही एकमात्र रस स्वीकार किया है--- 


“शड्वारवीरकरुणाहू तरोद्हास्य- 

बीभत्सवत्सलभयानकशान्तनास्व: , 
प्रम्नासिषुर्दशरसान्सुधियो वर्यं तु 

श्ज्ञासेव रसनाद रसमामनाम; | 
चीराहू तादिषु च येह रतप्रसिद्धिः 

सिद्धा कुतो5पि वट्यकज्ञवदाविभाति , 
लोके गतानुगतिकत्ववशादुपेता- 

मेतां निवर्तयितुमेष परिश्रमो नः ॥? 


( शज्भारप्रकाश ६ । ७ ) 
ध्वनिकार ने भी कहा है-- 


अज्भजारसो हि. संसतारिणां नियमेनानुभवविषयत्वात्सवेरसेम्य: 
“कमनीयतया ग्रधानभूतः! ( ध्वन्यालोकदृत्ति, ३।३६ पृष्ठ १७६ ) 


चतुथ स्तवक १८० 





आतलम्वन | 
नायिका और नायक | इनके निम्नलिखित भेद हैं । 


नायिका 
| | | 
स्वकीया परकीया सामान्या 
शक ब। . जवरीरशिलि 2: मर्द 
[ [| .। | | 
मुग्धा मध्या प्रोढा ऊढा अनूठा 


| | 
जेष्टा कनिष्ठा 


| | | 
हे शक सम 


साला 2रीपरमाफसक.. 





अवस्थानुसार 





कण आय गा पा 
ग्रोषित- खण्डिता कलहा- विप्र- उत्का या वासक- स्वाधीन- अमि- 
पतिका न्तरिता लब्चा उत्क- सजा पतिका सारिका 
ख्ठिता 





श्८१ नायिका भेद 


(१३) स्वकीया) के भेद-- 
१ मुग्धा*े 
६ मध्या --- 
३ ज्येष्ठा“--घीरा", अधीरा' ओर धीराधीरा* | 
३ कनिष्ठा“--धीरा, अधीरा ओर धीराधीरा । 
६ प्रौढा*-- 
३ ज्येश--धीरा *, अधीरा” * ओर धीराघीरा१ ? | 
३ कनिष्ठा--धीरा, अधीरा ओर धीराघीरा। 
(६ २ ) परकीया१ ३ के भेद--ऊढा?४ (या पस्ेढा ) ओर अनूढा"* 
( १ ) सामान्या | 
ये प्रत्येक सोलह नायिकाएँ, अवस्था-मेद से, प्रोषितपतिका"४, 


३ पतित्रता। २ अह्ू रिवयोचना । ३ जिसमे कज्या शोर कास 
समान हो । ४ जिस पर पति का अधिक प्रेम हो । € श्रन्यासक्न नायक 
पर सपरिहास चक्रोक्लि द्वारा कोप प्रकट करनेवात्नी । ६ अन्यासक्त नायक 
को कठोर वाक्य कहनेवाली । ७ अन्यासक्व नायक के सम्मुख रुदन करके 
'कोप सूचित करनेवाली । ८ जिस पर पति का न्यून प्रेस हो। & केलि- 
कलाप-प्रगहु्भा । १० अन्याप्तक्त नायका की बहिरूप से आदर, किन्तु 
चास्तव सें उऊदासीन | ११ अन्यासक्त नायक का ताड़न करनेवाली | १२ 
अन्यासक्त नायक को वक्रोक्नि द्वारा दुखित करनेवाली। १३ प्रच्छन्न 
अन्यपुरुष आसक्रा । १४ अ्रन्य पुरुष की विवाहिता । १९ अविवाहिता, 
'पिता आदि के वशीभूत रहने से परकीया है। 8६ वेश्या4 १७ जिसका 
लायक प्रवासी हो । 


चतुर्थ स्तवक श्पर 





खरिडिता*, कलहान्तरिता*, विप्रलब्धाः, उत्का ४, वासकसज्जा",, 
स्वाधीनपतिका* ओर अमिसारिका , आठ प्रकार की होती हैं८ | अतः 
इस प्रकार १२८ भेद होते हैं । इन १२८ के प्रकृति के अनुसार तीन-तीन 
भेद--उत्तमा*, मध्यमा)" ओर अधमा? * होते हैं । इस प्रकार 
नायिकाओ के श्८४ भेद हैं । 


उपयुक्त प्रत्येक सोलह नायिकाओं के, अर्थात्‌ तेरह प्रकार को 
स्वकीया, दो प्रकार की परकीया ओर एक सामान्या के, स्वभावानुसार 





4 परस्री-संसर्ग के चिह्लो से चिह्दित नायक को देख ईंष्या-कलुषित 8 
२ प्रार्थी नायक का अनादर करके पश्चात्ताप कानेचाली । 

३ नियुक्त स्थान पर नायक के न आने से अपमानिता | 

४ रंकेत करने पर भी नायक के कारण-वश न आने से चिल्तित'। 


४ नायक का आना निश्चयात्मक जान कर शशज्ञारादि से विभूषिता 
होनेवाली । 


६ गुणों से अ्रनुरक्त होकर नायक जिसका श्राज्ञानुकारी हो । 
७ कामातें होकर नायक के समीप जानेवाली या उसको बुलानेवाली । 
रे दो अवस्थाएँ श्र हैं--प्रवत्स्यतप्रयसि ( जिसका नायक 
प्रवास के लिये उद्यत हो ) और आगतपतिका ( नायक के प्रवास 
से आने के समय हर्वित होनेवाली )। किन्तु ये अप्रधान हैं । 
£ नायक के अन्यासक्र होने पर भी उसफी हितचिन्तका। 
१० नायक के हितकारी या श्रनहितकारी होने पर तदनुसार। 
११ सदेव हितकारी नायक के विषय में भी श्रहितकारिणी । 


१्८घ३्‌ नायिका भेद 


अन्यसम्भोग-दुःखिता?, बक्रोक्चिगर्विता* ओर मानवती” ये तीन-तीन 


भेद ओर हैं” । 


मुग्धा के भी चार भेद ओर हैं--शातयोवना", अजातयोवना+; 
नवोढा» ओर विश्रव्ध नवोढा । 


प्रौंढ़ी के क्रियानुसोर दो भेद्द हैं--रतिप्रिया* ओर आनन्द- 
सम्मोहिता? ? | 


१ अ्रपने नायक के खाथ रमण करके आई हुईं अन्य नायिका कोः 
देखकर दुःखित होने वाली । 

२ अपने रूप भौर नायक के प्रेम का गर्व रखने वाली । 

ह अश्रन्यासक्त नायक पर कुपित होने वाली । 

४ नायिकाओं के ये सभी भेद भानुदत्त-कृत रसतर्ञिणी' के श्रनुसार* 
हैं। साहित्य-दर्षण आदि में प्रायः ये ही भेद माने गये हैं। 

& योवन के आगमन का जिसे ज्ञान हो 

६ योवन के आगमन का जिसे ज्ञान न हो । 

७ लज्जा ओर भय के कारण जिसकी रति पराघीन हो । 

८ नायक के विषय में जिसको कुछ विश्वास हो । 

8 सम्भोग में प्रीति रखने चाली । 

१० रतिआनन्द से सम्मोहित होने वालो । 





नायक तीन प्रकार के होते हैं--पति, उपपति* और वेशेषिक" * । 
'पति चार प्रकार के होते हैं--अनुकूल" १, दक्षिण", घृष्ट* 5, ओर 
शुठ*१< | उपयति ओर वेशेपिक के कोई उपभेद नहीं होते हैं । “ 





4 भूत, वर्तमान और भावी प्रेम-व्यापार को छुपानेवाली | 

२ वचन और क्रिया के चातुर्य से नायक को सझेत करनेवाली । 
३ जिसका प्रम-यापार सखियों को प्रकट हो गया हो । 

४ सहज त स्थान के नष्ट हो जाने से दुखित होने वाली । 

& भावी सह्तत स्थान के लिये चिन्ता करनेवाली । 
“ सह्ल त स्थान पर किसी कारण-वश न पहुँच सकनेवाली । 

७ अनेको मे आसक्ल । 
मे मनोवान्छित बाते सुनकर हर्षित होनेवाली | 

£ अन्य नायिका श्रनुरक्‍्त । 

4० व्यभिचारी। 

११ अपनी पत्नी में सदा अनुरक्ष रहनेवाला 4 

१२ अनेक नायिकाओं में स्वाभावतः समान अनुराग रखनेवाला । 
१३ अपराध करने पर अ्र्यल्त तिरस्कृत होकर भी नायिका से विनय 

ऋरनेवाला । 
१४ अपराधी होने पर भो नायिका को टगने में चतुर । 


"१५ उद्दीपन ओर अनुभाव 





' उद्दीपन विभाव ! 
नायिका की सखी--इनके मण्डन, शिक्षा, उपालम्भ ओर परि: 
झास आदि काय | 


नायक के सहायक सखा--इ्नके चार भेद हैं--पीठमद १ , विट * 
चैट) ओर विदूषकर्ट | ' 
दूती--इनके उत्तमा, मध्यमा, अधमा ओर स्वयदूतिका भेद हैं । 
इनके सिवा पटऋत॒, वन, उपवन, चन्द्र, चॉदनी, पुष्प, पराग, 
अमर ओर कोकिलादि पक्तियों का सुज्ञार एवं निनाद, मधुर गान, वाद्य, 
नदी-तठ, सरोवर, कमनीय केलि-कुज्ञ आदि आदि चित्ताकषक सुन्दर 
चख्ुएँ | 
अनुभाव । 
अनुराग-पूर्ण पारस्परिक' अवलोकन, अश्र-भज्ञ, भ्ुजाक्षेप ( हस्त- 
सद्चालन ), आलिंज्जन, रोमाश्च, स्वेद ओर चाटुता आदि असख्य 
: ऋग्रिक, कचिक एवं मानसिक | 


ज्रियों की योवनावस्था के निम्नलिखित अनुमाव रूप २८ अलड्लार 
मुख्यतया माने गये हैं जिनमें ३ अद्भज, ७ अयत्नज और १८ स्वमावज हैं। 
अद्वज अलझ्लार--शरीर से सम्बन्ध होने के कारण इनको अद्भज 
कहते हैं। ये तीन प्रकार के होते हँ--- 
९ भाव--निर्विकार चित्त में प्रथम विकार उत्पन्न होना । 
२. हाव”--मभकुटि तथा नेत्रादि की चेष्टाओं से सम्भोगञ् मिलाषा- 
' सूचक मनोविकारों का कुछ प्रकट किया जाना । 


जज 2 ५ + ५४ ५3 ५० ५४ ५४ ५ध तल ५८ ५० ५२ 5त 523 2 3ध५ध 34 ५ञ५ध आधा 


६ कुषित नायिका को प्रसन्न करने की चेष्टा करने वाला । 

२ कामतन्त्र की कल्ला में निषुण । 

3 नायक और नायिका के संयोजन में चतुर | 

छ अड्जादि की विकृत चेष्टाशों से हास्य उत्पन्न करनेवाला | 
१० 


चतुथ स्तवक (पक 





झ् 


है 


“'हेल्ा--उपयु क्त मनोविकारों का अत्यन्त स्कुट होकर 
लक्षित होना । 


अयकल्लज अलक्लार--ये कृतिसाध्य न होने के कारण अयल्जज कहे 
जाते हैं ओर ये सात प्रकार के होते हैं-- 


१ 


#< ०८ 0 »(0 


६ 


७ 


शोभा-रूप, यौवन, लालित्यादि से सम्पन्न शरीर 
की सुन्दरता | 

'कान्ति--विलास से बढ़ी हुई शोभा । 

दीप्रि--अति विस्तीर्ण कान्ति । 

'साधुय!--सब दिशाओ में रमणीयता । 


ध्रगल्मता'--निर्मबता अर्थात्‌ किसी प्रकार की श॒ज्ला का 
न होना । 


आओदाय'--सदा विनय भाव | 
ध की । वि अचशञझल 
धय--आत्मश्लाघा से युक्त अचञ्जल मनोइत्ति । 


स्वभावज अलकझ्कार--ये ऋतिसाध्य हैं ओर अठारह प्रकार के 
होते ईँ--- 


१ 


लीला'--प्रेमाघिक्य के कारण वेष, अलड्ढार तथा प्रेमालाष 
द्वार प्रियतम का अनुकरण करना | 

'बिलास*--प्रिय वस्तु के दशनादि से गति, स्थिति आदि 
व्यापारों तथा मुख-नेत्रादि की चेशओं की विलक्षणता । 
'(विच्छित्ति---क्रान्ति को बढ़ानेवाली अल्प वेप-रचना ।) 
“वविव्वोक'--अ्रति गयव॑ के कारण अमिलषित वस्तुओं का भी 
अनादर करना | 

'किलकिव्चित'--अ्रतिप्रिय वस्ठु के मिलने आदि के हफ से 
मन्दहास, अ्कारण रोदन का आभास, कुछ हास, कुछ त्रास, 
कुछ क्रोध ओर कुछ श्रमादि के विचित्र सम्मिश्रण का एक ही 
साथ प्रकट होना । 


श्प७ -अनुभाव 





&६ 'मोद्रायित'--प्रियतम की कथा सुनकर अनुराग उत्यन्न होना। 


७ कुट्टमित---केश, स्तन और अधघर आदि के गअहण करने पर 
आन्तय हृ् होने पर भी बाहरी घबराहट के साथ शिर ओर 
हाथों का परिचालन करना | 

मे विश्रम--प्रियक्‍म के आगमन आदि से उत्पन्न हर्ष और 
अनुराग आदि के कारण शीघ्रता में भूषणादि का स्थानान्तर 
पर धारण करना | 

- £ लिलित”-अश्रज्ञों को सुकुमारता से रखना | 

१० मद!--सोमाग्य और योवन आदि के गब॑ से उत्पन्न मनो- 

विकार होना । 

११ “'विहृत---लजा के कारण, कहने के समय भी कुछन 

कहना । 


१२ तिपन-प्रियतम के वियोग में कामोहंग की चैशओ 
का होना । 

१३ 'मोग्थ्य--जानी हुईं वस्तु को भी प्रिय के आगे अनजान की 
तरह पूछना । 

१४ विक्षेप--प्रिय के निकट भूषस्खें की अधूरी स्वना और 
विना कारण इधर-उधर देखना, धीरे से कुछ रहस्यमयी बात 
कहना । 

१४ 'कुतूहल?--रमणीय वस्तु देखने के लिये चश्चल होना | 

१६ 'हसित'--योवन के उद्गम से अकारण हास्य। 

१७ शविकित'--प्रिय के आगे अकारण डरना या घबराना | 

१८ किलिः--प्रिय के साथ कामिनी का विहार। 

व्यभिचारी । 
उग्रता, मरश ओर जुग॒ुप्सा के अतिरिक्त अन्ध सभी निवंदादि | 


चतुथ स्तवक ' श्य८ 





- सम्भोग-श्ज्ञार में निर्वेदादि कुछ सद्चारी मावों का, जो प्रायः दुःख 
से उत्न्न होते हैं, होना सम्भव नहीं है, परन्ठु विग्रलम्म इद्भार से निववेद, 
ग्लानि, अग्नया, चिन्ता, व्याधि, उन्माद, अंपस्मार ओर मोह आदि 
भावों का प्रादुर्भाव होना स्वाभाविक है। अतः यह प्रश्न हो सकता है 
, कि »द्भार का स्थायी भाव जो 'रति! है उस में करुण के निवेदादि भावों 
का प्रादुर्भाव, किस, प्रकार होता है ! भरत मुनि कहते हैं कि करुण में 
निर्वेदादि भाव रति-निरपेक्ष होते हैं, अर्थात्‌ पुन्मिलन की आशा का 
अमाव रहता है | विप्रलम्म-श्रज्भार में ये:( निवंदादि भाव ) रति-सापेक्ष 
होते हैं, अर्थात्‌ इसमे पुनमिलन की आशा! बनी रहती है । इसलिये इन 
भावों का छद्भार मे प्राहुर्माव होता है। बस करुण ओर शज्ञार में 
उत्पन्न होनेवाले कुछ-निवंदादि सश्चारी भावों म यही भेद रहता है | 


स्थायी भाव । 


'रति | रति का अर्थ है--'मनोनुकूल वस्तु मे सुख प्राप्त होने का 
ज्ञान, अर्थात्‌ नायक ओर नायिका का पारस्परिक अनुराग-:प्रेम ।? 


श्रद्धासुस्स के प्रधान दो भेद हँ--सम्मोंग-शछाड़ार और चिप्रलग्भ 
( वियोग ) शयज्ञार | जहों नायक-नायिका का सयोग-अ्रवस्था में प्रेम हो 
वहाँ संयोंग, ओर जहाँ वियोग अवस्था मे पारत्यरिक अनुराग हो वहाँ 
विप्रलम्म होता है। संयोग का अथ नायक-नायिका की एकत्र स्थिति- 
मात्र ही नहीं है । क्योंकि समीप रहने पर भी मान अवस्था में वियोग 
ही है। अतएणव सयोग का अथ है सयोग-सुख की प्राप्ति ओर वियोग का 
अथ है संयोग-सुख की अप्राप्ति | 

सम्भोगखइड्भरर 

नायकनायिका का पारसधरिक अवलोकन, आलिड्रन आदि सम्भोग- 

शद्वार के असख्य भेद हैं। इन सबको सम्भोग-श्ड्भार के अन्तर्गत ही 


श्८६ सम्भोग खूज्ञार 





माना गया है | उपयुक्त सभी आलम्बन और उद्दयौपन विभावों का इसमे 
वर्णन होता है। सम्भोग-श्शज्ञार कहीं नायिका द्वारा आरब्ध , और कहीं 
नायक द्वारा आरब्ध होता है । हु 


नायिकारव्घ सम्भोग-शृद्वार । 


लखि निर्मन भोन उठी परजंक सो बाल चलो सनक ) ललचायके , 
छुल सो दृग-मीलित पी-मुख कौ? बढ़ी देर लीं देखि हिये हुलसायकी । 
सुख चुवन लीन्ह, कपोल लखे पुलके, भइ नम्न-सुखी सकुचायके ; 
हँसिके पिय ने वा नितंबनि को तब चुबन की चिर लो मनभायके १४१ 
यह नव-वधू के सम्भोग-श्रज्भार का वर्णन है। नायक आलम्बन 

है, क्योकि नायक को देखकर नायिका को अनुराग उत्पन्न हुआ है। 
(रति' स्थायीभाव का आश्रय नायिका है । स्थान का निजन ( एकान्त ) 
होना ओर तरुण एवं सुन्दर नायक का चित्ताकर्षक्र दृश्य उद्दीपन है, 
क्योकि यह उस उत्पन्न रति को उद्दीपन करता है | नायक के मुख की 
ओर देखना, इत्यादि अनुभाव हैं, क्योकि इनके द्वारा ही नायिका के 
चित्त में उत्पन्न रति का बोध होता है | “सनके ललचायके' मे शड्ला के 
साथ ओत्सुक्य, मुख को बडी देर लो देखि' मे केवल शद्जा ओर 
“नम्रमुखी! मे ब्रीडा व्यभिचारी हैं | इनकी सहायता से श्रज्ञार-रस की 
व्यञ्जना होती है। यहों नायिका ने उपक्रम किया है, अतः नायिका- 
रव्घ है । 

अति सुदर केल्नि के मंदिर में परजंक पे पासहु सोय रही , 

नव-योवन-रंग तरंगन सो छुवि अंगन मॉँहि' समोय रही । 

हिय के अभिलाखन चाखन को न समर्थ प्रिया जिय गोय रही ; , 

कछु मीलित से दृग-कोरन सो पिय के मुख श्रोरन जोय रही ।१४२ 


3०७१ ७८७० ५० ५ढ तट ५८१ ५ध ५३ ५ध घध भञध 5ध ५ध भध थट ५३ ५ध ५४ ७० ५७३ध ५३ २८४ +त ७तध ५ञ भ> 


३ धीरे से। २नोंद के बहाने से आँखें मीचे हुए प्रियतम के 
सुख को । 


चतुर्थ स्तवक १६० 





यहाँ नायक आलम्बन है। एकान्त स्थान और नायक का मनोहारी 
दृश्य उद्दीपन है | अधमिची ओखों से देखना अनुभाव ओर घीढा, 
आत्सुक्य आदि सश्चारी भावों से परिपुष्ट रति स्थायी की शृद्धार-रस में 
व्यञ्ञना होती है । 
नायकारव्ध संयोग-श्ृड्भर । 
कंचुकी के बिन ही मुग जोचनि ! सोहत तू श्रति ही मनभाइन ; 
प्रीतम यो कहिके हँसिके अपने करतें लगे बंध छुटावन । 
सस्मित बंक-विल्लोकन के छिंग देखि अ्लीन लगी सकुचावन ; 
ले मिस झूठी बना बतियाँ सखियाँ सनके जु लगी उठि धावन ।१४३ 
यहों नायिका आलम्बन है। उसकी अडद्भ-शोभा उद्दीपन है। 
कच्चुकी के खोलने की चेश अनुमाव ओर उत्कण्ठा आदि व्यभिचारी 
हैँ | नायक ने उपक्रम किया है, अतः नायकारब्ध है । 
कहीं-कहीं रति भाव की स्थिति होने पर भी शरज्ञारःरस नहीं होता 
है । जैसे-- 
“मेरी भत्र-बाधा हरो राधा साथव सोहइक्‍ ; 
जा तन की कोई” परे स्थाम हरित दुति होइ १४४ 


“गिरा श्र्थजल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न; 
चंदो सीता-राम-पद जिनहिं परस प्रिय खिन्न !१४६ 
« ७, » र < ५ 
इन दाहों म श्रीराघिकाजी और श्रीकृष्ण का, तथा श्रीसीताजी आ्रौर 
श्रीरथुनाथजी का परस्पर पूर्णतया प्रेममय होना व्यज्ञित होता है, अर्थात्‌ 
यहां 'रति! की स्थिति हैं | अप्पय्य दीक्षित” आदि ने ऐसे वर्णानों भे 
श्रज्ञाररस ही माना है। परिडतराज जगन्नाथ का इस विषय में मतभेद 


३ चित्र मीमांसा, पृष्ट र८। श्रो! हेमचन्द्र का काज्यानुशासन, 
पू० छ३रे | 


१६१ विप्रव्नम्भ शृद्भार 





है। उन्होने अपने मत के प्रतितादन में बहुत मार्मिक विवेचन किया है । 
परिडतराज के अनुसार राधा ओर श्रीकृष्ण एवं सीवा और श्रीराम के 
इस पारस्परिक प्रेम-वणन में, रति प्रधान नहीं है, किन्तु 'मेरी-मव-बाघा 
हरो” आदि द्वारा युगल मूर्ति की वन्दना करना कवि को अमीष्ट है। 
अतः यहाँ देव-विषयक रति भाव प्रधान है" | अतएवं ऐसे वणनों में 
साव ही समझना चाहिए, न कि »द्भारर्स | इसका विशेष स्पष्टीकरण 
आगे भावप्रकरण मे किया जायगा । 


[4 
विग्नन्ञस्म-श् ड्ञार 
इसमें शद्ढा; ओत्सुक्य, मद, ग्लानि, निद्रा, प्रबोध, चिन्ता, असूया, 


निवंद, स्वप्न आदि व्यभिचारी भाव होते हैं | सन्ताप, निद्रा-भड्, कृशता, 
प्रलाप आदि अनुभाव होते हैं| इसके निम्नलिखित भेद होते हैं--- 


--अभिलाषा-हेतठुक -+ -अभिलाघा 
--चिन्ता 
ईध्या-हेतुक --+ स्मृति 
तर ->गुण-कथन 
विप्रलम्भ-श्य जार 5 नल 7 -++उद्देग 
न्‍ य 
--प्रवास-हेतुक. +-- ः --उनन्‍्माद्‌ 
्>व्याधि 
--शाप-हेतु क लन्ड +“जडता 
म्रति 


१ २प राजनचर पृू० ३४७ । 


चतुथ स्तवक १६२, 


(९ ) अभिज्ञाषा-हेतुक वियोग" .। 
गुण-अ्वण-जन्य' का उदाहरण-- 
“जब तें कुमर कान्‍्ह ! रावरी कला-निधान 
वाके कान परी कछु सुजस कहानी-सी ; 
तब हीं सो देव” देखो देवता-सी हँसत-सी, 
खीजत-सी रीकत-सी रूसत रिसानी-सी ; 
छोही-ली छुली-सी छीन लीनी-सी छुली-सी, छीन । 
जकी सी टकी-सली लगी थक्री थहरानी-सी ; 
विधि-सी बिंदी सी विप-बूडत विमोहत-सी, 
बेंडी वह बकत -विलोकत बिकानी-सी |? १४६ 
यहाँ श्रीकृष्ण के गुण-श्रवणु-जन्य पूर्वानुराग है। श्रीकृष्ण आलम्बन, 
गुणु-श्रवण उद्दीपन, हसत-सी”, 'खीजत-सी इत्यादि अनुभाव, उत्कण्ठा; 
चिन्ता आर व्याथि आदि सज्ञारी हैं । 

(चित्र-दशेन-जन्य! का उठाहरण-- 

“हू ही भ्लुज्ञानी के भूल्यो सब कोई भूल को मंत्र समूल सिख्यों सो ; 
भोजन-पान भुलान्यो सत्रे सुख स्वैवों सवाद विषाद व्रिख्यों सो। 
चित्र भई हों विचित्र चरित्र न चित्त चुभ्यो अबरेख रिख्योसी। 
चित्र लिख्यो हरि-मित्र लख्यो तब ते सिगरो ध्रज चित्र लिख्यो सो [7१४७ 

यहाँ चित्र-दशन-जन्य अमिलापा से उत्पन्न वियोग-दशा का वर्णन है । 
स्प्न-दर्शन-जन्य' का उदाहरण-- 


३ सीन्दर्यादि गुणो के सुनने से, स्वप्न में अथवा प्रत्यक्ष दर्शन से, 
एवं चित्र दर्शन से, पररुपर से अनुरक्त नायक और नायिका का मिलने 
के पहिले का श्रनुराग अथवा अप्राप्प समागम के कारण मिलने की 
उन्कट इच्छा । 


१६३ विप्रलम्भ खद्गार 


“सेटत ही सपने से भट्ट चख चंचल चारु अरे के अरे रहे , 
त्यों हँसिके अ्रधरानहु . पे श्रधरानहु वे जु- धरे के धरे रहें।” 
चौंकी नवीन चकी उम्ककी मुख सेद के बूंद ढरे के ढरे रहे ,: 
हाय खुलीं पलके पल में ! हिय के अभिलाष भरे के भरे रहे ।१४प८ 


प्रत्यक्ष दशेन-जन्य' का उदाहरणु-- 


“करत बतकही अनुज सन मन सिय-रूप लुभान , 
मुख-सरोज-मकरं द-छुबि करत मधुप इव पान ।?१४६ 


यहाँ श्रीरघुना थजी को जानकीजी के प्रत्यक्षु दर्शन से उत्पन्न अमिलाषा है।' 


- “आनि कद़यो इहिं गेल भट्ट महिमंडल में श्रलबेलो न झओर है , 
देख्त रीक्चि रही सिगरी सुख-साधुरी कोहू कछू नहिं छोर है। 
बेनोप्रवीन! बढे-बवडे लोचन बॉकी चितोन चलाकी को जोर है; 
साँची कहें ब्रज की युवती यह नंदलडोतो बढ़ो चितचोर है ।?”१४६० 

“आज लीं देख्यो न कान सुन्यो कहूँ शचके आवत गेल निहारो , 
त्यों लछिराम” न जानि परथो हमें आँखिन बीच बस्यो के श्रखारो । 
मूरति माधुरी स्थास घटा रझेच पीत-पटी छुन जोति को चारो; 
हास की फाँसुरी डारि गरे मन ले गयो यथा बन बॉसुरीवारों /?१९$ 


यहाँ भी प्रत्यक्ष द्शन-जन्य अभिलापा है | 


(२) इष्यौ-हतुक वियोग" । 


4 मान के कारण वियोग । इसके दो भेद्‌ हैं--प्रणयमान (अ्रकारण 
कुपित नायक या नायिका का समान ), और ईंर्ष्यामान ( अन्य नायिका- 
सक्न नायक पर कुपित नायिका के मान के कारणं वियोग )। इं्ष्यामान 
के भी दो भेद हैं--भत्यक्ष दर्शन से ( नायक को श्रन्यासक्त प्रत्यक्ष 
देखने ले ), ओर अनुमान से या सुनने से । . 


चतुथ स्तवक १६४ 


अशुय-मानच का उद्ाहरख्‌-- 
“बोली हँसौ विहँसौ न विलोकौ, तू मौन भू यह कौन खयान है ; 
चूक परी सो बताय न दीजिए, दीजिए आपुन को हमैं आन है। 
प्रानप्रिया ! बिन कारन ही यह झूसिबो “बेनी अबीन' अयान 


7] 
तो 


छो निःमूल विलोकिए राधिके, अंबर-बेल ओऔ रावरो मान है ।?१५२ 
यहाँ राधिकाजी का प्रणयमान हे । 


याही लता-गृह में सिय को तुम मारग नाथ ! रहे हे विलोकत ; 
खेलत राज-मरालन सो सरिता-तट ताहि विलंब भयो तित। 
आवबत ही कछु दुर्मन से तुमकों लखिके वह व्याकुल छ्वी चित ; 
कोमल-कंजकली-सम संजु सु अंजुलि जोरि अनाम कियो इत १४३ 


सीताजी का त्याग करने के पश्चात्‌ श्रीरथुनाथजी जब शम्बूक का वध 
करके दण्डकारण्य से लोट रहे थे, उस समय वनवासिनी वासन्ती को 
श्रीरधुनाथजी के प्रति यह उक्ति है। धनज्ञय ने अपने दस रूपकर में एवं 
हेमचन्द्राचाय ने अपने काव्यानुशासन में इस पद्च में प्रणय-मान वियोग 
माना है, किन्ठु हमारे विचार में यहाँ प्रण्यमान की अपेक्षा स्मृति की 
व्यञ्जना प्रधान है, अतः 'स्मृति' भाव है--न कि प्रणयमान । 
डेष्यी-मान का उदाहरणु-- 
“ठाढ़े इते कहुँ मोहन मोहिनी, आई तिते ललिता दरसानी ; 
हेरि तिरीडे तिया-तन माधव, माधवे हेरि तिया सुसकानी । 
यो 'नंदरामजू” भामिनी के उर आइगो सान लगालगी जानी ; 
रूठि रही इमि देखिक्रे नेन कछू कहि बेन बहू सतरानी १४४ 
इसमें प्रत्यक्ष दर्शन-जन्य ईर्प्या-मान है। 
“सुरंग महावर सौंति-पग निरख रही अनखाय ; 
पिय अग्रुरिय लाली लखें खरी उठी लगि लाय ॥7१ २४२ 


५१६४ विप्रलम्भ झड़ढगर 


यहाँ सपलि के प्रेम-व्यापार के चिह्ो के अनुमान से उत्पन्न मान है। 
यह उद्दग-दशा” का वर्णन है । 

जहाँ अनुनय के प्रथम अर्थात्‌ मान छुटने का अवसर आने तक 
मान नहीं ठहर सकता है, वहा इर्ष्या-हेतुक विप्रलम्भ-श्शद्भार नहीं होता 
है, प्रत्युत सम्भोग-सञ्जारी भाव मात्र होता है। जैसे-- 

टेढ़ी करो” भूकुटीन तऊ दग ये उतकंठ भरे बनि जावतु , 

मोन गहौी' रु चहो' रिस्र पे जरि जानो अरी ! मुखहू सुसकावतु । 

चित्त करो' हो' कठोर तऊ पुलकावलि अश्रंगन में उठि आवतु ; 

केसे बने सजनी पिय सो अब तू ही बता फिर मान निभावतु ।१३९६ 


यह मान करने की शिक्षा देनेवाली सखी को मान करने मे सफल 
न होनेवाली नायिका की उक्ति मे सम्भोग-सश्जारी भाव है। 


६ ३ ) विरह-हेतुक वियोग" । 
“कूजत कंज में कोकिल त्यों मतवारे मलिंद घने अठके हैं ; 
संक सदा गुरू लोगनि की चलजूह चवाइन के फटके हैं। 
ए मनभावरी में 'लक्किराम” भरे रंग लालच में लठके हैं ; 
या कुल-कानि-जहाज चढ़े च्रजराज विलोकिब्रे में खटके है ।?१९७ 
यहाँ गुरुजन आदि की लजा के कारण वियोग है | 
“देखें बने न देखिब्रो अनदेखें अकुलाहिं ; 
इन दुखिया अखियान को सुख सिरज्ञोही नाहि ।?११८ 
(४ ) प्रवास-हेतुक वियोग* । 
१ समीप रहने पर भी गुरुजनों की लज्यणा के कारण समागम का 
न होना | 
२ नायक या दसायिका में से एक का विदेश में होना। यह तीन 
अकार का होता है--भूत, भविष्यत्‌ ओर चर्तंमान | 


चतुथ स्तवक १६६." 


!' भ्रविष्येत् प्रवांस-- ः 
“ऐसेहु बचन कठोर सुनि जो न हृदय बिलगान ; 
तो प्रशु-विषम-वियोग-दुख सहिह पामर प्रान ।?१५६॥ 
श्रीरघुनाथजी की भावी वनन्यात्रा के समय श्रीजानकीजी की वियोग- 
व्यथा का वर्णन है। 

“पिन जाउ पिया ! यों कहौ' तुमर्सो तो तुम्हे बतियाँ यह दागती है 
इहॉँ चंदन में घनसार सिले सु सबे' सखियाँ तन पागती हैं। 
कवि “वाल” उहाँ कहाँ कंज बिछे औ न मालती संजुल जागती हैं ; 
तजेके तहखाने चले तो सही पे सुनी मग में लुबै' लागती हैं ।7३६० 

यहाँ भी भविष्यत्‌ प्रवास है । 
वर्तमान प्रवास-- 
कंकन ये कर सा जु चले अँसुवा ऑअंखियान चले ढल हैं ; 
धीरज हू हियरे सो चलयो चलिबे चित हो रहो विह्नल हैं। 
पीतम भोन सो गौन करे सब ही यह साथ परे चल हैं ; 
प्रान ! तुम्हे हू तो जाइबो है फिर क्यों यह साथ तजो भत्ल हैं १६% 


यह प्रवत्स्यत्पतिका नायिका की अपने प्राणो के प्रति सोपालम्म उक्ति 
है। नायक के प्रवास के लिये उद्यत होने के कारण वतंमान प्रवास है। 
“बामा भामा कामनी कहि बोलो प्ानेस , 
प्यारे कहत लजात नहिं पादस चलत विदेख ।?१६२॥ 
| भी प्रस्थान के लिये उद्यत नायक के प्रति नायिका के वाक्य सता 
वतमान प्रवास है। 
भरूत-प्रवास--- 
हे भंग! तू अमित ही रहता सदारे! 
गोविंद है प्रिय कहाँ ? यह तो बता रे। ह 


८२६७ विग्रलम्भ,ख्टज्ञभर 





देखे निकुज ? अथवा कह क्यों न, प्यारे ! है 
बसी लिए कर कहीं यमुना-किनारे ११६३॥ 


यह गोपीजनों का विर्होद्गार है। पूर्वोक्त दश काम-दशाओं में यह 
'प्रलाप-दशा का वर्णन है। 


| 
“सुभ सीतल मंद सुगंध समीर कछ छल-बंद सों छुचे गए हैं , 
'पद्साकर” चाँदनी चंदहु के कछु ओरहि डौरन च्वें: गए हैं। 
* *» मनमोहन से बिछुरे इत ही बनके न श्रंबे दिन ह्वो गए हैं , 
सख्ि, वे हम वे तुम चेई बने पे कछू के कछू मन हो गए हैं ।”?१६४ 


श्रीनन्दकुमार के मथुरागमन करनेःपर अज-युव॑तियां का यह विरह- 
चरणन है । - - 


“बरुनीन हु नेन कुकें उककें, मनो खंजन मीन के जाले परे ; 
दिन औषधि के केसे गिनों सजनी, ऑँगुरीन के पौरन छाले परे । 
कवि “टांकुर' कार्सो कहा कहिए, यह प्रीति किए के कसाले परे , 
जिन लालन चाह करी इतनी, तिनन्‍्हें देखबे के अब लाले परे ।?३ ६४ 


“मेरे सनभावन न आए सखो, खावन में 

तावन लगी हैं लता लरजि-लरजि के , 
वूदें, कभू रूदें कम धारें हिय फारें दैया ! 

बीजुरी हू वारे हारी बरजि-रजि के। 
बवाल” कवि चातकी परम पातकी सो मिलि, 

मोरह करत सोर वरजि-त्तजि के, 
गरजि गए जे घन गरजि गए हैं भला, 

फिर ये कसाई आए गरजि-गरजि के ।?१६६॥ 


य्ये भी प्रवासी प्रिय के वियोग में विरहिणी के बिरहोद्गार हैं। 


चतुर्थ स्तवक श्ध्८ 


“ऊधो कहो सूधों सो सनेस पहिलेंती यह, 
प्यारे परदेस तें कनें धो" पग पारि हैं। 
कहे 'सतनाकर! तिहारी परि बात्तन में 
मीडि हम कबलें। करेजी मन मारि हैं ॥ 
लाइ-लाइ पाती छाती कबलीं सिरे हैं हाय, 
धरि-धरि ध्यान घीर कब खलगि धारि हैं।' 
बैसलनि उचारि हैं उराहनो कनें थों से 
स्याम को सलोनो रूप नेननि निहारि हैं ॥”१६७॥ 
यहाँ श्रीकृष्ण के वियोग में गोपीजनो के विरहोद्गार हैं। 
(४ ) शाप-हेतुक वियोग" | 
गेरूँ से में लिखकर तुझे सानिनी को शिला पे 
जो लो चाहों तव पद-गिरा हा ! मुझे भी लिखा मैं । 
रोके इष्दी बढ़कर महा अश्र्‌ -घारा असझा, 
है धाता को अहह ! अपना संग यों भी न सह ।१६८॥ 
यहाँ कुबेर के शाप के कारण यक्षु-दम्पती का वियोग है। 
वन कजतन में श्रलि-पजन की म॒द-रगंजन मंजु सुनी जब ही 
विधि काम के बान सरक् भ्रए कुरुनंदन पांडु श्ुवाल वहीं । 
वह पीर-निवारन की जु क्रिया में प्रवीन प्रिया डिंग मैं हू रहीं ; 
द्विज-साप के कारन हाय ! तऊ करि ओहु सकी उपचार नहीं ।१६४॥ 
यहा महाराजा पाए३ को, महारानी कुन्ती ओर माद्री के समीप रहने 
पर भी, शाप के कारण वियोग है । 
“पीतम ले जल-केलि करे हुतोी नारद ने लियो आइके दायो ; 
अंग खुले लखि कोप सयो, पत्ति को ब्रज को तरु साखि बनायो 


४ ४ &६४०२६०४ ४४४६ ४४ ४५७४०६०७८. २६४६ *५ ०5६ /5७०९ ** ६ 3 हब हव २९ ८» 


१ शाप के कारण दियोग । 


१६६ हास्य-रस 





यों कवि “म्वाल! बरी बिरहागनि आकसमात को खेद मैं पायो ; 
नाथ-वियोग कराय अछी ! कहौ वा मुनि के कहा हाथ में आयो ।'*१७० 
नारदजी के शाप से नल-कूत्र के वृद्ध-रूप हो जाने पर उन दोनो में 
में से एक की पत्नी की यह उक्कि है। 
यहों यह लिखना अप्रासज्ञिक न होगा कि कुछ लोग अशज्ञार-रसात्मक 
काव्य ओर तत्सम्बन्धी विवेचना में अश्लीलता का दोषारोपण करते हैं । 
यह उनका भ्रम है। अ्रमर्यादित ऋज्ञार-रस के वर्णन को तो कोई भी 
साहित्य-मर्मज्ञ अच्छा नहीं कद्ठता है । इसे सभी प्रसिद्ध साहित्यिक ग्रन्थों से 
त्याज्य कहा गया है। किन्तु »ज्भारात्मक वरणन-मात्र को ही त्याज्य समभना 
काव्य के वास्तविक महत्त्व से अनभिशता है । >शज्ञार-रस तो काव्य मे 
स्व-प्रधान है | इसके विना काव्य का ताइश महत्त्व नहीं रहेगा । महा- 
भारत, वाल्मीकीय रामायण ओर श्रीमद्भागवत आदि शान्तरस, करुण 


रस एव वेराग्य-भक्ति प्रधान आपं-अन्थों में भी श्रड्भारर्स का समा- 
वेश है । है 


( २ ) हास्य-रस 

विकृत आकार, वाणी, वेश ओर चेश आदि को देखने से हास्य 
रस उत्पन्न होता है । 

यह दो प्रकार का होता है--आत्मस्थ ओर परस्थ । हास्य के विषय 
के देखने मात्र से जो हास्य उत्पन्न होता है, वह आत्मस्थ हे। जो दूसरे 
को हँसता हुआ देखकर उत्पन्न होता हे, वह परस्थ हे? । 

स्थायी भाव--हास । 

आलम्बन--दूसरे के विक्ृत वेश-भूषा, आकार, निजता, रहस्व- 
गर्भित वाक्य आदि, जिन्हें देख ओर सुनकर हँसी आ जाय । 





१ आत्सस्थो द्वष्डुरत्पन्तो विभावे क्खमात्रतः ; 
हसतमपरं दृष्टवा विभावश्चोपजायते | 
यो5सी हास्यरसतंझ्े: परस्थः परिकीर्तितः ॥ --रसगनद्स्‍ाघर 


चतुर्थ स्तवक “२०० 





'उद्दीपग--दास्य-जनक चेशए आदि । । 
* अनुभाव-श्रोष्ठ, नासिका ओर कपोल का स्फुरण, नेत्रो का मिचना, 
मुख का विकसित होना, व्यग्य-गर्भित वाक्‍्यों का कहना, इत्यादि | 
सश्नारी--आलस्य, निद्रा, अवहित्था आदि | 


इसके छः भेद होते हैं--( १ ) स्मित, ( २ ) हसित,( रे ) विहसित, 
(४) अवहसित, ( ५ ) अपहसित और (६ ) अतिहसित । इन भेदों 
“का आधार केवल हास की न्यूनाधिकता है, ओर कोई विलक्षणता 
नहीं है । 
स्मित हास्य । ु 
. यह चित्रित है दस चित्र विचित्र बढ़ी इनसो छुवि भौन की भारी ; 
इनमे जगनायक की यह सातवीं साँवरी मूरति कौन की प्यारी । 
सखि, तू है सयानी सहेलिन सें, इहिंसो हम पूछत देहु बतारी ; 
विकसे-ले कपोलन, बॉकी चितोन सिया सखियान की श्रोर निहारी ।१७१ 


महाराजा जनक के भवन मे चित्रित दशावतारों की मूर्तियों में 
अररधुनाथजी की मूर्ति को लक्ष्य करके जानकीजी के प्रति उनकी सखियों 
की--पहले तीन चरणों म>व्यम्योक्ति हे। यह व्यम्योक्ति द्ास्य का 
आलम्बन है । सीताजी के कपोला का विकसित होना, उनका वड्ड दृष्टि 
से देखना अनुभाव ओर वीडा सश्ञारी है। 
* “अति धन ले अहसान के पारो देंत सराह ; 
वेद-वधू निज रहसि" सौ” रही नाह-मुख चाह ।?१७२॥। 


यहाँ वेद्य द्वारा पारे की विकृवत ( अन्यथा ) प्रशंसा है। वैद्य के 


जज नी जिल जजड जैज ल जी ऑन 


$ चेद्य बधू द्वारा अपने पति के मुख को देखने में यह रहस्य है कि 
यदि इस पारे से सचमुच इतना गुण है, जितना तुम इस रोगी से कह 
रहे हो, तो फिर तुम्हारी यह दशा क्‍यों है ? 


-> 





जीजीजीजीजज जज ज न 


३०१ "हर 


कथनानुसार पारे में यदि पुरुषत्व लाने का ताइश गुण होता, तो स्वयं 

वेद ईंयों पुरुषत्व-हीन रहता । अतण््व़ यही अन्यथा, प्रशंसा यहाँ हास्य 

उत्मन्न करने का कारण होने से आलम्बन है। धन लेकर भी रोगी पर 

एह्सान' करना उद्दीपन है । वेद्य-बधू द्वारा अपने पति का मुख निरीक्षण 
। करना अनुभाव ओर स्मृति आदि सश्जारी है । 


हसित हास्य । ् 


रूप अनूप सजे पद भूबन जात चली मद के रकमोरनि 
ओऔचक कोंटो घुभ्यो पग में सुख सों सिसकार कढ़ी बरजोरनि। 
सो सुनिके विट बोल्यो हहा ! फिरिहू इमि क्यों न करे चितचोरनि 
चंद्रमुखी सुख ऑचर दे चितई तिरछी वरछ्षी दृग-कोरनि ॥३७३ 


यहाँ विद ( वेश्यानुरागी ) की रहस्यमयी उक्ति आलम्बन है। 
नायिका का मुख पर वस्त्र लगाकर बॉके कठाक्षु से उसकी ओर देखना 
अनुभाव है| हष॑, आदि सच्चारी हैं। स्मित से कुछ अधिकता होने के 

' 'कारण हसित हास्य है। 





“मोने के थोस सिंगारन को “मतिराम! सहेलिन को गन आयो ; 
कंचन के बिछुशा » पहिरावत प्यारी सखीन हुलास बढ़ायो" | 
वपीतम-श्रीन-ससीप सदा बलैें' यों कहिके पहलें पहिरायो ; 
कामिनि कॉल चलावन को कर ऊँचो कियो, पे चल्यो न चलायो ।?!३७४ 


यहाँ सखी के 'पीतम-श्रोन-समीप सदा बजे? वाक्य में ओर नायिका 
द्वारा कमल के फेंकने की चेश्ा में हास्य की व्यञ्ञना है। 


4 यहाँ मुल-पाठ प्यारी सखी परिह्दास बढ़ायो” है, पर उसमें 
+परिहासः द्वारा हास्य का कथन शब्द द्वारा हो गया है, अतः इसका 


थाठ प्यारी सखीन हुलास बढ़ायो” इस प्रकार कर दिया गया है ।- 
१२१ 


चतुथ स्तवक ३०३ 


विक्रत आकार-जअन्य हास्य । 


“बाल के आनन-चंद लग्यों नस आली विलोकि अनूप प्रभा-सी ; 
आजु न द्वेज है चंदमुखी ! मतिमंद कहा कहें ए पुरबासी। 
बाधुरो ज्योतिसी जाने कहा अरी ! हों कहों जो पढ़ि आ्राइड्रों कासी ; 
चंद दुहू के दुँ इक ठौर है आज है हज औ' पुरनमासी ।7 १०४॥ 


यहाँ नायिका के मुख पर नख-च्षुत देखकर दूसरे चरण में सखी के 
वाक्य में ओर तीसरे एवं चोथे चरण में नायिका के वाक्य में हास्य 
की व्यज्ञना है ( 


विक्ृत वेश-जन्य हास्य । 


काम कलोलन की बतियान में बीति गईं रतियाँ उठि प्रात में ५ 
आपने चीर के धोखे भट्ट कूट पीतम को पहिरयो पट गात में । 
ले वनमाल को किकिनी ठोर नितंबन बॉधि लई अ्ररसात में ; 
देख सखीं विकसीं तब वालहु बोलि सकी न कछू सकुचात, में ।$७५७ 


यहाँ नायिका का विपरीत वेश हास्य का विभाव है | 


“केसरि के नीर भरि राल्यों होद कंचन को, 
बसन विद्धाए तापे जोन्ह की तरंग में 
सोसनाथ! मोहन किनारे तें उसरि शआपु, 
शआन्यो है हुलास उर होरी की उमंग में । 
आई मनभावनों अश्रनुप कमला-सी बनि 
परथो तहाँ चरन सहेलिन के संग में ; 
रँंगी सब रंग में निहारि अ्रंग-अंग प्यारो रे 
विकसे कपोल के रोग्यो है प्रेम-रंग में ।?१७णा 


यहा केसर-रड् में वस्लादि का रेंग जाना हास्य का विभाव है। 


२०३ हास्य रस 
“गोपी गुपाल को बालिका के वृषभानु के भौन सुभाइ गई ; 
“उजियारे! बिलोकि-बिलोकि तहाँ हरि, राधिका पास लिवाइ गईं। 
उठि हेली मिलो या सहेली सो यों कहि कंठ सों कंठ लगाइ गई ; 
भरि भेंटत अंक निसंक उन्हें, वे मयंक-मुखी सुसकाइह गईं।”१७८ 


यद्यपि यहाँ 'मुसकाइ गई ? से हास्थ का शब्द द्वारा कथन है, पर 
यह सखियों का मुस्काना है। ऐसी परिस्थिति में सखी जनों को हँसती 
देखकर राधिकाजी ओर श्रीकृष्ण को भी हास्य उत्पन्न होना अनिवार्य 
था | श्रीराघाकृष्ण का हास्य शब्द द्वारा नहीं कहा गया है, वह व्यंग्य 
है, ओर उसी में प्रधानतया चमत्कार है | अतः यहाँ पर-निष्ट हास्य है । 
“सुनिके विहंग सोर भोर उठी नंदरानी, 
अंग-अंग आलस के जोर जमुहानी वह ; 
घारी जरतारी सो न सूधी की सँभार रही, 
कान्ह को बिरावत खिलावत सिहानी वह । 
धवाल” लखि पूत की सु हीरा धुकधुकी माँहि, 
छुबि सब आधुनी अजायब दिखानी वह ; 
एक संग ऐसी खिल-खिल करि उठी भोरी, 
आँसू आइ गए पेन खिलन रुकानी वह ।?!३७६ 
यहाँ यशोदाजी ने अपने विकृत वेश का ग्रतिविम्ब श्रीकृष्ण के हार 
की धुकधुकी में देखकर उनके ओऑय आ जाने पर भी खिल-खिलाहट न 
रुकने में अति हसित की व्यज्ञना है । 
तुहिनाचल ने अपने कर सौं हर गोरी के छे जब हाथ जुटा; 
तन कंपित रोम उठे सिव के, विधि भंग भए अति ही सकुचाए। 
“गिरि के कर में बड़ो सीत अहो” कहि यों वह सारिवक भाव छिपाए, 
वह संकर" संकर" हे गिरि के रनवास सों जो स-रहस्य लखाए (३८० 


$ श्रीमहादेवजी । २ शंकर शअ्र्थात्‌ कल्याणकारक । 


चतुथ स्तवक ०४ 





जब हिमाचल ने श्रीशइ्र को पावंतीजी का पाणिग्रहण कराया, उस 
समय पारव॑तीजी के स्पश से श्रीशड्ढर के रोमाश्वादि हो गए.।। इन रोमा- 
शादि को छिपाने के लिये श्रीशड्डर ने कहा कि “हिमाचल के हाथ्‌ बडे 
- शीतल हैं”, जिसका अमिप्राय यह था कि उनके रोमाशादि का कारण 
हिमाचल के हाथो की शीतलता थी। पर वास्तविक रहस्य को अन्तःपुर 
की स्त्रियों समझ गई, और उनके ,रहस्य-युक्त देखने में यहाँ हास्य की 
व्यक्षना अवश्य है, पर चौथे चरण में जो भक्ति-माव है, उसका उक्त 
हास्य अड्भध हो गया है, अतः यहाँ देव-विषयक रति-भाव ही है, 
नकि हास्य । 


“सोहे सलोनी सुहाग-भरी सुकुमारि सखीनि समाज मढ़ी-सी ; 
द्विवजू! सोचत ते गए लाल महा सुखमा सुखमा उमडी-सी | 
पीक की लोक कपोल सें पीके बिलोकि सखीनि हँसी उमड़ी-सखी ; 
सोचन सोहें न लोचन होत, सकोचन सुद्रि जात गढ़ी-सी [?१८१॥ 


भवानीविलास में इसे हास्य का उदाहरण दिखाया गया है, पर 
इसमें प्रधानतया ब्रीडा-माव की व्यक्षना है, हास-माव उसका पोषक- 
मात्र है | इसके सिवा यहाँ हँसी' शब्द से हास? वाच्य भी हो गया 
है। परन्तु-- 


/विंध्य के बासी उदासी तपोत्रत-घारी महा बिनु नारी दुखारे ; 
गोतस-तीय तरी तुलसी” सो कथा सुनि भे मुनि-द्रद सुखारे । 
हो हैं सिला सब चंद्रसुखी, परते पद-मंजुल कंज तिहारे ; 
कोन्हीं भली रघुनायकजू करुना करि कानन को पग चघारे ।१८२॥ 


यहाँ ओऔीराम-विपयक भक्ति-माव की व्यज्ञना होने पर भी वह _ 
प्रधान नहीं है। अत्तः यह हास्य-रस ही है। .'* " 


०५ ० करुण रस 





पी 


३२ करुण-रस | ' 
बन्धु-विनाश, बन्धु-वियोग, धर्म के अपघात, द्रव्य-नाश आदि अनिष्ट 
से करुण-रस उत्पन्न होता है । 
स्थायीभाव--शोक |. 
आलम्बन--विनष्ट बन्धु, परामंव, आदि । 
उद्दीपन--प्रिय बन्धु जनों का दाह-कर्म, उनके स्थान, वस्त्र-भूषणादि 
का दृश्य तंथा उनके कार्यों का श्रवण एवं स्मरण आदि । 
अनुभाव--देव-निन्दा, भूमि-पतन, रोदन, विवर्णता, उच्छास, 
कम्प, मुख-सूखना, स्तम्म ओर प्रलांप, आदि । 
सब्चारी--निवंद, मोह, अपस्मार, व्याधि, ग्लानि, स्घृति, भ्रम, दनन्‍्य, 
विषाद, जडता, उन्‍्माद ओर चिन्ता आदि । 
बन्धु-विनष्ट-जन्य करुण । 
नव पल्मचव भरी बिछे हुए झदु तेरे तनको असझायथे 
वह हाय! चिता धरा हुआ, अब होगा यह सद्य क्यों प्रिये ! १८३ ॥ 
महारानी इन्दुमति के वियोग में महाराज अज का यह विलाप है | 
इन्दुमति का मत शरीर आलम्बन ओर उसकी चिता उद्दीपन है | 
कारुणिक क्रन्दन अनुभाव है। स्मृति, चिन्ता, दन्‍य आदि सश्ञारी हैं | 
“जो भूरि भाग्य भरी विदित थी निरुपमेय सुहागिनी ; 
हे हृदयवल्लभ ! हूँ वही अरब में महा हतभागिनी। 
जो साथिनी होकर तुम्हारी थी अतीत्र सनाथिनी ; 
है अब उसी मुझ-सी जगत में और कोन अनाथिनी ।?१८७॥७ 
यह उत्तरा का विलाप है। अभिमन्यु का मृत देह आलम्बन है । 
उसके वीरत्व आदि गुणों का स्मरण उद्दौपन है। उत्तरा का क्रन्‍्दन 
अनुभाव हे । स्प्रति, देन्‍य आदि सच्ञारी हैं । हि 


४ 


चतुर्थ स्तवक २०६ 





“काज्य-मनि बारिधि-बविपत्ति -में बूढे सब, 
बिन श्रवलंब गुन-गोरव गह्यो नहीं ; 
पवन प्रलय की दीप दीपित दक्यो जो देह, 
चित्त हू लक्यो जो दुःख कब॒हूँ चह्मो नहीं । 
रलपुर-राज बलवंत के ब्रिदिव जात, 
सुमन सुसीलन पे जावत सह्यो नहीं; 
आज अश्रवनी पे श्रभिछूपन के आलय में, 
मालव-मिहिर बिन सालव रह्यो नहीं ।?१८५॥ 


महाराज वलवन्तसिंह के परलोक-गमन पर कवि की यह श्रद्धाज्ञलि 
है | परलोक-गमन आलम्बन है, उनके ओदार्यादि गुण की स्मृति उद्दीपन 
है | स्मृति, विषाद आदि सशग्जारी ओर कवि के ये वाक्य अनुभाव हैं। 


“कती कृष्ण राज देन कह्यो पे न लह्षो कने, 

कहो जुद्ध-भार सीस काके धर जाओ में , 

ताको बल चीन्ह सुत बलिन बलीन होब' , 
दीनन से दीन भयो जी न लरजाश्ों मैं ; 

सब जन चेरो होब कोन हितू मेरो घन-- 
दुःखन को घेरो घूसि कोन घर जाओ में ; 

केसे टर जाओं अ्व्लदग्नि जरि जाओ केधों, 
कृप परि जाश्रों विष खाय मर जाओं में ।” १८६४॥ 

वन्धु-वियोग-जन्य करुण । 


वनवास-छूता जटा कहाँ? सुत | त्तेरी रमणीयता कहा १९ 
स्मृति भी यह दे रही व्यथा, चिधि की है यह हा (विडंबना [१८७ 


4 कर्ण के बल पर मेरा पुत्र दुर्योधन सब बलवानों से बलवान था, 
पर अय दीनों से भी दीन हो गया। यहाँ होब! का अर्थ है--जो था 
वह अब ४ 


२०७ करुण रस 





श्रीराम-वनवास के समय महाराज दशरथ का यह शोकोदगार है | 
श्रीरधुनाथजी आलंम्बन॑ है। वनवास के गमन का प्रस्ताव उद्दीपन है। 
देव-निन्दा अनुभाव है । विषाद आदि सच्चारी हैं । 
+#लव दारुन या अपमान सा तू निहचे दुग-तीरहि ढारत होइगी ; 
सिसु होन समे पे सिया वन में कहूँ बेहद पीर सो आरत होइगी । 
घिरि हाय | अ्रवानक खसिंहनि सो किसि बेबस धीरज धारत होइगी ; 
करिके सुधि मेरी हिये में चहूँ तब तातहि तात पुकारत होइगी ।?4८८ा 


सीताजी के त्याग के पश्चात्‌ भगवान रामचन्द्र का उनके वियोग में 
यह शोकोद्गार हैं । सीताजी आलम्बन हैं। उनके वनवास-दुःख का 
स्मरण उद्दीपन है। यह वाक्य अ्रनुभाव है| स्घृति, चिन्ता आदि सश्जारी 
भावों से यहाँ करुण की व्यञ्जना हैं | इस पद्म में विप्रलम्म-श्शज्ञार नहीं 
समभना चाहिये, क्‍योंकि उसमें पुनर्मिलन की आशा रहती है, यहाँ 
निर्वासित सीताजी के विषय में पुनर्मिलन की आशा नहीं है | 


भ् 
घन-वभव-विनाश-जन्य करुण । 


“सहस अख्यासी स्वणे-पात्र में जिमातो ऋषि, 
युधिष्ठिर और के अधीन अन्न पाये है ; 
अजु न त्रिलोक को जितेया भेष बनिता के, 
नाटक-सदन बीच बनिता नचावे है । 
राजा तू बकासुर हिडंब को करेया बच, 
पाचक विराट को हल रसोई पकावे है; 
माद्दी के सुजसधारी दोनों ही सुरूपमनि, 
एक अ्रश्व-बीच, एक गोधन चराचे है ।?१८श॥। 


कीचक की कुचेष्टाओं से दुखित द्रोपदी का भीमसेन के समक्ष यह 
कारुणिक क्रन्दन है। राज-भ्रष्ट युधिष्ठटिरादि आलम्बन हैँं।कीचक की 


चतुथ स्तवक य्ण्फ़ 


नीचता उद्दीपन है। द्रौपदी के ये वाक्य अनुभाव हैँ । विषाद, 


चिन्ता और देन्य आदि सम्जारी हैं । इनके संयोग से यहाँ करुण की 
व्यज्ञना है। 


“जीपमकों प्रेरों कने हूँ की मुख हैरों हाय 
सकल सभा की ओर' दीन द्ग फेरों में ; 

कहे 'रतनाकर' त्यों अन्ध हूँ के आगे रोह; 
खोद्ट दीढि चाहति अनीठहिं निबेरों में ; 

हारी जदुनाथ जदुनाथ हूँ पुकारि नाथ, 
हाथ दाबि कढ़त करेजहि दरेरों मैं; 

देखि रजपूती की सफल करतूति शअ्रब, 

. एक बार बहुरि गुपाल कहि टेरों मैं ॥/?48०॥ 


“' यहाँ द्रुपद्‌ सुता की उक्ति में करुण-रस की व्यज्ञना है । 


कहीं कहीं शोकस्थायी की स्थिति होने पर भी करुण-रस नहीं 
होता है, जैसे-- 


“अंदर ते निकसीं न मंदिर को देख्यो द्वार ! 
बिन रथ पथ ते उधारे पॉय जाती हैं 
हवा हू न लागती, ते हवा तें बिहाल भइ, 
लाख़न की भीर में संभारती न छाती हैं । 
भूषन! भनत 'खिवराज तेरी धाक सुनि, 
: . हाय दारी चीर॑ फारी मन ऊु सलाती है , 
ऐसी परी नरम हरम बादसाहन की, ! 
'', , लासपाती खातीं, ते बनासपाती खाती हैं।”१६१॥ 


यहाँ मुगल-सम्रारों की रमणियो की दीन-दशा के वर्णन में करण 
की व्यज्जना होने पर भी करुण-रस नहीं | क्योंकि प्रधानतः शिवराज के: 





३०६ रोद् रस 





वीरत्व की ही प्रशंसा है। अतः राज-विषयक रति-भाव प्रधान है, ओर 
यवन-रमणियो की कारुणिक दशा का वर्णन, उसका अद्भ हो जाने से 
सश्जारी रूप में गोण हैं। । 


४ रोद् रस 


शत्रु की चेष्टा, मान-भज्ज, अपकार, गुरु जनों की निन्‍्दा, आदि से 
रौद्र रस प्रकट होता है । 


स्थायीमाव--क्रोध । 
आलम्बन--शन्रु एवं उसके पक्ष॒वाले । 


उद्दीपन--शन्नु द्वारा किये गये अनिष्ट काये, अधिक्षेप, कठोर वाक्यो 
का प्रयोग, आदि | 


अनुभाव--नेत्रों की रक्तता, भ्र-भज्ञ, दाँत ओर होठों का 
चबाना, कठोर भाषण, अपने कार्यों की प्रशसा, शस्त्रों का उठाना, 
क्रूरता से देखना, आक्षेप,' आवेग, गजन, ताड़न, रोमाश्च, कम्प, 
प्रस्वेद, आदि । 


सम्चारी--मद, उग्रता, अमषं, स्मृति, आदि चित्तद्धत्तियोँ। 

यद्यपि 'रोद्र' ओर 'वीर' मे आलम्बन विभाव समान ही होते हैं, किन्तु 

इनके स्थायी भाव भिन्न-भिन्न होते हैं। रोद मे क्रोध! स्थायी होता है, ओर' 

वीर में “उत्साह! | इसके सिंवा नेत्र एव मुख का रक्त होना, कठोर वाक्य 

कहना, शस्त्र-प्रहार करमा, इत्यादि अनुभाव 'ोद्र' में ही होते हैं?, 
वीर! में नहीं । 

पुरारि को प्रचंड यह खंडि कोदड फेर, 
भोंहन मरोरि अब गर्व दिखरचे तू; 


बज 


4 रक्कास्यनेत्रता चात्र भेदिनीं युद्धवीरतः । (साहित्यदर्पण, ३ ।२३१) 


चतुर्थ स्तवक २१० 


आतु की न बातु मन लातु है निसंक भयो, 

कौसिक की कान हैँ. म मान यतराते तू । 
देख ! ये कुठार क्र.र कर्म हैं श्रपार याके, 

के के अपमान विप्न जानि इतरावैतू ; 
छुद्नित पतब्रिन * ज्यों काटि की निछत्र मही, 

झयोरे छन्रिबाल, भूलि काल हँकराबे तू ॥११२॥ 


धनुप-भड़ के प्रसड़ में लक्मणजी के प्रति परशुरामजी के ये वाक्य 
हैं। श्रीराम-लक्षमण आलम्धन हैं। धनुष-भद्ध ओर लक्षमणजी द्वारा 
निश्शड्ड उत्तर दिया जाना उद्दीपन है। परशुरामजी के ये वाक्य अनुभाव 
हैं । अमपषे, गये आदि व्यभिचारी हैं । इनके द्वारा यहाँ क्रोध स्थायी भाव 
की रोद्र रस मे व्यज्ञना होती है। 
भीम कहै प्यारी! सारी कोरचन नारिन कं, 
रिक्त बेस-भूसा मुक़-केसा करि डारोंगो। 
चंड भुज-दंडन में प्रचंड या गदाकों ले, 
मंडल अ्रमाय सिंहनाद के प्रचारोंगो | 
अंधन के संग ही धमंड करि भंग जंग, 
दुष्ट दुरजोधन को वेगि ही पछारोंगो ; 
रक्त सो रंगे ही उन रक्त भए हाथन सौं, 
खुले फेस बाँघि तेरी बेनी को सम्हारोंगो।१६३॥ 


द्रौपदी के प्रति ( जिसने अपने केशाकर्षंण के कारण, जब तक 
दुर्योधन का विनाश न हो, अपने केशों की वेणी न बाँधने की प्रतिज्ञा 
'की थी ) भीमसेन के ये वाक्य हैं। द्रोपदी का शोकाकुल होना आलम्बन, 
दुर्योधनादि द्वारा अपमान किए, जाने का स्मरण उद्दीपन, भीम के ये 


समन 





- | पत्तियों के समान | 


२११ रोद्र रस 





वाक्य अनुभाव ओर गयबं, स्मृति, उम्रता आदि सच्चारी भावों द्वारा यहाँ 
' रौंद्र रस की व्यज्ञना है | 
“श्रीकृष्ण के सुन वचन श्रज्ञुव ज्ञोभ" से जलने लगे ; 
सब शील अपना भूलकर करतल युगल मलने लगे । 
संसार देखे श्रब हमारे शत्रु रण में रूत पढ़े! ; 
करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठकर खड़े। 
उस काल मारे क्षोभ' के तनु कॉपने उनका लगा; 
सानो पवन के जोर से सोता हुआ अजगर जगा ।?4६४॥ 


यहाँ अभिमन्यु के बध पर कोस्वों का हर्ष प्रकट करना आलम्बन 
है। श्रीकृष्ण के वाक्य (जिनके उत्तर में अजुन की यह उक्ति है ) 
उद्दीपन है। अज् न के वाक्य अनुभाव हैं। अमर्ष, उग्रता ओर गये 
आदि सश्थारी हैं| इनके द्वारा रोद्र रस की व्यज्ञना है । 
“नहिंन ताडका नारि, में व हर-धनुष दारुमय ; 
नहिंन राम ट्विज दीन, म्ग न सारीच कनकमय | 
बालि हौ' न बनचर वराक, जढ़ ताढ़ न जानहेँ ; 
खर दूषन त्रिसिरा सुबाहु पौरुष न श्रमानहेँ । 
पाथोधि होंन बाँध्यो उपल, सबल सुरासुर-सालको ; 
रन कुंभकने काकुस्थ रे! महाकाल हो” काल को?१४४॥ 
यहाँ श्रीरचुनाथजी आलम्बन, राक्षुसों का विनाश उद्दीपन, कुम्मकर्ण 
के तजन-युक्त ये वाक्य अनुभाव, उम्रता, अमष और गवे आदि सच्ारी 
भावों से रोद्र रस ध्वनित होता है। 
“धनु हाथ लिए नप मान-धनी अवलोकत हो पे ककछू न कियो; 
कुरुजीवन कने के आगे 'झुरार' वकार के आपनो बैर लियो। 





३ सूल पाठ 'क्रोध' है। क्रोध का रौद के उदाहरण में यहाँ शब्द 
द्वारा स्पष्ट कथन हो जाना ठीक न था इसलिये पाठान्तर कर दिया है | 


चतु्थ ध्तवक श्र 


| कच-हौपदी ऐचनहार ,दुसासन को नख तें ज्॒ विदार हियो; 
कत जात कह्मो अति श्रानंद आज में जीवित को रत-उच्ण पियो ।”?१६१४१॥ 


न्‍ैँ 


यहाँ भूत दुःशासन आललम्बन, दुयोधन ओर कण का समक्ष होना 
उद्दीपन तथा स्मृति, उम्रता, गव ओर हप॑ आदि सश्चारी ओर भीमसेन 
द्वारा रक्त-यान॑ किया जाना अनुभाव हैं । किन्तु--- 


' “लंका ते निकसि आए जुत्थन के जुत्थ लखि, 

कूय्ो वजुअंग किंटकिटी दें भपटिके ; 
सुनि-सुनि गर्तित वचन दुष्ट पुष्ठन के, 

मुष्ट बॉघि उच्छुलत सामने सपश्टिके। 
शवाल' कवि क़है महा मत्ते रतते अत्ष करि, 

धावे जित तित्त परे वजू सो लपझिकें ; 
चब्बरत अधर फेंकी पव्चत उत्ंग तंग, 

को दुब्बत दलुज्ञ -के दलन है दुपष्टिके ॥7१8णा 


यहाँ रावण की सेना आलम्बन है। उसके गव-पूर वाक्य उद्दीपन 

हैं। दात चबाना, पर्वतो को फेकना आदि अवतुमाव ओर उग्रता, अमण 

। आदि सश्चारी हैं, पर रोद्र रस नहीं । यहाँ कवि द्वारा हनुमानजी के वीरत्व 
का वर्णन है अतः देव-विषयक रति-भाव है । ओर-- 


* सत्रुन के कुल-काल सुनी, धनु-मंग-धुनी उठि वेगि सिधाएं ; 
याद कियो पिठु के बध को, फरकें अधघरा दृग रक्त बनाए। 
' आगे परे घनु-खलंड विलोकि, अचंड भए स्ुकुटीन चढाएं ; 
देखत श्रीरघुनायक को भुगुनायक चंदत हों सिर नाए ।॥१ ६८॥ 


हु 


/ इस प्रकार के अन्य उदाहरण मी रोद्र रस के नहीं हो सकते हैं । 
यद्यपि यहाँ क्रोध क्रे आलम्बन श्रीरघुनाथजी हैं, धनुष का भद्ग होना 


ईश३ ' » वीर रस 
उद्दौपन है, होठों का फरकना आदि' अनुमाव ओर पितृ-बंध की स्मृति, 
गवं, उम्रतादि व्यभिचारी भाव, इत्यादि 'रौद्र की सभी 'सामग्री' विद्यमान 
है, पर ये सब मुनि-विपयक रति भाव के अज्गभ हो गए'हैं--प्रधान नहीं 
है । यहाँ कवि का अभीष्ट परशुरामजी के प्रभाव के वर्णन द्वारा उनकी 
वन्दना करने का है, अतः वही प्रधान है ) स्थायी भाव क्रोध रति भाव 
का अज्गभ होकर गोण हो गया है । ह मु 


0 जे 


५ बीरूस .-, 
वीर-रस का अत्यन्त उत्साह से प्रादुर्भाव होता है । 
वीर-रस के चार भेद हैं--( १ ) दान-बीर, (२ ) धम-बीर, ( ३ ) 
युद्ध-चीर, ओर (४ ) दया-वीर । इन सब  भेदों का स्थायी भाव तो 


उत्साह ही है, पर आलम्बन, उद्दयीपन, अनुभाव ओर सप्जारी 
पृथक-प्थक होते हैं । 


कुछ आचार्यों का मत है कि “वीर” पद का प्रयोग युद्ध-बीर रस में ही 
होना समुचित है। किन्तु साहित्यदपंण ओर रसगद्भांधर आदि में चारो 
भेद माने गये हैं । 


दान-बीर । बी । 

आलम्बन--तीर्थ, याचक, पर्व और दान योग्य उत्कृष्ट पदार्थ आदि। 
। उद्दौपन--अ्रन्य दाताओं के दान, दान-पात्र द्वारा की गई 
प्रशंसा, आदि । 

अनुभाव-याचक का आदस्सत्कार, अपनी दातव्य शक्ति की - 
प्रशंसा, आदि | 

सम्चारी--हर्ष, गब॑, मति आदि । 


चतुथ स्तवक २१४ 





सुझ कर्ण का करतव्य दृढ़ है मोगने आए जिसे ; 
निज हाथ से रूट काट अ्रपना शीश भी देना उसे | 
बस, क्या हुआ फिर अधिक,घर पर ञआ्रा गया अ्रतिथी विसे; 
हूँ दे रहा कुण्डल तथा तन-ब्राण ही अपने इसे १६ 8॥ 


ब्राह्मण के वेष में आए, हुए. इन्द्र को अपने कुए्डल ओर कवच 
देते हुए. कर्ण की अपने निकट्स्थ सम्य जनो के प्रति ( जो इस काय से 
विस्मित हो रहे थे ) यह उक्ति है। यहाँ इन्द्र आलम्बन, उसके द्वारा की 
हुई कर्ण के दान की प्रशंसा उद्दीपन, कवच ओर कुण्डल का दान ओर 
उनमें तुच्छ बुद्धि का होना अनुभाव ओर स्मृति आदि सश्जारी भावों से 
दानवीस्ता व्यक्तहोती है । 


तन के परजंक सिला सुचि आसन जाहि परे न बिछावनो है ; 
जल निर्कर सीतल पीहबे को फल-मूलन को मधु खावनो है । 
बिन माँगे मिलें ये विभी वन सें, पर एक बढ़ो दुख पावनो है ; 
पर के उपकार बिना रहिबो वहाँ जीवन व्यथ गुमावनो है ।२००॥ 


नागानन्द नायक में जीमूतवाहन की यह उक्तकि है। चौथे चरण में 
दान-वीर की व्यक्ना हे । 


“देवरुू दानव दानी भ्रए तिन जाचक की सनसा प्रतिपाली ; 
सोई सुजस्स जिहाँन सुहावतु गावतु है 'जनराज” रखाली। 
झैँ जगदेव पमार प्रसिद्ध सराहति जाहि ससी अरसुमाली ; 
सीस की मेरे कहा गिनती जिय राजी रहै कल्लि में जो केकाली" |२०१ 


कड्लाली नाम की एक भाट की ज््री के प्रति इतिहास-प्रसिद्ध जगदेव 


व कझ्लाली-नामक भाटिनी ने जगदेव से भित्ता में उसका सिर माँगा 
था | उस भाटिनी के अ्रति जगदेव के ये वाक्य हैं। 


२१५ दान+वीरु 





पमार की यह उक्तकि है। यहाँ भी दान के उत्साह की व्यज्जना 
है । किन्तु-- 


पद एकहि सातों समुद्र सदीप कुल्ाचल नापि धरा में समायो ; 
पद दूसरे सो दिवि-लोक सबें, पद तीसरे को न कछु'जब पायो। 
हरि की स्मित मंद विज्ञोकनः, पेखि तबै बलि ने हिय मोद बढ़ायो ; 
तन रोस उठे प्रन राखिबे को जन्म नापिबे को निज सीस, झुकायो ।२०-२ 


यहाँ दान-वीर नहीं, क्योंकि भगवान वामन आलम्बन, उनका 
सस्मित देखना उद्दीपन, रोमाश्चादि अनुमाव एवं हर्षादि सच्चारी भावों से 
स्थायी भाव उत्साह की दान-वीर के रूप में व्यज्ञना होने पर भी यहॉँ 
वक्ता को बलि राजा की प्रशंसा करना अभीष्ट है, ओर उस प्रशसा का 
यह उत्साहात्मक वर्णन पोषक है'। अतः राज-विषयक रति भाव ही यहाँ 
प्रधान है--उत्साह उसका अज्ञ-मात्र है। यद्रपि पूर्वोक्त सख्या १६६ के 
उदाहरण में भी कर्ण की प्रशंसा सूचित होती है, पर वहाँ कर्ण के वाक्य 
कवि द्वारा केवल दोहराएं गये हैं--कवि द्वारा प्रशसा नहीं, अतः वहाँ 
दान-वीर ही है। 


“बकसि वितुड दुए क्रुंडन-के-कुड रिपु- 
मुंडन की मालिका त्यों दुईं त्रिपुरारी को ; 
कहे 'पदसमाकरः करोरकः के कोष दृए, 
षोडसहू दीन्हें सहादान अ्रधिकारी कों; 
आम द॒ुए, धाम दुए, अमित अरास दए , 
श्रन्न-जल दौन्‍्हें जगती के जीवधारी को; 
दाता जयसिंह दोय बात. नहीं दीन्ही कहें, 
बैरिन को पीठि और दीठि परनारी को ।?२०३॥ 


चतुर्थ स्तवक २१६ 





“संपर्ति सुमेर की छुबेर की हु पावे ताहि 
तुरत लुटावत विलंव उर धारें ना; 
क्है पदमाकरः सु हेम हय हाथिन के 
। हलके हजारन के 'बितर बिचारें ना। 
दीन्हें गज बकस महीप रघुनाथराव, 
याहि गज धोखे कहूँ काहू देय डारें ना ; 
८ याही डर गिरिजा गजानन को ग़ोय रही; 
गिरि ते गरें ते निज गोद तें उतारेंना |?२०४॥ 


इन दोनों कवित्तो मे दान-बीर की उत्कट व्यज्ञना है, किन्तु दान का 
उत्साह; पहले में जयपुराधीश जयसिंह की, ओर दूसरे म॑ राजा रघुनाथराव 
की, प्रशंसा का पोषक है | अतः राज-विषयक रति-भाव ही प्रधान है, ओर 
“उत्साह उसका अद्भ है--दान-बीर नहीं | 


'घर्म-बीर । 


महाभारत, मृनुस्मृति आदि धार्मिक ग्रन्थ आलम्बन; उनमें वर्णित 
धार्मिक इतिहास ओर फलस्त॒ुति उद्दीपन; धर्माचरण, धर्म के लिये कष्ट 
सहन करना, आदि अनुमाव, ओर ध्ूति, मति आदि सश्जारी होते हैं । 


“और ते टेक घरी मन माँहि न छॉँढडि हों कोऊ करो बहुतेरो ; 
घाक यही है युधिष्ठिर क्री धन-धाम तजों पे न बोलन फेरो । 
मातु सहोदर औ'? सुत नारि ज्ु सत्य बिना तिहिँ होय न बेरो। 
हाथी तुरेंगम औ” वसुधा बस जीवहु धर्म के काज है मेरी २०४ 


यहाँ महाराज युधिष्ठिर का धर्म-विषयक दृढ उत्साह स्थायी है | गवे; 
हूष, घृति ओर भति आदि सश्जारी एवं ये वाक्य अनुभाव हैं। 


१७ ,.__युद्ध वीर 
“रहते हुए तुम सा सहायक प्रण हुआ पूरा नहीं ! 
इससे मुझे है जान पड़ता भाग्य-बल ही सब कहीं | 
जलकर अ्रनत्ञ में दूसरा प्रण पालता हूँ में अभी ; 
: “अच्युत ! युधिष्टिर आदि का श्रब भार है तुम पर सभी ।?२०६॥ 


यहां अजु न की इस अक्ति में ध्मंवीर की व्यज्ञना है । 

“श्रीद्सरत्थ महीप के बेन को मानि सही मुनि वेष लयो है ; 
पै कछु खेद न कीन्हों हिये 'लदछिराम' सु बेद-पुरान बयो है । 
सातहु दीपन के अवनीप प्रजा प्रतिपाल को रंग रयो है , 
राम गरीब-निवाज को भूतल धर्म ही को अवतार भयो है ।?२०७॥ 


यद्यपि यहाँ पूर्वांद्ध मे धर्म-वीर की व्यज्ञना है, पर उत्तराद में 
भगवान्‌ श्रीरामचन्द्र की धर्म-बीरता की जो प्रशसा है, वही प्रधान है | 
अतः देव-विषयक रति-भाव का धर्मवीरत्व अद्ध हो गया है। “महेश्वर- 
विलास' में लछिरामजी ने इसे धर्म-वीर के उदाहरण में लिखा है, पर 
वास्तव में 'धर्-वीर” नहीं है ।- 
युद्ध-वीर । 
आलम्बन--शत्रु । 
उद्दीपन--शत्रु का पराक्रम आदि | 
अनुमाव--गवं-सूचक वाक्य, रोमाश्च, आदि । 
सश्चारी--ध्ृति, स्मृति, गव॑ तक, आदि | 
भादें रघुनाथ खोल आलें सुन लंकाधिप ! 
देडु वयदेही स्वयं याचत्‌ है राम यह; 
सततिश्रम तेरे कहा, हेरें क्यों न धर्मनीति , 
बीतिगो कछू न बने सारे धन-घाम यह । 
श्र 


चतुर्थ स्तवक २१८ 





ना तो मम॒ वान चढ़ि जायगो कमान तब, दे 
होयगो प्रतच्छ जेसो निसित निकराम यह ; 
चूसि-चूसि रक़्॒ खरदूषन को तठृप्त छोन, 
हो रहो अलक़ श्र॒जों आदर मुख स्थाम यह । २०८॥ 
यह रावण के समीप अद्भद द्वारा भेजा हुआ श्रीरघुनाथजी का 
सन्देश है | रावण आलम्बन हैं। जानकी-हरण उद्दीपन है। ये वाक्य 
अनुभाव हैं | स्पृति, गव, आदि सा्चारी हैं | 
“पारथ विचारो पुरुषारथ करेगो कहा , 
स्वारथ-सहित परमारथ नसेंहों में । 
कहें. 'रतनाकर' प्रचारधो रन भीषम यो , 
आज दुरजोधन को दुःख दरि देहों में । 
पंचनि के देखत प्रपंच करि दूर सब , 
पंचन को स्वत्व पंचतच्व में मिलेहों में ; 
हरि-प्रन-हारी जस धारिके धर्रों हों सांत , 
सांतनु को सुभट सुपूत्त कहिबेहों में ।?२० शा 
(गंगा राजरानी को सुभट अभिमानी भ्रट , 
भारत के बंस मैं न भोषम कहाऊँ में ; 
जो पे सररेट ओ' दपेट रथ पारथ को , 
लोकालोक परबत के पोर न बहाऊ में । 
'सिश्रजू! सुकवि रनघीर वीर भूमें खरे , 
कीन्ही यह पेज ताहि सबको सुनाऊं में ; 
कहो हों पुकारि ललकारि महाभारत में , 
आज हरि-हाथ जो न सस्त्र को गहाऊँ में 7२१ ना 
इन दोनो कवित्ता में भीष्मजी की उक्ति है। श्रीकृष्णाजु न आलम्बन 
हैं। श्रीकृष्ण की शत््र न धारण करने की प्रतिज्ञा उद्दीपन है। भीष्मजी 
के ये वाक्य अनुभाव हैं| गव॑, स्मृति, ध्ति आदि सश्जारी हैं। 


२१६ युद्ध वीर 


“बल के उम्ंड भुज-दंढड मेरे फरकत , 

कठिन कोदंड खेंच मेल्यो चहें कान तें। 
चाउ श्रति चित्त में चढ़यो ही रहे जुद्ध-हित , 

जूटे कब रावन जु बीसहू भ्रुजान तैं। 
“वाल” कवि मेरे इन हत्थन को सीघ्रपनो , 

देखेंगे दनुज्ज जुत्थ शुत्यित दिसान तें,; 
दसमसत्थ कहा, होय जो पे सो सहस्त लक्ष , 

कोटि-कोदि मत्थन को कार्टों एक बान तें।”२११॥ 


यह श्रीलक्ष्मणजी की उक्ति हे। यहाँ रावण आलम्बन, जानकी-हरण 
उद्दीपन, ये वाक्य अनुभाव ओर गवे, अमर्ष, ओत्सुक्यादि सच्चारी हैं । 


“एहो अवधेस ! श्रब दीजिए निदेस मोहि, 
चंद्र मॉहि चूरिके निचोरि सुधा ला मैं, 
जायके पताल ताल मारि जीति सेसजू कों, 
अष्टकुली नागन को गनिके नखाऊ मैं; 
रामद्वि!! सडि जस सारतंड-मंडल को, 
प्रबल अचंड तेज सीतल बनाऊें में, 
खंडि जम-दंड जोन पंड म्जुजदंडन सं, 
वीर बलबड पोन-पूत न कहाऊँ में।”२१२॥ 


यहाँ लक्ष्मणजी के शक्ति लगने पर सुषेण वैद्य द्वारा सञ्जीवनी लाने 
के लिये कहा जाना आलम्बन है | इस कार्य के लिये विचार किया जाना 
उद्दीपपग ओर हनुमानजी के ये वाक्य अनुभाव हैं। गवं, ओत्सुक्य, 
अमर्ष, आदि सश्जारी हैं । इनके सयोग से यहाँ वीर-रस की व्यञ्ञना है। 


“मैं सत्य कहता हूँ सले ! सुकुमार मत जानो मुझे ; 
यमराज से भी युद्ध में प्रस्तुत सदा मानो मुझे । 


चतुर्थ स्तवक २२७० 





है और की तो बात हो क्‍या गये मैं करता नहीं ; 
मामा तथा निज तात से भी समर में डरता नहीं ।?२१३॥ 


ये अपने सारथी के प्रति अभिमन्यु के वाक्य हैं। कोरव आलम्बन 
हैं। उनकी अभेद्य चक्रव्यूह-रचना उद्दीयन है। अभिमन्यु के ये वाक्य 
अनुभाव हैं | गव॑, ओत्सुक्य, हर्प आदि व्यभिचारी हैं। इनके सयोग से 
वीर-रस की-व्यज्ञना है | किन्तु-- 
“जा दिन चढ़त दल साज्ञि अवधूतसिंह , 
ता दिन दिगंत लौं दुवन दाटियतु है; 
प्रतें केसे धाराधपर धमकें नग्रारा भूरि , 
धारा ते समुद्रन की घारा पाटियतु है। 
'भूषन' भनत भआुवगोल को कहर तहां, 
हहरत तगा जिमि गज काटियतु है; 
काच-से कचड़ि जात सेस के असेस फन , 
कमठ की पीढि पे पिठी-सी बॉटियतु है।”२१४॥ 


यहों उत्साह की व्यञ्ञना होने पर भी महाराजा शिवराज की प्रशंसा 
प्रधान है। उत्साह उस प्रशसा का पोषक होकर यहाँ गोण हो गया है, 
अतः राज-विषयक रति-भाव है। 


“दीन द्रौपदी की परतंत्रता थुकार ज्यों हीं , 
तंत्र बिन आई सन-जंत्र बिजुरीनि पे। 
कहे 'रतनाकर' त्यों कान्‍्ह की कृपा की कानि , 
झ्ानि लखी चातुरी-बिहीन प्ातुरीनि पे॥ 
अंग परो थहरि लहरि दुग रंग परथौ , 
तंग परथो बल्नन सुरंग पसुरीन पे। 
पंच जन्य ुमन हुमसि होंठ बक़ लाग्यो , 
चक्र लाग्यों घूमन उसंग्रि अंगुरीनि पे ॥7२१४॥ 


२२४ _ दँथां वीर 





यहाँ द्ोपदी की पुकार सुनकर भर्गवान्‌ श्रीकृष्ण के हंद्रय में उत्साह 
की उत्कट व्यज्ञनगा होने पर भी वह ( उत्साह ) यहाँ भक्तिभावः की 
व्यज्ञना का अज्ञ मात्र है, अतः वीर रस नहीं । 


दया-बीर । 


इसमे दयनीय व्यक्ति ( दया का पात्र ) आलम्बन, उसकी दीन दशा 
उद्दौपन, दया-पात्र से सात्वना के वाक्य कहना अनुभाव, ओर धृति, हृष, 
आदि व्यभिचारी होते हैं । 
सखबत रुधिर धमनीन सो मॉँसहु मो तन माँहि , 
तृपत लखाय न गरुड तुहु भखत न क्यों अब याहि।२१६॥ 


सर्पों की बध्य शिला पर शह्डचूड के बदले में बैठे हुए; दयाद्र 
जीमूत-वाहन के अड्भो को नोंच-नोंचकर खाने पर भी उसको ( जीमूत- 
वाहन को ) प्रफुल्ल-चित्त देखकर चकित गरुड के प्रति जीमूत-वाहन की 
यह उक्ति है। यहाँ शह्बचूड आलम्बन है | उसको खाने के लिये गरुड' 
के उद्यत होने पर उसकी दयनीय दशा उद्दीपन है। ध्ृति आदि सश्जारी 
आर जीमृत-वाहन के वाक्य अनुभाव हैं । 

“देखत मेरे को जीव हने सुनि के घुनि कोस हजार ते घाऊं; 
और को दु.ख न देखि सकों जिहिँ भाँति छुटे तिहि भाँति छुटार्ऊ 
दीनदयाल है छुत्रि को धर्म तहूँ सिवि हों जग-व्याधि नताऊँ; 
तू जनि सोचे कपोत के पोतक आपनी देह दे तोहि बचाऊँ ।?२१७॥ 


बाज-रूप इन्द्र से डरे हुए शरणागत कबूतर के प्रति ये शिवि राजा 
के वाक्य है। कबूतर आलम्बन है, कबूतर की दयनीय दशा उद्दौपन 
है । राजा के वाक्य अनुमाव हैं| घृति, हर्ष आदि व्यमिचारी हैं । 
“है कपिकंत ! विभीषन को यहा मंत्रिन साथहि वेगि छुलाय ले ; 
हों सरनागत को न तज्जों प्रन मेरो यही उर में अपनाय ले। 


चतुर्थ स्‍्तवक २२२ 


/ लीन्हों सुकंठ ने बोलि तबे लखि ताहि कट्चों प्रभु ने उर लाय लें; 
लंक-महीप ! असंकित हो दुख-दंद विहाय अनंद बढ़ाय जे ।?२१८॥ 


यहाँ रावण द्वारा अपमानित विभीषण आलम्बन है। सुग्रीव द्वारा 
कहलाए, हुए विभीपण के दीन वाक्य उद्दीपन हैं। धृति, स्मृति, आदि 
सारी हैं। श्रीरखुनाथजी के वाक्य अनुभाव हैं । 


“हेरि हहराय हाय-हाय के कहत हरा) , 
ससुरा न सास कोन मेटे दुख-माला कों 
थान है ससान ता बिकान को धरे को आन , 
लेहे कोन लाला सिंहछाला गजछाला कों। 
वृश्चिक भुजंग गोधिकात्मज" से भव्य-भव्य , 
भूषन भरे है केलें काटि हों कसाला को 
वाको दुख चीन्हों नाहिं, चीन्हों दुख देवन को, 
लीन्हों ह्वॉ श्रमोत्त जल पीनो हर? हालाएँ को ।?२१६॥ 


7 


यहाँ श्रीपार्वती के वाक्यो से अपने घर की दशा पर ध्यान न देकर 
देवतों की दीनता पर दया करके विष-पान करने में दया के उत्साह की 
व्यज्ञना अवश्य है, किन्तु इसमे दया-वीर नहीं है। कवि का अभीष्ट 
श्रीशड्डर की स्तुति करना है। अतः ऐसे वर्णोनों में देव-विषयक रति 
( भक्ति ) भाव ही प्रधान रहता है, ओर दया का उत्साह उसका पोषक 
होने से भक्ति का अद्ध हो जाता है | 


६ भयानक रस 


किसी बलवान्‌ के अपराध करने पर, या भयड्डर वस्तु के देखने से 
यह उत्पन्न होता है । 


£25७६४०७६ /« ६ ४४ २६ ४६ ४६ 2९२५ २६ /५ ४५ ४५/८5/५४४२ ८२५ ४६०४ ४४ २+२४०४०४६४४ ०५० 


१ श्रीपावतीजी । २ गोहिरा । ३ श्रीशइझूर । ४ ज़हर । 


3२३ भयानक रस 





स्थायी भाव--मय । 

५... आलम्बन-व्यात्र आदि हिंसक जीव, शून्य स्थान, वन, शत्रु आदि 
उद्दीपन--निस्सहाय होना, शत्रु आदि की भयड्जलर चेश, आदि । 
अनुभाव--स्वेद, वेबस्यं, कम्स, रोमाश्न ओर गद्गद होना, आदि | 
सश्चारी--जुगुप्सा, त्रास, मोह, ग्लानि, दीनता, शड्डा, अपस्मार, 

चिन्ता ओर आवेग आदि | 
कर्तव्य अपना इस समय होता न मुझको ज्ञात है ; 
८ कुरुराज' चिंता-प्रस््न मेरा जल रहा सब गात है। 
अतएवं मुकको अभय देकर आप रक्षित कीजिए , 
या पाथे-प्रण करने विफल अन्यत्र जाने दीजिए ।”२२०॥ 


अजुन की प्रतिज्ञा को सुनकर दुर्योधन के प्रति जयद्रथ के ये वाक्य 
हैं। अभिमन्यु के बध का अपराध ओर अजुन की प्रतिशा आल- 
म्बन ओर उद्दीपन है। त्रास आदि व्यभिचारी ओर जयद्रथ का किंक- 
तेब्य-विमूढ होना ओर गात्र का जलना, अनुभाव हैं। इनके द्वारा यहाँ 
भयानक रस की व्यज्ञना होती है । 
“पवन-वेगमय वाहनवाली गर्जन करती हुईं बढ़ी ; 
उसी जगह से घन-माला-सम कौरव-सेना दीख पडी। 
सूर्योदय होने पर, दोपक हो जाता निष्प्रभ* जैसे ; 
डसे देखकर उत्तर का मुख शोभा-हीन हुआ तेले । 
बोला तब होकर कातर वह शक्ति भूल अपनी सारो , 
देखो-देखो बृहन्लले! यह सेना है कैसी भारी ।”२२१ 


१ मूल पाठ भय और” है। भयानक रल के उदाहरण में भय 
का स्पष्ट ऋथन होना उपयुक्र न होने के कारण 'कुरुराज” पाठान्तर करे 
दिया गया है। 

२ यहाँ 'सय से? के स्थान पर 'होकर” पाठान्तर कर दिया गया है । 


चतुथ , स्तवक ४ 





मैं किस भाँति लड़गा इससे, ल्लोटाओ रथ-अरश्व अभी ; 
सेन्‍्य-सहित जब पिता शआरायेंगे, होगा वस अ्रव युद्ध तभी,।? २२२॥ 


' बहन्नला के रूप में अपने सारथी अरजु न के प्रति विरायराज के पुत्र 
उत्तरकुमार की यह उक्ति है। कारव-सेना आलम्बन है । उसका भयड्डर 
दृश्य उद्दीपन है। वैवर््य और गद्गद होना अनुभाव हैं। त्रास, देन्य, 
आवेग आदि सज्चारी हैं। पहला उदाहरण अपराध-जनित भय का है, 
ओर यह भयड्डर दृश्य-जनित भय का । 


कही कहीं भय स्थायी की स्थिति होने पर भी भयानक रस नहीं 


होता है-- 


“सकट व्यूह भेद करि धायो है पार्थ जबै , 
युद्ध करि द्वोन ही ते याद करि बाका की ; 
कुपित महान भयो रुद्बर-लतम रूप छुयो, 
लाग्यो है करन घोष गांडिच पिनाका की । 
भने कवि कृष्ण! भूमि-सुडन सो छात भई, 
नदी-ली उम्रडि चली खोनित घराका की ; 
कौरव के वोरन की छात्ती धहरान लागी, 
देख फहरान भारी बानर-पताका की ।”२२१॥ 


अजुन के युद्ध का वर्णन हे। अजु न आलम्बन है। उसके युद्ध 
का भयद्डुर दृश्य उद्दीपन है। स्मृति, त्रास, आदि सश्चारी हैं। कोरव- 
सेना का हृदय घहराना अनुभाव है। यहाँ भय स्थायी की व्यश्जना है 
पर वक्ता का अभीष्ट यहाँ अजु न के बीरत्व की प्रशंसा करना है | अतः 
भय यहाँ राज-विषयक रति का अड्भज हो गया है । और--- 


“सूवनि सराजि पढ़ावतु है निज फौज लखे मरहद्दन केरी ; 
ओरंग आपुनि दुग्ग जमाति विलोकत तेरिए फोज दरेरी । 


श्र बीभत्स रस 


साहितने सिवसाहि भई भनि 'सूषन! यों ठुव घाक घनेरी ; 
रातहु. योस दिलीस तके तुव सेंन कि सूरति सूरति घेरी ।7२२४॥ 
ऐसे उदाहरणों में मयानक रस नहीं समभना चाहिये। यद्रपि यहाँ 
शिवराज आलम्बन है, उसके पराक्रम का स्मरण उद्दीपन, औरगशाह 
की अपनी ही फौज में शिवाजी की फोज का भ्रम होना अनुमाव, ओर 
त्रास, चिन्ता, आदि व्यभिचारी भावों से भय की अभिव्यक्ति होती है, 
किन्तु कविराज भूषण का अभीष्ट यहाँ शिवाजी की प्रशसा करने का है; 
अतः राज-विषयक रति-भाव प्रधान है। ओरगर्जेब का भयभीत होना 
उसकी पुष्टि करता है, अतः वह अद्भभूत है। 
“छूटे घाम धवल केवल सुखवार छूटे, 
छूटी पतिश्रीति गति छूटी जो करीन 
भनत '“प्रवीन बेनी! छुटे सुखपाल रथ, 
छूटी सुखलेज सुख साहिबी नरीन में । 
गाजुदी उजीर वीर रावरी अतंकु पाइ, 
आ्राजु दिन छल गई जु दीन जे परीन में ; 
कारी-कारी जामिनी में बेरिन की भामिनी ते , 
दामिनी-सी दोरें दुरी गिरि की दरीन में ।”शर॥ 


हि ७| | 


यहाँ भी भयानक रस की सामग्री है किन्तु इसके द्वारा कवि कृत 
गाजुद्दीन की प्रशसा की पुष्टि होती है, अतः राज-विषयक रति-भाव ही 
प्रधान है। 'नवरसतरग' में इसे भयानक रस के उदाहरण में लिखा है, 
पर वास्तव में भयानक रस नहीं है । 


७ बीमत्स रस 


रुघिर, ऑत आदि घृणित बस्ठु देखने पर जो ग्लानि होती है, उसी 
से यह उत्पन्न होता है। 


चतुर्थ स्‍्तवक २२६ 





स्थायी भाव--जुगुप्सा ( ग्लानि ) | 

आलम्बन--दुर्गन्धित मास, रुधिर, चर्बी, वमन, आदि । 
'उद्दीपन--मासादि मे कीड़े पड जाने, आदि का दृश्य । 
अनुभाव--थूकना, मुंह फेर लेना, ओख मूं द लेना, आदि | 
व्यभिचारी--मोह, अपस्मार, आवेग, व्याधि, मरण, आदि | 


“अति ताप तें अस्थि पसीजञन सा कढ़ों सेद की दूँटुबन जो टपकावें; 
तिन घूम घुसारिनु लोधिनि को ये पिसाच चितानु सौं खैंचि के खाचें। 
ढिलियाह खस्थो तचि मांस सबे जिहिँसों जुग संधिहु भिन्न लखावें ; 
अस जंघनली-गत मज्जा मिली, सद पो चरबी परवी-ली सनावें ।?२२६ 


अद्ध -दग्ध मृतका का दृश्य आलम्बन ओर उद्दीपन है | इस दृश्य 
का देखा जाना अनुभाव ओर मोह आदि सश्ञारी हैं । 


“सिर पे बेब्यो कागा श्रॉख दोड खात निकारत ; 
खींचत जीभहि स्यार अतिहि आनंद उर घारत 4 
गिद्धू जॉब को खोदि-खोदिके मांस उपारत ; 
स्वान ऑगुरिन काठि-काटिके खात विदारत। 
बहु चील नोंचि ले गात नुच मोद भषथों सबको हियो , 
सनु ब्रह्मम्रोज जिजमान कोड आज भसिखारिन कहे दियो 7१२२७ 


यहाँ श्मशान का दृश्य आलम्बन, ओर मृतकों के अड्»ों का काकादि 
छारा खाया जाना उद्दीपन, इत्यादि से बीमत्स रस की व्यञ्ञना है । 


“इतहि प्रचंड रघुनंदन उ्दंड मुज , 
उत्तें दसकंठ बढ़ि आयो डरु डारिके; 
सोमनाथ” क्है रन संठ्यों फर मंडल में , 
नाच्यो रुद्र स्लोनित से अंगन पखारिके। 


२२७ चीभत्स रस 


मेद गूद चरब्री की कीच मची मेंदनी में, 

बीच-बीच डोलें भूत भेरों मद धारिके ; 
चायनि सौं चंडिका चबाति चंड-मंडन कौ, 

दंतनि सों अंतनि निचोरें किलकारिके ।?२२८॥ 


किन्तु-- 
इढ़ कावरि है अधघ-ओघन को सब दोषन को यह गागरि है ; 
श्रस तुच्छु कलेवर को खक-चन्दन भूषन साजि कहा करि है । 


मल-मूतन कीच गलीच जहाँ कृमि आकुल पीब अँतावरि है ; 
दिन वे किन याद करे ? घिन के जब सूकर कुकर हू फिरि है ।३२६ 


यहाँ बीमत्स की व्यज्ञना होने पर भी मनुष्य-शरीर की घृणास्पद 
अन्तिम अवस्था के वर्णन से वेराग्य की पुष्टि की गई है, अतः शान्त 
रस प्रधान हे--बीभत्स उसका अडद्) मात्र है। 


“आवत गलानि जो बखान करें ज्यादा वह , 
मादा-मल-मृत ओर? सज्जा की सलीती है , 
कहै “'पदमाकर” जरातो जागि भीजी तब , 
. छीजी दिनन-रेन जेसे रेनु ही की भींती है। 
सीतापति राम में सनेह यदि पूरो कियो , 
तो तो दिव्य देह ज़म-जातना सों जीती है , 
रीती राम-नाम तें रही जो विना काम वह , 
खारिज खराब हाल खाल की खलीती है ।?२३०॥ 


इसमें मनुष्य-शरीर की बीभत्सता का वर्णान होने पर भी बीमत्स रस 
नहीं है। यहाँ जुगुप्सा स्थायी न रह कर सशञ्जारी हो गया है, क्योंकि 
शरीर की बीमत्सता बताकर राम-भक्ति को प्रधानता दी गई है, अतः - 
देव-विषयक रति-भाव ही है। 


चतुथ स्तवेक श्श्दे 





“सूप शिवराज कोप करि रन मंडल में , 
* खग्ग गहि कूृद्यो चकत्ता के दरबारे में; 
काटे भट विकट गजनहू के सुंड काटे , 
पाटे डारि भूमि काटे दुबन सितारे 
'भूषन! भनत चेन उपजैे सित्रा के चित्त, 
चौसट नचाई जबें रेवा के किनारे 
अतन की तॉत बाजी,खाल की झूदंग बाजी , 
खोपरी की ताल पसुपाल के अखारे में ।?२३१॥ 


7 


७ 4 


यहाँ भी जुगुप्सा की व्यज्ञना हैं। किन्ठु वह सश्जारी भाव होकर 
महाराज शिवाजी के प्रताप के वर्णन का अद्ञभूत हो गया है, अतः राज- 
विषयक रति भाव हे--न कि वीभत्स रस | 
“चटकत बॉस कहूँ जरत दिखात चिता, 
मज्जा-मेद-बास मिल्‍यो गंधवाह” गहिए । 
काड्ू थल आत-पाँत दग्घ देह की दिखात , 
नील-पीत ज्वाल-पंज भांति बहु लहिए। 
केतिक कराल गीघ चील माल जाल रूप 
मांसहारी जीवन जमात लखि घिनिए , 
ऐसे समसान मॉहि शांत हेतु शब्द यही 
राम-नास सत्य है, श्रीराम-नामस कहिए ।”२३१॥ 


यद्यपि यहॉचोये चरण में शान्त के विभावों का वर्णन है, पर शान्त 
रस के अनुभाव ओर व्यभिचारियों द्वारा इसकी पुष्टि नहीं की गई है । 
अतः ऐसे वर्णनों में वीमत्स को ही प्रधान समझना उचित है। मु 





4१ पवन | 


श्र5: अदूभुत रसे 





८ अदभुत रस 

आश्चर्य-जनक विचित्र वस्तुओं के देखने से अ्रदूभुत रस व्यक्त 
होता है | 

स्थायी भाव--विस्मय | 

आलम्बन--अ्रलोकिक, अदृश्य पूवे, आश्चय-जनक वस्तु । 

उद्दीपन--उसकी विवेचना । 

अनुभाव--स्तम्म, स्वेद, रोमाश्ञ ओर गदूगद होना, अनिमिष 
देखना, सम्प्रम, आदि । 

सद्चारी--वितक, आवेग, श्रान्ति, हष, आदि | 


जदुनाथ सो मॉगि बिदा बगदे सग माँहि श्रनेक विचार फुरे चित ; 
निज भोन हतो तहेँ मंदिर चारु पुरंदर हू अ्रभिलाबित जो नित। 
मनि-थंभ रु विद्ुम देहरी त्यों गजनमोतिन वंदनवार परे जित; 
लखि चौंकि के विश्र कह्यो यह है सपनो श्रथवा लखि सोचो परे इत २३३ 


7 द्वारिका से लोटकर आने पर सुदामाजी को अपने घरका न 
दीखना आलम्बन, अलोकिक विभव-सम्पतन्न भवन का वहाँ होना उद्दीपन 


वितक आदि सारी हैं। इनसे विस्मय स्थायी भाव अ्रदूभुत रस में 
व्यक्त होता है| 


शोर्षों से-अपमान जान अपना क्रोधांध होके तभी , 
की वर्षा ब्रज इंद्र ने सलिल से चाहा डुबाना सभी। 
था ऐसा गिरिराज आआाज कर से ऊँचा उठाके अहो ! 
जाना था किसने कि गोप-शिशु ये रक्षा करेगा कहो १२३६४श॥ 
यहाँ गोवर्धनधारी श्रीनन्दनन्दन आलम्बन है। उनका अविकल 
स्थिर रहना उद्दीपन है | व्रजवासियों के ये वाक्य अनुभाव हैं। वित्क, 
हर्ष, आदि सद्चारी हैं। इनके सयोग से यहाँ अद्भुत रस की व्यञ्ञना है। 


चतुथ स्तवक २३० 


“रिसि करि लेजें ले के पूते बांधवे को लगी, 

शआावत न पूरी बोली केंसो यह छौोना है। 
देखि-देखि देखें फिर खोल के लपेटा एुक, 

बाँधघन लगी तो वहू कक्‍्योह्ू के बँधी ना है । 
दवाल कवि! जसुधा चकित यों उचाटि रही, 

आली यह भेद कछु परे समझो ना है। 
यही देवता है किधों याके संग देवता हैं, 

या किहूँ सखा ने करि दिन्हों कछु टोना है ।२३५॥ 


यहाँ ऊखल से भगवान्‌ श्रीकृष्ण को बॉधने के समय सभी रस्तियों 
का छोटा रहना आलम्बन है। श्रीकृष्ण का बन्धन में न आना उद्दीपन 
है | बितक आदि सश्चारी है। इनके द्वारा विस्मय स्थायी अदभुत रस में 
व्यक्त होता है | 


“न्रज बछुरा निज घास करि फिरि चज-लखि फिरि धाम ; 
फिरि इत लखि फिरि उत लखे ठगि विरंचि तिहि ठाम ।?२३६४ 


बत्स-हरण के समय ब्रह्मा द्वारा गोपकुमार ओर बछुडो को ब्रह्म-धाम 
मैं छोड आने पर भी श्रीकृष्ण के पास वही गो ओर बछुडे देखकर 
ब्रह्मा को विस्मय होने मे अद्भुत रस की व्यज्ञना है । 
“जाही पै संघान बानगांडीव ते अर्जुन को , 
ताही पे अच्छुर चख चंचल चल्लात हैं। 
रूप रंग भूषन जे वसन निहारत ही , 
छिन ही में ओर ही से ओर दिखरात है। 
मेरो ही बरणे है केचों ओर को बरथो है ऐसो , 
अरत्र बिन सख्र ही सें दश्य लखि पात है। 
याही ख्याल बीच हैं विहाल सुर-बाल डारें , 
त फूल माल लाल-लाल भई जात हैं।?२३७॥ 


२३१: अदभुत रस: 


यहाँ अजु न के बाणों से स्वर्गगामी होने वाले वीरों के दृश्य, में, 
सुराज्ञनाओं के हृदय मे अद्भुत रस की व्यज्ञना है । 


“दुवन दुसासन दुकूल गह्यो दीनबंधु ! 
दीन होौके हर पद-कुमारी यों धुकारी है, 
छोड़े पुरुषारथ को ठाढ़े पिय पारथ से 
भीस महाभीम भव नीचे को निहारी है , 
अंबर तो अंबर अमर फियो “बसीघर!' 
भीषम करन द्वीन सोभा यों निहारी है । 
सारी मध्य नारी है कि नारी मध्य सारी है कि 
सारी ही की नारी है कि सारी-है कि नारी है ।”२१घ८ा॥ 


यहाँ द्रोपदी के चीर-हरण के समय वस्त्र-इद्धि को देखकर भीष्मादि' 
के चित्त में अद्भुत रस की व्यज्जना है| किन्तु-- 


जाते ऊपर को अहो उतर के नीचे जहाँ से ऋती, 
हैं पेड़ी हरि की अलोकिक जहाँ ऐसी विचित्राकृती । 

देखो भू गिरती हुईं सगरजों को स्वर्गंगामी किए , 
स्वर्गारोहण-मार्ग जो कि इनके क्‍या ही अनोखे नए ॥२३ ४३ 


ऐसे उदाहरणों में अद्भुत रस नहीं होता है, क्योंकि यहाँ श्रीगद्धाजीः 
की महिमा का वर्णन किया जाने से देव-विषयक रति-भाव ही प्रधान है, 
विस्मय व्यभिचारी अवस्था में उसका अद्भ है | 


“सेस गनेस महेस दिनेस सुरेंसहु जाहि निरंतर गावें , 
जाहि अनादि अखंड श्रनंत शअ्रभेद अछेद सुं वेद बतावैं।. 
नारद से सुक प्यास रहे पचि हारे तऊ पुनि पार नपायें , 
ताहि अहीर की छोहरियों छछिया-भरी छाछु पे नाच नचादें |?२४०॥७ 


चतुथ स्तव्॒क २३२० 





: यहाँ भी चतुर्थ चरण में विस्मय की अभिव्यक्ति होने पर भी वह 
प्रधान नहीं है। भगवान्‌ की भक्त-बत्सलता का वर्णन होने से देव- 
(विषयक रति-माव ही प्रधान है, ओर विस्मय-भाव उसी का पोषक होने से 
अद्भभूत है । 

& शान्त रस 
तत्त्व-शान ओर वेराग्य से शान्त रस उत्पन्न होता है। 
स्थायी भाव--निर्वेद या शम | 
अलम्बन--अनित्य रूप संसार की असारता का ज्ञान या 
'परमात्म-चिन्तन । 
उद्दीपर--ऋषि जनों के आश्रम, गंगा आदि पवित्र तीर्थ, एकान्त 
'चन, सत्सज्भ, आदि | 
अनुमाव--रोमाश्च, ससार-भीरुता, अध्यात्म-शास्त्र का चिन्तन, 
ऋआदि | 
सम्चारी--निवेद, हष॑, स्मृति, मति, आदि |. 
काव्यप्रकाश में 'शान्त” रस का थायी निर्वेद माना गया है। मम्म- 
ठाचाये का मत है कि जो तत्व-ज्ञान से निवंद होता है, वह स्थायी भाव 
है, और जो इष्ट के नाश ओर अनिष्ट की प्राप्ति के कारण निवेद होता 
है, वह स्चारी है! । नाय्य-शासत्र में शान्त रस का स्थायी भाव 'शम 
माना गया है। 
साहित्यदपंण में शान्त रस की स्पष्टता करते हुए. कहा है-- 
नयत्र दुःखं न सुख न चिन्ता न द्वेषरागी न च काचिदिच्छा ; 
रसः स शान्तः कथितो मुनीन्‍्द्रें: सर्वेषु भावेषु शमप्रधानः । 


१ “स्थायी स्याह्विषयेष्वेव तत्त्वज्ञानादवेयदि ; 
इष्टानिष्टवियोगाप्तिकृतस्तु “व्यभिचार्य सौ!?--. 
काब्यप्रकाश, वासनाचार्य टीका, पृष्ठ १३८। 


श्श्यु शान्त रस 





अर्थात्‌ जिसमें न दुःख हो, न सुख हो, न कोई चिन्ता हो, न राग- 
हंष हो, ओरं न कोई इच्छा ही हो, उसे शान्त रस कहते हैं |,यहाँ 
शह्»ा हो सकती है कि यदि शान्त रस का यह स्वरूप मान लिया जायगा, 
तो शान्त रस की स्थिति मोक्ष-दशा में ही हो, ओर उस अवस्था 
में विभावादि का ज्ञान होना असम्मव है। फिर विभाव, अनु- 
भाव, सश्जारी आदि के द्वारा शान्त रस की सिद्धि किस प्रकार मानी जा 
सकती है ! इसका समाधान यह किया गया है कि युक्त 
वियुक्तर ओर युक्त-वियुक्तः दशा में जो 'शम' रहता है, वही स्थायी 
होकर शान्त रस में परिणत हो जाता है, ओर उस अवस्था में विभावादि 
का ज्ञान भी सम्भव है। यहाँ मोक्ष दशा या निर्विकल्पक समाधि का शम 
अभीष्ट नहीं है | 
शान्त रस में जो सुख का अ्रमाव कहा गया है, वह विषय-जन्य सुख 
का अमाव है, न कि सभी प्रकार के सुखो का अभाव | क्योंकि-- 


“यघ्च कामसुखं लोके यज्च दिव्यं महत्सुखम्‌ , 
तृष्णाक्षयसुखस्येते नाहैतः षोडशी कलाम ।” 


३ रूप, रस आदि विषयों से मन्त को हटाकर ध्यान-सग्न योगी को 
ध्युक्र' कहते हैं । 


२ जिसे योग-बल से अ्रसणिसा आदि सिद्धियाँ प्राप्त हैं, ओर 
समाधि-भावना करते ही सब वान्छित वस्तुओ का ज्ञान ग्रन्त/।करण 
में भाव होने लगदा है, उस योगी को 'वियुक्र! कहते है | 


३ जिसकी नेत्र आदि खब इन्द्रियाँ महत्त्व और श्रदूभुत रूप आदि 
प्रत्यक्ष ज्ञान के कारणों की अपेक्षा न करके सब श्रतीन्द्विय विषयों का 
खाज्ञात्‌ कर सकती हैं, उस योगी को युक्न-वियुक्र! कहते है । 

१३ 


चतुथ सतवक २३४ 





- अर्थात्‌ ससार में जो विषय-जन्य सुख हैं, तथैव स्वर्गीय महासुख हैं, 
वे सब मिलकर मी वृष्णा-क्षय ( शान्ति ) से उत्पन्न होनेवाले सुस्त के 
सोलहवें अंश के समान भी नहीं हो सकते हैं। अतणएणव शर्मा अ्रवस्था 
में सुख अवश्य होता है, ओर वह अनिवंचनीय होता है। शान्त रस का 
उदाहरणु--- 


“जानि परयो सोर्कों जग श्रसत अखिल यह 

धव आदि काह्ू को न सर्वदा रहन है, 
याते परिवार व्यवहार जीत-हारादिक 

त्याग करि, सबही विकसि रहो मन है । 
“वाल” कवि कहै मोह काहू में रद्यो न मेरो 

क्योंकि काहू के न खंग गयो तन-घन है। 
कीन्हों में विचार एक ईश्वर ही सत्य नित्य 

अलख अपार चारु चिदानंदघन है।”२४१॥ 


यहा जगत्‌ की अनित्यता आलम्बन है। किसी में मोह न रहना 
अनुभाव हे । मति आदि स्वारी भाव हैं। इनके द्वारा शान्त रस 
ध्वनित होता है | 


व्याल सों न भीति भ्रीति मोतिन की माल सों न 
जैसो रल ढेर तेसो लोहहू प्रमानों मैं, 
फूलन बिछान त्यो पखान हू समान मेरे 
मित्र और सम्रु में न भेद कछु जानोंमें। 
तन को न तुच्छु, नहिं रूच्छु करों तरुनी कों 
. राग ओर द्वेष को न लेस चित्त आनों में । 
'कोऊ जुन्यारन्य माँहि मेरे यह यौस बीतो 
. चीर्तों ना और एक सिव-सिव्र बखानो' मैं ।२४२॥ा 


२३४ शान्त रस 





यहाँ प्रिय-अप्रिय, राग-दं घ आदि में समदृष्टि होने के कारण शान्त 
रस की व्यक्षना है। जिस संस्कृत-पद्म का यह अनुवाद है, उसे काव्य- 
प्रकाश में शान्त रस के उदाहरण में लिखा है। नागोजी भट्ट ओर 
क्षेमेन्द्र* कहते हैं--'समदृष्टि के लिये सभी स्थल शिवमय हैं, फिर 
पुण्यारण्य की ही इच्छा उस अवस्था के ( समदृष्टि के ) प्रतिकूल होने से 
यहाँ अनोचित्य है! । हमारे विचार में इसके द्वारा निर्वेद या वेराग्य की 
व्यज्ञगा में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती है, प्रत्युत पुण्यारणय का 
सेवन और शिव-शिव की रटन तो विरक्तावस्था के अनुकूल ही है | केवल 
विषय-सुख ओर दुःख के विषय में ही समदृष्टि की आवश्यकता है। 
अतएव यहाँ अ्रनोचित्य नहीं है । 


“हाथी न साथी न घोरे न चेरेन गाँव न ठाँव को नाम बिले हैं ; 
तात न मात नमित्र नपुत्र न वित्त नअंग के संग रहै हैं। 
'करेसव” कास को राम बिसारत झ्रौर निकाम ते काम न ऐंहैं , 
चेत रे चेत अज्जों चित अंतर शअंतक लोक इकेलो ही जहैं ।?२४३॥ 

यहाँ मी विभावादिकों से शान्त रस ध्वनित होता है । 

कहीं-कहीं निरवेद के विभावादि की स्थिति होने पर भी शान्त रस 
नही होता है। जैसे-- 

सुरसरि-तट दृग मूँदि सब विषयन विष-सस जान , 

कब निमग्न हट हों ,मघुर नील जलज-छुवि ध्यान २४४७ 

विषयों ज ; >ज ५ ५. निवेंद्‌ 

यहाँ विषयों के तिरकार आदि के द्वारा पूर्वाद्ध में निर्वेद 

की व्यज्ञना है, किन्तु” कवि का अमीष्ट भगवान्‌ कृष्ण में प्रेम-सूचन 





१ देखिये, शान्त रस के इस उदाहरण की काव्यप्रकाश की उद्योत 
दीका । | 
२ श्रौचित्यविचारचर्चा, काव्यमाला, प्रथम ग्रुच्छुक, प्रष्ठ ३३१।॥ 


चतुर्थ स्तवक *३३ 


करना ही है। अतः शान्त रस नहीं, देव-विषयक रति ( भक्ति ) भाव 

अ्रधान है, ओर “निवेंद' सख्ारी अवस्था मे उसका पोषक है। 

“या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारों; 
- झाठहु सिद्धि नवो निधि को, सुख नंद की गाय चराय बिगारों | 
'रसखान! कर्बों इन लोचन सों घज के बन बाग तढ़ाग निहारों ; 
कोटि करों कलधोत के धाम करील के कुजन ऊपर वारों ।?२४४ 


ऐसे वर्णानों मे मी देव-विषयक रति भाव ( भक्ति ) ही प्रधान हैं, न 
एके शान्त रस | 
“बैटि सदा सतसंगहि में विष मानि विषे-रस कीति सदाहीं , 
त्यों 'पदमाकर' कूठि जितो जग जानि सुज्ञानहि को अवगाहीं । 
नाक की नोंक से दीठि दिए नित चाहे न चीज कहूँ चित चाही; 
संत्तत संत सिरोमनि है धन है बन वे जन वेपरवाही ।२४६ 


जगद्विनोद मे कवि ने इसे शान्त रस के उदाहरण मे लिखा है। 
यहाँ तीन चरणों में जो वैराग्य की व्यञ्ञना है, वह चोथे चरण में सन्त 
जनो की महिमा का अज्ज हो जाने से मुनि-विषयक रति भाव है, न कि 
शान्त रस | 


शान्‍्त रस ओर दया-वीर रस मे यह भेद है कि दया-वीर मे 
देहादि का अभिमान रहता है, किन्तु शान्त मे अहड्गार का आमास भी 
नहीं होता है। यदि दया-वीर, धर्म-वीर ओर देव-विषयक रति भाव, 


सब प्रकार के अहड्डारों से शूत्य हो जायें, तो वे शान्त रस के अन्तर्गत 
आ सकते हैं। 


हास्य ओर बीभत्स रस के आश्रय 


रति, क्रोष, उत्साह, भय, शोक, विस्मय ओर निवेद इन स्थायी 
भावों के आलग्बन ओर आश्रय दोनों की ही प्रतीति होती है। जेसे 


२३७ शान्त रस 





शज्ञार-रस में शकुन्तला-विषयक दुष्यन्त की रति में शकुन्तला आल- 
म्बन ओर दुष्यन्त रति का आश्रय है, और दोनो को ही प्रतीति होती 
है | परन्तु हास्य ओर जुग॒ुप्सा में केवल आलम्बन की ही प्रतीति होती 
है--आश्रय की नहीं। अर्थात्‌ जिसे देखकर हास ओर घृणा उत्पन्न 
होती है, प्रायः उसी का वर्णन होता है--जिस व्यक्ति के हृदय में हास 
ओर घृणा उत्पन्न होती हे, उस (आश्रय ) का प्रायः वर्णन नहीं होता | 
परिडतराज जगन्नाथ का* इस विषय में यह कहना है कि हास ओर 
जुगुप्सा मे आश्रय के लिये काव्य के पाठक और श्रोता या नायक के 
दशक किसी व्यक्ति का आज्षेप कर लेते हैँं। यदि किसी व्यक्ति का आज्लेप 
न भी किया जाय तो पाठकों, श्रोताओं या दर्शकों को ही रस का आश्रय 
मान लेना चाहिए. | यदि यह कहा जाय कि पाठक, श्रोता या दर्शक तो 
अलोकिक रस के आस्वाद के आनन्द का अनुभव करनेवाले हैं 
(अर्थात्‌ आस्वाद के आधार हैं ), ओर इसलिये लोकिक हास ओर 
जुराप्सा के आश्रय वे केसे हो सकते हैं * तो इसका उत्तर यह है कि 
जिस प्रकार श्रोता आदि को अपनी स््री-सम्बन्धी वर्णनात्मक काव्य से 
श्सास्वाद होता है ( अर्थात्‌, लोकिक रस का जो आश्रय होता है, वही 

अलोकिक रस का आस्वाद करनेवाला भी होता है) उसी प्रकार हास 
और जुगुप्सा में भी आश्रय ओर रसानुभवी एक ही मान लेने में कोई 

बाधा नहीं है। 


जिन दर्द २९७ ध्र्दूः रे >जन«-म 


१ रसगद्ञाघर, ए० ४५ । 


चतुर्थ स्तवक र्३८ 


चत॒र्थ स्तवक का तृतीय पुष्प 


भाव 


( १ ) देव आदि विषयक रति, (२) सामग्री के 
अभाष में उद्बुद्ध-मात्र अर्थात्‌ रस रूप का अग्राप्त रति 
आदि स्थायी भाव, और ( ३ ) प्रधानता से व्यव्जित निर्वे- 
दादि सब्चारी, इनको भाव संज्ञा है | 


( १ ) देवता, गुरु, मुनि, राजा ओर पुत्र आदि जहा 'रति! के 
आलम्बन होते हैं, अर्थात्‌ जहाँ इनके ब्रिषय में भक्ति, प्रेम, अनुराग, 
अद्धा, पूज्यमाव, प्रशंसा, वात्सल्य और स्नेह ध्वनित होता है, चाहे 
वे सामग्री से पुष्ट हों अथवा अपुष्ट, वे रति भाव ( भक्ति आदि ) 
“भाव? कहे जाते हैं | 


( २ ) जहाँ रति आदि नवों स्थायी माव उद्बुर-मात्र हो अर्थात्‌ 
विभाव, अनुभाव ओर सश्जारियो से परिपुष्ट न हो, वहाँ इन स्थायी भावों 
को भाव कहते हैं। तात्पर्य यह है कि नायक-नायिका आलम्बन होने पर 
भी 'रति'! तभी <इड्जारर्स मे परिणत हो सकती है जब वह विभाव, 
अनुमाव ओर सखग्जारी भावों से परिपुष्ट की जाती है। अन्यथा उस 
( रति ) की केवल 'भाव' सज्ञा रहती है | इसी प्रकार हास आदि अन्य 
स्थायी भाव जब विभावादि से परिपुष्ट होते हैं तमी रस अवस्था को 


प्राप्त हो सकते हैँ--अपुष्ट अवस्था में वे भी भाव-मात्र रहते हैं । 


काव्यप्रकाश ओर ररुगड्राधर के भाव-प्रकरण में स्थायी भाव का 


२३६ भाव 
स्पष्ट उल्लेख नहीं है | किन्तु साहित्यदर्पश" में अपुष्ट स्थायी भावों की 
आाव सज्ञा का स्पष्ट उल्लेख है। काव्य-प्रदीप का भी यही मत है* | 


(३ ) निवंदादि सश्जारी भाव जहाँ प्रधानता से व्यज्ञित ( प्रतीत ) 
होते हैं, वहों उनकी भी भाव सज्ञा रहती है । 


जहाँ व्यभिचारी माव होता है वहाँ रस होता है ओर रस की ही 
प्रधानता रहती है | अतः प्रश्न होता है कि प्रधानता से व्यज्ञित व्यभिचारी 
की माव सज्ञा किस प्रकार मानी जा सकती है ? इसका उत्तर यह है--- 
जैसे मंत्री के विवाह मे मंत्री-दूल्हा आगे चलता है, ओर राजा स्वामी 
( प्रधान ) होने पर भी, दूल्हा के पीछे चलता है, इसी प्रकार जहाँ 
किसी विशेष अवस्था में व्यभिचारी' प्रधानता से प्रतीत होता है, वहाँ 
अपने रस की अपेक्षा अधिक प्रधान होकर उसकी ( व्यभिचारी भाव की ) 
भाव संज्ञा ही रहती है । 


इस विषय में यह मी प्रश्न हो सकता है कि जत्र विभाव, अनुभाव 

ओर व्यभिचारी भाव सम्मिलित होकर ही, प्रषानक रस के समान, 

रस का आस्वाद कराते हैं, तब व्यमिचारी का प्रथक आस्वाद और 

चह भी प्रधानता से किस प्रकार हो सकता है ? इसका उत्तर यह है कि 

जिस प्रकार प्रषानक रस में जब इलायची आदि किसी पढाथ विशेष का 

आधिक्य होता है तो उस पदार्थ विशेष का आस्वाढ प्रधानता से होता 
४ “संचारिण: प्रधानानि देवादिविषयारतिः , 
डद्बुद्धमाश्र स्थायी च भाव इत्यभिधीयत्ते ।” 


२ “रतिरिति स्थायीभावोपलक्षणम्‌ । * 'कान्तादि विषयाउप्य- 
भूर्गरतिहासादयश्चाप्रापरसावस्था, प्राधान्येन व्यज्लितो ब्यभिचारी च 


० ० $ 2: ब करा पुनवगपत या 33 शान + 
27 0 32 009 


चतुर्थ स्तवक र्प्र्० 





है, उसी प्रकार व्यंभिचारी भी किसी विशिष्ट अवस्था में प्रधानता सेः 
प्रतीत होने लगता है | 


देव-विषयक रति भाव । 


हों सवसागर में अमि बूढत हा ! न मिल्‍यो कोउ पारः उतारन ; 
नाथ ! सुनो करुना करिके सरनागत की यह दीन पघुकारन। 
चाहों सदा गुन-गावन के मनभावन वे उर मॉँहि निहारन ; 
कालिंदी-कूल-निकु जन की भव-भंजन-केलि अरहो गिरिधारन ।२४७ 


यहाँ श्रीनन्दनन्दन आलम्बन हैं | यमुना-तट का विहार उद्दीपन है। 
विनीत प्रार्थना अनुभाव है। चिन्ता, विषपाद ओर ओत्सुक्य आदि 
सञ्जारी भाव हैं| भगवान्‌ के विषय में जो अनुराग ध्वनित होता है» 
वह देव-विषयक रति-भाव है | देव-विषयक रति, भक्ति का पर्याय है। 


दिवि में भ्रुवि में निवास हो' या, 
नरकों मे नरकांत ! हो न क्‍यीं या ; 
रमणीय पदारविंद तेरे, 
मरते भी स्मरणीय होये मेरे ।२४घ८ा)॥। 


यहाँ भी मगवान्‌ के विषय में देव-विषयक रति भाव है |, 


“जअ्रजु मन चरन संकट हरन । 

सनक संकर ध्यान लावत निगस असरन सरन। 

सेल सारद कहें नारद्‌ संत चिंतत चरन । 

पद पराग प्रताप दुरलभ रमा को हितकरन !/ 

परसि गंगा भई पावन तिहूँ घुर उद्धरन। 

चित्त चेतन करत  अंतःकरन- तारनतरक। हि 


बाई है न ॥_ 35५३ 


गए तरि ले नाम केले लाप-प्रंकर में स्थायी भाव का 


रछ१ भाव। 


जासु पदरज परसि गोतम-नारि गति उद्धरन | 
जासु महिसा प्रगट कहत न धघोह पर सिर घरन । 
कृष्ण-पद-मकरन्द पावन ओर नहिं सिर परन। 
सुर! प्रभु चरनारविंद तें मिटरें जनम रु मरन ॥२४ शा 


महात्मा सूरदासजी के इस पद में भी देव-विषयक रति भाव है |, 


“पान चरनाम्त को गान गुन्न-गानन को , 

हरि-कथा सुने सदा हिय को हुलासिबो'; 
प्रभु के उतीरन की गूदरी करों चीरन,की , 

भाल भुजकंठ कर छापन को लसिबो!।' 
'सेनापति' चाहति है सकल जनस-भरि , 

वृदावन सीमा ते न बाहिर निकसिबो ; 
राधा-मनरुंजन की सोभा नेन-कंजन की , 

माल गरे ग्ुजन की कुजनि में बसिवो ।?२-४०॥॥ 


यहाँ श्रीवृन्दावन-विहारी मे कवि का जो प्रेम ध्वनित होता हे, वह 
देव-विषयक रति भाव है | 


देव-विषयक रति अथांत्‌ भक्ति-रस को साहित्याचार्यों ने भाव 
सकज्ञा दी है। यह ठीक है कि भक्तिरस को शड्भाररस नहीं कहा जा 
सकता । क्‍योंकि »ड्जार की व्यज्ञगा तो कामी जनों के हृदय में ही' 
उद्भूत हो सकती है | यह बात शशज्ञार शब्द के योगिक अर्थ से भी 
स्पष्ट है| किन्तु 'भक्ति' को एक स्वतन्त्र रस॒न॒ मानना केवल प्राचीन 
परिपाटी-मात्र है | वास्तव मे अन्य रसों के समान सभी रसोत्यादक 
सामग्री इसमें मी होती है । जैसे, भक्तिर्स के आलम्बन भगवान 
श्रीरामकृष्ण आदि हैं, श्रीमद्धागवत आदि का श्रवण उद्दीपन है ; ओर 
बह रोमाशञ्च, अश्रपात आदि द्वारा अनुमव गम्य एवं. हपे, ओऑत्सुक्या 

डगाश्लिसष्टी आातों बारा, परिपृष्ट होता है), 


चतुर्थ रतवक २४२ 


श्रुतियो के अनुसार१ जिस ब्रह्मानन्द्‌ पर रस का रसत्व अवलम्बित 
होना सभी साहित्याचार्य मानते हैं, उस ब्रह्मानन्द से भी अधिक जो 
अक्ति-जन्य आनन्द तदीय भक्त जनों को होता है, उस मक्ति को स्वतन्त्र 
रस न मानना ओर क्रोध, शोक, भय ओर जुगुप्सा आदि की व्यज्ना 
को रस-संज्ञा देना वस्त॒तः युक्ति-युक्त प्रतीत नहीं होता है* । 
यदि यह कहा जाय कि भक्ति-जन्य आनन्द होने मे क्‍या प्रमाण है, 
तो इसका उत्तर यही है कि जब अन्य रसों के आनन्दानुभव के प्रमाण 
के लिए. सहृदयों के ढृदय के अतिरिक्त कोई प्रमाण नहीं है तो भक्ति- 
रस के आनन्दानुभव के लिए. भी भक्त जनो का हृदय ही साक्षी है। 
गुरुविषयक रति-भाव । 
वामन पद-क्षालन-सलिल भवसागर-प्रिय जोय ; 
वंदी भवसागर-दमन गुरु-पदु-कज्ञालन तोय् ।२९१॥ 


१ 'रसो वे सः ।! 

'रसह्ये वायं लब्ध्वाउ3नन्दी सवति ॥? 

आनन्दाह्य व खत्विमानि भूतानि जायन्ते |? 

आनन्देन जातानि जीवन्ति आनन्द प्रथयन्त्यभिसंचिशंति |! 

२ इस विषय का अधिक विवेचन हमारे संस्कृत साहित्य के इति- 
हास के द्वितीय भाग में किया गया है। 

३ प्रेम, श्रद्धा अ्रथवा पुज्य भाव | 

४ वामन भगवान्‌ के चरणों को प्रत्तालन करनेवाले जल को अर्थात्‌ 
श्रीगज्ञाजी को, भवसागर स्लेषार्थ--भव (श्रीशक्र) और सागर (समुद्र) 
से प्रेम है, क्योंकि शिवजी की जटा-में वह विराजमान हैं, और समुद्र में 
जाकर मिलती हैं। किन्तु मैं भवसागर (संसार ) से घबरा रहा हूँ, 
अत; भवसागर ( संसार ) के दुःखों को दूर करने वाले श्रीगुरु-चरणों 
को प्रद्ालन करनेवाले जल को प्रणाम करता हैं|. . 


र्ः 


२8४३ भाव 
यहाँ गुरु के पाद-प्रज्ञालन के जल की वन्दना में गुरु-पिषयक रति- 
' भाव है | 
पुत्र-विषयक 'रति-भाव?" १ 
वात्सल्य वह प्रेम है जो माता, पिता आदि गुरुजनों के हृदय में 
युत्रादि के विषय में होता है । इसी कारण (वात्सल्य' को स्व॒तन्त्र रस न 
मानकर पुत्र-विषयक रति-भाव माना है | 
“तन की दुति स्याम सरोरुह-लोचन कंज की संजुलताइ हरें ; 
अति सुदर सोहत घूरि-भरे छुबि भूरि अनंग की दूर करें। 
कबहूँ ससि साँगति भ्ारि करें, कब॒हूँ प्रतिबिंब निहारि इरें ; 
कबहूँ. कर-ताल बजाय के नाचत मातु तबै मन मोद भरें ।?२५२॥ 


यहाँ कोसल्याजी का श्रीराम-विषयक जो वात्सल्य है, वह पुत्र-विष- 
यक रति-भाव है। 


“दैहों दधि मधुर घरनि धरयों दोरि खेंहैं, 
धाम तें निकसि धोरी घेनु धाह खोलि हैं, 
घोरि लोटि ऐहिं लपरटेंहें लटकत ऐंहैं, 
सुखद सुनेंहें बेन बतियाँ अमोलि है। 
आलम' सुकवि मेरे ललन चलन सीखें, 
वलन की बॉह म्ज-गलिन में डोलि है ; 
सुदिन सुदिन दिन ता दिन गिनोंगी माई, 
। जा दिन कन्हैया मोर्सों मैया कहि बोलि हैं ।?२५१॥ 


यहाँ यशोदाजी का भगवान्‌ श्रीकृष्ण-विषयक वात्सल्य है । किन्तु-- 


“वर दंतकि पंगति कुद-कली श्रधराधर पल्षव खोलन की; 
चपला चमके घन-बीच जगे छुवि मोतिन-माल अम्प्रेलन की | 


१ वात्सल्य अथवा स्नेह | 


>ै 
0<:- 
७८ | 


चतुथ स्तवक 





घु घुरारी लटकें सुख ऊपर कुंडल लोल कपोललन की 
निवछावर प्रान करे 'तुज्लसी” बलिजा लला इन वोलन की ।?२१५४॥ 
ओर-- 
#पग नूपुर औ! पहुँची कर कंजनि मंज बनी मनिमाल हिए ; 
नव नील कलेवर पीत रगा मलकें पुलकैं नुप गोद लिए। 
अरविंद सों आानन रूप मरंद अनंदित लोचन भ्ुुग पिए। 
मन में न बस्यो अस बालक तो 'तुलसी' जग में फल कौन जिए ।”रशशा 
ऐसे वर्णनो में पुत्र-विघयक रति भाव (वात्सल्य ) नहीं है। 
गोस्वामीजी का अपने इश्टदेव वाल-रूप भगवान्‌ रघुनाथजी के प्रति जो 
प्रेम है, वह भक्ति प्रधान हे, अतः देव-विपयक 'रति-भाव' है । 
राज-विषयक 'रति-भाव | 
न झ्गया) रति नित्य नवीन भी, 
न सघुरा मधु" ही रखस-लीन की। 


नव-चया तरुणी रमणीय भी, 
न उसकी मत्ति कर्षित की कभी ।२६९६७ 


न करुणा सुरराज समीप थी, 
न वितथा. परिहासमयी कसञ्नी। 


वह कठोर नथी रिपु साथ भी, 
दशरथीय गिरा इस भाँति थी।ररणा 


यहा महाराज दशरथ के विषय में कवि का प्रेम व्यज्ञित होता है |, 
अतः राज-विघषयक रति-भाव है। 


“साहितने सरजा तब द्वार प्रतच्छुन दान कि दंदुल्ि बाजे 
भूषन! भिच्छुक भीरन को अति भोजहु ते बढि मोजनि साजे। 


१ झ्िकार | २ मदिरा | ३ मिथ्या । 


९ है 4 हि भाव 


४ 


अन्‍बन्‍न्‍न्‍ःःमसाथ, 
लक 


राजन को गन राजन ! को गने साहिन में न इतो छवि द्ाजे ; 
आाजु गरीब-निवाज सही पर तोसो तुहीं सिवराज विराजे ।”र२५णा 


यहाँ महाराज शिवाजी पर भूषन कविराज का प्रेम ध्वनित होता है, 
अतः राज-विषयक रति-भाव है। 


डद्बुद्ध-मात्र स्थायी भाव । 


इनके उदाहरण स्थायी भावों के विवेचन प्रष्ठ १४२-१४७ में 
देखिये । 


अधानता से व्यश्लित व्यभिचारी । 
तन छूत्रत ही कर सो हटक्यो मुख सौं न कह्नो न किए दंग सो ही ; 
आ्राज लखी सपने में प्रिया अँखियान भरे ऑसुचान रिसों'ही। 
के बिनती परि पार्य मनाय, चत्मो भरि शअ्रंक में लेइबे ण्यों ही ; 
हा ] विधि की सठता का कहों' रूट चोंदू छुटाय दई तबल्ो' ही ।२४५६ 


किसी वियोगी की अपने मित्र के प्रति यह उक्ति हे--“आज अपनी 
“रूठी हुईं प्रिया को मैने सपने में देखा, किन्तु जब तक मैं उसे प्रसन्न 
करके अड्डज में लू, इसके पहले ही शठ विधाता ने मेरी निद्रा भद्ध कर 
दी।' यहा विधाता के प्रति जो असूया हे, वही प्रधानता से ध्वनित हो 
"रही है। अतः यहाँ रति माव है। यद्यपि विप्रल्मम्भ-श्॒द्धार के उदाहरणु-- 
गेरू से मैं लिखकर तुझे” ( पृष्ठ १६८) में--भी विधाता की क्ररता के 
(विषय में असूया है, किन्तु वहाँ “रोके दृष्टी पद द्वारा वियोग-श्ज्ञार ही 
प्रधानता से व्यज्ञित हो रहा है। अतएव वहाँ असूया विप्रलम्म-श्रज्ञार 
का अज्ग हो जाने से प्रधान नहीं रही है, इसी से वहाँ विप्रलम्म-श्वज्ञार 
रस्स है| 

“दहैं निगोडे नेन ये वगहें न चेत अचेत ; 
हो' कसिके रिसके करो, ये निरखें हँसि देत ।7?२६०॥ 


चतुथ स्तवक २४६ 





यहाँ सम्मोग सश्ारी प्रधानता से व्यज्ञित हो रहा है। 


री संखी कैसी विचितन्रता है चपला थिर या डर मॉहि सुहावहि ; 
दीनदयालु है आली ! सुनो बनमालीं अहो जब बेनु बजावहिं। 
दूरहि सो सुनिके हित सों चित मोहित हो झग-्यू द लखावहि ; 
दाँतन गास लिए धरि श्रोन रु मौन भे चित्र लिखे से जनावहि ।२६१॥४ 


यहाोँ 'जड़ता' भाव की प्रधानता से व्यज्ञना है । 
रसासास 


जब रस अनौचित्य रूप में होता है, तब उसे रसा- 
भास कहते हैं | 


सहृदय जनो को अनुचित प्रतीत होना ही अनोंचित्य है। यद्यपि 
रस का अनोचित्य रूप में होना रस दोष है, किन्तु आपात रमणीय होने 
के कारण इसके द्वारा भी क्षुण-मर के लिये रस का आभास हो जाता 
है। जल में सूर्य के प्रतिविम्ब आदि की तरह अवास्तव स्वरूप को 
धमास” कहते हैं) । रसामास में, सीप में चॉदी की कलक की तरह. 
रस की भलक-मात्र रहती है*, और इसलिये . रसाभास को भी ध्वनि का 
एक भेद माना है । 


' आद्भार-रसाभास--उपनायक (अन्य पुरुष ) में अथवा अनेक 
पुरुषों में नायिका की रति होना, नदी आदि निरिन्द्रियों में सम्भोग का 
आरोप करना, पशु-पक्षियो के प्रेम का वर्णन करना, गुरु-पत्षी आदि में 





१ अतिबिम्बादिवदवास्तवस्वरूपम!--शब्द-कल्पद से । 
२ 'शुक्रोरतताभासवत'--ध्वन्यालोक-ज्ञोचन, पृष्ठ ६६। 


र्ध्ऊ रसाभासः 





अनुराग, नायक-नायिका में अनुभयनिष्ठ रति” ओर नीच व्यक्ति में प्रेम 
होना, इत्यादि | 


हास्य-रसाभास--ग़ुरू आदि पूज्य व्यक्तियों का हास का आल* 
म्बन होना । 

करुण-रसाभास--विरक्त में शोक का होना। 

रोद् रसाभास--पूज्य व्यक्तियों पर क्रोध होना । 

वीर-रसाभास--नीच व्यक्ति में उत्साह होना, आदि ।' 

भयानक रसाभास--उत्तम व्यक्ति में भय का होना, आदि । 

बीभत्स-रसाभास--यज्ञ के पशु में ग्लानि होना, आदि । 

अदूभुत रसाभास--एद्रजालिक कार्यों में विस्मय होना, आदि ।' 

शान्त रसाभास--नीच व्यक्ति में शम की स्थिति होना, आदि ॥ 


. उपनायकनिष्ठ रति-श्वद्भार-आभास । 


“फिर फिर चित उतरीं रहत हुटी लाज की लाव ; 
श्रंग-अंग-छुवि-स्ोर में भयो भोर की नाव" ॥?२६४२॥ 


यह अन्तरज्ञ सखी की नायक के प्रति उक्ति है । डुठी लाज की 
लाव' इस कथन से नायिका की उपनायक में सते का सूचन है, अतः 
रसाभास है। 


३३७८ ५० ४७०४४३८७० ७० ७५ ५० ५४ ७० ५७८ ४४७८ ५४ ५४ ५४ ५४ ५४ ७४० ५४ ५० ४४ ४४ ४४ ५४ 


३ उभयनिष्ठ प्रेम न होना। अर्थात्‌ स्री का प्रेस पुरुष से हो, किन्तु 
पुरुष का र्त्रीमें न हो, या पुरुष का प्रेम स्त्री में हो, पर स्त्री का प्रेम 
पुरुष में न हो । ह हि 

२ उसका चित्त तुम्हारे श्रक्नों के लावण्य रूप कौर के भौ२ में फेस 
गया है । उसकी गति जल के मँवर मे फँसी हुईं नाव की तरह हो रहीः 
है, अर्थात्‌ वहाँ से निकलना श्रसम्भव-सा हो रहा है । 


अतुथथ स्तवक ५ रद 





चबहुनाग्रक-निष्ठ रति-आज्भार-आभसास | 


“यों श्रलबेली अकेली कहूँ सुकुमार सिंगारन के चले के चले 
त्यों 'पदमाकर”ः एकन के डर सें रस बीजनि बे चले बे चले । 
एकन सों बत्तराय कछू छिन एकन को मन ले चले ले चले ; 
एकन सौं तकि घूं घट में मुख मोरि कनेखनि दे चले दे चले ।?२६१॥ 


यहा नायिका की अनेक पुरुषों में रति व्यक्त होने से श्वद्ञार- 
रसामास है | 


अधम पात्र से रति-शृद्भार-रसाभास । 


“पेह तें निकसि बेढि बेचत सुमन-हार, 

देह-दुति देखि दीह दामिनि जला करे ; 
मदन - उमंग नव - जोबन तरंग उठे, 

वसन सुरंग. अंग भूषन सजा करे। 
“दत्त! कवि कहै प्रेम पालत प्रवीनन सों, 

बोलत अमोल बेन बीन-सी बजा करे ; 
“गजब गुजारती बजार में नचाय नैन, 

मंजुल मजेज -सरी मालिन मजा करे ।”?२६४॥ 


यहाँ मालिन में अनुराग सूचन होता है, अतः अधम पात्रनिष्ठ रति 
रोने से रसाभास है । 


ज्यनुभय-निष्ठ रति-श्वड्भार-रसाभास । : 


“जात पै पातन के कपरा ग़र गुंजन की दुलरी भन मोह; 
लाल कनेर के काननि फूल सदा बन को-बसियो चित टोहे । 
आजु अचानक ही बन में ब्रजराज कुमार घरावतु गो है: 
फ;ेखि पुद्धि-द-वघू बस-काम सखान सो पूछत ही यह को है ।?२६९ 


्छ६ “'रसामास 





यहाँ श्रीनन्दनन्द्न को देखकर पुलिन्द-रमणियो के'रति ( प्रेम ) उत्पन्न 
होने में अनुभय-निष्ठ रति हे, क्योकि श्रीकृष्ण की उनमे रति नहीं है । 
अतः रसामास,. है।. + 
निरिन्द्रियों म॑ रति के आरोप में शृज्ञगर-रसाभास। 
देखी जाती सलिल-कृश हो एक वेणी-स्वरूप, 
जो वृक्षों के गिर दल पक्के हो रही पांडु रूप। 
तेरे को है उचित, उसका सेटना काश्य, क्योकि--- 
ऐसे तेरा प्रकट करती मित्र ! सोभाग्य जोकि ॥२६६॥ 
यहाँ नदी में विप्रलम्भ-शड्भार का आरोप किया जाने से रसाभास है। 


पशु-पक्षियो में रति के आरोप में शज्भार-रसाभास । ' 

' “सब राति वियोग के जोग जगे न वियोग-सराप सराहत हैं ४ 
पुनि प्रात संयोग भए पे नए तऊ प्रेम उचछाह उदछावत है। 
चकवाइ रहे चकई चकवा सु छुके चकि से चकि चाहत है; 
बिछुरे न मरे इहि लाज मनो सु खरे खरे नेह निबाहत है।”?२६७ 


यहाँ चकवा-चकवी पत्तियों में विप्रलम्म ः्यड्जार का आरोप है। 
रोद रसाभास । 
“पहले चचन देकर समय पर पालते हैं जो नहीं , 
वे हैं प्रतिज्ञा्घातकारी निनन्‍दनीय सभी कहीं। 
सैं जानता जो पाण्डर्वों पर प्रीति ऐसी श्आपकी , 
आती नहीं तो यह कभी बेला विकट संताप की ॥”२६८ा। 


यहाँ महाभारत युद्ध में द्रोणाचाय को कहे हुए दुर्योधन के- इन 
चाक्यों मे पूज्य व्यक्ति गुरु पर क्रोध की व्यज्ञना मे रोद्र रस का 


आभास है | 
, १७४ * हे 


चतुर्थ स्तवक २५० 





बीभत्स रसाभास | 
“दुबरो कानों हीन खबन बिन पूछ नवाएं । 
बूढो बिकल सरीर लार सुख ते टपकाएं । 
मसरत सीस तें राधि रुधिर कृमि डारत डोलत। 
छुघा छीन श्रति दीन गरे घट-कंठ कलोलत । 
यह दुसा स्वान पाई तऊ कुतियन सेंग उरमत गिरत। 
देखो अ्रनीत या मदन की झुत्तकन हूँ मारत फिरत ॥”?२६४९॥ 


यहां कुत्ते के इतने बीमत्स विशेषणों द्वारा जुगुप्सा की पुष्टि की गई 
है। कुत्ते की यह घृणित अवस्था स्वाभाविक है, इनके द्वारा जुगुप्सा की 
पुष्टि नहीं हो सकती है, इसलिये यहाँ बीमत्स रस का आभासममात्र है| 
यदि ऐसा वर्णन मनुष्य-विघयक किया जाता तो बीमत्स रस हो सकता था। 
अदूभुत रसाभास । 

अति अचरजमय जलधि पुनि तिहि बढि मुनि किय पान ; 

तासों बढ़ि लघु घट-जनम का जग अचरज मान १।२७०॥ 


महामहिम अगस्त्य मुनि द्वारा समुद्र-्यान का यह बणन है । प्रथम 
तो समुद्र ही सारे आश्चर्यों का खजाना है। फिर ऐसे समुद्र का एक 
चुल्लू में पी जाना ओर भी आशचये है। इससे भी बढ़कर आश्चय तो 
यह है कि जिन अगस्त्यजी ने इसे पिया, उनका जन्म एक छोखटेसे घडे 
सेहें। यहाँ तक क्रमशः आश्चय की पुष्टि होती रहती है, किन्ठु चोथे 
पाद में अर्थान्तरन्यास-अलड्लार द्वारा यह कहने से कि 'इस जगत्‌ के आश्चर्य 
का क्‍या प्रमाण है! उपयुक्त सारा आश्चर्य छिप गया है। अतः चौथे 
पाद का वर्णन अनोचित्य होने से केवल रसाभास ही रह गया है | 


सावामास 
भाव का जब अनौचित्य रूप से वर्णन होता है, या 


२४१ भाव शान्ति 





जो भाव रसाभास का अजड्भ हो जाता है, उसे भावा- 


भास कहते हैं। 
 व्यभिचारी भाव जन्र तक किसी रस के पोषक रहते हैं, तब तक 
वे व्यभिचारी भाव हैं, जब वे प्रधानता से प्रतीत होते हुए मांव- 
अवस्था को प्राप्त होकर दूसरे किसो रसाभास के अद्भ हो जाते हैं, तब दे 
भावामास कहे जाते हैं । 
“नुत्यत कैसे हरष ये ले गति परम विचित्र ; 
कैसे कढ़त सुदंग तें महा मधुर धुनि मित्र ।?२७१॥ 
यहाँ मृद्ग की ध्वनि के विषय मे चिन्ता करना अनुचित है, अतः 
चिन्ता व्यभिचारी भाव का आभास मात्र है अतः भावामास है। 
विस्मृति-पथ भे विषय सब रहो न शास्त्र-विवेक। 
केवल वह मुगलोचिनी टरत न हिय छिन एक ॥२ण्रा। 
किसी अन्य नायिका का स्मरण करते हुए, किसी प्रवासी पुरुष की 
यह उक्ति है। सक-चन्दनादि आनन्द-दायक् विषयों में विराग, परिश्रम 
से पढ़े हुए शास्त्रों में क्ृतष्नता, ओर उस नायिका का स्मरण कदापि दूर 
न होना, ये स्मृति! सा्ारी भाव की पुष्टि करते हैं। अ्रतः स्मृति-भाव 
प्रधान है, ओर वह स्मृति-भाव यहाँ अन्य नायिका-निष्ठ होने से शथ्ज्वार 
रसामास का अज्ञ हो गया है, अतः भावाभास है । 


भाव-शान्ति । 

जब एक भाव की व्यंजना हो रहो हो, उसी समय किसी 

दूसरे विरुद्ध भाव की व्यज़ना हो जाने पर पहले भाव की 

समाप्ति में जो चमत्कार होता है,उसे भाव-शान्ति 
कहते हैं । 


“चतुर्थ स्तवक श्र 





- कंज-मुखी ! कहु क्यों अनखी ? पग तेरे परों करु कोप निवारन 
मानिनि एतो न मान क॒वों तें गह्यो श्रव जेतो अ्रहो ! बिन कारन । 
यों सनभावन की सुनि बात सकी न कछू मुख सो हु उचांरने ; 
'मीलित से तिरछ्ठे दग-कोरन जोरन सों अ्रसुवा लगी ढारन ॥२७३॥ 


, यहाँ मानवती नायिका के ऑस गिरने से ईष्यां-भाव की शान्ति है । 
लक्षी किया यद॒पि एक कुरज्ञ को था, 
प्रेमानुक़॒ हरिणी-निकटस्थ वो था। 
आक्ृष्ट भी ,शर, किया न प्रहार जो कि-- 
कासी कृपाद्र न॒प देख दशा उनन्‍्हों की) |२७४॥ 


महाराज दशरथ के शिकार का वर्णन है।मृग को बंध 
करने के लिए वाण के सन्धान करने म जो उत्साह-माव है, उसकी स्मृति 
भाव से शान्ति है--मग को कामासक्त देखकर अपनी कामासक्त दशा 
का स्मरण हो आने मे स्मृति-भाव की व्यज्ञना है। 


“अ्रतीव उत्कणरिठत ग्वाल बाल हो, 
| सचेग शअआते रथ के समीप थे। 
परन्तु होते अति ही मज्नीन थे, 
न देखते थे जब बे मुकुद को।॥”र७९॥ 


उद्धवजी के श्रज मे आने के समय ग्वालबालो की श्रीकृष्ण के 


४ आांशीलीश0/00शशशआंशीशी आर आर अरिकरीर की कक कई 


३ ग्हाराज दशरथ ने एक झूग को लक्ष्य ( निशाना ) बनाकर, उस 
पर बाण सन्धान कर लिया था, पर उसे हरिणी के पास प्रेमानुरक् 
देखकर उस पर बाण नहीं छोडा, क्योकि वह स्वयं विलासी थे 
अतएुत्र उनकी तादंश दशा देखकर अपनी तादइश अ्रवस्था. का उर्न्हें 
स्मरण हो आने से उस पर दया आ गई थी । 





श्श्झु _भाव्शान्तिः 


दशनों के लिये अमिलाषा में जॉ हृषं-भाव॑ है उसकी, रथ में श्रीकृष्ण 
को न देखकर, विषाद-भाव से शान्ति है। - 


“वह चोहटे की ' चपरेट में श्राज भली भट्ट श्राय दुह्न घिरगे ; 
कवि 'बेनी? दूहँन के लालचो लोचन छोर सँँकोचन सो भिरगे। 
समुहाने हिए भर भेटिब्रे को सु चवाइन की चरचा चिरगे , 
फिरगे कर से कर हेरत ही करते मनु सानिक से मिरगे ।”२७६ 


2. 
| 


* यहाँ भी दष-भाव की विपाद-भाव से शान्ति है । 


. कहीं-कहीं एक से अधिक भावों की भी भाव-शान्ति होती है । जैसे-- 

“बहु राम लदिमन देखि मरकट भालु मन अ्रति अपडरे। : 
जनु चित्र-लिखित समेत लदछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे , 
निजञ् सेन चकित बिलोकि हंसि सर-वाप सजि कोसल धनी ; 

साया हरी हरि निसिष महँ हरषी सकल मरकट अनी ।7२७७॥ 


“यहाँ भय, जडता, विस्मय आदि भावों की उत्साह-भाव से शान्ति है। 


अन्यत्र पादु गमनाथ उठा रही सो-- 

वो देख रूप शिव का पुलकाझ्लिनी हो , 
मार्गावरुद्धू गिरि से सरिता-गती ज्यों , 

यों पावेती चल सकीं, न सकीं खडी हो" ।२७घा 


३ अहाचारी का कपट-चेष धारण करके आए हुए श्रीमहादेव, 
पार्वतीजी की प्रेम-परीक्षा लेने के लिये, अपनी निनन्‍्दा के वाक्य कहते 
हुए न रुके तब, अधिक सहन न करके पा्वेतीजी ने वहाँ से उठकर 
जाने के लिये बडे आवेग से एक चरण उठाकर श्रागे रक्खा ही था. 
क्रि इतने में उस कंपट-वेष को दूर केरके शझर ने अपना असली 
रूप प्रकट कर दिया। उस रूप को देखकर पार्वतीजी न तो आगे- 


चतुर्थ स्तंवक श्श्ृ 


यह पावतीजी की प्रेम-परीक्षा करने के लिये छल-वेष में गए हुए 
ओऔरीशझूर द्वारा उस कप-वेष के दूर कर देने पर श्रीगिरिजा की तात्का- 
लिक अवस्था का वर्णन है| यहाँ आवेग सश्जारी भाव की हृष-भाव से 
ओर हृ्ष-माव की जड़ता से शान्ति है। 


भावोदय 


जहाँ किसी भाव की शान्ति के अनन्तर किसी कारण 
से दूसरे भाव का उदय हो, और उसी में चमत्कार हो, 
वहाँ 'भावोदय' होता है । 


में हों ही तुम हो कपटी अ्रस की उचछुटी बतियाँ जब प्यारी ; 
पाँय परे की न मान कियो अपमान निरास भए गिरिधारी। 
रूसि चले पिय को लखिके छुतियाँ घरिं हाथ उसास निकारी ; 
त्यो असुवान भरी श्रखियॉन की दीठ प्रिया सखियान पें डारी ॥२७६ 


यहाँ नायक के लोट जाने पर कलहान्तरिता नायिका में विषाद 
सब्चारी भाव! का उदय है, ओर उसी में चमत्कार है। भाव-शान्ति' में 
दूसरे भाव का उदय होता है, ओर मावोदय मे पहले भाव की शान्ति | 
अतएव भाव-शान्ति ओर मावोदय मे कोई विशेष भेद नहीं है । किन्तु 
रसगड्ाघरकार का मत है कि दोनो को समान मानने मे चमत्कार नहीं 
रहेगा, इसीलिये प्रथकूप्रथक दो भेद माने गए हैं। एक मत यह भी 





आन न ची 


को जाने के लिये दूसरा. चरण उठा सकीं,-और न पीछे ही हट सकी । 
उनकी दशा ऐसी हो गई, जैसे मार्ग में पर्चत के शा जाने से नदी का 
अवाह--न तो आगे ही जा सकता है, ओर न वेग के कारण पीछे 
ही. हट सकता है " 


2.3 


२५५ भाव सन्धि 





है कि जहों पहले माव की शान्ति में अधिक चमत्कार होता हैं वहाँ 
आाव-शान्ति ओर जहा पिछले भाव के उदय में अधिक चमत्कार होता 
है वहाँ भावोदय समझना चाहिए। 


भाव-सन्धि 


जब समान चमत्कारवाले दो भावों की उपस्थिति एक 
ही साथ हो, वहाँ भाव-सन्धि होतो है | 
मुख घूंघट को पट है न तऊ जुग नेनन को तरसाय रही , 
श्रति दुर्लस जानत हों मिलिबयो सन को हु तक ललचाय रही। 
मद-जोबन सें मतवारी भई तन की छुवि को दरसाय रही ; 
हँसि हेरत में मुख फेरत में हिय की हुलसाय जराय रही २८० 
यहाँ हर्ष ओर विपाद भावों की सन्धि है। 
“प्रभुहिं चित घुनि चितह महि राजत लोचन लोल , 
खेलत मनसिज-मीन युग जन्नु विधुमंडल डोल २८१ 
यहा ओत्सुक्य ओर त्रीडा भावों की सन्धि है | 
'<देख्यो चहै पिय को सुख पे अखियाँन करे जिय की अभिलाषी , 
चाहति 'संभु' कहै मन में बतियाँ मुख मे पुनि जाति न भाषी। 


सेटिबे को फरकें भुज पै नहिं जीभ ते जाइ नहीं नहिं भाखी ; 
क्राम सेंकोच 'दु्हुंन बहू बलि आजु दुराज-प्रजा करि राखी ।?२८२ 


यहाँ भी ओत्सुक्य और ब्रीडा की सन्धि है। 
भाव-शवलता 
शक के पीछे दूसरा और दूसरे के पीछे तीसरा, इस 





चतुथ स्तवक र्श्क्ष 


हु 





प्रकार बहुत-से भावों का एक ही स्थान पर सम्मेलन होने: 
की भांव-शवलता कहते हैं । 


या विधि की विपरीत कथा हा ! विदेह-सुता कित है अरु मैं कित ; 
ता सुगनैनी बिना बन में अब होह मो प्रान श्रधारहु को इत। 
मोहि कहेंगे कहा सब लोग ? रु कैसे लखेंगो उन्हें समुहै चित ; 
'शज रसातल जाहु अबे है घरातल जीवन हू में कहा हित ।२८३े 


यह जानकीजी के वियोग मे श्रीरघुनाथजी की कातरोक्तकि है। यहाँ 
“विधि की विपरीत कथा” में असूया' है। हाय विदेह-सुता कित' में 
“विधाद' है। ता मृगनैनी' मे 'स्मृति' है। "मेरा प्राण-आधार कोन 
होगा! ! यह वितर्क है। लोग मुझे क्या कहेगे' यह “शद्जा' है। मै 
उन लोगों के सम्मुख केसे देखू गा' यह 'ब्रीडा' है। और 'राज रसातल 
जाहु' इत्यादि मे निवेंद्‌ है । इन बहुतु-से भावों की प्रतीति होने से यहाँ 
भाव-शवलता' है। 


एक मत यह है कि तिल-तन्दुलन्याय" से प्रथकूप्रथक्‌ भावों का 
एकत्र हो जाना ही भाव-शवलता है । दूसरा मत यह है कि यदि ऐसा 
माना जायगा तो इस लक्षण की 'भाव-सन्धि' में अतिव्याप्ति हो जायगी। 
अर्थात्‌ भाव-शवलता ओर भाव-सन्धि में कुछु भेद न रहेगा | अतः एक 
भाव के उपमदन ( निद्ृत्त ) होने के पीछे दूसरे भाव का उदय होकर 
उपमर्दित भाव का ( जो निवृत्त हो गया है ) फिर न होना शवलता है। 
तीसरा मत यह है कि युद्ध में जिस प्रकार कोई योद्धा गिरता हुआ ओर 
कोई गिराता हुआ दीख पड़ता है, उसी प्रकार कोई भाव उपमर्दित और 


८६८ ५ध 5 ध 5 ल्‍3 45 ८5६ ८5 ८७४ /८४८४ ८४ +  /४८४०5६ ८५ 


१ चावल और तिलों के मिल जाने पर भी प्रथक-प्रथक दिखाई 
देते-रहना तिल-तन्दल-न्याय है। / - 


4 


श्श्ज़ा संलक्त्य-क्रम-ध्वनिः 


कोई उपमर्दन करता हुआ माना जाना चोहिए और ऐसा करने में “तिल- 
तन्दुल-न्याय के अनुसार 'भाव-सन्धि' में अतिव्याप्ति भी नहीं होती है | - 

'भावन्‍-शान्तिं आदि चार अवस्थाओओं की भोति 'भाव-स्थिति! भी 
एक अवस्था है। किन्तु भाव-शान्ति आदि चारो अ्वस्थाओं के सिवा. 
भाव का होना ही भाव-स्थिति है, अतएव व्यज्ञित, सश्जारी ओर अपुष्ट 
रति आदि के उदाहरण जो पहले दिखाए गए. हैं, वें माव-स्थिति के ही 
उदाहरण हैं | 

-- 06% 2 -- 


चतुर्थ स्तवक का चतुर्थ पुष्प 


संलक्य-क्रम-व्यंग्य-ध्वनि 


जिस ध्यनि में वाच्याथ और व्यंग्यार्थ का पौर्वापर्य- 
क्रम संलक्ष्य होता है, अर्थात्‌ भले प्रकार से प्रतीत होता 
है उसे संलस्‍्य-क्रम-उ्यंग्य-ध्वनि कहते हैं. 


जहाँ वाच्यार्थ का बोध हो जाने पर व्यम्यार्थ प्रतीत होता है वहाँ 
यह ध्वनि होती है। जैसे घडावल के बजने पर पहले जोर का टडट्लार 
होता है तदनन्तर अनुरणन अथथांत्‌” मड़ार होती है, उसी प्रकार टछ्कार के 
समान वाच्यार्थ का बोध होने पर भड़ार की मॉति इस ध्वनि में ब्यंग्य 
अर्थ की ध्वनि निकलती है। जैसे टड्डार की अ्पेज्ञा भड़ार मधुर होता 
है, उसी प्रकार वाच्याथ की अपेक्षा व्यग्याथं मधुर होता है ओर जैसे-« 
व्ड्डार का भड़ार के साथ पोवायय क्रम स्पष्ट जाना जाता है, उसी प्रकार 
वाच्यार्थ के अनन्तर प्रतीत होनेवाले व्यग्यार्थ का पोवापय-क्रम इस ध्वनि 


चतुर्थ-स्तवक _ श्श्८ 





अस्पष्ट प्रतीत होता है। इस ध्वनि में रस, भाव आदि की तरह वाच्यार्थ 
आर ब्यंग्यार्थ का क्रम असलच्ष्य नहीं रहता है। 


असंलक्ष्य-क्रम व्यग्य-ध्वनि में जहोँ विभावादिकों से व्यक्त होनेवाले 
स्थायी भावों के उद्रेकातिशय से आस्वाद उत्पन्न होता है, वहाँ “रस- 
व्वनि' होती है। जहाँ अपने अनुभावों से व्यक्त होनेवाले व्यभिचारी 
आदि" के उठ्रेक से आस्वाद उत्पन्न होता है, वहों भाव-ध्वनि' होती 
है| ओर संलक्ष्य क्रम-व्यंग्य-ध्वनि मे, व्यग्यीभूत व्यभिचारियों की अपेक्षा 
न करके केवल विभाव-अनुभावों के उद्रेक से आस्वाद उत्तन्न होता 
है, अर्थात्‌ रस, भाव आदि के बिना वस्तु या अलड्डार की ध्वनि होती है | 


सलद्य-क्रम-व्यंग्य कहीं शब्द-शक्ति द्वारा, कहीं अर्थ-शक्ति द्वारा 
आर कहीं शब्द-अर्थ उभय शक्ति द्वारा प्रतीत होता है। अतः इस ध्वनि 
के तीन भेद हैं--( १ ) शब्द-शक्ति उद्धव अनुरणन-व्यनि, ( २) अर्थ- 
शक्ति-उक्धव अनुस्णन-ववनि, ओर (३) शब्दार्थ-उमय-शक्ति-उद्धव 
अनुरणन-व्यनि । * |! 


( १ ) शब्द-शक्तिउद्भव अनुरणन-ध्वनि 


जिस शब्द का अयोग किया जाय, उसी शब्द से, न 
कि उसके पर्याय-बाचक शब्द से, जहाँ व्यंग्यार्थ प्रतीत 
होता है, वहाँ शब्द-शक्कि-उद्भव-ध्वनि होती है | 


यह दो प्रकार को होती है--( १ ) बस्तु-ध्वनि ओर ( २) अलड्ढार- 
ध्वनि | वस्तु उस अथ को कहते हैं जिसमें कोई अलड्जार नहीं होता है। 
- १ यहाँ आदि” पद से श्रपुष्ट 'रति! आदि नत्रों स्थायी भाव भी 
समऊ़ना चाहिए । जम आओ 


न 





२४६ संलक्ष्य-क्रम-ध्वनि 





अतः जहाँ ऐसा व्यंग्यारथ हो जिसमें कोई अलड्लार न हो, वहाँ बस्तु-ध्वनि 
'कही जाती है। जहाँ ऐसा व्यंग्या्थ हो जिसमें कोई अलड्जार हो, वहाँ 
अलड्लार-ध्वनि कही जाती है। 


अलक्कार और अलझ्ञाये । 


जा 


र्ौ 


अलड्डार-ध्वनि के विषय मे एक बात यह भी स्पष्ट करना 
आवश्यक है, कि अलड्जार ओर अलड्डाय दो पदार्थ हैं। अलड्जार उसे कहते 
हैं जो दूसरे को शोमायमान करता है, जैसे, हार, कुएडल, आदि शरीर 
'को शोमित करते हैं। अलड्लाय॑ उसे कहते हैं जो दूसरे से शोमित होता है; 
जैसे, मनुष्य का शरीर अलड्जारो से शोमित होता है । इसी प्रकार जब 
उपमा आदि अलड्लार शब्दा्थ ( वाच्ष्या्थ या व्यंग्याथ ) को शोभित 
करते हैं तब उन्हे अलड्जार कहते हैं। जब वे स्वय व्यग्यार्थ में प्रधानता 
से प्रतीत होते हैं तब अलड्डाय हो जाते हैं। अ्रतः उन्हें अलड्डार- 
ध्वनि! कहते हैं । 


यहाँ यह प्रश्न होना स्वाभाविक है कि जो अलड्लाय ( व्यग्याथ ) 
है, वह अलड्जार ( वाच्यार्थ ) किस प्रकार कहा जा सकता है £ अर्थात्‌ 
अलहड्जार-घ्यनि में जो उपमा आदि अलड्डार ध्वनित होते हैं उनको यदि 
प्रधान माना जायगा तो उनमे अलड्लार्ता कहाँ रह सकेगी। दूसरे को 
'शोभमायमान करना जो अलड़ार का धर्म है वह उनमें नहीं रहेगा, क्योकि 
दूसरे को शोभित करनेवाला तो अपग्रधान होता है । यदि उनको ( ध्वनित 
होनेवाले उपमा आदि अलड्डारों को ) अपग्रधान माना जायगा तो उनमें 
ध्वनित्व नहीं रह सकेगा, क्योंकि जो ध्वनि ( व्यंग्यार्थ ) है वह तो प्रधान 
अर्थ ही होता है। निष्कर्ष यह है कि एक ही पदार्थ को अलड्लार ओर 
अलड्लाय ( ध्वनि ) अर्थात्‌ अप्रधान ओर प्रधान किस प्रकार कहा 
जा सकता है ! 


चूतुथ: स्तवक- “ , 
2 एशराणणाा् 


४) इसका समार्धान ब्राह्मणु-क्षपणकं-न्याय ” द्वारा हो जाता. है;। 
शब्द-शक्ति-उद्भव वस्तु-ध्वनि । | का. 


पत्थर-थल * है पथिक ! इत सत्थर3 कहूँ न लखाये | 

उठे पयोधर देखि जो रहो चहतु रहि जायें ।३२८४॥ 
। | 
: यह पथिक के प्रति स्वयं दूतिका नायिका की उद्ति है | यहाँ पहले. 
तो यह वाच्यार्थ बोध होता है कि “यहाँ बिछोने आदि नहीं हैं, पहाडी- 
गॉव है | यदि उठे हुए पयोधरों को--बदहलों को--देखकर रात्रि के- 
समय, मार्ग में वर्षा की पीडा समभकर, रहने की इच्छा हो तो यहाँ रुक 
जाइए। इस वात्त्याथ का बोध हो जाने पर 'सत्थर' ओर 'पयोधर'- 
शब्दों की शक्ति से यह व्यंग्या्थ प्रतीत होता है कि 'परस््नी-गमन का- 
निषेध करनेवाले शास्त्रो को यहाँ कोई नहीं पूछता है | यदि मेरे उठे हुए 
( उन्नत ) पयोधरो को ( स्तनों को ) देखकर इच्छा होती है तो रुक- 
जाइए | यहाँ यदि “'सत्थरो ओर 'पयोधर”-शब्दो के स्थान पर इनके 





$ जैसे कोई व्यक्ति पहले ब्राह्मण. और फिर क्षपणक (बौद्ध 
संन्यासी ) हो गया, उस अवस्था में उसमें ब्राह्मणव्व न' रहने पर भी--- 
शिखा-सूत्र का श्रभाव रहने पर भी--उसे ब्ाह्मण-क्षपणक कहते हैं । 
इसी का नाम ब्राह्मण-क्पणकन्याय है। इसी प्रकार श्ल्नक्वारों के 
अलड्ाये अवस्था को प्राप्त हो जाने पर उनमें यद्यपि वस्तुतः अल“ 
क्वारता ( अ्रधानता ) नहीं रहती है, तथापि इनको अलक्षार-ध्वनिः 
इसलिये कहा जाता है कि उनकी पहले अलझ्कार संज्ञा थी । 


२ पत्थर फेला हुआ स्थत्त श्रर्थात्‌ पहाड़ी आम । . 


३ यह शब्द प्राकृत भाषा का है। इसके अर्थ शास्त्र ओर बिस्तरु 
( बिछोने ) दोनो हैं। 


रद संलक्ष्य-कम-प्वेंनि 


'पर्यायवा्ची शब्द बदल दिए जायेंगे -तो उपयुक्त व्यंग्य प्रतीत नही हो 
'सकेगा | शब्द के आश्रय से ही यहाँ व्यग्य है, .अतण्व' यह शब्द-शक्ति 
'उद्धव ध्वनि है । 


यह वस्त-ध्वनि इसलिये है कि इस व्यंग्याथ में कोई अलड्ढार प्रतीत 
नहीं होता है | अनुरणन-ध्वनि इसलिये हैं कि यहाँ वाच्यार्थ का बोध 
होने के बाद व्यंग्यार्थ की क्रमशः ध्वनि निकलती है। 
शब्द-शक्ति-उड्भधव अलक्कार-ध्वनि । हे | 


उपादान-संसार" बिनु जगत-चित्र बिन भीत* 
कलाकार हर? ने रच्यो वंदों उन्हें विनीत।र८शा 


6 भगवान्‌ श्जर का चित्र-कला-सम्बन्धी लोकोत्तर उत्कष व्यग्य 
द्वारा प्रतीत होता है। प्रवीण चित्रकार रज्ञ ओर लेखिनी ( बुरुस ) 
आदि सामग्रियों से और दीवार आदि किसी प्रकार के आधार पर ही चित्र 
बना सकता है, पर भगवान्‌ श्र ने विना ही किसी सामग्री और आधार 
के--शुल्य स्थान पर--जगत्‌ का विचित्र चित्र बनाया है। इस प्रकार 
साधारण चित्रकार से श्रीश़्र का आधिक्य सूचित होता है। अतः 
“्यतिरिक' अलड्डार की ध्वनि है । यदि चित्र! ओर “कला -शब्द बदल 
दिए जायें तो यह व्यग्यार्थ प्रतीत नहीं हो सकता, इसलिये शब्द-शक्ति: 

उद्धव अलड्लारध्वनि हे। 
मेघकाल करवाल की जल-घारान प्रपातु ; 
अरिन प्रतापानल बढ़यो देव ! तुम्हीं बिनसातु ॥२८द॥ 


जज तट ऊन नं ओर 


१ रचना करने को सारी सामग्रियों के अभाव में । 

२ दीवार । 

३ प्रशंलनीय चन्द्रमा की कला चारण करनेवाले अथवा चित्रकला में 
अवीण अीशिव । 





चतुर्थ स्तवक श्धर्‌ 


“यह राजा के प्रति कवि की उक्ति है--हे राजन! मेघ-जैसी कवाल 
( तलवार ) की जलधारा से, अथांत्‌ कान्ति-युक्त तलवार की धार से, 
शत्रओं के प्रताप-रूपी बढ़ी हुई अग्नि को त॒म्हीं विनाश करते हो” | इस 
मुख्य अर्थ को बोध कराके अभिषा-शक्ति रुक जाती हें, तदनन्तर व्यंग्य 
से इन्द्र का अर्थ प्रतीत होता है। अर्थात्‌ 'हे देव ! आप कालकर (काली 
कान्तिवाले) बाल ( नवीन ) मेंघो की जल-घाराओं के प्रपात से ( डालने 
से ) जल के शत्र-तेज आदि का ताय विनाश करते हो! | वाच्यार्थ 
प्राकरशिक राजा है ओर व्यंग्याथ है अ्रप्राकरणिक इन्द्र | राजा को इन्द्र 
की उपमा व्यंग्याथ से प्रतीत होती है, अतणव उपमा-अलड्ढार की 
ध्वनि है। 

जहाँ शब्द-उद्धव-शक्ति द्वारा व्यंग्य से अलड्जार ध्वनित होता है, 
अर्थात्‌ वाच्यार्थ वस्तु-रूप ओर व्यग्याथ अलड्लारःरूप होता है, वहीं 
शब्द-शक्तिउद्धव अलड्जार-ध्वनि होती है । जहा शब्द-शक्ति द्वारा एक से 
अधिक अथ व्यंग्याथ रूप न होकर वाच्याथ होते हैं, वहाँ ध्वनि नहीं, 
किन्तु श्लेषालड्डार होता है| जैसे-- 
हैं. पूतना-मारण में सुदक्ष, 
जघन्य काकोदर था विपक्ष । 
की किन्तु रक्षा उसकी दयालु, 
शरण्य ऐसे अभ्भु हैँ कृपालु ॥रझणा 
यहाँ शब्द-शक्ति द्वारा एक साथ ही श्रीरामचन्द्र ओर श्रीक्षष्णचन्द्र 
दोनो का वर्णन है। दोनो अर्थ वाच्यार्थ हैं ओर न इनमें उपमेय और 
उपमान-मभाव ही व्यंग्य है, अतः उपमालझ्लार की ध्वनि नहीं है, केवल 
शब्द-शलेष अलड्ढास्मात्र" है। 


“+बल्न्ल-"्->0<3-.- 


१ श्लेष अलझ्कार का विस्तृत विवेचन इस ग्रन्थ के द्वितीय भाग में 
किया गया है । 





२६३ संलक्ष्य-क्रम-ध्वनिः 


(२) अथ-शक्ति-उड्ब अनुरणन-ध्वनि 


जहाँ शब्द-परिवर्तन होने पर भी व्य॑ग्यार्थ की' प्रतीतिः 
होंती रहे, वहाँ अर्थ-शक्कि-उद्भव ध्वनि होंती है | 


शब्द-शक्ति-उद्धवद॒ ध्वनि में शब्द-परिवर्तन करने पर व्यग्यार्थ 
सूचित नहीं होता, किन्तु इस (अर्थ-शक्ति-उद्धव ध्वनि ) में शब्द- 
परिवतन करने पर भी व्यंग्याथं सूचित होता हैं। अतः यह शब्द पर 
निमर न होने के कारण अर्थ-शक्ति-उद्धव ध्वनि है। व्यज्ञक्त अर्थ 
( जिससे व्यंग्यार्थ सूचित होता हैं) तीन प्रकार का होता है--( १ ) 
स्वतः सम्भवी', (२) “कविश्मोंदोक्तिमात्र सिद्धो ओर ( १) 'कवि- 
निबद्ध-पात्र की प्रोढोक्ति-मात्र सिद्ध! । 


इन तीनो भेदों में कही तो वाच्यार्थ ओर व्यंग्याथ दोनो ही वस्तु- 
रूप या अलड्डाररूप होते हैं, ओर कहीं दोनो में ( वाचयार्थ ओर' 
व्यंग्यार्थ में ) एक वस्तु-रूप ओर दूसरा अलड्लार-रूप होता है, अतएव 
इन तीनो के चार-चार भेद होते हैं। 


स्वतः सभ्भमवी 


» जो “अर्थ! ( वर्णन ) कवि की कल्पना-मात्र ही न हो, किन्तु सम्भव, 
भी हो, अर्थात्‌ लोक-व्यवहार में असम्भव प्रतीत न हो, वह स्वतः सम्भवी 
है। इसके निम्नलिखित चार भेद हैं-- 

( क ) स्वतः सम्भवी वस्तु से बस्तु-व्यंग्य, अर्थात्‌ वाच्यार्थ भी वस्तु-- 
रूप ओर व्यग्यार्थ भी वस्तु-रूप । 

( ख ) स्वतः सम्भवी वस्तु से अलड्ढास्व्यंग्य, अर्थात्‌ वाक्ष्या्थ 
वस्तु-रूप ओर व्यग्याथे अलड्डार-रूप । 


चतुंथे स्तवक “ 'रे६४ 





(ग) स्वतः सम्मवी अलड्डार से वस्ठु-व्यंग्य, अर्थात्‌ वाच्याथ 
अलड्बार्ूप ओर व्यंग्याथ वस्तुरूप |... 


शः ४४ ् 


* (घ) स्वतः सम्भवी अलड्डार से अलड्ढलार-व्यंग्य, - अर्थात्‌ वाच्यार्थ 

भी अलड्डार ओर व्यंग्याथं भी अरल॑डर। ०, # 

( क ) स्वतः सम्भवी वस्तु से वस्तु व्यंग्य । 

- सर सम्सुख धावहिं फिरहिं, फिर श्रावहिं फिर जाहि , 
मधुप-पंज अति मधुर ये गुजत अ्रधिक सुहाहि श्८पा। 


यहाँ मधुर गुल्लित मौरों का सरोवर के पास बार-बार लोठकर आना, 

जो वाच्यार्थ है, वह वस्त॒-रूप हैं। इसमें कोई अलड्ढार नहीं है | इसके 
द्वारा यह व्यंग्य प्रतीत होता है कि कमलो का शीघ्र ही विकास होनेवाला 
है, तथा शरद-ऋठ भी आ रही है। और यह व्यंग्यार्थ भी वस्तु-रूप हैं 
इसमे भी कोई अलड्डार-नहीं है। भ्रमरो का मधुर गुज्लार जो वाच्याथ हैं; 
वह ओर शरद का होनेवाला प्रादुर्भाव दोनो दी स्व॒तः सम्भवी हैं, क्योंकि 
इन बातों का होना सम्भव है, अतः यहाँ स्वतः सम्भवी वस्तु से वस्ठ 
व्यंग्य हैं । 
सदु पद रख धीरे कण्टका भू-स्थली है; 

सिर पट ढकिए री! छाम कैसी घनी है। 
पथि पथिक-वधू यों मैथिली को सिखातीं ; 

इृग-सलिल बहातीं, प्रेम को थीं दिखाती ।२८श॥ 


| 


श्रीरघुनाथजी के वन-गमन की कथा कहते हुए सुमन्त्र की राजा 
“दशरथ के प्रति जो यह उक्ति है, वह वस्तु-रूप वाच््याथ हैं। यहाँ 
“जानकीजी' के अड्नों की सुकुमारता, उनका पातित्रत्य ओर इस दुस्सह 
अवस्था में भी पति का साथ देना, इत्यादि जो भाव पथिकाड्नाओं के 
डृद्य मे उठे हुए, प्रतीत होते हैं, वह व्यंग्यार्थ हैं, और वह भी वस्तु-रूप है। 


२६४ सं तक््य-क्रम-ध्वनि 


( ख ) स्व्रतः सम्भवी चस्तु से अलक्कार व्यंग्य 
रवि-प्रताप हू घटत है दुब्छिन दिसि जब जाय; 
रघु-प्रताप नहिं सहि सक्‍यो नृपन तिहीं दिसि माय | २६० ४ 


यह रघु राजा के द्ग्विजय का वर्णन है। दक्षिण दिशा में जाकर 
( दक्षिणायन होकर ) सूर्य का भी प्रताप (ताथ ) घट जाता है, पर उस 
दिशा में भी महाराज रघु का प्रताव नहीं घटा-+उसके प्रताय को दक्षिण 
दिशा में पाण्ड्य देश के राजा नहीं सह सके |” यह स्वत, सम्मवी वस्तु- 
रूप वाच्यार्थ हैं--कवि-कल्पित नहीं हे । ओर इस वाच्यार्थ के द्वारा सूर्य के 
तेज से रघु के तेज का उत्कष सूचित होता है | इस व्यग्यार्थ में ब्यतिरेका 
अलड्लार की ध्वनि निकलती है । अतः वस्तु से अलड्डार-ब्यंग्य है | 

*गेह तज्यों अरू नेह तज्यो पुनि खेह लगाइके देह सँवारी , 

मेघ सहे सिर सीत सहे तन धूप-समें जु पंचागनि जारी । 

भूख सही रहे रूख तरें यह सु'दरदास” सहे दुख भारी; 

डासनि छॉड़िके कासन ऊपर आसन मारत्रो पै आस न मारी ।?२६१॥ 

यहाँ गेह आदि सब वस्तुओं के त्यागने पर भी आशा का बना रहना 
कहा गया है । इस वस्तु-रूप वात्ष्याथ द्वारा यह व्यंग्या्थ सूचित होता है 
कि आशा के त्यागे बिना घर आदि का त्याग बथा है! । इस व्यग्यार्थ 
में विनोक्ति-अलड्जार की ध्वनि निकलती है । 
(ग) स्वतः सस्भवी अलक्लार से वस्तुव्यंग्य | 

“ऐसे रन रावन बुलाए बीर बान दत्त, 
जानत जे रीति सब सज्ञुग समाज्ञ की ; 
चली चतुरंग चम्तू चपरि हने निसान, 
सेना सराहन जोग राति-चर-राज की। 
*तुलसी'विलोकि कपि भालु किल्षकित्त-लल--- 


कत्त लखि ज्यों कैगाल पातरी सुनाज की , 
श्ध्‌ 


चूंतुर्थ स्‍्तवक २६६ 


राम-रुख निरखि हरण्यो हिय हनूमान, 
- मानो खेलबार खोली सीसख-ताज बाज की 7२६२७ 


रावण की सेना को देखकर  श्रीरघुनाथजी ने, युद्ध करनेके लिये, 
हनुमानजी को सड्जेत किया | उस सड्जेत से हनुमानजी को जो हे हुआ, 
उस हर में शिकारी द्वारा नेत्रों का ढक्कन हठाये हुए बाज पंक्षी की उद्ग्रेन्षा 
की गई है। इस उत्प्रेज्ञा-अलड्लार से यह वस्वु-रूप व्यंग्यार्थ सूचित होता है 
कि रावण से युद्ध करने के लिये हनुमानजी की जो चिरकाल से उत्कद 
उत्कणठा थी, वह पूर्ण हो गई । 


जीरन बसन विहाय जिमि पहरत शअ्रपर नवीन , 
' » तिमि-पावत नव-देह नर॒तजि जीरन तन-छीन ॥२६३॥ 


गीताजी में भगवान्‌ की इस उक्ति में उपमा.अलड्लार स्वतः सम्भवी 
-: वाच्याथ है । इसमें वरतु रूप ध्वनि यह है कि घम्मयुद्ध में मरने पर स्वर्ग 
में दिव्य देह मिलता है अतः भीष्मादिक पूज्य व्यक्तियों को बध करने का 
शीक करना व्यथ्थ है । 


(घ) स्वतः सम्भवी अलक्कार से अलड्डार-व्यंग्य । 


रिपु-तिय-रद्‌-छुद अधर को दुख सब दियो मिटाय ; 
नुप ! तुस रन में कुपित छो अपने अधर चबाय ।२६४॥ 


कवि राजा से कहता है कि “संग्राम में कुपित होकर अपने ओठों को 
चबाकर तुमने अपने शत्रुओं की स्त्रियों के अधरो का दुःख (जो उनके 
पतियों द्वारा किए गए; दन्त-च्षुतों से होता ) दूर कर दिया । यह वाच्यार्थ 
है। इसमे अपने अधरों को चबाकर दूसरों के अधसें का दुःख दूर करना 
यह विरोधाभास-अलझ्लार है। इस अलड्लार द्वारा अघरों का चबाना' 
ओर “शत्रुओं का मारना” दो क्रिया एक काल मे होने मे समुच्चय 
अलड्लार की ध्वनि है। 


२६७ संलक्ष्य-क्रम-ध्वनि 


कविग्रोढ़ोक्विन्मात्र सिह 


जो अर्थ केवल कवि की कल्पना मात्र ही हो अर्थात्‌ जिसका होना 
असम्भव हो उसे कवि की प्रोढोक्ति कहते हैं। जैसे काली वस्तु को 
सफेद करनेवाली चन्द्रमा की चॉदनी केवल कवियों की कल्पना मात्र है। 
क्योंकि ऐसी चॉदनी देखी नहीं जाती । इस प्रकार के कवि-कल्पित वणन 
को कवि-प्रोढोक्ति-मात्र सिद्ध कहते हैं। इसके भी निम्न लिखित चार 
भेद होते हैं-- 
( क ) कविय्प्रोढोक्ति-सिद्ध वस्तु से वस्तु व्यंग्य । 
(ख ) कवि-प्रोढोक्ति-सिद्ध वस्तु से अलड्डलार व्यंग्य । 
(ग ) कवि-प्रोढोक्ति-सिद्ध अलड्लार से वस्तु व्यंग्य | 
( घ ) कवि-प्रौदोक्ति-सिद्ध अलड्भार से अलड्लार व्यंग्य | 
(क ) कबि-प्रोढ़ोक्ति-मात्र सिद्ध वस्तु से वस्तु-व्यंग्य | 
कुसुम-बान- सहकार के मधु केवल न सजातु , 
करि सम्मुख तरुनीन के स्मर-कर में पकरातु ।२६४॥ 


यह वसन्त-वर्शन है । वसन्‍्त को बाण बनानेवाला, कामदेव को 

योद्या, सत्रीजनों को लक्ष्य; ओर आम्र को बाण कहा गया है। 
काम योद्धा या उसके चलते हुए. बाण नहीं देखे जाते हैं यह केवल 
कवि की कल्प ना-मात्र है| अ्रतः यहों कवि-प्रोढोक्ति-मात्र सिद्ध वस्तु-रूप 
वाच्याथ है। यहाँ 'यह कामोद्दीपक काल है” यह वस्तु-रूप व्यंग्य है | 
( ख ) कवि-प्रोढ़ोक्ति-मात्र सिद्ध-वचस्तु से अलझ्कार-व्यंग्य. 

निसि ही में ससि करतु है केवल भुवन प्रकास। , 

तेरो जस निसि-दिन करत श्रिथुवन धवल उजास ।२६६॥ 


राजा के यश से त्रिभुवन में प्रकाश होना कवि-कल्पना-मात्र है, 
अतः कवि-प्रोढोक्ति है। “चन्द्रमा केवल रात्रि में ही प्रकाशन करता है, 


चतुर्थ स्‍्तवक_ श्द्ष् 


और तेरा यश दिन-रात, इस-वस्तु-रूप वाज््याथ से राजा के यश में 
चन्द्रमा से अधिकता व्यंग्य से सूचित होती है, अतः व्यतिरेक-अलड्ढलार 
की ध्वनि निकलती है। 
४हस ख़ब तरह से जान गए जेसा आनंद का कंद किया, 
व-छप सील गुन तेज पज तेरे ही तन में बंद किया । 
सुझ हस्त प्रभा की बाकी ले फिर विधि ने यह फरफंद किया; 
चंपक-दल सोनजुही नरगिश चामीकर चपला मंद किया ।7२६७ 


यहाँ अद्धों के रूप-लावण्य की रचना करके बची हुईं सामग्री से 
चम्पक-दल आदि की रचना के कथन में कवि-प्रोढ़ोक़नि है। इसमें 
व्यतिरेक-अलड्लार की व्यज्ञना है, क्योंकि चम्पक आदि से अक्ञों की 
कान्ति की अधिकता सूचित होती है । 
( ग) कवि-प्रोढ़ोक्ति-मात्र सिद्ध अलझ्टार से वस्तु-उ्यंग्य । 


रावन सिर के मुकुट सो तिहिं छिन भुवि-तल आय । 
मनि-मिस्र॒ निश्तचिचा-लच्छि के असुबा गिरे ढराय ॥१ध८॥ 
“श्रीरचुनाथजी के जन्म-समय रावण के मुकुट से मणियों के गिरने 
का तो बहाना-मात्र था, वास्तव में राज्षसों की लद्धमी के ओसू एथ्वी पर 
गिरे थे! । 'राक्ष्सों की लक्ष्मी के आँसू! कवि-कल्पित हैं--कवि प्रोढ़ोक्ति- 
मात्र है। 'मणियों के बहाने से ओसू गिरे! इस कथन में अपहूति- 
अलड्लार वाच्यार्थ है। इसमे “आगे को होनेवाला राक्षसों का विनाश - 
रूप वस्तु-व्यंग्य है । 
६ घ ) कवि-प्रोढ़ोक्तिमात्र सिद्ध अल्क्कार से अलझ्डार व्यंग्य | 
“कोप के कठाचछ तें निहारत ही शत्रु-ओर; 
काम के कठाच्छ बराम तिनकी बितात हैं। 
मूर्ची-गांडीव ताकी सपरस करत अरी-- 
नारिन के कजल को परस मिटात है । 


२६६ संतद्य-क्रम-ध्वनि 


ड्सत है होठ आप पीर को सहत बीर - - 
सत्र्‌ -वधू होठनि की पीर सो बिलात है। 
बान के संघानत ही अजुन के सत्रुन की-- 
ख्रियन की चूरिन को चूरन दिखात है।”रशध्धा 


अजुन के युद्ध के वर्णन में यहाँ कवि की प्रोढोक्ति है। शत्रुओं 
पर अजु न के कुपित कटाज्ञों का गिरना' यह कारण और उन शत्रुओ 
की स्रियो के काम-कटाक्षु का अन्त हो जाना! यह काय भिन्न-भिन्न स्थान 
पर होने में असड्ज ति-अलड्जार है इस अलड्डार द्वारा कार्य कारण का 
एक साथ होना' यह अतिशयोक्ति-अलड्डार की ध्वनि निकलती है। 


“जन्ाहिन ये पावक प्रवत्न लुवे चलें चढ़े पाल । 
मानहु विरह-वसंत के आत्म लेत उसास ॥?३००॥ 


यहाँ 'वसन्त के विरह में लूओों के रूप मे ग्रीष्म-ऋत का तप्त श्वास 
लेना? इस वाच्यार्थ में सापह्व उद्पेज्ञा अलड्रार है। इस उद्रेत्ञा 
द्वारा “जब स्वय ग्रीष्म-ऋरत ही तप्त श्वास ले रही है, तब जीवधघारी 
मनुष्यादिकों के सन्‍्ताप की बात ही क्या है” यह '“अर्थापत्ति' अलड्ढार 
व्यंग्याथ से ध्वनित होता है । 


सुनत बिहारी के ललित दोहन-मोहन-मंत्र ; 
सहदय हृदय न सुधि रहत लगत न जंत्र न तंत्र ।३०१॥ 


बिहारी कवि के दोहों को मोहन-मन्त्र कहने में 'रूपकाो अलड्ढार 
वाच्यार्थ है। इसके द्वारा अन्य मन्त्रो की मोहन-शक्ति पर जंत्र-तंत्रों का 
प्रभाव हो सकता है, ओर इन मोहन-मन्त्रों पर कोई जंत्र-मंत्र नही चल 
सकता? यह उत्कर्ष सूचित होता है | अतः व्यतिरेक अलड्लार व्यंग्य 
है | यह कवि-ऋल्पित वर्णन है, अतः कविय्प्रोढ़ोक्ति-मात्र है । 


चतुथ स्तवक २७८ 


कवि-निबद् पात्र की प्रीढ़ोक्चि सिद्ध 


जहाँ कवि की स्वयं उक्ति न होकर कवि द्वारा कल्पित पात्र की 
अर्थात्‌ नायक-नायिका अ्रादि अन्य व्यक्ति की उक्ति द्वारा लोकातिरिक्त 
केवल कल्पनात्मक वर्णन होता है, वहाँ कवि निबद्ध पात्र 
की प्रोढोक्ति मात्र सिद्ध कहा जाता हैं। “कविग्पयोदोक्ति में 
कवि स्वय वक्ता होता है; और इसमें कवि-ऋल्यित पात्र इन दोनो में 
केवल यही भेद है | इसके भी निम्न लिखित चार भेद होते हैं-- 

( क ) कवि-निवद्ध पात्र की प्रोढोक्ति-सिद्ध वस्तु से वस्तु व्यंग्य | 

( ख ) कवि निबद्व पात्र-प्रोढोक्ति-सिद्ध वस्तु से अलड्डार व्यंग्य । 

(ग) कवि-निब द्व पात्रगप्रोढोक्ति अलड्लार से वस्तु व्यंग्य । 

( ध.) कवि-निबद्द पांत्र-प्रों० अलड्जार से अलड्लार व्यंग्य | 
( के ) कवि-निबद्ध पात्र की भ्रोढ़ोक्ति-सिद्ध वस्तु से वस्तु व्यंग्य । 


“करी विरह५ ऐसी तऊ गेल न छुड़त नीच । 
दीन्हेऊ चसमा चखनि चाहत लखे न मीच ।??३०२॥ 


यहाँ मृत्यु के नेत्र- में चश्मे का होना कवि-कल्पित वस्तु रूप है। 
वक्ता विरह-निवेदना दूती है । अतः कवि-निबद्ध पात्र की प्रोढ़ोक्ति है | 
नायिका की, अत्यन्त क़ृशता का सूचित होना? यह वस्तु-व्यंग्य है | 
( ख ) कवि-निबद्ध-पात्र की प्रोढ़ोक्ति-सिद्ध वस्तु से अलक्कार-व्यंग्य 
» मदन-बान- की पंचता कीनही हाय - अनत , 
 बिरहिन को अब पंचता दीनही आय वसंत ॥३०३॥ 


स्क 





३ बिरह ने उसे इतनी दुबली कर दी है “कि झूत्यु चश्मा लगाकर 
भी उसे नहीं देख सकती, फिर भी नीच विरह डसका पिंड नहीं 
छोठता । 


२७१ संल्द्य-क्रम-ध्वनि 


, यहाँ कवि-निबद्ध मायिका की उक्ति है--हे सखि, कामदेव के 
पुष्प वाणों की जो पश्चता,( पाच की संख्या ) थी वह वसन्‍्त ऋतु ने 
अनन्त ( असंख्य ) कर दी अर्थात्‌ वाणों की पशद्चता तो छुग दी 
आर वियोगियों को पश्चता ( मृत्यु ) दे दी। यह वस्तु रूप वाचयार्थ है । 
इसके द्वारा--वसन्त ने कामदेव के बाणों की पश्चता लेकर मानो 
विरही जनों को वह (पश्चता ) दे दी। यह उद्पेज्ञा अलड्वार व्यंग्य 
से प्रतीत होता है | यहाँ ( पश्चता शब्द ) ध्वर्थक्र है। 
( ग ) कवि-निबद्ध-पात्र की प्रोढ़ोक्ति-सिद्धअलझ्कार से वस्तु-व्यंग्य | 
मानिनि ! मालति-कुसुम पे गूंजत अ्रमर सुहाहिं , 
मानो 'मदन-प्रयान के सुन्‍-्समय संख बजाहिं।३०४॥ 


मानिनी के प्रति कवि-निबद्धू सखी की यह प्रोढोक्ति है। भ्रमर के 
गुब्जार मे कामदेव के शंख की उद्पेक्ञा वाच्याथ है। इस उद्पेक्षा- 
अलड्लार द्वारा “कामोद्दीपक समय आ. गयी, फिर भी वू माने नहीं 
छोड़ती” यह वस्तु-ध्वनिं निकलती है। 


“मरबे को साहस कियो बढ़ी विरह. की पीर हद 
दौरति है समुहै ससी सरसिज सुरभि-समीर ।”३० शार- 


. यह कविननिबद्ध दृति की प्रोढोक्ति है। मरने के. लिगे चन्द्रमा 
ओर कमलों के सम्मुख दोड़ना इच्छा के विरुद्ध प्रयत्ञ है।. अतः 
विचित्र अलड्लार है। इसमें "नायिका का अत्यन्त विरह-सन्ताप होना 
अह बस्तु-ध्वनि है॥ हे 
-(घ) कवि-निबद्ध पात्र की प्रोढ़ोक्तिससिद्ध अलझार से 
अलक्षार-उयंग्य | 
हिय तेरो बहु तिय भरथो मिलत न ताको ढौर; 
छाॉँदि सबहि वह करत नित्त छूस तन अब कस और ।३०६॥ 


चतुर्थ स्‍तवक र्७र 


यहाँ कवि-निंबद्ध दूती की दक्षिण-नायक के प्रति प्रोदोक्ति है । 
“बहुत-सी युवतियों के प्रेम से मरे हुए. ठम्हारे हृदय में स्थान न मिलने 
के कारण बह वेचारी अ्रव संब काम छोड़ कर प्रतिदिन अपने कृश 
देह को और भी कृश कर रही है; यह इसलिये कि अत्यन्त ज्ञीण होने 
से सम्भव है हृदय में कुछ स्थान मिल जाय | यह काव्यलिज्ञ अलक्लार 
वाच्यार्थ है। इसमें विरह में 'कृश देह होने पर भी तुम्हारे हृदय में 
स्थान नहीं मिलता” यह “विशेषोक्ति! अलह्डार व्यंग्य से प्रतीत होता है । 


“४ उुट'$#२९,-- 
शब्द और अर्थ उमय शक्ति उद्मव- 
अनुरणन ध्वनि 


जहाँ कुछ पदों का परिवर्तन न होने पर और कुछ 
पदों का पर्ित्तंन होने पर भी “्यंग्य सूचित हो, 
चहाँ शब्दार्थ उभय-शक्किमूलक अलुरणन च्िरनि 
होती है। 


यह भेद केवल वाक्यगत ही होता है--प्रदगत नहीं। क्योंकि एक 

ही पद में दो विरुद्ध धर्म (अर्थात्‌ शब्द-परिवर्तन सहन करना श्र 
सहन न करना ) नहीं रह सकते। इसमें वस्तु के द्वारा अलड्लास्व्यंग्यं 
होता है, न कि वस्तु-रूप व्यंग्य । क्योंकि वस्तु शब्दार्थ-उभय-मूलक 
नहीं होती, वस्तु के गोपन मे--छिपाने मे--केवल शब्द-शक्ति ही समर्थ 
है, अ्रथ-शक्ति नहीं । 

सोहत चंद्राभरन -जुत सनमथ प्रबल बढ़ातु ; 

तरल तारका कलित यह श्यामा ललित .सुहातु ।३००ा 


२७३ ध्वनि के भेद 


इसके दो श्रुर्थ हैं, एक अर्थ यह है--चन्द्रमा जिसका आमभरण 
है, जो कामदेव को बढाती है, ओर तरल-तारका है, अर्थात्‌ कहीं-कहीं 
कुछ तारागणो से युक्त है, ऐसी यह श्यामा (रात्रि ) शोमित हो रही 
है। ओर दूसरा अर्थ यह है--जो, चन्द्र अर्थात्‌ कपूर के भूषणों से 
अथवा चन्द्रामरण से (ललाट के भूषण से ) युक्त है, कामदेव को 
बढ़ानेवाली है, ओर तरल-तारका" है, अर्थात्‌ चञ्चल नेत्रवाली है 
(अथवा तारों के समान कान्तिवाले छोटे-छोटे हीरों की लटकन वाला 
हार धारण किए है ) ऐसी यह श्यामा-कामिनी शोभायमान है ये दोनो 
वाच्यार्थ हैं ओर वस्तु-रूप हैं। इनमें ्नी के समान रात्रि शोभित है, 
अथवा चॉदनी रात्रि जैसी कामिनी शोभित है, यह उपमा अलड्लार व्यग्य 
से ध्वनित होता है | “चन्द्र, तरल” ओर 'श्यामा” शब्दों के स्थान पर” 
इन्हीं अथथों' के बोधक दूसरे शब्द बदल देने पर, दो अर्थ नहीं हो सकते, 
यह शब्द-शक्तिमूलकता है, ओर आमरण?” तथा “बढात शब्दों के 
स्थान पर इसी अर्थ वाले दूसरे शब्द बदल देने पर भी दो अर्थ हो 
सकते हैं, यह अर्थ-शक्ति-मूलकता है। अतः यहाँ शब्द और श्रर्थ दोनो 
ही की शक्ति से व्यंग्योथ सूचित'होने से यह शब्दा्य-उभय-शक्ति-मूलक 
ध्वनि है। 
यहाँ तक ध्वनि के १८ भेदों का निरूपण किया गया है-- 
२ लक्षणा-मूला अविवज्षितवाचय ध्वनि के--१ अर्थान्तर सक्रमित 
वाचय ध्वनि ओर २ अत्यन्त तिरस्कृत वात्य व्वनि | 


१६ अभिधामूला-विवक्षितवाक्ष्य ध्वनि के-+- 
१ असंलक्ष्यक्रमव्यंग ध्वनि के रस, भाव आदि को एक ही भेद 
माना जाता है। 


१ तरल ८ चन्चल, तारका > श्राँखों के बीच का काला मण्डत्ञ 


चतुर्थ स्तवक २७४ 





१५ संलच्यक्रमव्यंग्य ध्वनि के--- 
२ शब्द-शक्तिमूलक ( १ ) वस्तुव्यंग्य और अलक्षास्व्यंग्य । 


१२ अर्थ शक्ति मूलक-- 


४ स्वत सम्मवी 
४ कविग्प्रोढोक्ति मात्र सिद्ध । 
४ कवि-निबद्ध पात्र की प्रोढोक्ति मात्र सिद्ध 
१ शब्दा्थ उभय-शक्ति-मूलक 
इन १८ भेदों के यथासंभव, अर्थात्‌ एष्ट १०६ की तालिका के 
अनुसार, पदगत*, वाक्यगत*, प्रबन्धगत पदाशगत*, वणगत”, आर 


3 43 /९५/५ 4६ /५ /९ / ६ /५/४६/९./५/७८९/४७/६८४ /४-८४८४१४४४०८ 


१ सुबन्त और तिढः ग़न्त को पद” कहते हैं। 





२ पर्दों के समूह को वाक्य! कहते हैं।। अतएव पर्दों के समृहात्मक 
वाक्य में और पदों के समास में जो ध्वनि होती है वह भी वाक्यगत 
ध्वनि है। 


३ महावाक्य को श्रर्थात्‌ अनेंक वा््यों के समूह को प्रबन्ध 
कहते हैं। प्रबन्ध दो प्रकार के होते हैं--अंथ-रूप और ग्रंथ के अवान्तर 
अकरण-“रूप । ह 

४ पद के एक अद्ग था श्रंश को 'पदांश” कहते हैं। जैसे धात॒, 
नाम ( प्रातिपदिक ) तिडः -विभक्कि, सुप्‌ विभक्ति, क्ञ आदि शत्यय 
सस्वन्ध-वाचक पष्ठी विभरक्कि, लडः आदि लकार, वचन ( एक वचन 
आदि ), प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष, समास पूववनिपात विभक्लि 
सिशेष, 'क' आदि तद्धित, प्र” आदि उपसर्ग, 'च! आदि निपात 
सर्वेनास और समाप्त आदि । 

४ 'क' आदि वण । 


र्७्श्‌ ध्वनि के भेद 


रचनागत”, ४१ भेद होते हैं। इनमें से कुछ के उदाहरण इस 
प्रंकार 'हैं--- के 
पद्गत ध्वनि।. - क्र हे 

पदगत ध्वनि में प्रधानता से एक ही पद व्यज्ञक होता है, अन्य पद 
क्रेवल उस पद के उपकारक होते हैं | जैसे नासिका आदि किसी एक 
अज्ञ में धारण किए गए भूषण से कामिनी के सारे शरीर की शोभा हो 
जाती है, उसी प्रकार एक पद के व्यग्यार्थ से कवि-कृत सारे पत्र की 
रचना शोभा को प्राप्त हो जाती है* । > 


जाके सुहद छु सुहद हो रिपुह् रिपु ही होई ; 
जनम सफल तिहिं पुरुष को जीवित हू जग सोइ ।३०८॥ 
यहाँ 'सुहृद! और 'रिपु! पद में अर्थान्तरसंक्रमित ध्वनि है। 

दूसरी बार कहे हुए, 'सुद्ृद'-शब्द के वाच्यार्थ में “विश्वास के योग्य” और 
'रिपु' शब्द के वाच्यार्थ में 'परास्त के योग्य! व्यंग्यार्थ सूचित होता है । इस 
ध्वनि की व्यञ्जना में यहाँ दूसरी बार कहे हुए 'सुदृद! और “रिपु पद हीं 
प्रधान हैं, इसी से यहाँ लक्षुणामूला अर्थान्तरसंक्रमित पदगत ध्वनि' है 4 
पदगत अपत्यन्ततिरस्कृतवात््य ध्वनि का उदाहरण “लगि मुख के 
निःस्वास! ( पृष्ठ ११२) मे है। 





-१ गूंथने का नाम रचना है। इसके वेदर्भी, पान्‍्चाली, लादी 
और गौडी चार भेद हैं। वेदर्भी रचना समास-रहित होती. है, 
पाञ्चाली दो-तीन या चार पदों के समासवाली, लादी! पाँच तथा 
सात पदों के समासवाली होती है, और गोडी में यथाशक्लकि पदों का 
समास हो सकता है। ह 

२. 'एकावयवर्संस्थेन भूषणेनेव “कामिनी 

पदच्योतेव सुकवेध्वेनिना भाति भारती।”' 
. >-ध्क्यालोक | 


चतुथ स्तवक डर 


|. 





कफ 


“सखी सिखावत मान-विधि सेननि बरजति बाल ; 
हरुये कहु मों हिय बसत सदा विहारोलाल ॥7३० 8॥ 


यह मान का उपदेश देनेवाली सखी के प्रति नायिका की उक्ति है । 
“है सखि ! तू मान करने की बाते बहुत धीरे-धीरे कद्द, क्योकि मेरे हृदय. 
में प्राणनाथ रहते हैं, वे कहीं सुन न ले! । यहाँ 'हरुये कहु! पद प्रधानता 
से पति में अनुराग सूचन करता है। अ्रतः इस एक पद से सम्भोग- 
श्रद्धार ध्वनित होने से पद में असंलच्यक्रमव्यग्य-ध्वनि है। इसी प्रकार 
संलच्ष्यक्रमव्यंग्य-ध्वनि के शब्द-शक्तिमूल तथा अर्थ-शक्ति-मूल वस्तु या 
अलड्लार-ध्वनि के पदगत उदाहरण होते हैं । 


वाक्यगत ध्वनि 


'सुबरन फूलन की धरा? ( प्रृष्ट १११ ) में कई पद से बने हुए सारे 
वाक्य में अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य-ध्यनि है। असंलच्ष्यक्रमव्यंग्य-ध्वनि के 
उदाहरण रस प्रकरण में प्रायः वाक्यगत ही दिए गए. हैं। जैसे संख्या 
१४१ आदि मे वाक्यगत ध्वनि का उदाहरण है। 


प्रबन्धगत ध्वनि 


यह ध्वनि एक वाक्य या एक पद्म में नहीं होती, किन्तु ग्रन्थ-प्रबन्ध . 
के कई पद्मो में हुआ करती है । महाभारत के शान्तिपर्व के आपद्वर्म की 


१४३ वीं अध्याय के गरप्न-गोमायु-सम्बाद आदि में यह बहुत मिलती 
है। जैसे-- 
गीध स्थार कंकाल जुत है यह घोर -मसान ; 
अतिहि भ्रयंकर या समय रहिब्रो इत शब्रज्ञान । 


प्रानि-सान्न की गति यही प्रियवा अ्रश्रिय होइ; 
या जग में मरिके कष्नों जीवित है नहिं कोइ ।३१०॥ 


२७७ “व्चनि करे भेद 





सन्ध्या के समय श्मशान में किसी मृतक बालक को उसके बन्धुओं 
द्वारालाया हुआ देखकर, गीध॑ ने चाहा कि “ईस मृतक को छोड़कर 
ये लोग यदि दिन रहते चले जायें तो मेरा काम बन जाय, ओर गीदड़ ने 
उसे देख कर यह चाहा कि “यदि कुछ देर ये लोग यहीं रह जोय तो फिर 
रात मे गीध तो इसे न ले जा सकेंगे ओर मेरा काम बन जायगा' | इसी 
प्रसद्ध में रात्रि में अन्धे हो जाने वाले मास-मक्षक गीध की मृतक के 
बान्धवों के प्रति यह उक्ति है । 'ऐसे भयड्डर श्मशान में इस सन्ध्या- 
काल में ठुम लोगों का यहाँ रहना बड़ा भयावह है! | यह स्वतः सम्भवी 


वस्तु रूप वाच्याथ है | इसमें 'मृतक को छोडकर तुम शीघ्र अपने घर 
लोट जाओ" यह वस्तु रूप व्यग्य है | 


अधथ्यो न रवि लखियतु अर्जों विधघन रूप यह काल , 
रहहु निकट ही जिय परे फिरि कदाचि यह बाल । 
भई न याकी त्तरुन वय सुवरन वरन समान्त , 
तजत याहि क्यों मूढ़ 'जन ! गीध-वचन तुम मान ।३११॥ 


उस मृतक के उन्हीं बॉधवों के प्रति यह गीदड की उक्ति है। यह 
मी स्वतः्सम्भवी वस्ठु रूप वाच्ष्याथ है। इसमे मत बालक को छोड़ कर 
जाने का निषेध व्यंग्यार्थ है ओर वह वस्तु-रूप है| इन दोनो उदाहरणों 
में किसी एक ही पद या वाक्य से उक्त व्यंग्य प्रतीत नहीं हो सकता, किन्तु 
सारे प्रबन्ध के वाक्‍्य-समूह द्वारा ही व्यग्य प्रतीत होता है, अतः यहाँ प्रवन्ध- 
गत सलक्ष्यक्रमव्यंग्य अथ्थ-शक्ति-उद्धव ध्वनि है। 


महाभारत में शान्तरस, श्रीरामचरित्र में करुणरस, भमालतीमाधव' 
ऋऔर 'रलावली” आदि नाठको में श्भार रस की ध्वनि के अन्थ रूप मे 
प्रवन्धगत उदाहरण हैं । 


चतुर्थ सतवक २७८ 





. _'.. यदांशगत ध्वनि 


०० 


रुचि है “चहिं तोहि अहारन में रु बिंहार न कोड सुहावतु री; 
रहे नासिका “ओर निहारत ही मन एकहि ठौर लगावतु रीज 
गहें मोन रहे यह, भौन सबे यहे सूने-ले तोहि लखावतु री; 
कह जोगिन है कि वियोगिनिःत्‌ू ९ सजनी ! यह क्यों न बतावतु री ।३१२ 


किसी बियोगिनी के प्रति उसकी सखी की यह परिहासोक्ति है। यहाँ 
अहारन में, 'कोठ, ही, 'कहु, सजनी' ओर "कि! ये सब पदाश 
हैं | अहारन मे” विषय सप्तमी विभक्ति है, इसमें सारे आहारो से वेराग्य 
होना व्यंग्य है। 'योगिनी शरीर-रक्षा्थ सात्िविक आहार तो करती है, पर 
तूतो आहास्मात्र से विरक्त है! यह ध्वनि है। 'कोउ” विशेषण है। 
इसमें यह ध्वनि है कि धार्मिक विषयों से--गड्जा-स्नानादि 
से--योगिनी की निद्ृत्ति नहीं होती, किन्तु ठुके तो भला या 
बुरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता' । “"निहारत' के आगे 'ही” है। हीं 
पदांश से निरन्तर नासाग्र दृष्टि रखना; व्यंग्य है यह! में व्यंग्य यह हैं 
कि तेरा यह प्रत्यक्ष विलक्षुण मोन है! । 'सजनी' पद से अन्‍्तरघ्भता 
घ्वनित होती है, अर्थात्‌ मुझसे तेरा प्रेम छिपा नहीं है। 'री कह 
सम्बोधन से उपहास सूचित है । 'कि है ?! से उसकी बविरहावस्था सूचित 
है | यहों इन पदाशों का अपने-अपने विषयो को ध्वनित करना सहृदयों 
को ही अनुभवनीय है । 


रो > शी 
वर्ण ओर रचनागंत ध्वनि 


इनके उदाहरण छुठे स्तवक में ( गुण”-प्रकरण में ) दिए जायेंगे । 
यहाँ तक॑ ध्वनि के जिन ४१ भेदों का निरूपण किया गया है, 
वे सब शुद्ध भेद हैं । 


७६ ध्वनि संकर संसृष्टि: 
ध्वनियों का संकर ओर संसष्टि ' 
एक ध्वनि में दूसरी ध्वनियों के मिश्रण होने को ध्वनि-संकर 
ओर ध्वनि-संररृष्टि कहते हैं । 
संकर | 
इसके तीन भेद्‌ हैं-- 


( १) संशयास्पद-संकर--जहाँ एक से अधिक ध्वनियों की प्रतीति 
होती हो किन्तु यह निश्चय न हो कि उनमें से कोन सी एक दूसरी की. 
साधक है अथवा एक दूसरी की बाधक है। अर्थात्‌ जहाँ यह कोन-सी 
ध्वनि है ! ऐसा सशय होता हो वहाँ सशयास्पद-संकर ध्वनि 
कही जाती है । 


(२ ) अनुग्राह्म-अनुम्राहक संकर--जहाँ एक से अधिक ध्वनियाँ 
हों ओर उनमें एक ध्वनि दूसरी ध्वनि की पोषक हो--उनका अद्ञाज्ञीभावः 
हो--वहाॉँ अनुग्राह्म-अनुग्ाहक संकर-ध्वनि होती है । 


जहा एक व्यंग्य दूसरे किसी व्यग्य का अज्ञ होता है वहा वह 
गुणीभूत व्यंग्य हो जाता है। अतणव यह प्रश्न होता है कि फिर 
इस अड्जाड्भीभाव संकर को ध्वनि-भेद के अन्तर्गत क्यों माना जाता है ९ 
इसका उत्तर यह है कि जैसे किसी कामिनी के कण्ठ में धारण किया 
हुआ कोई चमकीला आभूषण अपने चमत्कार को ख्वतंत्रता से 
रखता हुआ भी उस कामिनी के कएठ का भी उपकार करता 
रहता हे--शोभा बढ़ाता रहता है--उसी प्रकार जहाँ एक ध्वनि स्वतः 
चमत्कारी रहकर दूसरी ध्वनि का भी कुछ उपकार कर देती है, न कि 
दूसरी ध्वनि का सवंथा अजद्भ ही हो जाती है, वहाँ अनुग्राह्म-अनुआहक: 
संकर-व्वनि कही जाती है। 


चतुर्थ सतंवक श्घ० 





(३ ) एकव्यव्जकानुगप्रवेश संकर--जहाँ एक ही पद या एक ही 
वाक्य में एक से अधिक प्रकार की ध्वनि होती है । वहाँ एकव्यज्ञका- 
'नुप्रवेश संकर-ध्वनि कही जाती है । 


संस प्टि-- 


जहाँ निरपेतज्षुता से-परस्पर सम्बन्ध न रखकर स्वतन्त्रता 
से--एक से अधिक ध्यनियों अपने स्वरूप में स्थित होती हैं, वहाँ 
ध्वनि ससृष्ठटि' कही जाती है | 


नसंशयास्पद संकर-- 


“सीता हरन तात ! जनि कहेहु पितासन जाथ ; 
जो मैं राम तो कुज्न-सहित कहहि दुसानन आय ॥?३१३॥ 


गृध्रराज के प्रति श्रीरघुनाथजी की यह उक्ति है। इस उक्ति का जो 
मे राम हैं पद 'मैं यदि सूयबंशी महाराज दशरथ का ,अतुल बलशाली 
पुत्र राम हैँ इस अथान्‍्तर में सक्रमण करता है। अतः अविवज्षितवाच्य 
अथान्तरसंक्रमित ध्वनि है या जोमेै राम हैँ तो' पद से “ जानकी 
'को हरण करनेवाले रावण का में शीघ्र ही वध करूँगा! यह अनुरणन 
रूप व्यंग्य सूचित होने से विवक्तितवाच्य अथ-शक्ति-मूंलक ध्वनि है! यहाँ 
“यह सशय होता है कि इन दोनो में से कोन-सी ध्वनि है । क्योंकि एक को 
स्व्रीकार करने में साधक ओर दूसरी का त्याग करने में बाधक प्रमाण 
नहीं है--दोनो की ही समानता से प्रतीति होती है | अतः यहाँ संशयास्पद 
संकर-ध्वनि है । 
अनुग्राह्म-अनुग्राहक संकर । 


इसका“उदाहरुण सकर संसूष्टि के उदाहरण (पद्च संख्या ३१६ ) में 
पंद्खाया जायगा । डे | 


श्८१ ध्वनियो की-संस्टि 





एकठ्यव्जकालुप्रवेश संकर | | 

उन्नत पीन उरोज लखें जुग दीरघ चंचल दीठ विलोकित 

ठाढ़ी है गेह की देहरी पै पिय-आगम के उतसाह-प्रलोभित । 

कंचन-कुस कुसुभ सजे पट, कंजन-वंदनवार सुसोभित ; 

मंगल ये, उपचार करिए बिन ही श्रम कंजमुखी समयोचित ।३१४॥ 

“उन्नत उरोजोवाली ओर बडे तथा चश्जल नेत्रोवाली घर के दरवाजे 
पर खड़ी हुई सुन्दरी ने अपने पति के आने के समय समयोचित माड्भलिक 
काय--दो पूर्ण कलशों को सम्मुख लाना और पुष्यों की बन्दनवार 
लगाना--बिना ही कुछ यत्न के सम्पादन कर दिए? | इस वाच्याथ के स्तन 
ही कलश हैं ओर सुदीध एवं चश्चल दृष्टि ही कमलो की वन्दनवार है? 
इन दोनों वाक्यों मे रूपक अलड्जार की व्वनि और “श्ज्ार-रस की ध्वनि 
एक ही आश्रय मे है, श्र्थात्‌ जिन वाक्‍्यों द्वारा सलक्ष्यक्रमव्यग्यात्मक 
रूपक की च्वनि प्रतीत होती है, उन्हीं वाक्यो द्वारा असंलक्ष्यक्रमव्यग्यात्मक 
आज्ञारर्स भी ध्वनित होता है। यहाँ संलक्ष्यक्रमव्यग्य ध्वनि और 
असलक्ष्यक्रमव्यंग्य व्वनि दोनो हैं, अतएव एकव्यअ्ञकानुप्रवेश 
संकर-ध्वनि है। 
ध्वनियों की संस्ृष्टि । 

“हँखने लगे कुसुम कानन के देख चित्र सा एक महान, 
विकस उठीं कलियाँ डाली में निरख मैथिली का सुप्कान । 
कोन कोन से फूल खिले हैं उन्हे” गिनाने लगा समीर, 
एक एक कर गुन गुन करके जुड आई भोरों की भीर ।??३१ 


यह पग्चवटी का वर्णेन- है | इसमें लक्षणामूला तीन व्वनियो की 
संसृष्टि है-- 
१--हँसना चेतन का धर्म है, कुसुम (पुष्प) जड है। उनको ँसने 


लगे! कहने में मुख्याथ का बाघ होने के कारण गोणी-लक्षणा द्वारा 
द ५६ 


चतुरथ स्तवक शेपर 
3७+७++०>%ः»»मभ_कऋकननक 9००७५ उन मन 


“पुष्प खिलने लगे” यह लक्ष्यार्थ जाना जाता है। व्यंग्याथ में प्रफुल्लित 
पुष्पों की रमणीयता की ध्वनि है । 


२--जानकीजी की मुसकान देखकर कलियों का विकसित होना 
असम्भव होने के कारण मुख्या्थ का बाघ है। कली जड़ है वे 
देख नहीं सकती | यहां व्यग्यार्थ में मुतकान के आधिक्य की ध्वनि है | 


३--समीर (पवन) द्वारा पुष्पों का गिना जाना असम्भव होने के 
कारण मुख्यार्थ का बाध है। गोणी-लक्षणा से वायु द्वारा पुथ्यों का-स्पश 
किया जाना लक्ष्यार्थ है | इसमें पवन के मन्द-मन्द बहन होने की 
ध्वनि है। 


ये तीनो ध्वनि प्थक्‌ प्रथक्‌ स्व॒तन्त्र प्रतीत होती हैं---एक ध्वनि किसी 
दूसरी ध्वनि का अड्ग नहीं है । 


संसृष्टि ओर संकर का मिलाव । 


छावो घनघोर घटा क्‍यों न नभ-संडल पै, 

स्यामल छुटा हू ये लीपो चहूँ ओरन सो ; 
सीतल समीर धीर मेरें का करेगो पीर, 

है है का मेघ-मित्र मोरन क्रे सोरन सों । 
राम हों कठोर-हिय भ्रुवन-असिद्ध मैं तो, 

सहोंगो सबे ही ऐसे दुःख बरजोरन सा ; 
प्यारी सुकुमारी हाय जनकदुलारी ताकी, 

होयगी देखा कहा पावस झकोरन सो ।३१६॥ 


- वर्षा-काल के उद्दीपक विभावों को देखकर सीताजी के विरह में 
भगवान्‌ श्रीरतुनाथजी की यह उक्ति है। आकाश को श्याम रह्ञ की 
कान्ति से लीपनेवाले मेघ भले ही उमड़े, शीतल-मन्द समीर भले हीः 


२८३ ध्वनियों की संसष्टि, संकर 


चले ओर मेघ के मित्र मयूरों की भी भले ही कूक होती रहे, मै अत्यन्त 
कठोर हृदय राम हूँ, सब कुछ सहन कर सकूगा | पर हाय ! सुकुमारी 
बेंदेही की क्या दशा होगी ? यहाँ ध्वनि-संसष्टि, अनुग्राह्म-अनुगहक 
ध्वनि-सलकर ओर एकव्यक्षक्रानुप्रवेश ध्वनि-संकर, तीनो एकत्र हैं:--- 
(१ ) आकाश निराकार है। उस पर लेप नहीं हो सकता, अतः यहाँ 
लीपत!” का लक्ष्यार्थ व्याप्त करना है। 'मित्रता' चेतन व्यक्ति का 
धम्म है। जड़ मेघ से मयूरों की मित्रता होना सम्भव नहीं, इस मुख्यार्थ 
का बाध होने से मित्रता का लक्ष्यार्थ 'भयूरों को सुख देनेवाला” ग्रहण 
किया जाता है। इसमे अतिशय कामोद्दीपकता व्यग्य है। अतः ये 
दोनो अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनि हैं । इनकी यहा परस्पर निरपेक्ष 
स्थिति होने से संसृष्टि है | (२) इन दोनो अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य 
ध्वनियों के साथ अथान्‍्तरसंक्रमित वाच्य ध्वनि का अनुग्राह्म-अनुग्राहक 
भाव से सकर भी है, क्‍योंकि यहाँ वक्ता स्वयं राम हैं। केवल 'मैं” 
कहने से भी राम का बोध हो सकता था, अतः "मै राम हैँ ऐसा 
कहना अनावश्यक था, पर 'रार्मा पद 'राज्य-श्र श, वन-वास, जठा-चीर- 
धारण, स्लरीहरण आदि अनेक दु.खों को सहन करनेवाला मै राम हूँ” 
इस अर्थान्तर में सक्रमण करता है। इस अशर्थान्तरसंक्रमित ध्वनि में 
श्री रामचन्द्रजी का अपनी अवज्ञा सूचित करना व्यंग्य है। उपयुक्त 
ललीपत” ओर "मित्र पदों से जो कामोद्दीककता की अधिकता व्यंग्य है, 
वह इस अवज्ञा का अद्ग है, अर्थात्‌ 'राम-शब्द से सूचित होनेवाली 
अवशज्ञा की मेघ-काल की उद्दीपकता से पुष्टि होती है। श्रतः इन दोनो 
ध्वनियों का अनुग्राह्म-अनुग्राहक् भाव सकर है। (३ ) 'एकव्यज्ञका- 
नुप्रवेश-ध्वनिसकर' इस प्रकार है कि राम! पद से जिस प्रकार 
रघुनाथजी द्वारा अपनी अवशा सूचित होती है, उसी प्रकार सीताजी 
का वियोग सहन करना भी सूचित होता है, अतः 'रामा पद में 
विप्रलम्भ-खद्भारात्मक व्यंग्य भी है। एक ही पद “राम में अर्थान्तर- 


चतुथ स्तंवक॑ श्य४छ 


संक्रमितवाच्य ध्वनि ओर विप्रलम्भ-श्द्भधारात्प्रक असंलक्ष्यक्रम व्यंग्य 
ध्वनि दोनो होने से एकव्यज्ञकानुप्रवेश संकर भी है । 
है 3+45- मेंदों है ] 
ध्वनिं के मेदों की संख्या 

ध्वनि के ५१ शुद्ध भेदों के परस्पर एक का दूसरे के साथ मिश्रण 
होने पर (४१ से ५१ का गुणन करने पर ) २६०१ मिश्रित भेद होते 
हैं। इन २६०१ भेदो के तीन प्रकार के संकर ओर एक प्रकार की संसृष्टि 
द्वारा ( २६०१ को चार के गुणन करने पर ) १०,४०४ मिश्रित ( मिले 
हुए. संकी्ण ) भेद होते हैं | इन १०,४०४ भेदों में ५१ शुद्ध भेद जोड़ 
देने पर ध्वनि के कुल १०,४५४ भेद होते हैं । 

“१७ ४#:<4-<--- 


चतुर्थ स्तवक पद्म पुष्प 
“77+३३०८८जन्‍ट- ७० 
व्यज्ञना शक्ति का प्रतिपादन 


ध्वनि के उपयु क्व विवेचन द्वारा स्पष्ट है कि काव्य मे व्यंग्यार्थ सर्वोपरि 
पदार्थ है । व्यंग्याथ का बोध होना व्यज्ञना-शक्ति के ही आश्रित है। किन्द 
बहुत से नैव्यायिक आदि विद्वान व्यज्ञना का माना जाना अनावश्यक बताते 
हैं | उनका कहना है कि ध्वनि-सिद्धान्त मे जिस विशेष-अ्र्थ (व्यंग्याथ) के 
बोध कराने के लिये व्यज्ञना-शक्ति को माना गया हैं, उस विशेष अथ का 
बोध जब अभिधा आदि ( लक्षणा या तात्यय बृत्ति ) द्वारा ही हो सकता 
हैं, तब एक अन्य शक्ति व्यज्ञना की कल्यना करना अनावश्यक है। इस 
विषय पर ध्वन्यालोक ओर काव्यप्रकाश में विस्तृत विवेचना की गई है | 
व्यज्ञना-शक्ति के विरोधियों की सभी तकों का आचार्य मम्मठ ने बढ़ा 
ही मार्मिक खण्डन किया हैं) ' 


श्पश व्यज्जना का प्रतिपादन 








: आचार्य मम्मट का कहना है कि व्यज्ञना-शक्ति की आवश्यकता का 
अनुभव करने के लिये सर्वप्रथम ध्वनि के भेदों पर विचार करना चाहिए | 


ध्वनि के मुख्य दो भेद हैं लक्षणामूला--अविवज्षितवाच्य ध्वनि ओर 
अमिधा-मूला विवक्तितान्यपरवाच्य ध्वनि | इनमें अरविवज्षितवाच्य के तो 
नाम से ही स्पष्ट हे कि जिस अभिधा के बल पर व्यज्जना को निमू,ल करने 
का साहस किया जाता हैं, उस अभिधा के अभिषेयार्थ ( वाच्यार्थ ) का 
अविवज्षितवाच्य ध्वनि में कुछ उपयोग ही नहीं होता हैं। क्योंकि अविव- 
क्ितवाच्य के दो भेद हैं अ्रर्थान्तरसक्रमितवाच्य ओर अपत्यन्ततिरस्क्ृत- 
वाच्य । अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य में अभिधा का वाच्यार्थ, अनुपयोगी होने 
के कारण, दूसरे अर्थ में सक्रमण कर जाता है, जैसे 'कदली-कदली ही 
तथा इत्यादि में" । ओर अत्यन्ततिरस्कृतवात््य में तो वाच्यार्थ सवंथा 
ही छोड दिया जाता है , जैसे 'सुबरन फूलन की घरा' इत्यादि मेंः । 


यदि यह कहा जाय कि अविवज्तितवात््य ध्वनि में अमिषा का 
तो उपयोग नहीं होता है पर लक्षणा तो रहती है, तब व्यज्ञना के 
आविष्कार करने की क्‍या आ्रावश्यकता है ? इसका उत्तर यह हैं कि 
यह ध्वनि लक्षणा-मूला अवश्य है और इसमें प्रयोजनवती लक्षणा रहती 
भी हे, किन्तु लक्षणा तो केवल लक्ष्यार्थ का ही बोध करा सकती है। 
लक्षणा में प्रयोजन रूप जो व्यग्याथ होता है--जिसके लिये लक्षणा की 
जाती है, उस प्रयोजन का लक्षणा कदापि बोध नहीं करा सकती है। जैसे-- 


गज्ञा पर धर' इस उदाहरण में लक्षणा केवल 'गद्ञा-शब्द 
का लक्ष्यार्थ (तट बोध करा सकंती हैं। जिस प्रयोजन के लिये ( अपने 
नियास-स्थान में शोतलता और पवित्रता का आधिक्य सूचित करने के 
लिये ) इस वाक्य का वक्ता ने प्रयोग किया है, वह लक्षणा द्वारा ब्रोध 





१ देखो, पृष्ठ ५०८ । २ देखो, पृष्छ १११ |. * 


चतुथ स्तवक २८६ 





नहीं हो सकता है। वह प्रयोजन तो व्यंग्यार्थ है वद लक्षणा द्वारा न बोध 
ही हो सकता है और न वह लक्षणा का व्यापार ही है। वह व्यञ्जना का 
ब्यापार है। उसका बोध केवल व्यज्ञना-शक्ति ही करा सकती है? | यदि 
धाज्भा पर घर! वाक्य में उक्त प्रयोजन न माना जायगा तो वक्ता के ऐसे 
वाक्य कहने का अर्थ ही कुछ नहीं होगा । अ्रवणब यह सिद्ध होता है कि 
व्यग्यार्थ के बिना प्रयोजनवती लक्षणा हो ही नहीं सकती है। और 
अविवक्तितवाच्य ध्वनि के व्यंग्याथ का चमत्कार व्यञड्जना पर ही 
निर्भर है । 

“विवज्षितान्यपरवाच्य' ध्वनि में तो लक्षणा को कोई स्थान ही नहीं 
है, क्योकि इसमें वाचयार्थ का बाघ नहीं होता, ओर वाच्याथ के वाघ 
के विना लक्षणा हो नहीं सकती है। हों, अभिधा का उपयोग इस ध्वनि 
में अवश्य होता है, क्योंकि वाच्यार्थ विवक्षित रहता है, किन्तु वाच्या्थ 
व्यंग्य-निष्ठ होता है | अर्थात्‌ विवक्तितान्यपरवाच्य ध्वनि के जो दो मुख्य 
भेद हैं, असलकच्यक्रमव्यंग्य ओर संलक्ष्यक्रमव्यंग्य, इनमें असंलक्ष्य 
ऋ्रम-व्यंग्य रसमावादि हैं ओर वे अमिधा के वाच्याथथ नहीं हैँ । यदि वे 
वाच्याथ होते तो रस अथवा »ज्ञार आदि शब्दों के कह देने-मात्र से ही 
उनका आननन्‍्दानुभव होना चाहिए था | पर ऐसा नहीं होता है| “शइज्ञार 
रस, श्रज्ञासस्स कहने मात्र से ही कुछ आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता, 
प्रत्युत रस या »ज्ञार आदि शब्दों का प्रयोग किए बिना ही विभावादिकों 
के व्यज्ञन व्यापार द्वारा रस का आनन्दानुभव होने लगता है। 


यदि यह कहा जाय कि विभावादिकों के वाचक जो दुष्यत्त आदि 
शब्द हैं उनके बिना उन विभावादिकों की प्रतीति नहीं हो सकती है, 
इसलिये रस आदि को लक्षणा का लक्ष्या्थ समझना चाहिये--व्यज्लना 





१ देखो, पृष्ठ &० । 


श्प व्यज्जना का प्रतिपादन 





की व्यर्थ ही कहना करने की आवश्यकता नहीं है | इसका उत्तर यह है 
फि लक्षणा तो वहीं होती है, जहाँ मुख्या्थ का बाघ आदि तीन कारण 
होते हैं | किन्तु जहों रम आदि व्यक्त होते हैं वहाँ मुख्यार्थ का बाघ 
आदि नहीं होता है | अतः असंलक्ष्यक्रम व्यंग्य अभिषा ओर लक्षणा द्वारा 
बोध नहीं हो सकता है । 


संलक्ष्यक्रमव्यंग्य के शब्द-शक्ति-मूलक भेदों में अनेकार्थी शब्दों का 
अयोग होता है, अर्थात्‌ जहाँ अनेकार्थी शब्द होते हैं, वहीं शब्द-शक्ति- 
मूलक सलक्ष्यक्रमव्यंग्य होता है। सयोग' आदि कारणों से अभिधा की 
शक्ति रुक जाने पर ही अनेकार्थ शब्दों का व्यग्याथ व्यञ्जना द्वारा बोध 
होता है। अरथंशक्तिमूलक भेदों में भी अमिधा वाच्यार्थ का बोध कराके 
हट जाती है। अतः वाच्यार्थ के पश्चात्‌ जो वस्तु या अलड्ढार-रूप 
व्यग्यार्थ ध्वनित होता है, उसे अमिधा तो बोध करा ही नहीं सकती है 
ओर मुख्यार्थ का बाध न होने के कारण न वहाँ लक्षणा को ही स्थान 
मिल सकता है। ऐसी परिस्थिति में अरथशक्तिमूलक व्यग्याथ का बोध 
कराने के लिये एक तीसरी शक्ति को अवेज्ञा रहती है, ओर वह व्यज्ञना 
शक्ति के सिवा ओर कौनसी शक्ति हो सकती है * 


अब रही तातय बृत्ति"॥। धनज्लय कृत दशरूपक- के व्याख्याकार 
धघनिक का कहना है “तातय दृत्ति द्वारा ही वाच्यार्थ ओर व्यग्यार्थ दोनो 
का बोध हो सकता है। ताप्पय॑ कोई तराजू पर ठुला हुआ पदार्थ नहीं, 
जो न्यूनाधिक न हो सकता हो | तात्पय॑ का प्रसार ( फेलाब ) जहाँ तक 
इच्छा हो वहाँ तक हो सकता है । फिर व्यग्याथ के लिये व्यज्ञना का 
माना जाना निरथंक है” । किन्तु तात्पय वृत्ति द्वारा व्यग्यार्थ का बोध 
होना बतलाने वाले न्याय का यह सिद्धान्त भूल जाते हैं कि शब्द, बुद्धि 


१ तात्पर्य वृत्ति का स्पष्टीकरण पृष्ठ १०२ में देखिये। 


चतुथ स्ववक शेप८ 





और क्रिया यह तीनो अपना अपना एक एक काय करने के बाद छ्षीण 
हो जाते हैं)--एक के सिवा दूसरा कोई कार्य नहीं कर सकते हैं। 
अमभिधा की शक्ति वात्ष्याथ का बोध कराके ओर लक्षणा की शक्ति 
लक्ष्याथ का बोध कराके जिस प्रकार क्षीण हो जाती है--दूसरा अथ 
बोध नही करा सकती; उसी प्रकार तात्पयं की शक्ति भी वाक्य के प्रथक्‌ 
प्रथक पद्मों का सम्बन्ध बोध कराके ज्ञीण होकर अन्य अथ बोध नहीं 
करा सकती है । जैसे, गड्ा पर घर! इस वाक्य में गड़्ा आदि शब्दों का 
(वाह) आदि वाच्यार्थ बोध कराके अमिधा की शक्ति रुक जाती है | एवं 
धाड़ा' शब्द का लक्ष्या्थ (तट बोध कराके लक्षुणा रुक जाती है। ओर 
तातय बृत्ति गदड़्ा आदि एथक्‌ पथक शब्दों का एक का दूसरे के साथ 
परस्पर सम्बन्ध बोध कराके रुक जाती है | इसके सिवा 'गड़ा पर घर 

वाक्य में (तर भें पवित्रता ओर शीतलता आदि सूचक जिस व्यंग्यार्थ 
की प्रतीति होती है| उस व्यंग्यार्थ का बोध, अमभिधा*, लक्षणा३, ओर 
ताल ४ इन तीनो ही द्वारा बोध नहीं हो सकता है | अतणुव उस ब्यग्यार्थ 
का बोध व्यञ्ञना शक्ति ही करा सकती है | 





2252 द्विकमणां 5. द्वि गे 
१ शाव्दलुछ्रुकसणा वरम्य व्यापाराशाव; । 


२ अभिधा केवल शब्द के सझे तित वाच्याथे गड्गा के प्रवाह का बोध 
करा सकती है | पर शीतल ओर पवित्नता वाच्याथे नहीं है । 


- ३ लक्षणा लाज्षणिक गड्ा शब्द का केवल लच्याथे तट! बोध करा 
सकती है पर शीतलता और पवित्रता लक्ष्यार्थ भी नहीं है । 


४ तात्पय चत्ति गद्ा श्रादि शब्दों का केवल परस्पर सम्बन्ध बोध 
करा सकती है; पर जब शीतलता ओर पविश्नता का किसी शब्द द्वारा 
कथन ही नहीं है, तब तात्पर्य दृत्ति इनका किघ्त शब्द के साथ सम्बन्ध बोध 


5 


करा सकती है ? है - 


र्८६ व्यज्जना का प्रतिपादन 





व्यंग्यार्थ के ज्ञान के लिये व्यञ्जना के माने जाने में ओर भी बहुत-से 
कारण हैं-- 


समान अर्थ के बोधक शब्दों का अभिषेयार्थ सवंत्र एक ही रहता है, 
किन्तु व्यग्यार्थ भिन्न-भिन्न हो सकते हैं | जैसे-- 


सोचनीय अब दो भए मिल्लनन कपाली हेत , 
कांतिमयी वह ससिकला अरु तू कांति-निकेत ।३१७॥ 


तपश्चर्या-रत पाव॑तीजी के प्रति ब्रह्मचारी का कपट-वेष धारण 
किए हुए श्रीशड्गर की यह उक्कि है। 'हे पावंती, कपाली के ( मुण्डमाला 
धारण करनेवाले शिव के ) समागम की इच्छा के कारण अब दो-- 
एक तो चन्द्रमा की वह कान्तिमयी कला, ओर दूसरी नेत्रानन्द-दायिनी 
तू--शोचनीय दशा को प्राप्त हो गए हैं , अर्थात्‌ पहले चन्द्रमा कीः 
कला ही शोचनीय थी, अत्र तू भी हो गई है, क्योंकि तू भी उसी मार्ग 
की पथिक होकर कपाली के समागम की इच्छा कर रही है!। यहाँ 
कपाली' के स्थान पर यदि 'पिनाकी' आदि उसी अर्थ के बोधक शब्द 
रख दिए जायेंगे तो वाच्याथ तो वही रहेगा--शझ्भलुर का बोधक ही 
होगा--पर “कपालीशब्द के प्रयोग में जो अशुद्द नरक्रपाल धारण 
करनेवाला' कहकर श्रीशड्भर का अपने को अचस्पृश्य सूचित करने रूप 
जो व्यग्याथ व्यज्ञनावृत्ति द्वारा प्रतीत होता है. वह पर्याय शब्द से सूचित 
नहीं हो सकेगा | यदि व्यक्षना न मानी जायगी तो ऐसे पदो के प्रयोग 
में जो काव्य का महत्व है, वह सर्वथा लुप्त हो जायगा। 


इसके अतिरिक्त प्रकरण, वक्ता, बोधव्य, स्वरूप, काल, आश्रय, 
निमित्त, कायय, सख्या ओर विषय, आदि में वाच्या्थ ओर उनके 
व्यग्या्थ की पारस्परिक भिन्नता होने के कारण भी व्यज्ञना/का माना जाना 
आवश्यक है। जैसे-- 


चतुथ स्तवक २६० 


सूर्य श्रस्त हो गया! इस वाक्य का वाच्यार्थ समी को एक यही 
जोध होगा कि सूर्य अस्त हो गया हैः--इसके सिवा दूसरा कोई 
वाच्या्थ बोध नहीं हो सकता है | किन्तु व्यंग्याथ प्रकरणादि के अनुसार 
मिन्न-भिन्न रूप में प्रतीत होता है। यदि शत्रु पर आक्रमण करने के 
'प्रकरण में सेनापति अपनी सेना के प्रति यह वाक्य कहेगा तो इसका 
व्यंग्यार्थ यह होगा कि 'शीघ्र धावा करो, यह मोंका अच्छा है! | यदि 
अमिसार के प्रकरण में यह वाक्य दूती नायिका से कहेगी तो इसका 
व्यंग्यार्थ यह होगा कि अभिसार के लिये प्रस्तुत हो जाओ | वासकसजा 
नायिका के प्रकरण में सखी के इस वाक्य में यह व्यंग्य होगा कि तिरा 
पति आना ही चाहता है! । भत्य के प्रति स्वामी के इस वाक्य में अब 
हमे काम करने से निवृत्त होना चाहिए! यह व्यंग्य होगा | शिष्य के प्रति 
गुरु के इस वाक्य में 'सध्यादि कर्म करने चाहिये! यह व्यंग्य होगा । 
गोपालक के प्रति गहस्थ के इस वाक्य में 'गौझं को घर में ले आओ 
यह व्यग्य होगा । भवत्यों के प्रति दूकानदार के इस वाक्य में विक्री की 
वस्ठुओ को समेटकर रखो! यह व्यंग्य होगा | अपने साथियों के प्रति 
पथिक के इस वाक्य में अब कहीं विश्राम करना चाहिए यह व्यंग्य 
होगा । इत्यादि-इत्यादि । निष्कर्ष यह कि प्रकरण, वक्ता तथा बोधव्य की 
मिन्नता के कारण एक ही वाक्य के भिन्न-भिन्न व्यग्याथ होते है| 


“'इत न स्वान वह आज अहो भगत निधरक बिचर" पद्म में भक्त 
को निश्शड्ठ आने को कहा गया है, अतः वात्ष्याथ विधिरूप है| पर 
व्यग्याथ में आने का निषेध है, अतः व्यग्या्थ निषेध रूप है। 'कुच 
के तट चन्दन छूव्यों सबै *“*” इस पद्म में वाच्यार्थ निषेध रूप है, पर 
व्यंग्यार्थ विधि रूप है। इसी प्रकार-- 


१ देखो पृष्ठ ११३ । 
+२ देखो पृष्ठ €२ । 


2२६१ व्यखजना का प्रतिपादन 





पूछुत हैं मतिमानन सो - जन जे मति मत्सरता ते बिहीन के-; 

सेवन जोग बताओ नितंब गिरीन के हैं अथवा तरुनीन के ९ 

त्यों चित ध्वाइवे जोग है जोग वा भोग-विलास कहो रमनीन के ९ - 
श्र तन लाइबे जोग वभूत है के झदु अंग हैं 'चन्द-मुखीन के १३१८॥ 


ऐसे पतद्मों में वाच्यार्थ सशयात्मक होता है। अर्थात्‌ वाच्यार्थ द्वारा 
यह नहीं जाना जा सकता है कि यह किसी विरक्त की उक्ति है. या किसी 
विलासी पुरुष की | किन्तु व्यंग्याथ द्वारा विरक्‍्त वक्ता में शान्त-रस की 
ओर, शज्ञारी वक्ता में ज्भार-रस की व्यज्ञना निश्चयात्मक होती है । 
दूती तू उपकारिनी तो सम हितू न ओर ; 
अति सुकुमार सरीर में सहे जु छुत हित-मोर।३१४९६॥ 
यहाँ वाच्यार्थ स्तुति-रूप है, ओर व्यग्यार्थ निन्‍्दा-रूप । ऐसे स्थलों 
में वाचयार्थ और व्यग्यार्थ में स्वरूप-मेद होने के कारण व्यज्ञना को 
मानना पड़ता है । 
वाच्यार्थ प्रथम बोध हो जाता है, ओर व्यग्याथ उसके पीछे प्रतीत 
होता है,अ्तः काल-मेद के कारण मी व्यज्ञना का मानना आवश्यक है । 


वाच्ष्यार्थ केवल शब्द ही में रहता है, किन्तु व्यग्यार्थ शब्द, शब्द 
के एक अंश, शब्द के अर्थ ओर वर्णों की स्थापना विशेष में मी रहता 
है । इस विषय का 'ध्वनि'प्रकरण में विवेचन किया जा चुका है। अतः 
आश्रय-मेद के कारण भी व्यज्ञना की आवश्यकता सिद्ध होती है ! 

वाच्यार्थ केवल व्याकरण आदि के ज्ञान-मात्र से ही हो सकता है, 
पर व्यग्यार्थ केवल विशुद्द प्रतिमा द्वारा काव्य-्मार्मिकों को ही भासित 
हो सकता है" । अतः निमित्त भेद भी व्यक्नना का प्रतिपादन करता है। 

१ 'शब्दा्थैशासनज्ञानमाश्रेणेव न वेद्यते , 

चेय्ते स॒ हि कान्यार्थतत्वशेरेव केवलं ।--ध्वन्यालोक उ०, १-७ 


चतुथ स्तवक २६२ 


वाच्यार्थ से केवल वस्तु का ज्ञान होता है, पर व्यंग्यार्थ से चमत्कार 
( आस्वादन का आनन्द ) उत्पन्न होता है, अतः यह कार्य-मेद भी 
व्यञ्जना के मानने का एक कारण है| 
१ प्रिया-अधर छुत-जुत निरखि कि हिंके होह न रोष ; 
बरजत हू स-मुप कमल सूँघत भई स-दोष ।३२०॥ 


इसमें वाच्यार्थ का विषय वह नायिका है जिसके अधर पर क्षत 
दीख पडता था, और उसे ही यह वाक्य कहा गया है। अधर को 
भ्रमर ने काटा है, उपपति ने नहीं? इस व्यग्य का विषय नायिका का पति 
है--उसी को सूचन करने के लिये यह व्यंग्योक्ति है । मैं अपने चाठुय 
से इसका अपराध छिपा रही हूँ” यह जो दूसरा व्यंग्य है, उसका विषय 
पडोसिन है, क्योंकि यह बात प|स में खडी हुई पडोसिन को व्यंग्योक्त 
से सूचन की गई है। ओर 'मैने इसके अपराध का समाधान कर द्या' 
इस तीसरे व्यग्य का विषय नायिका की सपत्नि है। इस प्रकार वाच्यार्थ 
से ब्यंग्यार्थ में विषय-भेद्‌ होने के कारण भी व्यञ्जना का मानना परमा- 
वश्यक है | इसी प्रकार-- 
. ५मायके तें कंब हों कित ही निकसी न सदा घर ही महँ खेली ; 

धु'दः कहै अब हों मनभावती आइके खेलि है संग सहेली।' 





१ उपपति द्वारा अपनी कान्ता के अधर को दष्ट देखकर, विदेश से 
आए हुए नायक के कृपित होने पर, नायिका की चतुर सखी का, ड्से 
निरपराध सिद्ध करने के लिये, नायक को सुनाते हुए, यह नायिका के 
प्रति चातुययंगर्सित वाक्य है | हे सखि ! दुंततत-युक्र अपनी प्रिया के अधर 
को देख कर किसे रोष नहीं होता ? यह तेरा ही दोष है, क्योंकि मेरे 
रोकने पर भी तूने उस कमल को सूँघ ही तो लिया, जिप्के भीतर 
भौंरा बैठा हुआ था, और उसने तेरे अधर पर चरण करंदिया है । अ्रव 
अपने पति “के कोपं को सहन कर [ धो ५ 


२६३ व्यञ्ञना का प्रतिपादन 





कालि ही कंटक वृक्षन के लगि कंटक अंग कहा गति मेली ; 
हों बरजों चित के हित तें बन-कुजन में जिन जाय अकेली ।”३२१ 


नायिका के प्रति सखी की उक्ति है| यहाँ वाच्याथ का विषय वह 
नायिका है जिसके अड्धों पर उपनायक द्वारा किए; गए नख-च्तत दीख 
पढ़ते थे। 'इसके अज्लों में, वन की कुज्जों में, केंटीले इच्चो के कॉँटे लग 
गए, हैं ( अर्थात्‌ नख-च्त नहीं हे )' । यह व्यंग्याथं है इस व्यंग्याथ का 
विषय समीप में बंठा हुआ नायिका का पति है । ह 


लक्ष्याथ से व्यग्याथ की विलक्षणता भी देखिए-- व 


जिस लक्षणादृत्ति द्वारा लक्ष्याथं लक्षित होता है, वह लक्षणा 
मुख्याथ के बाघ ओर मुख्याथ के सम्बन्ध आदि की अपेक्षा रखती है, 
किन्तु अमभिधा-मूला व्यञ्जना में--विवज्षितशअ्न्यपरवाच्य ध्वनि में--- 
मुख्यार्थ के बाध आदि की अपेक्षा नहीं रहती है। क्योंकि ध्वनि में 
वाच्य-अर्थ विवज्षित रहता है ओर उसके द्वारा ही व्यग्य-्त्रर्थ प्रतीत 
होता है। 


सम हों कठोर हिय सुवन प्रसिद्ध में तो न ? ( पद्य संख्या ३१६ ) 


में 'राम हो! का अनेक दुःखों को सहन करनेवाला' लक्ष्याथ है। ओर 
क्रर निसाचर रावन ने निज् दारुनता ही के जोग कियो वहि' 

उच्च कुलोचित्त तेरे हू जोग प्रिये ! रहिबो उत दुःखन को सहि। 
ये रुबंस लजाइ के वीर कहादह वृथा धनुबानन को गहि ; 
झ्रानन सो रखि मोह या राम ने हा ! कछु प्रेम के जोग कियो नहिं ।३२२ 


जनकनन्दिनी को उद्देश्य करके वियोगी श्रीरामचन्द्रजी की उक्ति 
है--'रावण ने तेरा हरण करके अपनी ऋरता ओर नीचता के योग्य ही 
कार्य किया, ओर तू अपने धर्-पालन के कारण असझ्य दुःख सहन कर 
रही है, यह भी एक उच्च कुलोलन्न तेरे जैसी के योग्य ही है | किन्द॒ अपने 
प्राणों से मोह रखनेवाले इस राम ने प्रेम का पालन नहीं किया! । वक्ता 


चतुर्थ सतवक.. २६४ 





स्वयं श्री राम हैं। अतः “या राम ने! इस वाक्य में राम का अर्थ उपादान 
लक्षणा द्वारा कायर' होता है | इसी प्रकार-- 

दसहु दिसिन जाको सुजस मरुत सात-सुर गातु ; 

तात वही यह राम है त्रिभुवन-बल-विख्यातु ।३२१॥ 


रावण के प्रति विभीषण की इस उक्ति में राम पद का लक्ष्यार्थः 
है---खर-दृषणादिकों का बध करनेवाला' । 


जिस प्रकार 'सूर्य अस्त हो गया' इस वाक्य में अनेक व्यंग्य सूचित 
होते हैं, उसी प्रकार उपयु क्त उदाहरणों म॑ राम! पद के लक्ष्यार्थ भी 
अनेक होते हैं। अर्थात्‌ जैसे व्यंग्य के अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य, अत्यन्त- 
तिरध्कृतवाच्य आदि अनेक भेद होते हैं, वेंसे ही लक्ष्याथ के भी अनेक 
जेंढ होते हैं | अ्रतण्व यह प्रश्न होता है कि लक्ष्याथ ओर व्यंग्यार्थ में भेद 
ही कया दे ! ओर लक्ष्याथ से व्यज्ञना को प्थक्‌ मानने की आवश्यकता 
ही कया है। उक्त शद्ढा का समाधान इस प्रकार किया जा सकता है कि 
यद्यपि लक्ष्या्थ अवश्य अनेक हो सकते हैं, पर लक्ष्याथं, एक या एक से 
अधिक, वाच्याथ की तरह नियत ( मर्यादित ) रहता है क्‍योंकि जिस 
अर्थ का वाचय-अथर्थ के साथ नियत सम्बन्ध नहीं होता है, उसकी लक्षुणा 
नहीं हो सकती है | अर्थात्‌ जिस प्रकार अनेकार्थी शब्द का अमिधा 
द्वारा एक ही वाच्य-अ्र्थ हो सकता है, उसी प्रकार लाक्षणिक शब्द भी 
उसी एक अर्थ को लक्ष्य करा सकता है, जो वाच्य-अर्थ का नियत 
सम्बन्धी होता है। जैसे गह्ना पर घर' में गद्गा शब्द के प्रवाह रूप 
वान्ष्य-अर्थ का नियत ( नित्य )* सम्बन्धी 'त् है, अतः त ही में गद्भा 
शंब्द की लक्षणा हो सकती है, अन्य किसी अर्थ में नहीं। इसी प्रकार 





३ अ्वाह के साथ तद का नित्य सस्बन्ध॑ इसलिये है कि जल के 
प्रवाह का तट के साथ सदैव सम्बन्ध रहता है । 


२६४ व्यज्ञना का प्रतिपादन 





लक्ष्य-अर्थ भी वाच्य-अ्रथ की मॉति नियत-सम्बन्ध में होता है, पर व्यग्य 
अर्थ प्रकरण आदि के द्वारा (१ ) नियत-सम्बन्ध में, (२) अनियत 
सम्बन्ध में ओर (३ ) सम्बन्ध-सम्बन्ध में होता है। जैसे--'हों इत 
सोवत सास उत” ( देखो, पृष्ठ ६८) में इच्छानुकूल विहार! रूप: 
एक ही व्यग्य है, दुसरा कोई व्यंग्य नहीं है इसलिये व्यग्यार्थ का वाक्य के 
साथ यहा नियत सम्बन्ध है । “प्रिया अधघर-छत-युत निरखि''” ( देखो 
पद्म स० ३१६ ) में विषय-भेद से अनेक व्यग्य-ञ्रथ हैं। इन व्यग्यों 
का एक ही जश्ञाप्य या बोध्य नहीं है; पर भिन्न-भिन्न हैं, अतणव अनियत 
सम्बन्ध है । ओर-- - 


लखहु वलाका" कमल्र-दल बेठी अचल सुहाहि। 
मरकत-भाजन मॉहि जिमि संख-सीप* बिलसाहि ॥३२४॥ 


उपनायक के प्रति यह किसी तरुणी की उक्ति है कि कमलिनी फे 
पत्र पर निश्चल बेठी हुई यह वलाका बड़ी सुन्दर दीख पड़ती हे। जैसे 
नीलमणि के पात्र में रक्खी शद्ड से बनी हुई सीप। यहाँ वलाका' 
को अचेतन सीप की उपमा द्वारा बलाका की निर्मयता रूप व्यंग्यार्थ 
प्रतीत होता है। इस निर्मयता रूप व्यग्यार्थ द्वारा स्थान की निर्जनता 
( एकान्त ) होने रूप दूसरा व्यंग्य सूचित होता है। इस निजनता रूप 
व्यंग्यार्थ द्वारा रति के अनुकूल स्थान होना तीसरा व्यग्य है। ओर इस 
अनुकूल स्थान रूप व्यंग्याथ द्वारा प्रतिबन्ध रहित विलास रूप चोथा व्यग्य 
है | ओर इसके द्वारा रति की अमिलाषा प्रकट किया जाना पोचर्वों 
व्यंग्य है । यहाँ उत्तरोत्तर सम्बन्ध से व्यंग्य की प्रतीति होती है | एक व्यग्य. 





१ बकपक्ती की सादा । 
- २ शहू से बनी हुईं सीपी के आकार की कटोरी । 


चतुथ स्तवक २६६ 


बना न 





की प्रतीति हो जाने पर दूसरे व्यग्य-अर्थ की प्रतीति होती जाती है, यही 
सम्बन्ध-सम्बन्धिता है | 

. इस विवेचना से स्पष्ट है कि वाच्याथ ओर लक्ष्याथ से व्यंग्याथ 
पिलक्षण है, ओर व्यंग्याथ का बोध अभिधा, लक्षणा या तातय 
चूत्ति द्वारा नहीं हो सकता है। अतणएव व्यज्ञना-शक्ति का माना जाना 
अंनिवायंत: आवश्यक है। - | 


महिम भट्ट के भत का खण्डन 


महिम भट्ट व्यज्ञना ओर ध्वनि-सिद्धान्त के कट्टर विरोधी हैं। इन्होंने 
थ्वनि-सिद्धान्त के खण्डन पर “व्यक्तिविवेक'-नामक ग्रन्थ लिखा है| इनका 
'कहना है कि जिस व्यञ्जनादत्ति के आधार पर ध्वनि सिद्धान्त का विशाल 
भवन निर्माण किया गया है, वह व्यज्जना पूर्व-सिद्ध अनुमान के अतिरिक्त 
कोई प्रथक पदार्थ नही है । 
यहाँ यह समझ लेना उचित होगा कि “अनुमान! किसे कहते हैं| 
अनुमान में साधन द्वारा साध्य सिद्ध किया जाता है | साधन कहते हैं हेतु 
या लिड़ को--अवुमान किए. जाने के कारण को, अर्थात्‌ जिसके द्वारा 
अनुमान किया जाता है | साध्य या लिड़ी उसे कहते हैं जो अनुमान के 
ज्ञान का विषय हो, अर्थात्‌ जिसका अनुमान किया जाता है | जैसे घुए 
से अग्नि का अनुमान किया जाता है--'घुओ? साधन (हेतु ) है, ओर 
“अग्नि! साध्य | क्योकि घुएं से यह अनुमान हो जाता है कि यहाँ घुआँ 
है, अतः यहाँ अग्नि भी है। अनुमान में व्याप्ति-सम्बन्ध रहता है, अर्थात्‌ 
धुआँ है वहॉ-वहॉँ अम्रि भी अवश्य है। ओर यह व्याप्ति-सम्बन्ध॑ 
ही अनुमान हे । 
महिम भद्द कहते हैँ कि जिसे तुम व्यम्जक कहते हो--जिसके द्वारा 
व्यंस्याथ का ज्ञान होना बतलाते हो--वह अनुमान का साधन ( हेतु ) 
है । अर्थात्‌ जिस प्रकार घुएं से अग्नि का अनुमान हो जाता है, उसी 


२६७ व्यज्जञना का-प्रतिपादन 





प्रकार तुम्हारे माने हुए व्यज्ञक शब्द वा अ्रर्थ का; जिसे तुम व्यंग्यार्थ 
मानते हो, अनुमान हो जाता है। 


अपने मत की पुष्टि में महिम भट्ट ने ऐसे अनेक पद्य, जिनको 
ध्वनिकार ने ध्वनि के उदाहरणो में दिखाए, हैं, उद्धृत करके उनमे 
“अनुमान' होना सिद्ध किया हे | जैसे-- 


अहो भगत निधरक बिचर वह न श्व्रान इत आज , 
हत्यो ताहि, जो रहत इहि. सरिता-तट मूगराज ॥श्शद॥ 


- यह पद्म किसी कुलग ख््री द्वारा उस भक्त के प्रति कहा हुआ है जो 
उस कुलगा के एकान्त स्थल मे पुष्य लेने के लिये प्रतिदिन आया करता 
था । ध्वनिकार ने कहा हे--“इस पद्म के वाच्याथ में कुत्ते से डरनेवाले 
उस भक्त को, सिंह द्वारा कुत्ते का मारा जाना कहकर निश्शड्ज आने के 
लिये कुलगा कह रही है । किन्तु व्यग्यार्थ में उस कुलय ने उसे, सिह का 
भय दिखाकर, आने का निषेध किया हैं। क्योकि जो व्यक्ति कुत्ते से भय- 
भीत होता है, वह उसी स्थान पर सिंह के रहने की वात सुनकर वहाँ 
जाने का किस प्रकार साहस कर सकता है। ओर यह निपेध व्यग्याथ है! । 


महिम भट्ट का कहना है---जिस वाच्याथ में निश्शह्ल आने के लिये 
कहा गया है, वह वाच्ष्यार्थ ही न आने को कहने का साधन ( हेठ ) है ; 
अर्थात्‌ जिसको व्यग्यार्थ बताया जाता है, वह वध्यज्जना का व्यापार 

है, किन्तु वाच्यार्थ द्वारा ही उसका अनुमान हो जाता है। जैसे 
अग्नि का अनुमान करने के लिए, घुएँ का होना हेठ है, उसी प्रकार 
सिंह के होने की सूचना देना वहाँ आने के निषेध का हेतु है! । इसी 
प्रकार के तकों' द्वारा उन्होंने अपने मत का प्रतिपादन किया हैं। 





१ देखो, पृष्ठ ११३ । 
१७ 


चतुर्थ स्तवर्क श्ध्८ 


न 





आचार्य मम्मठ ने इन तकों का बडी सारर्भितं युक्तियों दारा 
खण्डन किया है। श्रीमम्मठ कहते हैं--“'सिंह का होना जो तुप अवुर्मान 
का हेतु बताते हो, वह अनैकान्तिक हे--निश्चयात्मक नहीं है | अनु- 
मान वहीं हो सकता है जहाँ हेतु निश्चयात्मक होता है। जैसे अग्नि का 
अनुमान वही हो सकता है, जहाँ घुए का होना निश्चित है | यदि धुएं के 
अस्तित्व में ही संशय है तो अग्नि का अतुमान मी नहीं किया जा सकता | 
कुलय द्वारा सिंह का होना बताए जाने में उस भक्त के वहाँन आने 
का हेतु निश्चयात्मक नहीं है। क्योंकि गुरु या स्वामी की आज्ञा से या 
अपने किसी प्रेमी के अनुराग से अथवा ऐसे ही क्रिसी विशेष कारण से 
डस्पोक व्यक्ति का भी भय वाले स्थान पर जाना हो सकता है | अ्तण्व॑ 
यहाँ हेतु नहीं--हेतु का आभास हैं। फिर वहाँ पर सिंह का होना, न 
तो प्रत्यक्ष सिद्ध है, और न अवुमान-सिद्ध ही है। सिह को बतलानेवाली 
एक कुलटणा हैं, जिसक्रा कथन आप्त-वाक्य ( सत्यवादी ऋषियों का 
वाक्य ) नहीं हो सकता हैं, प्रत्युत ऐसी स्त्रियों का कूठ बोलना तो 
स्वभाव-सिद्ध है। अतएव वहाँ सिह हे या नहीं ? यह भी सन्देहास्पद है। 
इस प्रकार व्याप्ति-सम्बन्ध, जिसका होना अनुमान के लिये परमावश्यक 
है सन्दिग्ध है । ऐसी अवस्था में अनुमान सिद्ध नहीं होता है| महिम 
भट्ट के सभी आक्षेपों का इसी प्रकार समुचित उत्तर देकर मम्मठचार्य 
ने यह भली भाँति सिद्ध कर दिया हैं कि व्यज्जना का माना जाना 


आवश्यक है, ओर उसका व्यंग्यार्थ, अनुमान का विषय किसी भी प्रकार 
नहीं हो सकता है। 


» यहाँ तक काव्य के प्रथम भेद “ध्वनि? का निरूप॑ण किया गया है ) 
अब काव्य के दूसरे मेद गुणीमभूतव्यंग्य का निरूपण किया जायंगा ) 


-ज़ट+क-- 


पञचम स्तवेक॑ 





गुणीभूतव्यंग्य 





बा् 05 तह गुणीभूतव्य॑ 
च्याथ, से गोण व्यंग्याथं को 'गुरणीभृतव्य॑ग्या 

कहते हैं। 

गोण का अर्थ है अप्रधान, ओर 'गुणीभूत' का श्रर्थ है गोण हो 
जाना--अप्रधान हो जाना । वाच्यार्थ से गौण होने का तात्यरय यह है कि. 
व्यग्य का वाच्यार्थ से अधिक चमत्कारक न होना--वाच्यार्थ के समान 
च॑मत्कारक होना या वाच्याथथ से न्यून चमत्कारक होना | 

ध्वनि और गुणीमूतव्यंग्य में यही भेद है कि ध्वनि में वाच्यार्थ. से . 
व्यग्याथ प्रधान होता है। ओर गुणीभूतव्यग्य में वाच्याथ से ध्यंस्यार्थ 
अप्रधान होता है । 

गुणीभूतव्यग्य के प्रधानतः आठ भेद होते हैं। ( १ ) अगूछ, ( २ ) 
अपराज्ञ, ( हे ) वाच्यसिध्यज्ञ, (४ ) अस्फुट, (४ ) सन्दिग्ध, (६) 
तुल्यप्राधान्य, ( ७) काक्काक्षित ओर ( ८) असुन्‍्दर | 


( £ ) अगूढ व्यंग्य 


जो ्य॑ग्याथ वाच्यार्थ के समान स्पष्ट प्रतीत होता है, 
उसे अगूह व्यंग्य कहते हैं | 


प्चम स्तवक ३०० 


कुछ-कुछ प्रकट होने वाला व्यंग्यार्थ ही चमत्कारक होता है--न 
कि सर्वथा स्पष्ट प्रतीत होने वाला । अतः स्पष्ट प्रतीत होनेवाला व्यंग्याथ 
प्रधान न रहकर, गोंण हो जाता है" | 


लक्षणा-मूलक अगूढ ठ्यंग्य-- 
उदाहरण-- 


पाननि जोरि नतानन ही सरनागत सम्रु किते ढिंग आइके ; 

, चाहते जाकी क्ृपा-अवलोकन ठाढ़े सदा मुख-ओर लखाइके ; 
सो श्रब नॉँचि रिर्ावत हों अ्ररू मेखला की रसरीन बनाइके ; 
जीवत हों न,अ्रहो धिक है जरि जाय ये क्‍यों न हियो धधकाइके ॥३२६ 


विराट राजा के यहाँ गुप्त रूप में पाणडवों के रहने के समय, कीचक 
की नीचता को सुनाती हुईं द्रोपदी के प्रति अज्ज न की यह उक्ि है। 
अजु न जीता हुआ ही कह रहा है, 'जीवत हो न॑ अतः इस 
वाक्य के मुख्याथे का बाध है | यहाँ "मेरा प्रशंसनीय जीवन नहीं है” 





4. नाधीपयोधरइवातितरां प्रकाशो 
नो गुजेरीस्तनइवातितरां निगृढ़:; 
अ्र्थों गिरामपिहितः पिहितश्च कश्चित्‌ 
सोभाग्यमेति मरहटटवधूकुचाभः ।! 
अर्थात्‌ तैलद्विनी कामिनी के पयोधरों की भॉति न तो नितानत प्रकट 
और गुजर रमणी के स्तनों की भाँति न सर्वथा ढका छुश्रा ही, किन्तु 
रराष्ट्कामिनी के कुर्चो की भाँति कुछ खुला और कुछ ढका हुआ 
व्यंस्याथे शोमित होता है। किप्ती कवि ने'यों भी कहा है--- 
सर्वे ढके सोहत नहीं उधघरें होत कुवेस ; 
अरध दके छुवि देत अति कवि-अक्तर कुच केस 7? 


३०१ अगूढ व्यंग्य 





यह लक्ष्यार्थ है। व्यग्य यह हैं कि 'इस जीवन से मरना ही अच्छा है! । 
यह व्यग्यार्थ, वाच्यार्थ के समान स्पष्ट है। 'जीवत हो न! का वाच्यार्थ 
मेरा श्लाघनीय जीवन नहीं? इस अर्थान्तर में सक्रमण करता हैं। जिस 
प्रकार लक्षणा-मूला अविवक्षितवाच्य में अर्थान्तरसक्रमितवाच्य ध्वनि 
होती हैं, उसी प्रकार यहाँ अविवज्षितवाच्य श्रर्थान्तरसक्रमित अगूढ 
गुणीभूत व्यग्य है | इस अगूढ व्यग्य के मूल मे उपादान लक्षणा रहती है | 


“ओरई कु द-कली अश्रली देत गुहे बिन पाँत सु जानन लागी ; 
ओऔरई कोमल विद्र म-पत्लव ओठनि सों ठनि मानन लागी । 
“बेनीप्रवीन” स्नाल बिना दग औरइ कौ ल वखानन लागी , 
आवत ही सिखई शुरुजोबन ये उपमा उर आवन लागी 7?३२७ 
हे यहाँ 'सिखई गुरु-जोबन” का मुख्या्थ योवन द्वारा शिक्षा देना? 
है। शिक्षा देने का कार्य चेतन का है, अतः अचेतन यौवन द्वारा शिक्षा 
का कार्य असम्भव होने के कारण मुख्यार्थ का बाध है--मुख्यार्थ सवेथा 
छोड दिया जाता हैं। अतः अत्यन्ततिरस्क्ृतवाक््य हैं। यौवन के आने 
से अड्डों में स्वतः लावए्य का आ जाना' व्यग्याथ है। यह व्यायाथे 
वाच्याथ के समान स्पष्ट होने के कारण अगूढ है । 

ग्ृह-वापिन में अरविदून के बन ये सजनी ! विकसाने लगे; 

चहुँश्नोर मधुत्रत वृद यहाँ मकरंद-लुभे मेडराने लगे। 

तुव आनन की छुबि चंदस्मुखी ! तजि-चंद अबे पियराने लगे ; 

रवि हू उदयाचल-चु'बि भएु लखु री यह कैसे सुहाने लगे ।३२८॥ 

यहाँ सूर्य-बिम्ब द्वारा उदयाद्वि का चुम्बन किया जाना मुख्यार्थ है । 
प्रभात का हो जाना व्यग्यार्थ है। सूर्य द्वारा चुम्बन असम्भव होने के 
कारण वाच्यार्थ को सर्वथा छोड़कर “उदयाचल के साथ सूर्य की 





१ घर में बने हुए तालाबों में । 


“पफ्ूचम स्तवक ३०२ 


शश्मियों का संयोग होना! लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है अतः अत्यन्त- 
पतिरस्कृतवाच्य है। यह व्यंग्या, वाचयाथ के समान स्पष्ट बोध हो रहा 
है, अतः अगूढ है। इस अगूढ व्यंग्य में लक्षण-लक्षणा होती है । 


“केलि-कला की फझलानि को मेलि रची रस रासि सची मुख थाती ; 
अंगन अंग समोय रही कछु सोह रही रस आखसव-माती । 
ऐसे में आय गयो है अचानक कंज-पराग-भरथो" उतपाती ; 
प्रीवम के हिय लागी तऊ उहि सीरे समीर जराइ दी छाती ।३२६ 


यहों भी प्रभात होना व्यंग्यार्थ है, किन्तु 'कंज-पराग-भरतथों 'सीरे 
समीर के कथन से प्रभात का होना स्पष्ट प्रतीत नहीं होता--उसकी 
प्रतीति विचार करने पर ही होती है। अतः यहाँ गूढ व्यंग्य है | अगूढ 
ओर गूढ व्यंग्य में यही विशेषता है। 


अथ-शक्ति-मूलक अगूढ व्यंग्य-- 
हुआ था फणि-पाश२-बन्धन यहाँ, द्वोणाद्वि लाथा यहाँ, 
तेरे देवर? के लिये शशिम्लुखी ! जा मारुतीर ही वहाँ। 


सोमित्री-शर से सुरेन्द्रजित भी स्वगंस्थ हूआ यहीं ; 
कीया था दशकण्ठ का वध यहीं देखो किस्री ने कहीं ।३३० 


विमान पर बेठकर अयोध्या को लोटते समय विजयी श्रीरधुनाथजी 
की जनकनन्दिनी के प्रति यह उक्ति है। चोथें पाद का वाच्यार्थ है-- 
रावण का बध किसी ने यहीं कहीं किया था?! । इसमें हमने किया 
था व्यग्याथ है। यह व्यंग्याथ, वाच्याथ के समान स्पष्ट हे, इसलिये 
अगूछ है | जिस प्रकार अभिषा-मूला अथ-शक्ति-मूलक ध्वनि मे वस्तु से 


३ कमलों की रज से भरा हुआ । “7 ०ापिपतया न ता: 
२ नाग-पाश । ३ लक्ष्मणजी के लिये। ४ हनूंमानजी । 


३०३० अपराह् व्यंग्य 


चस्तु-रूप गूढ़ व्यग्य होता है, उसी प्रकार यहाँ वस्तु से वस्तु-रूप अगूढ 
व्यंग्य है। यहीं देखो किसी ने कहों? के स्थान पर पप्रिये ! देखो यहीं ते 
कहीं? कर देने पर ध्वनि! हो जाती है। क्योंकि प्रिये | देखो यहीं तो 
कहीं ? पद का प्रयोग किया जाने से रावण का बंध करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी 
की गूढ-व्यंग्य द्वारा प्रतीनि होती है | 


“द्वोन कहे भ्ूकुटी करि बंक्र भए सुत कायर मंगल गावें , 
राज-सभा बिच नाहर रूप रु कम परे पर स्थार कहावे। 
क्यू तुम्ले नप पूत दुखासन ! गाल बजाइ के बीरता पार्चे 
सात्यकी तें बचे जन्म भयो नयो, सूप बजाबे कि थार बजावें ३३१ 


सात्यकी से पराजित दुश्शासन के प्रति द्रोणाचाय के ये वाक्य हैं | 
धात्यकी से पराजित होकर ठुके सकुशल्त आया हुआ देखकर हम तेरा 
नया जन्म हुआ समभते हैं | इस नए. जन्म के हर्ष में सूप बजावे या 
थाली । यहाँ 'ठुके कन्या समझें या पुरुष ? व्यग्य हैं यह काच्य के 
समान स्पष्ट है। क्‍योंकि पुत्र-जन्म के समय थाली ओर कन्या-जन्म 
के समय सूप बजाने की लोक-्प्रसिद्द प्रथा है। 


“अ्गूढ-व्यग्य' शब्द-शक्ति-मूलक वस्तु रूप ओर अलड्लार रूप नहीं 
हो सकता, ओर न असलक्ष्यक्रम ही हो सकता है, क्योंकि शब्द-शक्ति- 
मूलक व्यग्य की प्रतीति सहसा नहीं हो सकती है, वह गूढ व्यग्य ही 
होता है | असलक्ष्यक्रम मे भी विभावादिकों के द्वारा व्यग्यां की विलम्ब 
से प्रतीति होती है, वहाँ भी व्यग्य 'गूढ ही होता है । 


( २ ) अपराड़ व्यंग्य 


जो व्यंग्याथ किसी दूसरे अर्थ का अड्ग हो जांता है 
उसे अपराड़ व्यंग्य कहते हैं| 


पञव््चम स्तवक ३०४७ 





अर्थात्‌ असंलच्यक्रमव्यंग्य ( रस, भाव आदि ) या संलक्ष्यक्रमव्यग्य 
जहा असंलक्ष्यक्रमव्यग्य ( सस, भाव आदि ) के या संलक्ष्यक्रमव्यंग्य के 
अथवा वाच्यार्थ के अज्ञ हो जाते हैं, वहाँ उन्हें अपराड्र व्यग्य 
कहते है । ह 


यहाँ अद्जा से उस प्रकार के अड्लो से तात्पर्य नहीं है, जैसे शरीर 
पु / का 
के अद्भ हाथ-पेर आदि हैं ओर कपडे का अड्ध सूत। यहाँ अड़ कहने 
का तालय हैं अपने सयोग से अड्भी को उद्दीपन करना! | 


ध्वनि प्रकरण में असलक्ष्यक्रम व्यंग्य ( रस,भाव आदि) को ध्वनि के 

भेद कह आए हैं, क्योंकि वहाँ ये प्रधान व्यंग्य होकर ध्वनित होते हैं। 

अर्थात्‌ अलड्डार्य रूप ( दूसरे से शोभायमान होने वाले ) होते हैं। इस 

लिये वहाँ इनकी ध्वनि सज्ञा है। यहाँ इनको गुणीभूतव्यंग्य बताने का 

कारण यह है कि यहाँ ये अपराड्र (दूसरे के अज्ञ ) होने के कारण गौण 

( अ्रप्रधान ) होते हैं । अथात्‌ यहाँ यह प्रधान न रहकर केवल अलड्ढार 

, रूप (दूसरे को शोमित करनेवाले ) रहने से गुणीभूतव्यंग्य कहे 
जाते हैं। 


यहाँ यह प्रश्न होता है कि निवंद आदि व्यमभिचारी भावों को जो 

रस के अदड्भ ओर शोभाकारक हैं, वे अलड्जार क्यो नहीं माने जाते हैं! 
८ थः ्ृढ 

इसका उत्तर यह है कि जिस प्रकार हाथ-पर आदि शरीर के अवयव हैं 

आर शरीर की शोभा भी करते हैँ, पर ये अलड्ढार नहीं कहे जाते, उसी. 

प्रकार व्यमिचारी भाव यद्यपि रस के अवयव हँ--उनसे रस की सिद्धि 
होती है--पर वे अलड्डार नही कहे जाते | 


रस में रस की अपराद्भता-- 


जहाँ किसी दूसरे रस का अथवा भाव, रसाभास, भावाभास आदि 


३०४ अपराड् व्यंग्य 





का रस अज्ज ( अपराड़ ) हो जाता है, वहाँ ( रस का सम्बन्धी हो जाने 
के कारण ) 'रसवत” अलड्डार कहा जाता है | 
यहां रस का अपराड़ होना कहा गया है, कित्तु रस किसी दूसरे 
का अज्भ नहीं हो सकता है | अतः जहाँ कोई रस अपराड्) हो जाता है, 
वहाँ उस रस के स्थायी भाव को ही समझना चाहिये । 
उदाहरणु-- 
उरु-जघनन सपरस करन, कुचन विमर्नहार ; 
हा ! यह प्रिय-कर है वही !, नीवो खोलनवार ।३३२॥ 


महाभारत युद्ध में भूरिश्रवा के कटे हुए हाथ को अपने हाथ में 
लेकर यह उसकी स्त्री का कारुणिक ऋन्‍दन है। यह पद हाथ की 
वतमान दशा को सूचित करता है। और “वही पद पहले की सजीब 
अवस्था को उत्कृष्ट दशा का स्मरण कराता है| अर्थात्‌ इस समय यह 
हाथ अनाथ की भाँति रण-भूमि की मिट्टी से मलिन है। इसको खाने 
के लिये गिद्द दृष्टि डाल रहे हैं | यह वही हाथ है, जो पहले शत्रुओं का 
गये चूर् करने में समर्थ था, शरणागतो को अभय देने वाला था ओर 
काम के रहस्यों का मर्मश था। यहाँ स्मरण किया गया शरज्ञार-रस, 
करुण-रस को पुष्ट कर रहा है , अश्रतः >»शज्ञार-रस, करुण रस का अद्ड 
हो जाने से अपराड् <्ञार रस हे। यहाँ असलक्ष्यक्रम का अस- 
लकच्ष्यक्रम व्यग्य अड्भ है ।* 





5 


१ 'उरुजघनन सपरसकरन” उदाहरण में यह शक्का हो सकती है कि 
जब यहाँ भकरणगत अपने मृतक पति के शोक में उसकी पत्नी का 
ऋन्दन होने के कारण करुण-रल की प्रधानता संभव है, तब इसे ध्वनि 
न मानकर गुणीमूत व्यंग्य क्यों माना जाता है ? इसका उत्तर यह है कि- 
ऐसा तो प्रायः कोई भी विषय नहीं, जहाँ ध्वनि शोर गुणीभूतब्यंग्य से 
एक के साथ दूसरे का संकर या संसृष्टि रूप से मिलाव न रहता हो | 


'पयव्ज्वम स्तवक ३०६- 


भाव मे रस की अपराड्ता-- . - ह 
इच्छा मेरे न धन-जन या काम-भोगादिको की, 
होते हैं ये सुखद न सदा कर्म-आधीन जो कि। 
है तेरे से सविनय यही प्रार्थना मातु! मेरी, 
गह् ! पादास्वुज-युगल की दीजिए भक्ति तेरी ।३३३॥ 


पहले दोनो चरणो में वेराग्य का वर्णन होने से शान्त रस की 
व्यज्ञना है | उतराद्ध में श्रीगड़ाजी के विषय में जो देव-विषयकर रति-- 
भक्ति-भाव--की व्यज्ञना है उसको शान्त रस की व्यञ्जना पुष्ट कर रही 
है। इसलिये यहाँ शान्त रस, देव-विषयक रवति-माव का अड्ढ हो गया है। 
यहाँ भाव में रस की अपराड्धता है | 


आव में भाव की अपराज्नता-- 
जब एक भाव किसी दूसरे माव का अड्ज हो जाता है तब उसे, 
अत्यन्त प्रिय हो जाने के कारण, 'प्रेयल” अलझ्लार कहते हैं । 


जाते ऊपर को अहो! उतर के नीचे जहाँ से छृती, 

है पेड़ी हरि की अलोकिक जहाँ ऐसी बिचिन्नाकृती । 
स्र्गारोहण के सदेव इनके हैं मार्ग केसे नए, 

देखो ! भू गिरती हुई सगरजो को स्वरगंगामी किए !३३४॥ 


अर्थात्‌ ध्वनि में गुणीभूतव्यंग्य का ओर गुणीमूतब्यंग्य में ध्वनि का __ 
मिश्रण प्रायः रहता ही है । किन्तु जहाँ जिसकी प्रधानता होती है --जिसमें 
अधिक चमत्कार होता है, उसी के नाम से व्यवहार हुआ करता है। 
थ्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति! अतएवत्र उक्त उदाहरण में करुणएरस कौ 
अपेक्ता श्यज्ञार रस की गोणता, में ही अधिक चमत्कार है | इसलिये यहाँ 
फरुण-रस न मान कर ख्यद्भार-रप्त की 'गोणता के कारण गुणीभूतब्यंग्य 


साना गया है | वह व, 
|] 


३०७ अपराड़ः व्यंग्य 





यहाँ स्वरग-मार्ग की विचित्रता का जो वर्णन किया गया है, उसमें 
“विस्मयें भाव है |. वह गल्जा-विषयक रति-भाव का श्रद्ध है, अतः यहाँ 
झक भाव दूसरे भाव का अज्ञ है। 


रुधिर-लिप्त-चसना सिथिल खुले केस दुति-हीन ; 
रजवति युवति समान नृप ! तू रिपु-सेना कीन्ह ३१६॥ 


यहाँ रजस्वला की अवस्था के वर्णन में ग्लानि-भाव की व्यज्ञना है । 
यह, शत्रु सेना की ताहश अवस्था में जो ग्लानि एवं त्रास भाव की 
व्यज्ञना है, उसका अद्भ है| क्‍योंकि रजस्वला की उपमा से, शत्र सेना 
में जो ग्लानि ओर त्रास की व्यजञ्ञना होती है, उसकी पुष्टि होती है। 
इनके द्वारा राजा के प्रताप का उत्कर्ष ध्चनित होता है। ओर ये ग्लानि 
' एवं त्रास-भाव दोनो राज-विषयक रति-भाव के अज्भ हैं । 
रसाभास की अपराद्गता-- 


इसे उज॑स्वी अल़ड्जार कहते हैं । 


लखि बन फिरत सुछुंद तप ! तुव रिपु-रमनीन सौ ; 
करतु विलास पुल्िंद तज्ञि निज-प्रिय-बनितान को ।३३४॥ 


यहाँ उमय-निष्ठ रति नहीं है । राजा की रिपु-र्मणियों का प्रेम 
आऔीलों में नहीं है, केबल भीलों का ( पुलिंदो का ) ही प्रेम उन रमणियो में 
है। भीलो का प्रेम राज-रमणियों में होना अनुचित है, अतः रसामास 
है | यह रसामास कवि की राज-विषयक रति-भाव का अक्ञ है, क्योंकि 
इस वर्णन से राजा की प्रशसा का उत्कर्ष होता है इसलिये भाव का 
रसाभास अड्ज है। 


भावाभास की अपराड्रता-- 


इसे भी उजस्वी अल्डार कहते हैं । 


पन्‍्चस स्तवक ३०८ 


सफल जनम निज हम गिन्यो रन तुब दरसन पाय ; 
यो अरि नप हू कहत तुहि जस फेल्यो भरुवि माँय ।३१७०ा 


विजयी राजा की शत्रुओं द्वारा प्रशंता की जाने में जो राज-विषयक 

रति-भाव है बह भावामास है| क्योंकि विजित शत्र-द्वारा की गई विजयी 
राजा की चाटुकारी मे प्रशंसा का आमास मात्र है। यह भावाभास कवि 
द्वारा की हुई राजा की प्रशंसा का उत्कपक है, अतः यहाँ भावाभास 
राज-विषयक रति-भाव का अड्ढ है| 
“ज्ञोन भरे सिगरे ब्रज सोंह सराहत तेरेद सील सुभाइन ; 

छाती सिरात सुने सबकी चहुँ ओर ते चोप चढ़ी चितचाइन । 

एरी बलाइ यों मेरी भट्ट ! सुनि तेरी हों चेरी परों इन पाइन ; . - 

सौतिहु की अ्रंखियाँ सुख पावति तो सुख देखि सखी सुखदाइन।?३ ३१८७ 


'सोतिहु की ऑँखियोँ सुख पावति' में मावाभास है--नायिका 
विषयक सपत्नी का रति-भाव आमासमात्र है। सखी द्वारा नायिका के 
शील की जो प्रशंसा की गईं है, वह सखी का नायिका बिष्रयक रति-भाव 
हे। इस रति-भाव का उक्त भावाभास अड्ज है, क्योंकि इसके द्वारा 
नायिका के शील का उत्कप सूचित होता है । 
भाव-शान्ति की अपराद्भता-- 

इसे समाहित” अलड्ढडार कहते हैं| 


गरजन अति तरज्नन करत रहे जु अखिन घुमाह ; 
लखि तुहि रन में श्ररिव को सईद वह गयो बिलाइ ।३३ शा 


यहाँ गव॑-भाव की शान्ति है। यह भाव-शान्ति राजा के महत्व 
की उत्कर्षक है, अतः राजविषयक रति-माव का अद्ग है। यहाँ मद 
का अर्थ गव॑ नहीं है--तलवार घुपाना आदि है अतः “मद! शब्द से 
गवं-सश्चारी का शब्द द्वारा कथन नहीं समझना चाहिए] 


३०६ अपराज्ध व्यंग्य 


“परे चैरि-भूपति अनूप रति-मन्दिर में; 

सुन्दरनि संग ले अनंग रस लीने है। 
भने 'डजियारे! विपरीत चह चोर माँह ; 

भारे भए दया भूप कोतुक नवीने हैं। 
जैनी स्ग नेनी की परी है कंठ आई ताहि ; 

तेरो तेग सुमरि सुभाईइ चित चोने हैं। 
छाॉँढ़ि परजंक तें मयंक-मुखी अंक तें जु, 

भाजत ससंक तें अतंक भय-भीने है ।३४०॥ 


यहाँ रति-भाव की शान्ति है। यह राजा के महत्त्व की उत्कर्षक है। 
अतः वह राज-विषयक रति-भाव का अद्ग है। 


भावोदय की अपरादड्रता-- 


इसे 'भावोदय' अलड्जार कहते हैं। 


“बाजि गजराज सिवराज सेन साजत ही , 

दिल्‍ली दुलगीर दसा दीरघ दुखन की ; 
तनिया न तिलक सुथनियों पग्गनियाँ न, 

घामें घुमरात छोडि सेजियाँ सुखन की । 
भसूषन! भनत पति-बॉह बहियाँ न तेऊ , 

छुहियाँ छुब्चीली ताकि रहियाँ रुखन की ; 
यालियाँ विधुरि जिसि आलियाँ नत्विन पर" , 

लालियाँ मलिन मुगलानियों मुखन की ।?३४ १॥ 


4 अलि ( भौरे ) जेसे कमलों पर मरढराते हैं, उसी प्रकार कानों, की 
बाजलियाँ सुख पर गिर रहो हैं । । 


पंच्च्म स्तवक : इ१७० 





यहाँ शिवाजी की सेना के सुसज॑ होंने पर यवर्न-रमणियों में त्रॉस-भाव 
का उदय ध्वनित'होतां है | यह माबोदय कविराज भूषण द्वारा की हुई 
शिवाजी की स्ठ॒ति का पोपक है, अतः राजविषयर्क रतिं-माव“का अज्ज है | 
भाव-सन्धि की अपराज्जता-- | 
इसे 'भाव-सन्यि' अलड्लार कहते हैं। 


इत जाव सहे न श्रहो ! लखिके रूदुगात महातप-ताप तएँ ; 
गिरजा-मुख की पिय बातन हू सों श्रघात न है श्रति भात हिए। 
छुल-वेष-हटावन को जो त्वरा अरु सेथित्न सो अभियुक्र भए ; 

“ वह शंकर या निञ किंकेर के हरिए भव-दुःख भयंकर ए्‌ ॥३४२॥ 


यह श्रीमहादेवजी की स्तुति है। “कठोर तप के कारण पाव॑तीजी के 
अड्जो को क्षीय होते हुए, देखकर उन्हे वर देने के लिये अपना कप८-वेष ' 
छोड़ने की जिन्हे जल्दी लगी हुई है। पार्वतीजी के साथ श्रीशझर की 
( ब्ह्मचारी के कपट-वेष मे ) जो बाते हो रही हैं, उस आनन्द को भी 
वे छोड़ना नहीं चाहते हैं। ओर इसलिये उस कपट-वेष को छोडने को 
भी जिनका मन नहीं मानता है। ऐसी अवस्था में फेंसे हुए त्वरा और 
शेथिल्य भावों से श्रमियुक्त श्रीशद्जर मुझ किड्जर के सासारिक दुःखों को 
हरण करे |” यहाँ त्वरा' मे आवेग और 'शैथिल्य' में धघ्रूति इन दोनो 
भावों की जो सन्वि है वह श्रीशड्गर्विषयक्र रति ( भक्ति ) भाव का 
अड्भ है। यद्यपि आवेग और थे परस्पर विरोधी हैं, किन्तु यहाँ समान 
बल होने से एक से दूसरे का उपमर्दन नही है। 


भाव-शबलंता की अपंराज्गता-- 
इसे 'भाव-शबलता”' अलड्डार कहते हैं | 
पट देहूँ लला ! करे जोरि कहैं बरजोरी भला ने इती पकरो हे 
हम जाय पुकारहिंगी नृप्सों बढ़ि जाइंगो नोहक ही भगरों। 


३१३ अपराड़ व्यंग्य 





लखि लोग कहा कहि हैं ? समुझो ! घंज-सीरिन्सो न अ्रनीति करो , 
हँसि- तीर बुलायके चौर दिए यदुवीर॑ वही भव-भीर हरो॥३४३ 


यहाँ 'करजोरि कहैं! में दीनता, 'बरजोरी में असूया, जाय 
पुकारहिंगी' मे गवं, 'बढि जाइगो झकागरों में स्टृति, “लखि लोग में 
द्रीड़ा, कहा कहिहँ' में वितक, ओर 'अनीति न करों! में विबोध भाव 
है | इन सब भावों का एक साथ प्रतीत होंन